8th Pay Commission: केंद्रीय मंत्रिमंडल द्वारा आठवें वेतन आयोग की कार्य अवधि को मंजूरी मिलने के बाद सरकार ने इसकी प्रक्रिया को शुरू कर दिया है. इसके बाद केंद्र सरकार के कर्मचारियों और पेंशन भोगियों को बड़ी राहत मिलने की उम्मीद है. इसी बीच एक सवाल यह उठ रहा है कि क्या केंद्र सरकार के कर्मचारी वेतन आयोग की सिफारिशों को कानूनी तौर से चुनौती दे सकते हैं? आइए जानते हैं क्या है इस सवाल का जवाब.

Continues below advertisement

वेतन आयोग की सिफारिशें 

केंद्र सरकार के कर्मचारियों के वेतन और फायदे में बदलाव की समीक्षा और सिफारिश करने के लिए एक वेतन आयोग का गठन किया जाता है. वैसे तो आखिरी कार्यान्वयन केंद्र सरकार पर निर्भर करता है. जो सिफारिशों को पूरी तरह, आंशिक रूप से या संशोधन के साथ स्वीकार कर सकती है. हालांकि कभी-कभी कर्मचारी संघ या फिर कुछ खास लोगों में असंतोष पैदा हो जाता है. उन्हें लगता है कि नए वेतनमान असमानताएं या फिर अनुचित परिणाम पैदा करते हैं. ऐसे मामलों में कर्मचारियों को फैसले को चुनौती देने का पूरा अधिकार है.

Continues below advertisement

विभागीय माध्यमों से निवारण 

अदालत का रुख करने से पहले कर्मचारियों से यह अपेक्षा की जाती है कि वे आंतरिक रूप से समस्या का समाधान करने की कोशिश करें. इसमें विभागीय शिकायत निवारण प्रणाली या फिर कर्मचारी कल्याण मंच के जरिए से शिकायत प्रस्तुत करना शामिल है. इसका सीधा सा उद्देश्य प्रशासन को बिना किसी मुकदमेबाजी के परेशानियों का समाधान करने का अवसर प्रदान करना है. अगर यहां शिकायतों का समाधान नहीं होता तो अगला कानूनी उपाय मौजूद होता है. 

केंद्रीय प्रशासनिक न्यायाधिकरण 

सेंट्रल एडमिनिस्ट्रेटिव ट्रिब्यूनल या फिर केंद्रीय प्रशासनिक न्यायाधिकरण केंद्र सरकार के कर्मचारियों के लिए वेतन, पदोन्नति, सेवा शर्तें या फिर वेतन आयोग की सिफारिशों के कार्यान्वयन से संबंधित निर्णय को चुनौती देने का एक बड़ा मंच है. कर्मचारी व्यक्तिगत रूप से या फिर कर्मचारी संघ के हिस्से के रूप में यहां पर याचिका दायर कर सकते हैं. इसके बाद केंद्रीय प्रशासनिक न्यायाधिकरण पूरे मामले की जांच करता है और यदि निर्णय कानूनी रूप से त्रुटि पूर्ण प्रतीत होता है तो परिवर्तन के निर्देश दे सकता है.

हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में न्यायिक समीक्षा 

यदि कर्मचारी न्यायाधिकरण के निर्णय से संतुष्ट नहीं है तो वह हाई कोर्ट में न्यायिक समीक्षा की मांग कर सकता है और यदि जरूरी हो तो भारत के सुप्रीम कोर्ट का भी दरवाजा खटखटा सकता है. इसी बीच आपको बता दें कि न्यायपालिका सरकारी नीतिगत निर्णय में तब तक हस्तक्षेप नहीं करती जब तक फैसला अवैध ना हो या फिर मौजूदा कानून का उल्लंघन न करता हो. इसी के साथ फैसले में मनमानी हो या फिर तर्कसंगत औचित्य का अभाव हो. साथ ही फैसले से भेदभाव हो जैसे समान कार्य के लिए समान वेतन का उल्लंघन. 

जनहित याचिका 

जहां वेतन आयोग की सिफारिशें कर्मचारियों के एक बड़े वर्ग को प्रभावित करती हैं और साथ ही जन कल्याण या व्यापक असमानता के मुद्दे उठाती हैं, कर्मचारी संगठन हाईकोर्ट या फिर सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका दायर कर सकते हैं.

ये भी पढ़ें: कैसे तय होती है किसी शो की टीआरपी, कैसे पता चलता है कितने लोग देख रहे शो?