Anti Paper Leak Bill 2026 : लोकसभा के बाद अब राज्यसभा ने भी एंटी-पेपर लीक बिल को मंजूरी दे दी है. विपक्षी सांसदों के वॉकआउट के बाद यह विधेयक ध्वनिमत से पारित हुआ. इसके साथ ही अब लोक परीक्षा संशोधन विधेयक-2026 संसद के दोनों सदनों से पास हो चुका है. इस नए कानून का उद्देश्य पेपर लीक और परीक्षा में होने वाली धांधली पर सख्ती से रोक लगाना है. ऐसे में आइए जानते हैं कि लोकसभा-राज्यसभा में एंटी-पेपर लीक बिल पास के बाद अब क्या प्रोसेस है और इस बिल में कौन-कौन से जरूरी प्रावधान किए गए हैं.
संसद से पास होने के बाद अब क्या प्रोसेस है?
लोकसभा और राज्यसभा दोनों से विधेयक पारित होने के बाद अब इसे राष्ट्रपति के पास मंजूरी के लिए भेजा जाएगा. राष्ट्रपति की स्वीकृति मिलते ही यह विधेयक कानून बन जाएगा और पूरे देश में लागू हो जाएगा. सरकार का कहना है कि इस कानून का उद्देश्य सार्वजनिक परीक्षाओं में पेपर लीक, नकल और अन्य अनुचित तरीकों पर सख्ती से रोक लगाना है.
इस बिल में कौन-कौन से जरूरी प्रावधान किए गए हैं?
नए संशोधन के अनुसार, अगर कोई व्यक्ति पेपर लीक या अनुचित तरीकों का इस्तेमाल करते हुए पकड़ा जाता है, तो उसे कम से कम 5 साल और अधिकतम 10 साल तक की जेल हो सकती है, साथ ही 50 लाख रुपये तक का जुर्माना भी लगाया जा सकता है. वहीं अगर यह अपराध किसी संगठित गिरोह या माफिया के तहत किया जाता है, तो ऐसे मामलों में 7 से 10 साल तक की जेल और 10 करोड़ रुपये तक के जुर्माने का प्रावधान है. इसके अलावा एआई की मदद से नकल करना, परीक्षा प्रणाली को हैक करना, ऑनलाइन प्रश्नपत्र भेजना और साइबर फ्रॉड जैसे अपराध भी इस कानून के दायरे में आएंगे.
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सेवा प्रदाताओं पर भी होगी सख्त कार्रवाई
विधेयक में परीक्षा आयोजित कराने वाली सेवा प्रदाता कंपनियों के लिए भी कड़े नियम बनाए गए हैं. अगर किसी सेवा प्रदाता की लापरवाही या इन्वोल्वमेंट सामने आती है, तो उस पर 5 करोड़ रुपये तक का जुर्माना लगाया जा सकता है. इसके अलावा उसे 8 साल तक परीक्षा आयोजन से प्रतिबंधित किया जा सकता है. कंपनी के निदेशकों और प्रबंधन के खिलाफ भी 5 से 10 साल तक की जेल और 5 करोड़ रुपये तक के जुर्माने का प्रावधान रखा गया है.
जांच और सुनवाई के लिए तय होगी समय सीमा
इस कानून के तहत पेपर लीक के मामलों की जांच तेजी से पूरी करने की व्यवस्था की गई है. जांच एजेंसी को दो महीने के अंदर जांच पूरी कर आरोपपत्र दाखिल करना होगा. इसके बाद विशेष फास्ट ट्रैक कोर्ट में चार्जशीट दाखिल होने की तारीख से तीन महीने के भीतर मुकदमे की सुनवाई पूरी करने का लक्ष्य रखा गया है. विधेयक के तहत राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को विशेष फास्ट ट्रैक कोर्ट नामित करने का अधिकार दिया जाएगा. जरूरत पड़ने पर केंद्र सरकार विशेष जांच दल (STF) या किसी केंद्रीय एजेंसी से भी मामले की जांच करा सकेगी. साथ ही मामलों की पैरवी के लिए विशेष लोक अभियोजक की नियुक्ति भी की जाएगी.
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