नई दिल्लीः अगर आजादी के 70 साल के बाद भी जाति और धर्म पर चुनाव लड़ा जाए तो मतलब साफ है कि लोकतंत्र अभी भी खिलौना बना हुआ है. सच्चाई यही है कि चुनावी मौसम में राजनेता जाति और धर्म की राजनीति का दोहन करने से बाज नहीं आते हैं. चुनावी मौसम में विकास कम बल्कि जाति और धर्म का खुमार चढ़ जाता है. इस महासमर में हर नेता ताल ठोककर अपनी जाति बताने से बाज नहीं आते हैं. मकसद है अपनी-अपनी जाति में वोट बटोरना और सत्ता में आना. तभी तो कोई अति पिछड़ा है तो कोई पिछड़ा है, कहीं दलित तो कहीं यादव, कोई जनेऊधारी तो कोई क्षत्राणी है.
दरअसल आजादी के 70 साल के बाद भी देश में जाति और धर्म का जहर ज्यादा फैलाया जा रहा है इसके लिए नेता ही नहीं जिम्मेदार हैं बल्कि जनता भी कसूरवार है. जाति में जकड़ी सोच, सामाजिक व्यवस्था, हर वर्ग में विकास की रफ्तार ना पहुंचना, सत्ता में भागदारी, धर्म की बीच दीवार और जाति के बीच गांठ, नेताओं में पदलोलुप्ता और पार्टी में पूर्ण लोकतांत्रिक व्यवस्था का चरमरा जाना मुख्य वजहें हैं. तभी तो कई क्षेत्रीय पार्टियां का निर्माण जाति के आधार पर हुई है और उसी जाति के बल पर दूकान चल रही है. इसके लिए राष्ट्रीय पार्टियां कम जिम्मेदार नहीं है.
कांग्रेस कभी मुस्लिम, दलित और ब्राह्मण के बलबूते पर राजनीति करती थी तो बीजेपी हिंदुत्व की राजनीति करती है. चुनाव में जाति देखकर टिकट दी जाती है तो धर्म को देखकर उम्मीदवार का पैमाना तय किया जाता है. मुस्लिम के लिए बीजेपी अछूत है तो बीजेपी भी मुस्लिम उम्मीदवारों को टिकट नहीं के बराबर देती है.
पार्टियों का जाति पर जोर
अखिलेश और तेजस्वी यादव जाति पर जोर देते हैं तो मायावती दलित जाति पर खास जोर देती है, बीजेपी का जोर पहले सवर्ण और अब पिछड़ी जाति भी है. सत्ता की भागीदारी के लिए कई जातियों में सांठगंठ भी हुई है. कभी उत्तरी भारत में अजगर मतलब अहिर, जाट, गुर्जर और राजपूत जातियों की सांठगांठ हुई तो कभी गुजरात में खाम (KHAM) मतलब के से क्षत्रिय, एच से दलित, ए के आदिवासी और एम से मुस्लिम का फॉर्मूला चला. अब तो नरेंद्र मोदी को हराने के लिए उत्तरप्रदेश में मायावती और अखिलेश यादव के बीच महागठबंधन हुआ तो यूपी के चुनाव में जाति पर जबर्दस्त जोर है.
जाति पर रार कैसे शुरू हुआ?
ये पहला चुनाव नहीं है बल्कि हर चुनाव में जाति और धर्म का जहर पूरे देश में फैल जाता है. ये खेल कहां से शुरू होता है और कहां खत्म होता है, इसे पकड़ना मुश्किल है लेकिन वार-पलटवार शुरू होने के साथ ये मुद्दा गर्माया जाता है. हालांकि इस चुनाव में जाति के मुद्दे को राहुल ने हवा देने की कोशिश की, कर्नाटक के कोलार में राफेल के मुद्दे पर राहुल ने कहा था कि सभी चोरों का उपनाम मोदी क्यों होता है.
