100% Tariff on India: यूएस सीनेट ने भारत समेत पांच देशों पर 100% टैरिफ लगाने वाला एक बिल पास किया है. यह प्रस्तावित कदम उन देशों को निशाना बनाना है जो  रूस से तेल खरीदना जारी रखे हुए हैं. यूएस हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव में इस बिल पर 31 अगस्त को चर्चा होनी है. अगर यह कानून बन जाता है और भारतीय सामानों पर प्रस्तावित टैरिफ लगाया जाता है तो इससे भारत के एक्सपोर्ट और कई रोजगार प्रदान उद्योगों पर काफी असर पड़ सकता है. इस अनिश्चितता के बीच एक बड़ा सवाल उठता है. क्या भारत ऐसे दंडात्मक टैरिफ को लेकर वर्ल्ड ट्रेड आर्गेनाइजेशन में यूएस को चुनौती दे सकता है? आइए जानते हैं.

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भारत वर्ल्ड ट्रेड आर्गेनाइजेशन में अमेरिका को चुनौती दे सकता है 

अगर टैरिफ लागू होता है तो भारत वर्ल्ड ट्रेड आर्गेनाइजेशन की विवाद निपटान संस्था के जरिए इस कदम को चुनौती दे सकता है. प्रस्तावित लिंडसे ओ ग्राहम सैक्शनिंग रशिया एंड ईरान एक्ट 2026 का मकसद रूसी तेल खरीदने वाले देशों पर 100% तक टैरिफ लगाने की मंजूरी देना है. 

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अगर अमेरिका भारतीय उद्योगों पर ऐसे टैरिफ लागू करता है तो भारत यह तर्क दे सकता है कि यह कदम अंतर्राष्ट्रीय व्यापार नियमों के तहत अमेरिका की जिम्मेदारियों का उल्लंघन करता है. हालांकि इसका नतीजा काफी हद तक इस बात पर निर्भर करेगा कि अमेरिका टैरिफ का बचाव करने के लिए किस कानूनी आधार का इस्तेमाल करता है. 

एमएफएन सिद्धांत भारत का मुख्य तर्क

एक संभावित कानूनी तर्क वर्ल्ड ट्रेड ऑर्गेनाइजेशन के मोस्ट फेवर्ड नेशन सिद्धांत से जुड़ा है. इस सिद्धांत के तहत वर्ल्ड ट्रेड ऑर्गेनाइजेशन सदस्य आमतौर पर एक जैसे उत्पादों पर अलग-अलग टैरिफ लगाकर व्यापारिक साझेदारों के बीच भेदभाव नहीं कर सकते.

भारत यह तर्क दे सकता है कि अपने एक्सपोर्ट पर काफी ज्यादा टैरिफ लगाना, जबकि दूसरे देशों पर कम टैरिफ लगाना भेदभावपूर्ण व्यापारिक व्यवहार माना जाएगा. 

हालांकि इस तर्क की मजबूती इस बात पर तय होगी कि अमेरिका टैरिफ को कैसे लागू करता है और क्या दूसरे व्यापारिक साझेदारों को छूट या फिर अलग व्यवहार दिया जाता है. 

क्या 100% टैरिफ वर्ल्ड ट्रेड आर्गेनाइजेशन की प्रतिबद्धताओं का उल्लंघन कर सकता है? 

एक और संभावित चुनौती बाउंड टैरिफ दर से जुड़ी है. वर्ल्ड ट्रेड ऑर्गेनाइजेशन सदस्य अलग-अलग उत्पादों के लिए अधिकतम टैरिफ स्तरों के प्रति प्रतिबद्ध होते हैं. इन प्रतिबद्धताओं को बाउंड रेट्स कहा जाता है. 

अगर अमेरिका उन उत्पादों पर 100% टैरिफ लगाता है जिनके लिए उसकी वर्ल्ड ट्रेड ऑर्गेनाइजेशन बाउंड दर काफी कम है तो भारत यह तर्क दे सकता है कि वाशिंगटन ने अपनी सहमत टैरिफ प्रतिबद्धताओं से ज्यादा टैरिफ लगाया है. 

हालांकि इसके लिए हर उत्पाद की अलग-अलग जांच की जरूरत होगी क्योंकि सामान की अलग-अलग कैटेगरी के लिए वर्ल्ड ट्रेड आर्गेनाईजेशन की टैरिफ प्रतिबद्धताएं अलग-अलग होती हैं. इस वजह से 100% टैरिफ की कानूनी वैधता हर भारतीय प्रोडक्ट के लिए एक जैसी नहीं होगी. 

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क्या अमेरिका टैरिफ का बचाव कर सकता है? 

यह भारत के लिए सबसे बड़ी कानूनी बाधा बन सकती है. अमेरिका जनरल एग्रीमेंट ऑन टेरिफ एंड ट्रेड के आर्टिकल XXI का इस्तेमाल करने की कोशिश कर सकता है. इसे आमतौर पर वर्ल्ड ट्रेड आर्गेनाईजेशन के राष्ट्रीय सुरक्षा अपवाद के तौर पर जाना जाता है. वाशिंगटन यह तर्क दे सकता है कि भारत द्वारा रूसी तेल की खरीद से रूस की कमाई बढ़ती है.‌ साथ ही इस वजह से इससे राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी चिंता पैदा होती है.

इस अपवाद की व्याख्या पहले भी वर्ल्ड ट्रेड ऑर्गेनाइजेशन विवादों का विषय रही है. यही वजह है कि भारत की चुनौती इस बात की एक बड़ी परीक्षा बन सकती है कि कोई देश व्यापार प्रतिबंधों को सही ठहराने के लिए राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े विचारों का इस्तेमाल किस हद तक कर सकता है. 

वर्ल्ड ट्रेड आर्गेनाइजेशन की अपील प्रक्रिया में क्या परेशानी है?

भले ही भारत वर्ल्ड ट्रेड आर्गेनाइजेशन के शुरुआती विवाद समाधान चरण में अमेरिका के टैरिफ को चुनौती दे दे लेकिन वर्ल्ड ट्रेड आर्गेनाइजेशन की अपीलेट बॉडी से जुड़े लंबे समय से चले आ रहे संकट की वजह से इसे लागू करना मुश्किल हो सकता है. 

अमेरिका ने सालों से नए अपीलीय जजों की नियुक्ति को रोक रखा है. इस वजह से यह निकाय सामान्य रूप से काम नहीं कर पा रहा. यही वजह है कि हारने वाला पक्ष फैसले के खिलाफ अपील करके मामले को कानूनी अनिश्चितता की स्थिति में डाल सकता है. इसका मतलब है कि वर्ल्ड ट्रेड ऑर्गेनाइजेशन का रुख करने से भारत को एक जरूरी कानूनी और कूटनीतिक मंच मिल सकता है लेकिन इससे टैरिफ हटाने का कोई तत्काल तरीका नहीं मिल सकता.

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