हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में गोवर्धन असरानी एक चर्चित नाम है. अपने बेहतरीन परफॉर्मेंसेस से उन्होंने दर्शकों के दिल में अपनी अलग छाप छोड़ी है. अभिनेता पाकिस्तान से बतौर शरणार्थी भारत में पधारें जहां उनका जीवन मुश्किलों से भरा रहा लेकिन मेहनत और संघर्ष के साथ उन्होंने अपनी अलग पहचान बनाई. गोवर्धन असरानी का जन्म 1 जनवरी 1941 को एक सिंधी परिवार में हुआ था. 20 अक्टूबर 2025 को उन्होंने इस दुनिया को अलविदा कह दिया.

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1947 में भारत पाकिस्तान विभाजन के बाद असरानी अपने परिवार के साथ भारत पधारे और उन्होंने अपनी शुरुआती जिंदगी राजस्थान के जयपुर शहर में बिताई. उनके पिता ठाकुरदास जेठानंद असरानी अपने परिवार का पेट भरने के लिए कई नौकरियां करते थे उसके बाद उन्होंने पंच बट्टी के पास अपना एक छोटा सा साड़ी और कार्पेट का बिजनेस शुरू किया. लेकिन इन  परिस्थितियों में भी असरानी का हौसला बुलंद रहा.

कॉलेज से शुरू हुआ एक्टिंग के लिए लगावअसरानी ने तमाम मुश्किलों के बावजूद अपनी स्कूली पढ़ाई पूरी की इसके बाद उन्होंने एक्टिंग की दुनिया में कदम रखा. दिवगंत अभिनेता ने सेंट जेवियर स्कूल से अपनी शुरुआती पढ़ाई पूरी की और इसके बाद उन्होंने राजस्थान आर्ट्स कॉलेज से अपनी डिग्री हासिल को. कॉलेज के दिनों से ही उनका मन थिएटर और एक्टिंग के प्रति लगा. द इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक अभिनेता ने जयपुर के ऑल इंडिया रेडियो में बतौर वॉयस ओवर आर्टिस्ट भी काम किया ताकि वो अपनी जरूरतों को पूरा कर सकें. 

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जयपुर के लोककथाओं में प्रसिद्ध है असरानी की ये कहानीजवानी के दिनों में असरानी अपने दोस्त के साथ MI रोड पर साइकलिंग कर रहे थे. उस समय दोनों दोस्त सिनेमा हॉल के पास रुके जहां दिवगंत अभिनेता की नजर मेहरबान के पोस्टर पर पड़ी. इसे देख उन्होंने अपने दोस्त को कहा कि, 'देख रहे हो. एक दिन मेरी पोस्टर भी यहां लगी होगी.' कुछ महीनों बाद ही असरानी की ये ख्वाइश पूरी हो गई. उनकी डेब्यू फिल्म हरे कांच की चूड़ियां का पोस्टर उसी थिएटर के बाहर लगी. भले पोस्टर में उनकी छोटी सी झलक थी लेकिन असरानी के लिए विश्वजीत, हेलेन, नैना साहू और राजेंद्र नाथ जैसे दिग्गजों के साथ स्क्रीन शेयर गर्व की बात थी.

 

अपने कल्चर से हमेशा कनेक्टेड थे एक्टरगोवर्धन असरानी सिंधी परिवार से ताल्लुक रखते हैं और उनके व्यक्तित्व में इसकी साफ झलक देखने को मिलती थी. 2024 में नवंबर के महीने में अजमेर के एक इवेंट में एक्टर ने शिरकत की और अपने भाषण में उन्होंने सिंधी हेरिटेज को बखूबी दर्शकों के सामने पेश किया. अपने स्पीच में एक्टर ने कहा- 'आपने कभी भी किसी सिंधी को भीख मांगते देखा है? नहीं ऐसा इसलिए क्योंकि सिंधी कभी भीख नहीं मांगते, हम मार्बल्स बेचते हैं, कपड़ों का ट्रेड करते हैं, पकौड़े बेचते हैं लेकिन कभी भीख नहीं मांगते और यही हमारी असली पहचान है.'

एक्टर ने कहा था- 'आपको दुनिया में कही सिंधी टेररिस्ट भी नहीं दिखेगा लेकिन आप सिंधी बिजनेसमैन जरूर देख सकते हैं. मेरे पेरेंट्स ने भी ऐसा ही किया. उन्होंने कपड़े सिले, मेहनत की लेकिन कभी भीख नहीं मांगा. यही संस्कार हैं जिनके साथ मैं बड़ा हुआ.'

कैसा रहा असरानी का फिल्मी करियरगोवर्धन असरानी अपने कॉमिक रोल्स के लिए पहचाने जाते हैं. अभिनेता ने अपने फिल्मी करियर में 350 से ज्यादा फिल्मों में काम किया और आज भी दर्शक उन्हें शोले के ब्रिटिश जेलर के रूप में याद करती है. 1970 से लेकर 1979 तक 'मेरे अपने', 'कोशिश', 'बावर्ची', 'अभिमान', 'महबूबा', 'पलकों की छांव में' और 'बंदिश' जैसी फिल्मों में सपोर्टिंग रोल्स में देखा गया.