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कितने रुपये में होता है एक प्लेन का इंश्योरेंस, किस तरह के हादसों पर नहीं मिलता क्लेम?

एविएशन सेक्टर में विमानों का बीमा उनकी श्रेणी और कमर्शियल उपयोग के कड़े पैमानों के आधार पर तय किया जाता है, जिसकी कीमत करोड़ों से लेकर अरबों रुपयों तक जाती है. आइए इसके बारे में समझ लेते हैं.

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  • युद्ध, लापरवाही, धोखाधड़ी में विमान बीमा क्लेम अक्सर नहीं मिलता.

दिल्ली के आईजीआई एयरपोर्ट के टर्मिनल-2 पर शनिवार की शाम को प्रकृति का एक खौफनाक रूप देखने को मिला. अचानक आए भयंकर तूफान के चलते रनवे के पास खड़े ग्राउंड सपोर्ट इक्विपमेंट तेज हवाओं में खिलौनों की तरह बहने लगे और वहां पार्क किए गए एअर इंडिया के 3 नैरोबॉडी विमानों से जा टकराए. इस टक्कर में तीनों विमानों को काफी नुकसान पहुंचा, जिसके बाद उन्हें तुरंत ऑपरेशन से बाहर कर दिया गया. इस बड़े हादसे ने एविएशन सेक्टर में विमानों के इंश्योरेंस और उससे जुड़े क्लेम के कड़े नियमों को लेकर एक नई बहस छेड़ दी है.

कितने रुपये में होता है एक विमान का इंश्योरेंस?

किसी भी हवाई जहाज का बीमा प्रीमियम कितना होगा, यह पूरी तरह से इस बात पर निर्भर करता है कि विमान किस प्रकार का है और उसका इस्तेमाल किस काम के लिए किया जा रहा है. एक छोटे निजी विमान, जैसे प्राइवेट जेट या पिस्टन प्लेन का सालाना बीमा प्रीमियम $1,200 से लेकर $15,000 के बीच होता है, जिसे भारतीय रुपयों में देखें तो यह करीब 1 लाख रुपये से 12.5 लाख रुपये तक बैठता है. इसके उलट, कमर्शियल एयरलाइंस के बड़े यात्री विमानों का पूरा बीमा कई हजार करोड़ रुपये की कीमत का होता है.

तीन मुख्य हिस्सों में बंटा होता है विमान का इंश्योरेंस

विमानों का बीमा मुख्य रूप से 3 अलग-अलग श्रेणियों में किया जाता है ताकि हर तरह के जोखिम से निपटा जा सके. इसमें सबसे पहला होता है 'हल कवरेज', जो विमान को पहुंचने वाले किसी भी तरह के शारीरिक नुकसान या टूट-फूट की भरपाई करता है. दूसरा हिस्सा होता है 'थर्ड-पार्टी लायबिलिटी', जो हादसे के वक्त जमीन पर मौजूद किसी बाहरी संपत्ति या लोगों को हुए नुकसान का हर्जाना देता है. वहीं तीसरा सबसे जरूरी हिस्सा 'पैसेंजर लायबिलिटी' होता है, जो उड़ान के दौरान यात्रियों को लगी चोट या मृत्यु पर वित्तीय सुरक्षा देता है.

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छोटे हवाई जहाजों से लेकर बड़े जेट्स का बीमा खर्च

अगर हम अलग-अलग श्रेणी के विमानों के सालाना बीमा खर्च पर नजर डालें, तो छोटे सिंगल-इंजन विमानों का प्रीमियम $1,000 से $2,000 के बीच आता है. हल्के दो-इंजन वाले विमानों के लिए यह खर्च बढ़कर $2,500 से $6,000 प्रति वर्ष तक पहुंच जाता है. थोड़े बड़े टर्बोप्रॉप विमानों के लिए कंपनियों को $5,000 से $15,000 सालाना चुकाने पड़ते हैं, जबकि आलीशान प्राइवेट जेट्स का प्रीमियम $30,000 या उससे भी ज्यादा होता है. कमर्शियल एयरलाइंस के एक बड़े विमान का कुल बीमा $200 मिलियन से $300 मिलियन यानी करीब 1600 करोड़ रुपये से 2500 करोड़ रुपये के बीच होता है.

किन परिस्थितियों में बीमा कंपनियां साफ तौर पर ठुकरा देती हैं क्लेम?

