खुले समुद्र में एक तेल का टैंकर, आसमान से उतरते हेलिकॉप्टर, चारों ओर युद्धपोत और पनडुब्बियों की हलचल- ये किसी फिल्म का सीन नहीं, बल्कि हालिया अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रम का दावा किया जाने वाला सीन है. सवाल उठ रहा है कि क्या एक टैंकर की जब्ती दुनिया की दो सबसे बड़ी सैन्य ताकतों अमेरिका और रूस को आमने-सामने ला सकती है? क्या यह घटना बड़े टकराव की शुरुआत है, या सिर्फ दबाव बनाने की रणनीति? आइए जान लेते हैं. 

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टैंकर विवाद कैसे शुरू हुआ?

हालिया घटनाओं को लेकर जो जानकारियां सामने आई हैं, उनके मुताबिक अमेरिका ने वेनेजुएला के तेल निर्यात पर सख्त रुख अपनाया है. रिपोर्ट्स में दावा किया गया कि दिसंबर 2025 में वेनेजुएला के तत्कालीन राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को लेकर बड़ा घटनाक्रम हुआ, जिसके बाद अमेरिका ने वेनेजुएला के तेल पर कड़ी पाबंदियां लगा दीं. इसी पृष्ठभूमि में तेल टैंकरों की आवाजाही पर सख्त निगरानी शुरू हुई.

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बताया जाता है कि टैंकर मैरिनेरा वेनेजुएला से तेल लेने जा रहा था, तभी अमेरिकी कोस्ट गार्ड ने उसे रोकने की कोशिश की. आरोप है कि जहाज ने रास्ता बदल लिया और बाद में उस पर अपना रूसी झंडा लगा दिया गया. इसके बाद रूसी नौसैनिक जहाजों और पनडुब्बियों ने उसे एस्कॉर्ट भी किया. 7 जनवरी को अमेरिकी स्पेशल फोर्सेस ने हेलिकॉप्टर के जरिए जहाज पर चढ़कर उसे अपने कब्जे में ले लिया. इसी दौरान एक और टैंकर सोफिया को भी जब्त किए जाने की खबरें आईं. 

रूस की प्रतिक्रिया

रूस ने इस पूरी कार्रवाई को अंतरराष्ट्रीय समुद्री कानून का उल्लंघन बताया है. क्रेमलिन का कहना है कि अगर जहाज पर रूसी नागरिक मौजूद थे, तो उनकी सुरक्षित वापसी सुनिश्चित की जानी चाहिए. रूसी मीडिया में इस घटना को समुद्री डकैती जैसे शब्दों में पेश किया गया. रूस का तर्क है कि खुले समुद्र में इस तरह किसी जहाज पर कब्जा करना गलत मिसाल कायम करता है. 

अमेरिका का पक्ष

वहीं व्हाइट हाउस का कहना है कि जब्त किए गए जहाज तथाकथित शैडो फ्लीट का हिस्सा थे. अमेरिका के मुताबिक ये जहाज वेनेजुएला, रूस और ईरान जैसे प्रतिबंधित देशों का तेल ढोते हैं और अक्सर फर्जी झंडों का इस्तेमाल करते हैं. अमेरिकी प्रशासन का दावा है कि रूसी झंडा भी असली नहीं था और नियमों का उल्लंघन हुआ, इसलिए कार्रवाई जरूरी थी. जहाज के क्रू पर कानूनी कार्रवाई की बात भी कही जा रही है. 

अंतरराष्ट्रीय राजनीति में इसका मतलब क्या?

यह पूरा मामला ऐसे समय सामने आया है, जब एक तरफ यूक्रेन युद्ध से जुड़ी शांति वार्ताओं की चर्चा है और दूसरी तरफ लैटिन अमेरिका में अमेरिका अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश कर रहा है. रूस लंबे समय से वेनेजुएला का रणनीतिक सहयोगी रहा है, जबकि अमेरिका वहां अपने प्रभाव को लेकर सतर्क रहा है. विशेषज्ञ मानते हैं कि यही वजह है कि एक टैंकर की घटना भी बड़े भू-राजनीतिक तनाव का कारण बन सकती है.

क्या सच में जंग का खतरा है?

सैन्य जानकारों का कहना है कि फिलहाल सीधे रूस-अमेरिका युद्ध की संभावना कम है. इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि दोनों देश खुले टकराव से बचना चाहते हैं. अमेरिका और रूस, दोनों ही जानते हैं कि सीधी जंग वैश्विक तबाही ला सकती है. माना जा रहा है कि अगर तनाव बढ़ा भी, तो वह साइबर हमलों, कूटनीतिक दबाव या सीमित प्रॉक्सी कार्रवाइयों तक सीमित रह सकता है.

अमेरिका या रूस कौन ज्यादा ताकतवर?

अगर सैन्य ताकत की बात करें, तो ग्लोबल फायरपावर इंडेक्स 2024 के अनुसार अमेरिका दुनिया का सबसे शक्तिशाली देश है, जबकि रूस दूसरे स्थान पर है. अमेरिका के पास करीब 13.28 लाख सक्रिय सैनिक हैं, वहीं रूस के पास लगभग 13.20 लाख हैं. रिजर्व फोर्स में रूस आगे है, जिसके पास करीब 20 लाख रिजर्व सैनिक हैं, जबकि अमेरिका के पास करीब 7.99 लाख सैनिक हैं. 

रक्षा बजट में अमेरिका बहुत आगे है. 2024 में अमेरिका का रक्षा बजट लगभग 820 बिलियन डॉलर रहा, जबकि रूस का बजट करीब 126 बिलियन डॉलर बताया गया. टैंकों की संख्या में रूस भारी है, जहां उसके पास 14,700 से ज्यादा टैंक हैं, वहीं अमेरिका के पास करीब 4,600 टैंक हैं. 

हालांकि वायु शक्ति में अमेरिका आगे है. उसके पास 13,000 से ज्यादा विमान और 5,700 से ज्यादा हेलीकॉप्टर हैं, जबकि रूस के पास विमानों और हेलीकॉप्टरों की संख्या इससे काफी कम है. 

नौसेना की बात करें तो रूस के पास जहाजों की कुल संख्या ज्यादा है, लेकिन अमेरिका के पास ज्यादा आधुनिक विध्वंसक पोत और वैश्विक पहुंच है. पनडुब्बियों की संख्या दोनों के बीच लगभग बराबर मानी जाती है.

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