मनोज बाजपेयी बॉलीवुड के मोस्ट टैलेंटेड एक्टर्स में से एक हैं. उन्होंने अपने अब तक के करियर में तमाम शानदार फिल्में दी हैं और अपनी एक्टिंग का लोहा मनवाया है. वहीं मनोज ओटीटी के भी बादशाह हैं. इन सबके बीच हाल ही में एक्टर ने खुलासा किया कि पिछले एक दशक में उन्होंने कई बार एक्टिंग छोड़ने के बारे में सोचा है. उन्होंने कबूल किया कि मुश्किल किरदारों को निभाने का इमोशनल बोझ अक्सर उन पर गहरा असर छोड़ता है.
10 सालों से एक्टिंग छोड़ने का कई बार आया ख्यालईटाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक मनोज ने कहा कि एक्टिंग को छोड़ने का ख्याल उनके मन में बार-बार आया है. उन्होंने कहा, "यार आपको सच बताऊं, लगभग 10 साल से न बीच-बीच में मन करता है कि मैं छोड़ दूं. लेकिन फिर कभी कोई रोल आ जाता है, हो जाता है." अभिनेता ने इस बात पर जोर दिया कि वह मजबूरी में काम करना जारी नहीं रखना चाहते. उन्होंने कहा, "मैं अभिनय को मजबूरी के तौर पर करना नहीं चाहता हूं कि मुझे घर पर दाल रोटी ले जानी है. मुझे एक्टिंग करनी है अगर कोई किरदार है, उसको निभाने में बड़ा मजा आएगा."
कमर्शियल एंटरटेनर फिल्में करना चाह रहे हैं मनोजदिलचस्प बात यह है कि मनोज बाजपेयी ने खुलासा किया कि सालों तक इंटेंस साइकोलॉजिकल डिमांडिंग रोल्स करने के बाद अब वह हल्के-फुल्के, कमर्शियल एंटरटेनिंग फिल्मों की ओर खींच रहे हैं. एक्टर ने कहा, “आजकल मेरा बड़ा मन कर रहा है कमर्शियल फिल्में करने का.. एकदम स्लैपस्टिक कॉमेडी, बकवास कॉमेडी. थोड़ा गानों-गानों पर नाचो. घर से कोई तैयारी करके नहीं आना है. सिर्फ परिवार को गुडबाय कहो और सेट पर अच्छा टाइम बिताओ.”
'डार्क किरदारों का असर पड़ता है'मनोज बाजपेयी ने ये भी कबूल किया कि गली गुलियां, अलीगढ़ और भोंसले जैसी फिल्मों की कुछ डार्कनेस आज भी उनके भीतर मौजूद है. एक्टर ने कहा, “कभी-कभी मुझे अपने मानसिक अंधकार का एहसास होता है. कभी-कभी मुझे ठीक-ठीक पता होता है कि यह कहां से आ रहा है.” उन्होंने आगे कहा कि ऐसे किरदार अक्सर मूड स्विंग्स और इमोशनल थकावट का कारण बनते हैं, जिससे स्प्रिचुअलिटी उनकी लाइफ में एक महत्वपूर्ण सहारा बन जाती है.
'पिताजी के साथ टाइम बिताने का और समय मिल जाता'मनोज बाजपेयी ने अपने सपनों का पीछा करते हुए किए गए बलिदानों पर भी बात की,खासतौर पर अपने माता-पिता के साथ बिताए गए समय को।.जब उनसे पूछा गया कि क्या संघर्ष इसके लायक था, तो उन्होंने कहा, "वास्तव में, हां," उन्होंने कहा, "लेकिन मैंने बहुत सी चीजें खो दीं." मुंबई - जिसने उनके और उनके माता-पिता के बीच दूरियां पैदा कर दीं. उन्होंने कहा, "कभी-कभी मुझे लगता है, यार, कुछ समय और मिल जाता है मुझे मेरे पिताजी के साथ. हम एक-दूसरे को बेहतर समझ सकते थे. हां मेरी मां के साथ हम अपने निजी मुद्दों को सुलझा सकते हैं." पीछे देखने पर बलिदान सार्थक लगता है. बाजपेयी ने कहा, ''मैटिरियलिस्टिक फुलफिलमेंट के बाद जब आप पीछे मुड़ के देखते हैं तो लगता है कि सब कुछ इसके लायक नहीं था.''
