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ईरान के पोर्ट बंदर खुमैनी और बंदर अब्बास में 'बंदर' का क्या मतलब है, जिन्हें चोक करने जा रहा अमेरिका?

डोनाल्ड ट्रंप के निर्देश पर अमेरिकी सेना आज से ईरान के प्रमुख बंदरगाहों की नाकेबंदी करने जा रही है. इस समुद्री घेराबंदी का असर केवल ईरान पर ही नहीं, बल्कि वहां से गुजरने वाले हर देश के जहाज पर पड़ेगा.

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  • ईरान-अमेरिका वार्ता विफल, पश्चिम एशिया में सैन्य हलचल तेज.
  • अमेरिका ने ईरान के व्यापारिक रास्तों की घेराबंदी का फैसला लिया.
  • स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर अमेरिकी नौसेना की सक्रियता बढ़ाई गई.
  • ईरान के प्रमुख बंदरगाहों की 13 अप्रैल से समुद्री नाकाबंदी.

पश्चिम एशिया में युद्ध के बादल एक बार फिर गहरा गए हैं. ईरान और अमेरिका के बीच सुलह की कोशिशें नाकाम होने के बाद अब समुद्र के रास्ते आर-पार की जंग की तैयारी है. अमेरिका ने ईरान की आर्थिक कमर तोड़ने के लिए उसके सबसे महत्वपूर्ण व्यापारिक रास्तों और बंदरगाहों की घेराबंदी करने का फैसला लिया है. इस तनाव के बीच 'बंदर खुमैनी' और 'बंदर अब्बास' जैसे नाम चर्चा में हैं. आखिर ईरान के इन पोर्ट्स के साथ 'बंदर' शब्द क्यों जुड़ा है और क्यों अमेरिका इन्हें निशाना बना रहा है?

ईरान-अमेरिका वार्ता की नाकामी

ईरान और अमेरिका के बीच इस्लामाबाद में चल रही बातचीत बेनतीजा खत्म हो गई है. इस कूटनीतिक विफलता के बाद पूरे पश्चिम एशिया में सैन्य हलचल तेज हो गई है. अमेरिका ने स्पष्ट कर दिया है कि वह अब बातचीत के बजाय कड़े सैन्य कदम उठाएगा. इस फैसले के बाद अंतरराष्ट्रीय बाजारों में भी चिंता की लहर है, क्योंकि समुद्री रास्तों पर तनाव का असर सीधे तेल की कीमतों और वैश्विक व्यापार पर पड़ता है.

स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर अमेरिकी पहरा

बातचीत फेल होने के बाद अमेरिका ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज की कड़ी पहरेदारी करने का बड़ा फैसला लिया है. यह रास्ता वैश्विक कच्चे तेल की सप्लाई के लिए लाइफलाइन माना जाता है. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के निर्देश पर अब अमेरिकी नौसेना इस क्षेत्र में अपनी सक्रियता बढ़ा रही है. अमेरिका का मकसद ईरान के समुद्री व्यापारिक रास्तों को पूरी तरह से नियंत्रित करना है ताकि उसकी आर्थिक गतिविधियों पर दबाव बनाया जा सके.

यह भी पढ़ें: US Military Funding: कनाडा ने रोका अमेरिका जाने वाला रक्षा फंड, क्या और भी देश अमेरिकी सेना को भेजते हैं पैसा?

बंदरगाहों की अभेद्य समुद्री नाकेबंदी

यूनाइटेड स्टेट्स सेंट्रल कमांड (CENTCOM) ने ऐलान किया है कि 13 अप्रैल से ईरान के प्रमुख बंदरगाहों के पास समुद्री नाकाबंदी लागू कर दी जाएगी. यह कोई सामान्य प्रतिबंध नहीं है, बल्कि एक व्यापक 'मैरीटाइम ब्लॉकेड' है. इस आदेश के तहत ईरानी तटों और बंदरगाहों के आसपास काम करने वाले किसी भी देश के जहाज पर ये नियम समान रूप से लागू होंगे. अमेरिका इस घेराबंदी के जरिए ईरान को पूरी दुनिया से अलग-थलग करने की कोशिश में है.

क्या है 'बंदर' शब्द का भाषाई अर्थ?

ईरान के संदर्भ में 'बंदर' शब्द सुनकर कई लोग भ्रमित हो जाते हैं, लेकिन इसका जानवरों से कोई लेना-देना नहीं है. फारसी भाषा में 'बंदर' का अर्थ होता है 'बंदरगाह' या 'पोर्ट'. यह शब्द दो हिस्सों से मिलकर बना है- 'बंद' जिसका मतलब है घिरा हुआ या सुरक्षित, और 'दर' जिसका मतलब है दरवाजा. यानी एक ऐसा सुरक्षित स्थान जो समुद्र से आने वाले जहाजों के लिए दरवाजे का काम करता है और उन्हें आश्रय प्रदान करता है.

