Balochistan History: भारत से अलग होने के बाद 227 दिन आजाद मुल्क रहा था बलूचिस्तान, फिर कैसे बन गया पाकिस्तान का गुलाम?
Balochistan History: पाकिस्तान और बलूचिस्तान के बीच तनाव जारी है. आइए जानते हैं कि 227 दिनों तक आजाद रहने के बाद भी बलूचिस्तान पाकिस्तान का गुलाम कैसे बन गया था.

Balochistan History: पाकिस्तान के सबसे बड़े प्रांत बलूचिस्तान में एक बार फिर से जबर्दस्त हिंसा देखने को मिल रही है. इसमें बलूच लड़ाकों और पाकिस्तानी सुरक्षा बलों के बीच हुई जानलेवा झड़पों ने पूरी दुनिया का ध्यान खींचा है. इस अशांति की जड़ों को समझने के लिए इतिहास में जाना होगा. आइए जानते हैं कि जब बलूच 227 दिनों तक आजाद रहा था तो उसके बाद पाकिस्तान का हिस्सा कैसे बन गया.
1947 में बलूचिस्तान की संक्षिप्त आजादी
1947 से पहले बलूचिस्तान का ज्यादातर हिस्सा ब्रिटिश राज के तहत कलात रियासत का हिस्सा था. 11 अगस्त 1947 को भारत की आजादी से ठीक 3 दिन पहले कलात के खान मीर अहमद यार खान ने औपचारिक रूप से कलात को एक आजाद संप्रभु राज्य घोषित कर दिया. उस समय यह कानूनी रूप से मान्य था क्योंकि कलात का ब्रिटिशों के साथ सीधा अधीनता का नहीं बल्कि संधि आधारित संबंध था. ध्यान देने वाली बात यह है कि इस कदम को शुरू में मुहम्मद अली जिन्ना ने भी समर्थन दिया था. इन्होंने पहले कलात के वकील के तौर पर प्रतिनिधित्व किया था और उसकी अर्ध स्वतंत्र स्थिति को स्वीकार किया था.
पाकिस्तान के रुख में अचानक बदलाव
पाकिस्तान के अस्तित्व में आने के तुरंत बाद ही बलूचिस्तान पर उसका रुख बदलने लगा. नए पाकिस्तानी नेतृत्व ने भौगोलिक निकटता और रणनीतिक चिंताओं का हवाला देते हुए कलात के विलय के लिए दबाव डालना शुरू कर दिया था. हालांकि कलात संसद ने पाकिस्तान में शामिल होने के प्रस्ताव को काफी ज्यादा भारी बहुमत से खारिज कर दिया और आजाद रहने के अपने अधिकार पर जोर दिया. इसके बाद पाकिस्तान ने कलात की स्थिति को कमजोर करने के लिए दूसरे तरीकों को खोजना शुरू कर दिया.
कलात को अंदर से तोड़ना
एक बड़े कदम में पाकिस्तान ने उन छोटी रियासतों को निशाना बनाया जो कलात के अधीन थीं. इनमें मकरान, लास बेला और खारान शामिल है. 17 मार्च 1948 को पाकिस्तान ने उनका विलय अलग-अलग करवा लिया. इस कदम से कलात प्रभावी रूप से चारों ओर से जमीन से घिर गया. इसी के साथ अरब सागर तक उसकी पहुंच खत्म हो गई और वह भौगोलिक और राजनीतिक रूप से अलग-थलग पड़ गया.
भारत से नाकाम अपील
बढ़ते दबाव का सामना करते हुए कलात के खान ने कथित तौर पर जवाहरलाल नेहरू से संपर्क किया और डिप्लोमेटिक सपोर्ट या फिर भारत में शामिल होने की संभावना तलाशी. लेकिन भारत ने दखल देने से मना कर दिया. नया आजाद हुआ भारत पहले से ही कश्मीर विवाद, शरणार्थी संकट और संवेदनशील अंतरराष्ट्रीय हालात से जूझ रहा था.
फौजी कार्रवाई और जबरन विलय
आखरी झटका 26 मार्च 1948 को लगा जब पाकिस्तान सेना बलूचिस्तान के तटीय इलाकों में घुस गई. इसमें पसनी और जिवनी शामिल थे. ताकत के प्रदर्शन से यह साफ हो गया कि पाकिस्तान विलय हासिल करने के लिए फौजी तरीकों का इस्तेमाल करने के लिए तैयार है.
घेराबंदी, राजनीतिक अलगाव और सीधे फौजी दबाव में कलात के खान के पास काफी कम उम्मीद और रास्ते बचे थे. 27 मार्च 1948 को उन्होंने विलय के कागजों पर साइन कर दिया और औपचारिक रूप से कलात और इस तरह से बलूचिस्तान को पाकिस्तान में मिला दिया गया. इस तरह बलूचिस्तान की 227 दिनों की आजादी खत्म हो गई.
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