Bengal Election Opinion Poll: पश्चिम बंगाल की सियासत में चुनाव से पहले ही मुकाबला बेहद दिलचस्प मोड़ पर पहुंच गया है. Matrize के ताजा ओपिनियन पोल ने साफ संकेत दिया है कि इस बार की लड़ाई सीधी, कड़ी और आखिरी वोट तक खिंचने वाली है.
सर्वे के अनुसार, वोट प्रतिशत में तृणमूल कांग्रेस को 43%, भारतीय जनता पार्टी (BJP) को 41% और अन्य दलों को 16% समर्थन मिल सकता है. यानी TMC को मामूली बढ़त जरूर है, लेकिन यह अंतर इतना कम है कि किसी भी वक्त चुनावी तस्वीर बदल सकती है.
खास बात यह है कि यह 2% का फासला कई सीटों पर निर्णायक साबित हो सकता है. वहीं 16% ‘अन्य’ वोट इस चुनाव में किंगमेकर की भूमिका निभा सकते हैं. ऐसे में साफ है कि बंगाल में इस बार मुकाबला बेहद कांटे का होने वाला है.
‘अन्य’ का खेला-किसका खेल बिगाड़ेगा?
बंगाल के इस करीबी मुकाबले में ‘अन्य’ का 16% वोट शेयर सबसे बड़ा सस्पेंस बन गया है. इस खेमे में कांग्रेस, लेफ्ट और ओवैसी की AIMIM जैसे दल शामिल हैं, जो सीधे तौर पर सत्ता की लड़ाई नहीं लड़ रहे, लेकिन नतीजों पर बड़ा असर डाल सकते हैं.
राजनीतिक समीकरण बताते हैं कि ये वोट परंपरागत रूप से BJP विरोधी माने जाते हैं, लेकिन कई सीटों पर इनकी मौजूदगी TMC के वोट बैंक में सेंध भी लगा सकती है.
कांग्रेस नेता Adhir Ranjan Chowdhury ने भी इसे लेकर चेतावनी दी है. उन्होंने कह, ‘पिछले विधानसभा चुनाव में वोटों के ध्रुवीकरण ने हमें हार की कीमत चुकानी पड़ी थी.’
इस बार AIMIM, Humayun Kabir की बनाई आम जनता उन्नयन पार्टी (AJUP) के साथ गठबंधन में चुनाव लड़ रही है. माना जा रहा है कि AIMIM-AJUP गठबंधन मुस्लिम बहुल सीटों पर वोट शेयर को प्रभावित कर सकता है.
वहीं, यह चुनाव मुख्य रूप से सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस (TMC) और भारतीय जनता पार्टी (BJP) के बीच सीधी टक्कर के तौर पर देखा जा रहा है. ऐसे में ‘अन्य’ का यह वोट शेयर किसी एक दल को जिताने से ज्यादा, मुकाबले को और उलझाने वाला फैक्टर बन सकता है. अब नजर इस बात पर है कि यह 16% वोट किसके पक्ष में झुकता है और किसका खेल बिगाड़ता है.
‘अन्य’ का 16%-किंगमेकर कौन?
ABP-Matrize का यह प्री-पोल सर्वे सिर्फ आंकड़े नहीं, बल्कि चुनावी ट्रेंड का संकेत है. यह दिखाता है कि बंगाल में इस बार सीधी लड़ाई TMC और BJP के बीच है, जहां कोई भी पार्टी आराम से जीत दर्ज नहीं कर सकती है. साथ ही, यह भी साफ है कि अंतिम नतीजे पूरी तरह से वोटिंग के आखिरी चरणों और मतदाताओं के मूड पर निर्भर करेंगे.
इस पूरे चुनावी समीकरण में सबसे अहम भूमिका ‘अन्य’ के 16% वोट शेयर की मानी जा रही है. यही वह हिस्सा है जो अंत में सत्ता का रुख तय कर सकता है. अक्सर नजरअंदाज किए जाने वाले छोटे दल और निर्दलीय उम्मीदवार इस बार असली गेमचेंजर बन सकते हैं. अगर यह वोट किसी एक बड़े दल की ओर झुकता है, तो सीटों का पूरा गणित पल भर में बदल सकता है.
विशेषज्ञों का मानना है कि करीबी मुकाबले में यह 16% वोट निर्णायक बढ़त दिलाने में अहम भूमिका निभाएगा. यही वजह है कि बड़ी पार्टियां अब इन वोटर्स को साधने के लिए अलग रणनीति बना रही हैं-स्थानीय मुद्दों से लेकर क्षेत्रीय समीकरण तक हर पहलू पर फोकस किया जा रहा है.
साफ है, इस बार जीत सिर्फ बड़े वोट शेयर से नहीं, बल्कि ‘अन्य’ के इस निर्णायक हिस्से को अपने पक्ष में करने से तय होगी. यानी यह वोट शेयर एक तरफ किसी को मजबूत करने के बजाय, दूसरे का खेल बिगाड़ने में ज्यादा अहम भूमिका निभा सकता है. अब बड़ा सवाल यही है कि क्या ‘अन्य’ वोट इस बार भी समीकरण बिगाड़ेंगे या किसी एक पक्ष को निर्णायक बढ़त दिलाएंगे?
वोट में बढ़त, लेकिन सीटों में फंसा खेल
दिलचस्प यह है कि वोट प्रतिशत और सीटों के अनुमान में सीधा तालमेल नजर नहीं आता. आंकड़े संकेत दे रहे हैं कि मुकाबला जितना वोट में करीबी है, उतना ही सीटों में भी उलझा हुआ है. सर्वे के मुताबिक, तृणमूल कांग्रेस को 140 से 160 सीटें मिल सकती हैं, जबकि भारतीय जनता पार्टी 130 से 150 सीटों के बीच रह सकती है. वहीं अन्य दलों के खाते में 8 से 16 सीटें जाने का अनुमान है.
यानी बढ़त के बावजूद TMC के लिए राह आसान नहीं दिख रही. BJP बेहद करीब है और थोड़ा सा भी वोट स्विंग सीटों का पूरा गणित बदल सकता है.
साफ है कि यह चुनाव किसी एकतरफा जीत की कहानी नहीं बनने जा रहा, बल्कि आखिरी चरण तक खिंचने वाली कड़ी टक्कर का संकेत दे रहा है, जहां हर सीट का फैसला बेहद अहम होगा.
2% वोट का फर्क, लेकिन सत्ता का फैसला
तृणमूल कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी के बीच महज 2% वोट का अंतर दिख रहा है, लेकिन यही छोटा सा गैप सत्ता की चाबी बन सकता है. चुनावी राजनीति में कई बार मामूली अंतर ही बड़े उलटफेर की वजह बनता है, और बंगाल इसका अपवाद नहीं है. राज्य की कई सीटों पर जीत-हार का फैसला बेहद कम वोटों से होता रहा है. ऐसे में 2% का स्विंग दर्जनों सीटों का गणित बदल सकता है. यही कारण है कि दोनों दल अब कोई ढील देने के मूड में नहीं हैं.
ग्राउंड पर अभियान तेज हो चुका है-बूथ मैनेजमेंट से लेकर माइक्रो-लेवल रणनीति तक, हर पहलू पर बारीकी से काम हो रहा है. स्पष्ट है कि इस बार मुकाबला आंकड़ों से ज्यादा रणनीति और आखिरी समय के रुझान पर निर्भर करेगा, जहां हर वोट निर्णायक साबित हो सकता है.