ऐसा नहीं है कि रनवे या आसमान में होने वाले हर हादसे पर कंपनियों को क्लेम मिल ही जाता है. एविएशन सेक्टर में इंश्योरेंस क्लेम रिजेक्ट होने के कुछ बेहद सख्त नियम बने हुए हैं. अगर कोई विमान किसी घोषित युद्ध क्षेत्र में उड़ान भर रहा हो या फिर किसी आतंकवादी गतिविधि के कारण उसे नुकसान पहुंचता है, तो बीमा कंपनियां उसका क्लेम देने से साफ मना कर देती हैं. ऐसे संवेदनशील और अत्यधिक जोखिम वाले हालातों को सामान्य एविएशन इंश्योरेंस पॉलिसियों के दायरे से हमेशा बाहर रखा जाता है.

लापरवाही और नियमों की अनदेखी पर भी नहीं मिलता एक पैसा

सुरक्षा मानकों और सरकारी गाइडलाइनों का जानबूझकर उल्लंघन करने पर भी कंपनियों को भारी नुकसान उठाना पड़ता है. अगर किसी हादसे के पीछे पायलट की गंभीर गलती या एयरलाइन द्वारा तय सुरक्षा नियमों की अनदेखी पाई जाती है, तो क्लेम को तुरंत खारिज कर दिया जाता है. इसके अलावा, अगर उड़ान भरने से पहले प्लेन में मौजूद किसी तकनीकी या यांत्रिक खराबी को छुपाया गया हो या मेंटेनेंस के काम में कोई बड़ी लापरवाही की गई हो, तो भी बीमा कंपनी मुआवजे की राशि देने से पूरी तरह इनकार कर देती है.

फ्रॉड और गलत इरादे से किए गए नुकसान पर सख्त कार्रवाई

बीमा क्लेम खारिज होने का एक और सबसे बड़ा कारण होता है गलत इरादा या फ्रॉड करना. अगर जांच में यह बात साबित हो जाए कि बीमा की मोटी रकम हड़पने के लिए या किसी अन्य गलत इरादे से विमान को जानबूझकर नुकसान पहुंचाया गया है, तो क्लेम तो रद्द होता ही है, साथ ही संबंधित एयरलाइन या मालिक पर सख्त कानूनी कार्रवाई भी की जाती है. इसलिए दिल्ली एयरपोर्ट पर हुए हादसे जैसी प्राकृतिक आपदाओं में तो क्लेम आसानी से मिल जाता है, लेकिन इंसानी गलतियों और साजिशों पर एक भी पैसा नहीं मिलता.

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About the author निधि पाल

निधि पाल को पत्रकारिता में छह साल का तजुर्बा है. लखनऊ से जर्नलिज्म की पढ़ाई पूरी करने के बाद इन्होंने पत्रकारिता की शुरुआत भी नवाबों के शहर से की थी. लखनऊ में करीब एक साल तक लिखने की कला सीखने के बाद ये हैदराबाद के ईटीवी भारत संस्थान में पहुंचीं, जहां पर दो साल से ज्यादा वक्त तक काम करने के बाद नोएडा के अमर उजाला संस्थान में आ गईं. यहां पर मनोरंजन बीट पर खबरों की खिलाड़ी बनीं. खुद भी फिल्मों की शौकीन होने की वजह से ये अपने पाठकों को नई कहानियों से रूबरू कराती थीं.

अमर उजाला के साथ जुड़े होने के दौरान इनको एक्सचेंज फॉर मीडिया द्वारा 40 अंडर 40 अवॉर्ड भी मिल चुका है. अमर उजाला के बाद इन्होंने ज्वाइन किया न्यूज 24. न्यूज 24 में अपना दमखम दिखाने के बाद अब ये एबीपी न्यूज से जुड़ी हुई हैं. यहां पर वे जीके के सेक्शन में नित नई और हैरान करने वाली जानकारी देते हुए खबरें लिखती हैं. इनको न्यूज, मनोरंजन और जीके की खबरें लिखने का अनुभव है. न्यूज में डेली अपडेट रहने की वजह से ये जीके के लिए अगल एंगल्स की खोज करती हैं और अपने पाठकों को उससे रूबरू कराती हैं.

खबरों में रंग भरने के साथ-साथ निधि को किताबें पढ़ना, घूमना, पेंटिंग और अलग-अलग तरह का खाना बनाना बहुत पसंद है. जब ये कीबोर्ड पर उंगलियां नहीं चला रही होती हैं, तब ज्यादातर समय अपने शौक पूरे करने में ही बिताती हैं. निधि सोशल मीडिया पर भी अपडेट रहती हैं और हर दिन कुछ नया सीखने, जानने की कोशिश में लगी रहती हैं.

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