जाति पर पीएम मोदी का पलटवार
मोदी ने राहुल पर पलटवार करते हुए छत्तीसगढ़ की रैली में कहा नामदार गालियां दे रहे हैं. सारे मोदी को चोर कहते हैं. यहां का साहू समाज गुजरात में होता तो उन्हें मोदी कहते हैं. राजस्थान में होता तो राठौर कहते. तो सोचिए, सारे साहू चोर हैं क्या? ये मुद्दा खत्म भी नहीं हुआ था कि मायावती ने मोदी पर वार करते हुए कहा कि वे नकली ओबीसी हैं. उन्होंने सीएम बनने के बाद अपनी जाति को ओबीसी में डाल दिया कि वो पिछड़ा नहीं बल्कि अति पिछड़ी जाति से आते हैं. पीएम ने मायावती को पलटवार करते हुए कहा, 'मेरी जाति तो इतनी छोटी है कि गांव में एक-आधा घर भी नहीं होता है. मैं तो पिछड़ा नहीं अति पिछड़ा में पैदा हुआ हूं. आप मेरे मुंह से बुलवा रही हैं इसलिए बोल रहा हूं, जब मेरा देश पिछड़ा है तो अगड़ा क्या होता है. मुझे तो पूरे देश को अगड़ा बनाना है.
तेजस्वी ने भी पीएम की जाति को लेकर साधा निशाना
आरजेडी नेता तेजस्वी यादव ने भी पीएम मोदी की जाति को लेकर निशाना साधते हुए कहा था कि वह कागजी ओबीसी हैं. ये सिर्फ इसी चुनाव का मामला नहीं है गुजरात में धर्म और जाति की राजनीति ऐसी हुई कि राहुल गांधी मंदिर मंदिर के दौरे शुरू कर दिये. बीजेपी राहुल के मंदिर दौरे पर सवाल उठाई तो कांग्रेस के रणदीप सुरजेवाला को कहना पड़ा कि कि राहुल गांधी जी सिर्फ हिंदू नहीं हैं,बल्कि वह जनेऊधारी हिंदू है. जब जाति के नाम पर राजनीति जोरों पर हैं तो कभी अरविंद केजरीवाल को कहना पड़ता है कि वो वैश्य/अग्रवाल के हैं और उन्हीं की पार्टी के मनीष सिसोदिया को कहना पड़ा कि आतिशी क्षत्राणी हैं.
जातिवाद के लिए कौन जिम्मेदार?
मतलब जाति-धर्म की राजनीति के मसले पर हम्माम में सब नंगे हैं. कोई जाति की झोली फैला लेता है तो कोई धर्म के नाम पर कटोरा फैला लेता है. कभी मंडल-कमंडल की राजनीति होती है तब देश की राजनीति ही बदल जाती है. खासकर चुनाव के मौसम ज्यादातर मतदाताओं के तन-मन में जाति का भूत सवार हो जाता है. अगर समाज और सोच में जाति का जहर फैला हुआ है तो इस बीमारी से न कोई संस्था और ना ही नेता अछूता है. सच्चाई ये भी है जाति व्यवस्था ने समाज को दो नहीं बल्कि अनेक स्तरों पर बांट दिया है. ये भी सच है कि समाज तब तक प्रगति नहीं कर सकता जबकि विकास की धारा हर वर्ग में नहीं पहुंचे.
अभी भी नहीं मिल रहा है दलितों-पिछड़ों का हक
1977 के बाद देश की राजनीति बदली है, विकास की धारा और समाज में भी सत्ता की भागीदारी शुरू हुई है लेकिन ये कालचक्र पूरा नहीं हुआ है. अभी सत्ता के उच्च पदों पर दलितों और पिछड़ों की भागीदारी बढ़नी है लेकिन दुर्भाग्य से दलित और पिछड़े की राजनीति करने वाले नेता भटक गये हैं वो सिर्फ अपने परिवार हित के लिए जाति का कार्ड़ खेल रहे हैं लेकिन राष्ट्रीय पार्टी भी इस खेल में पीछे नहीं हैं अभी भी संगठन और सत्ता में दलितों और पिछड़े को उचित भागीदारी नहीं मिली है. यही वजह है कि 21वीं सदीं में हम आगे नहीं बढ़ रहे हैं कि बल्कि पीछे फिसल रहें हैं जो देश और समाज के लिए बेहद खतरनाक है. अब इस लोकसभा चुनाव में जाति कार्ड चलता है या धर्म कार्ड ये 23 मई को पता चलेगा .
(नोट- उपरोक्त दिए गए विचार व आंकड़े लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. ये जरूरी नहीं कि एबीपी न्यूज ग्रुप सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है.)
(धर्मेन्द्र कुमार सिंह राजनीतिक-चुनाव विश्लेषक हैं और ब्रांड मोदी का तिलिस्म के लेखक हैं. ट्विटर और फेसबुक पर जुड़ने के लिए क्लिक करें, https://twitter.com/dharmendra135, www.facebook.com/dharmendra.singh.98434)
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