West Bengal Election 2026: पश्चिम बंगाल चुनाव से पहले एक नया ट्रेंड सामने आ रहा है. दिल्ली में काम करने वाले बंगाली प्रवासी तेजी से अपने गांव-शहर लौट रहे हैं. वजह? वोटर लिस्ट से नाम कटने का डर और चुनाव में वोट देने की बेचैनी. कई प्रवासी मजदूरों का कहना है कि मतदाता सूची में गड़बड़ियों और नाम हटने की खबरों के बाद वे जोखिम नहीं लेना चाहते. 23 और 29 अप्रैल को होने वाले मतदान से पहले 19 अप्रैल तक सुधार का मौका है, इसलिए लोग जल्दी घर लौट रहे हैं.

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क्या कह रहे हैं प्रवासीएक प्रवासी मजदूर ने बताया कि उसका नाम अभी तक मतदाता सूची में नहीं आया है. उसके परिवार में चार भाइयों में से सिर्फ एक का नाम सूची में दर्ज है, जबकि बाकी तीन को फिलहाल “विदेशी” माना जा रहा है. उसने कहा कि उनकी बस्ती के ज्यादातर लोग वोट देने के लिए घर जाने की योजना बना रहे हैं, लेकिन बड़ी संख्या में लोगों के यात्रा करने की वजह से टिकट मिलना मुश्किल हो रहा है.

उसने यह भी बताया कि कुछ लोगों के नाम, खासकर जिन्होंने 2002 में वोट दिया था, सूची में शामिल हो गए हैं, लेकिन कई नाम देर से आए हैं या अब भी लंबित हैं. हालांकि 19 अप्रैल तक सुधार का मौका है, इसलिए लोग दोबारा सत्यापन करा सकते हैं. उसने कहा, “हमारा वोट 23 तारीख को है और हम वोट देने जरूर जाएंगे. पूरी बस्ती के लोग जाएंगे, लेकिन ज्यादा लोगों के कारण टिकट की दिक्कत हो रही है. मेरा नाम अभी तक लिस्ट में नहीं आया है. चार भाइयों में सिर्फ एक का नाम है, बाकी तीन नहीं हैं. अभी हम तीन भाई ‘विदेशी’ माने जा रहे हैं और एक ‘भारतीय’. यानी डर सिर्फ वोट डालने का नहीं, बल्कि पहचान खोने का भी है.

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नाम कटने के आरोप, परिवार तक प्रभावितऐसे कई मामले सामने आए हैं जहां एक ही परिवार के कुछ लोगों के नाम लिस्ट में हैं, तो कुछ के नहीं.  कूचबिहार की एक प्रवासी महिला ने बताया कि वह अपने परिवार के साथ वोट देने के लिए घर जाने की योजना बना रही हैं. उन्होंने भरोसा जताया कि अब इस तरह की समस्याएं ज्यादा व्यापक नहीं हैं, लेकिन यह भी माना कि पहले ऐसी दिक्कतें सामने आ चुकी हैं. महिला का कहना है कि , “हां, मैं भी अपने परिवार के साथ वोट देने जाऊंगी. मैंने अभी ऐसा कुछ ज्यादा नहीं सुना है. मेरे कई रिश्तेदारों के नाम पहले वोटर लिस्ट से हटाए गए थे.”

एक अन्य प्रवासी ने बताया कि उसका नाम तो सूची में है, लेकिन उसकी पत्नी का नाम बिना किसी कारण हटा दिया गया है। उसने कहा कि ऐसे मामले अकेले नहीं हैं। उसने कहा, “हां, हम वोट देने जाएंगे। नाम हटाए गए हैं—मेरी पत्नी का वोट हट गया है। मेरा नाम है, लेकिन पत्नी का क्यों हटा, पता नहीं। ऐसे कई मामले हैं। हमारे परिवार में दो लोगों—मेरी पत्नी और भाभी—के नाम लिस्ट से हटा दिए गए हैं।”

SIR बना विवाद की जड़दरअसल, यह पूरा मामला स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) से जुड़ा है. इस प्रक्रिया के बाद राज्य में कुल मतदाताओं की संख्या करीब 61 लाख कम होकर 7.66 करोड़ से घटकर 7.04 करोड़ रह गई है. करीब 60 लाख नाम जांच के दायरे में थे, जिनमें से कई को लेकर अब भी विवाद जारी है. मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पहले ही आरोप लगा चुकी हैं कि यह प्रक्रिया लोगों के वोटिंग अधिकार छीनने की कोशिश है.

जमीनी स्तर पर बढ़ा गुस्सामालदा में ‘बांग्ला पक्षो’ संगठन ने वोटर लिस्ट से नाम हटाने के खिलाफ अनशन शुरू कर दिया है. संगठन का आरोप है कि बंगाली भाषी नागरिकों को व्यवस्थित तरीके से सूची से बाहर किया जा रहा है. संगठन ने चेतावनी दी है कि अगर जल्द सुधार नहीं हुआ, तो राज्यव्यापी आंदोलन होगा.

क्यों अहम है यह मुद्दा?बंगाल जैसे राज्य में, जहां हर वोट मायने रखता है, वहां लाखों नामों का हटना चुनावी नतीजों को प्रभावित कर सकता है. यह सिर्फ चुनाव नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक अधिकारों का सवाल बनता जा रहा है,जहां पहचान, नागरिकता और वोट तीनों जुड़ गए हैं.