एक्ट्रेस संदीपा धर हाल ही में रिलीज हुई फिल्म ‘दो दीवाने सहर में’ में नजर आई है. इस फिल्म में उन्होंने नैना नाम की लड़की का रोल निभाया है. नैना बाहर से बिल्कुल परफेक्ट, खुश और सुलझी हुई दिखती है लेकिन अंदर से वो काफी अकेली और इमोशनली टूटी हुई होती है. यही उसके किरदार की असली परत है जो कहानी को दिलचस्प बनाती है.

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नैना का किरदार क्यों लगा खासहाल ही में आईएएनएस से बातचीत में संदीपा ने बताया कि उन्होंने ये फिल्म खासतौर पर नैना के किरदार की वजह से चुनी थी. उन्होंने कहा की  'फिल्म में नैना का किरदार मेरे लिए सबसे बड़ा आकर्षण था. बाहर से वो परफेक्ट और खुशहाल दिखती थी लेकिन अंदर ही अंदर वो बहुत अकेली और इमोशनली टूटी हुई थी. फिल्म में मेरे इस सफर को गहराई से दिखाया गया है. बाहर की परफेक्शन और अंदर की उथल-पुथल को दर्शाना एक्टर के तौर पर मेरे लिए चुनौतीपूर्ण और रोमांचक दोनों था.'

अलग तरह की लव स्टोरीसंदीपा ने फिल्म की कहानी की भी जमकर तारीफ की. उन्होंने कहा कि काफी समय बाद ऐसी लव स्टोरी आई है जो आम फिल्मों से अलग है. ये दो ऐसे लोगों की कहानी है जो अपनी कमजोरियों को समझते हैं उन्हें स्वीकार करते हैं और फिर एक-दूसरे को अपनाकर आगे बढ़ते हैं. उनके मुताबिक ऐसी कहानियां कम देखने को मिलती हैं जहां हीरो-हीरोइन अपनी कमियों के बावजूद एक-दूसरे को चुनते हैं.

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रिलीज के बाद मिली संतुष्टिफिल्म रिलीज होने के बाद संदीपा काफी खुश और संतुष्ट हैं. उन्होंने कहा, 'फिल्म रिलीज होने के बाद मुझे बहुत अच्छा लग रहा है क्योंकि ये वैसी ही बनी है जैसा मैंने सोचा था. मेरा किरदार भी उसी तरह से सामने आया है. जब आपकी उम्मीदें पूरी होती हैं तो अलग ही सुकून मिलता है. मुझे पता था कि सेकंड हाफ में मृणाल के साथ मेरा टकराव वाला सीन अगर सही से किया जाए तो वो हाइलाइट बनेगा और वैसा ही हुआ था. कई लोगों ने उस सीन की तारीफ की और उससे खुद को जोड़ा भी था.'

मजबूत टीम और गहरे मुद्देफिल्म का निर्देशन रवि उदयवार ने किया है जबकि संजय लीला भंसाली के साथ प्रेरणा सिंह, उमेश कुमार बंसल और भरत कुमार इसे प्रोड्यूस कर रहे हैं. संदीपा ने बताया कि संजय लीला भंसाली के प्रोडक्शन का हिस्सा बनना उनके लिए खास अनुभव था क्योंकि उनका विजुअल विजन काफी मजबूत होता है. साथ ही उन्होंने कहा कि फिल्म में मुंबई और उत्तराखंड की खूबसूरती को बहुत शानदार तरीके से दिखाया गया है. फिल्म सिर्फ लव स्टोरी नहीं है बल्कि भाई-बहनों की तुलना, वैलिडेशन की जरूरत, सेल्फ-वर्थ, सिस्टरहुड, फैमिली वैल्यूज और परिवार में मौजूद टॉक्सिसिटी जैसे कई गहरे मुद्दों को भी छूती है. ये आज के रिश्तों और इमोशनल स्ट्रगल को सच्चाई से दिखाती है.