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Madan Mohan Death Anniversary: 'दिल ढूंढता है, लग जा गले...' जैसी गीतों के रचयिता संगीतकार मदन मोहन ने सेना में भी की थी नौकरी

Madan Mohan Death Anniversary: मदन मोहन ने अपनी मधुर धुनों और यादगार गजलों से हिंदी फिल्म संगीत को नई पहचान दी. 'लग जा गले' जैसे उनके सदाबहार गाने आज भी हर पीढ़ी के दिलों में बसे हुए हैं.

मधुर धुनों और यादगार गानों से लोगों के दिलों में खास जगह बनाने वाले मदन मोहन सिर्फ बेहतरीन संगीतकार ही नहीं थे, बल्कि उनका सफर भी उतना ही दिलचस्प रहा. आइए जानते हैं उनकी निजी जिंदगी, करियर और बॉलीवुड तक पहुंचने की कहानी.

बगदाद में जन्म, बचपन से था संगीत का शौक 

'दिल ढूंढता है', 'लग जा गले' और 'तू जहां-जहां चलेगा' जैसे सदाबहार गानों के संगीतकार मदन मोहन कोहली ने करीब तीन दशक तक हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में अपनी खास पहचान बनाई. उन्हें 1950, 1960 और 1970 के दशक के बेहतरीन संगीतकारों में गिना जाता है. खासकर गजलों को उन्होंने ऐसा संगीत दिया, जिसे आज भी लोग पसंद करते हैं.

मदन मोहन का जन्म 25 जून 1924 को इराक की राजधानी बगदाद में हुआ था, जहां उनके पिता राय बहादुर चुनीलाल कोहली कार्यरत थे. बाद में उनका परिवार भारत लौट आया और लाहौर तथा मुंबई में बस गया. बचपन से ही उन्हें संगीत में गहरी रुचि थी. उन्होंने शास्त्रीय संगीत की शुरुआती शिक्षा ली लेकिन आगे का ज्यादातर संगीत उन्होंने अपने एक्सपीरियंस और लगातार सीखने से सीखा

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सेना की नौकरी छोड़ चुना संगीत का रास्ता

स्कूली शिक्षा पूरी करने के बाद मदन मोहन ने साल 1943 में भारतीय सेना में सेंकेंड लेफ्टिनेंट के रूप में सेवा दी. द्वितीय विश्व युद्ध समाप्त होने के बाद उन्होंने सेना (दो साल कार्यकाल) छोड़ दी और संगीत को अपना जीवन समर्पित कर दिया. इसके बाद वे ऑल इंडिया रेडियो लखनऊ और दिल्ली में कार्यक्रम सहायक के रूप में कार्यरत रहे. इस दौरान उन्हें उस्ताद फैयाज खान, उस्ताद अली अकबर खान, बेगम अख्तर और तलत महमूद जैसे महान कलाकारों के साथ काम करने और उनसे सीखने का अवसर मिला.

इन फिल्मों से बनाई अलग पहचान

फिल्मी सफर की शुरुआत उन्होंने सहायक संगीतकार के रूप में की. साल 1950 में फिल्म 'आंखें' से उन्हें स्वतंत्र संगीतकार के रूप में पहचान मिली. इसके बाद 'अदा', 'देख कबीरा रोया', 'शराबी', 'वो कौन थी?', 'मेरा साया', 'हकीकत', 'दस्तक', 'हीर रांझा', 'मौसम' और 'लैला मजनूं' जैसी फिल्मों में उन्होंने ऐसा संगीत दिया, जिसे आज भी लोग बड़े शौक से सुनते हैं.

गजलों और मधुर धुनों के लिए हमेशा याद किए जाएंगे

मदन मोहन को विशेष रूप से हिंदी फिल्मों में गजलों को नई ऊंचाई देने के लिए याद किया जाता है. उनकी धुनों में शास्त्रीय संगीत की गहराई, इमोशंसकी मिठास और शब्दों की सेंसिटिविटी का अद्भुत संगम दिखाई देता था. उन्होंने लता मंगेशकर, मोहम्मद रफी, तलत महमूद, मन्ना डे, किशोर कुमार, महेंद्र कपूर और हेमंत कुमार जैसे दिग्गज गायकों के साथ कई कालजयी गीत दिए. लता मंगेशकर के साथ उनकी जोड़ी विशेष रूप से मशहूर रही और दोनों ने मिलकर अनेक अमर गीतों को जन्म दिया.

51 साल की उम्र में दुनिया को कहा अलविदा

गीतकार राजा मेहदी अली खान, कैफी आजमी, राजिंदर कृष्ण, साहिर लुधियानवी और मजरूह सुल्तानपुरी के साथ उनका रचनात्मक सहयोग भी बेहद सफल रहा. उनके संगीत की सबसे बड़ी विशेषता ये थी कि हर धुन में इमोशंनस की गहराई और मधुरता सहज रूप से महसूस होती थी. 14 जुलाई 1975 को मात्र 51 वर्ष की आयु में मदन मोहन का निधन हो गया था. हालांकि उनका जीवन तुलना में छोटा रहा लेकिन उन्होंने भारतीय फिल्म संगीत को ऐसी अमूल्य धरोहर दी, जो आज भी उतनी ही मशहूर है.

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1960 और 1970 का दशक मदन मोहन के संगीत करियर का सबसे सफल और यादगार समय माना जाता है. इस दौरान उन्होंने 'वो कौन थी?', 'हकीकत', 'मेरा साया', 'दस्तक', 'हीर रांझा', 'हंसते ज़ख्म' और 'मौसम' जैसी फिल्मों में कालजयी संगीत दिया. 'लग जा गले', 'नैना बरसे', 'कर चले हम फ़िदा' और 'ये दुनिया ये महफिल' जैसे गीत आज भी सदाबहार हैं. साल 1971 में फिल्म 'दस्तक' के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ संगीत निर्देशन का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला. लता मंगेशकर ने उन्हें 'गजल का शहजादा' कहा, जो उनकी संगीत कौशल का सबसे बड़ा सम्मान माना जाता है.

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