टीवी एक्ट्रर्स शीजान खान, फलक नाज, सुम्बुल तौकीर खान और इकबाल खान रमजान के पवित्र महीने से मिलने वाली खुशी पर अपने विचार साझा किए. बचपन में इफ्तार के बेसब्री से इंतजार करने की यादों से लेकर सालो में रमजान के बदलते मतलब तक, इन सितारें ने बताया कि उनके लिए समय के साथ रमजान का मतलब कैसे बदलता गया.
फलक नाज फलक नाज ने हिंदुस्तान टाइम्स से बात करते हुए बताया रमजान सुकून और खुशी लेकर आता है. वह पूरे साल इस पाक महीने का इंतजार करती हैं और इसे 'खामोश सुकून' का समय बताती हैं. उनके अनुसार, परिवार के साथ मिलकर रोजा रखना ही रमजान को खास बनाता है. बचपन की उनकी सबसे प्यारी याद किसी खास पकवान से नहीं, बल्कि एक मीठे शरबत से जुड़ी है. वह कहती हैं, 'रमजान मुझे बचपन की याद दिलाता है, खासकर रूहअफ़जा की. इस त्योहार का एहसास रूहअफ़जा के बिना अधूरा लगता है.'
फलक के लिए रमजान परिवार और सब्र से भी गहराई से जुड़ा है. उन्हें याद है कि वह अपनी नानी के घर यह महीना बिताती थीं और सुबह-सुबह गलियों में ढोल की आवाज सुनकर सहरी के लिए उठती थीं. आर्थिक तंगी के दौर में रखा गया उनका पहला रोजा उन्हें आज भी याद है. उसी समय उन्होंने सीखा कि 'अल्लाह सब्र करने वालों के साथ होता है,' और यह सीख आज तक उनके दिल में बसी हुई है.
सुम्बुल तौकीर खानसुम्बुल तौकीर खान रमजान को 'बहुत खास और सुकून भरा वक्त' मानती हैं. उनके लिए यह महीना शुक्रगुजारी, सब्र और अल्लाह के करीब जाने का समय है. अब रमजान उनके लिए थोड़ा ठहरने और परिवार के साथ जुड़ने का मौका बन गया है, खासकर अपने पिता तौकीर खान और बहन सानिया के साथ.
उन्हें अपना बचपन आज भी याद है, जब वह फर्श पर बैठकर अजान का इंतजार करती थीं और इफ्तार से पहले बार-बार घड़ी देखती थीं. वह मुस्कुराते हुए बताती हैं, 'मुझे अपना पहला रोजा भी साफ याद है. मैं बहुत छोटी थी, लेकिन उसे पूरा करने की जिद थी.' समय के साथ रमजान का मतलब उनके लिए बदल गया. जहां बचपन में यह त्योहार स्वादिष्ट खाने और देर रात तक जागने से जुड़ा था, वहीं अब यह इबादत और अनुशासन महीना बन चुका है.
इकबाल खानइकबाल खान रमजान को 'साल का सबसे बेहतरीन महीना' मानते हैं. उनके अनुसार, यह महीना हमें याद दिलाता है कि पूरी जिंदगी कैसे जीनी चाहिए. वह मानते हैं कि रमजान दिमाग, शरीर और रूह तीनों को साफ करने का समय है. बचपन की उनकी यादें बेहद सादा लेकिन भावुक हैं. वह कहते हैं, 'बचपन में रमजान का मतलब समय से था,' और उन्हें याद है कि जब भूख लगती थी तो उनकी मां कितनी नरमी और समझदारी से उनका ख्याल रखती थीं.
अब एक कामकाजी पिता के तौर पर इकबाल कोशिश करते हैं कि उनके बच्चे भी रमजान की असली भावना को समझें. उनका मानना है कि उम्र के साथ रमजान का असली मतलब समझ में आता है. 'यह इबादत बन जाता है… और इंसान होने का एहसास कराता है,' वह कहते हैं.
शीजन खानशीजन खान के लिए रमजान हमेशा एक ऐसा महीना रहा है, जब पूरी जिंदगी की रफ्तार थोड़ी बदल जाती है. बचपन में यह ज्यादातर खाने और सुबह जल्दी उठने से जुड़ा था, लेकिन आज उनके लिए यह इबादत और अपनों के साथ वक्त बिताने का समय बन गया है.
उन्हें इफ्तार से पहले की वह घड़ी आज भी याद है, जब वह पूरे यकीन के साथ दुआ करते थे, यह मानते हुए कि उस वक्त की गई दुआ जरूर कबूल होती है. अपने पहले रोजे को याद करते हुए, जो भूख और मुश्किलों से भरा था, शीजन कहते हैं कि उस अनुभव ने उन्हें जिंदगी को अलग नजर से देखना सिखाया. अब उनका मानना है कि त्योहार शोर-शराबे से नहीं, बल्कि परिवार के साथ सादगी से मनाने के लिए होते हैं.