क्यों नाम के आगे लगाया जाता है बंदर शब्द?

फारसी संस्कृति में 'बंदर' शब्द अक्सर उन शहरों के नाम के आगे लगाया जाता है जो समुद्र के किनारे स्थित होते हैं और व्यापार का बड़ा केंद्र होते हैं. यह शब्द केवल एक शिपिंग हब को ही नहीं दर्शाता है, बल्कि उस शहर की पूरी व्यापारिक व्यवस्था को परिभाषित करता है. ऐतिहासिक रूप से ये स्थान समुद्री व्यापार के लिए सबसे सुरक्षित और महत्वपूर्ण माने जाते रहे हैं, जहां से मध्य पूर्व का माल पूरी दुनिया में भेजा जाता है.

बंदर अब्बास और शाह अब्बास का नाता

ईरान का 'बंदर अब्बास' रणनीतिक रूप से बहुत अहम है. इसका नाम फारस के प्रसिद्ध शासक 'शाह अब्बास प्रथम' के नाम पर रखा गया था. इसका शाब्दिक अर्थ है 'अब्बास का बंदरगाह'. यह पोर्ट स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के मुहाने पर स्थित है, जो इसे सैन्य और व्यापारिक दोनों नजरिए से बेहद संवेदनशील बनाता है. अमेरिका की नजर सबसे पहले इसी हब पर है क्योंकि ईरान का अधिकांश नौसैनिक और व्यापारिक ट्रैफिक यहीं से गुजरता है.

बंदर खुमैनी की आर्थिक अहमियत

'बंदर खुमैनी' ईरान के सबसे बड़े और महत्वपूर्ण व्यापारिक बंदरगाहों में से एक है. यह पोर्ट ईरान की अर्थव्यवस्था के लिए सोने के अंडे देने वाली मुर्गी जैसा है. यहां से बड़े पैमाने पर खाद्यान्न, कच्चा तेल और पेट्रोकेमिकल उत्पादों का आयात-निर्यात होता है. अमेरिका की समुद्री नाकेबंदी का सीधा असर इस पोर्ट की गतिविधियों पर पड़ेगा, जिससे ईरान के लिए अपनी बुनियादी जरूरतों को पूरा करना भी मुश्किल हो सकता है. 

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About the author निधि पाल

निधि पाल को पत्रकारिता में छह साल का तजुर्बा है. लखनऊ से जर्नलिज्म की पढ़ाई पूरी करने के बाद इन्होंने पत्रकारिता की शुरुआत भी नवाबों के शहर से की थी. लखनऊ में करीब एक साल तक लिखने की कला सीखने के बाद ये हैदराबाद के ईटीवी भारत संस्थान में पहुंचीं, जहां पर दो साल से ज्यादा वक्त तक काम करने के बाद नोएडा के अमर उजाला संस्थान में आ गईं. यहां पर मनोरंजन बीट पर खबरों की खिलाड़ी बनीं. खुद भी फिल्मों की शौकीन होने की वजह से ये अपने पाठकों को नई कहानियों से रूबरू कराती थीं.

अमर उजाला के साथ जुड़े होने के दौरान इनको एक्सचेंज फॉर मीडिया द्वारा 40 अंडर 40 अवॉर्ड भी मिल चुका है. अमर उजाला के बाद इन्होंने ज्वाइन किया न्यूज 24. न्यूज 24 में अपना दमखम दिखाने के बाद अब ये एबीपी न्यूज से जुड़ी हुई हैं. यहां पर वे जीके के सेक्शन में नित नई और हैरान करने वाली जानकारी देते हुए खबरें लिखती हैं. इनको न्यूज, मनोरंजन और जीके की खबरें लिखने का अनुभव है. न्यूज में डेली अपडेट रहने की वजह से ये जीके के लिए अगल एंगल्स की खोज करती हैं और अपने पाठकों को उससे रूबरू कराती हैं.

खबरों में रंग भरने के साथ-साथ निधि को किताबें पढ़ना, घूमना, पेंटिंग और अलग-अलग तरह का खाना बनाना बहुत पसंद है. जब ये कीबोर्ड पर उंगलियां नहीं चला रही होती हैं, तब ज्यादातर समय अपने शौक पूरे करने में ही बिताती हैं. निधि सोशल मीडिया पर भी अपडेट रहती हैं और हर दिन कुछ नया सीखने, जानने की कोशिश में लगी रहती हैं.

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