दिल्ली के कालकाजी में एक नाबालिग के साथ हुए यौन अपराध के बाद दिल्ली यूनिवर्सिटी की छात्राओं ने जब विरोध प्रदर्शन किया था, जिसमें 'एक कचौड़ी दो समोसा, इन मर्दों का क्या भरोसा', 'एक सुट्टा दो चाय, मर्द जात हाय हाय' जैसे कई व्यंगात्मक नारे लगाए गए. 

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इन नारों के बाद सोशल मीडिया पर भी बहस हुई . कई मर्दों ने इसके खिलाफ आपत्ति जाहिर करते हुए कहा कि सभी मर्द एक जैसे नहीं होते. अब बॉलीवुड एक्टर गुलशन दैवेया ने भी  इस मु्द्दे पर अपनी राय रखी है.  उनका मानना है कि ये बात सही है कि सभी मर्द एक-जैसे नहीं होते हैं लेकिन इसको पर्सनली लेने की बजाय इस समस्या की गंभीरतो को समझने की जरूरत है. 

गुलशन दैवेया बोले, ‘मैं ऐसा नहीं हूं’

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बीबीसी को दिए एक इंटरव्यू में गुलशन दैवेया ने इन मीम्स पर खुलकर बात की. जब गुलशन दैवेया से पूछा गया कि 'एक-कचौड़ी दो समोसा इन मर्दों का क्या भरोसा' इस तरह के मीम्स से बहुत सारे पुरुष ट्रिगर हो जाते हैं, तो एक पुरुष के तौर पर उनकी क्या राय है, तो उन्होंने कहा, 'कई बार मैं भी ट्रिगर हो जाता हूं. मतलब ट्रिगर तो नहीं होता हूं. लेकिन मुझे भी लगता है कि सारे मर्द तो ऐसे नहीं होते हैं. मैं ऐसा नहीं हूं. मैं कई सारे लोगों का जानता हूं जो ऐसे नहीं हैं.'

मर्दों से समस्या को समझने की अपील की

गुलशन ने आगे सीमित दृष्टिकोण का जिक्र करते हुए कहा, 'कई बार क्या होता है कि हम बहुत नैरो पर्सपेक्टिव से देखते हैं. ये डिपेंड करता है. ऐसे मामलों में मुख्य रूप से ऐसा क्यों हैं, इसको आपको समझना पड़ेगा.'

इसके बाद वो कहते हैं, 'इसको पर्सनली लेने की जरूरत नहीं है. ये सब लोग जानते हैं. जो औरतें ये कह रही हैं, जो ये स्लोगन बना रहे हैं, वो लोग भी जानते हैं कि सारे मर्द ऐसे नहीं होते. लेकिन ये एक सीरियस प्रॉब्लम है.उस चीज को अगर ठीक करना है, तो ये ही है तरीका वन हैस टू अंदरस्टैंड'

गुलशन दैवेया का वर्क फ्रंट

गुलशन दैवेया को 2011 मे आई ‘शैतान’ फिल्म में करण चौधरी के किरदार से पहचान मिली थी. हाल ही में वो फिल्म ‘लिटिल थॉमस’ में नजर आए थे. इस फिल्म में उनके साथ रसिका दुग्गल भी हैं. इससे पहले वह ‘कांतारा चैप्टर 1’, ‘उलझ’, 'बैड कॉप्स' ‘गन्स एंड गुलाब्स’ और ‘दहाड़’ जैसे प्रोजेक्ट्स में भी काम कर चुके हैं.