नई दिल्ली: हरियाणा में विधानसभा चुनाव का बिगुल बजते ही सत्ताधारी बीजेपी जहां 75 पार का नारा बुलंद कर रही है....वहीं, विपक्षी पार्टी कांग्रेस राज्य की सत्ता में वापसी के दावे कर रही है. इनेलो और जेजेपी जैसे दल भी हरियाणा में खुद को राष्ट्रीय पार्टियों का विकल्प साबित करने में लगे हुए हैं. लेकिन राज्य का एक विधानसभा क्षेत्र ऐसा है जो 'पार्टी नहीं, आदमी चाहिए' के सिद्धांत पर चलता है. बीते 23 सालों में कई पार्टियां सत्ता में आईं और गईं लेकिन किसी भी दल की दाल वहां नहीं गली.

जी हां, हम बात कर रहे हैं हरियाणा के 90 विधानसभा क्षेत्रों में से एक 'पुंडरी' की. हरियाणा के कैथल जिले का एक छोटा सा शहर पुंडरी 1996 के बाद से बड़े राजनैतिक दलों को ललकार रहा है और उनको नकारते हुए निर्दलीय उम्मीदवारों का चयन कर रहा है. हरियाणा के बासमती चावल बेल्ट में स्थित इस निर्वाचन क्षेत्र ने प्रमुख राजनीतिक दलों के प्रभाव को समाप्त कर दिया है और कई सालों से 'अपने बीच के लोगों' को ही चुना है.

हालांकि, इसकी वजह से वहां के वोटर्स को कई बार भेदभाव का सामना करना पड़ता है क्योंकि वो सत्ताधारी दलों को छोड़कर निर्दलीय उम्मीदवार को चुनते हैं. पुंडरी विधानसभा क्षेत्र जिसे 1952 में बनाया गया था, में ब्राह्मण और रोर समुदायों का वर्चस्व है. इस सीट के पहले विधायक कांग्रेस के गोपीचंद थे.

1996 में हुई नई शुरुआत

पुंडरी में निर्दलीय को चुनने की परंपरा 1996 से शुरू हुई और बीते 23 साल के अंतराल में हुए पांच चुनावों से कायम है. 1996 में, निर्दलीय उम्मीदवार नरेंद्र शर्मा ने कांग्रेस के ईश्वर सिंह को हराया था. साल 2000 में ईश्वर सिंह के बेटे तेजवीर ने निर्दलीय के रूप में चुनाव लड़ा और नरेंद्र शर्मा को हराया. तीसरा और चौथा स्थान भी निर्दलीय उम्मीदवारों ने ही हासिल किया. इस चुनाव में बीजेपी पांचवें और कांग्रेस छठे स्थान पर रही.

2005 में निर्दलीय दिनेश कौशिक ने नरेंद्र शर्मा को हराया, जो तब इंडियन नेशनल लोकदल (INLD) से चुनाव लड़े थे. कांग्रेस उम्मीदवार भाग सिंह तीसरे स्थान पर रहे, जबकि बीजेपी के रणधीर सिंह गोलन चौथे स्थान पर थे.

2009 में निर्दलीय सुल्तान सिंह जादोला ने दिनेश कौशिक को हराया जो कि कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़े थे. 2014 में दिनेश कौशिक ने फिर से निर्दलीय के रूप में चुनाव लड़ा और जीत हासिल की. उन्होंने बीजेपी के रणधीर सिंह गोलन को हराया.

इस बार भी कई निर्दलीय उम्मीदवार राजनीतिक दलों के उम्मीदवारों को चुनौती दे रहे हैं और दावा कर रहे हैं कि वे जीतेंगे. इनमें से कई निर्दलीय बीजेपी में थे और टिकट की मांग कर रहे थे. टिकट नहीं मिलने के बाद कई नेता निर्दलीय मैदान में उतर गए हैं. उनमें से कुछ हालांकि, सत्तारूढ़ बीजेपी के लिए समस्याएं पैदा कर सकते हैं.

मौजूदा विधायक दिनेश कौशिक भी निर्दलीय मैदान में

निर्दलीय के रूप में जीते मौजूदा विधायक दिनेश कौशिक भी बीजेपी में शामिल हो गए थे और पार्टी के टिकट की उम्मीद कर रहे थे. टिकट नहीं मिलने पर वो अब फिर से निर्दलीय के रूप में चुनाव लड़ रहे हैं. बीजेपी ने इस बार पुंडरी से वेदपाल एडवोकेट को अपना उम्मीदवार बनाया है.

लंबे समय से बीजेपी से जुड़े और कई बार पार्टी से चुनाव लड़ चुके रणधीर सिंह गोलन को भी इस बार टिकट देने से मना कर दिया गया. वह भी निर्दलीय के रूप में चुनाव लड़ रहे हैं. एक अन्य निर्दलीय उम्मीदवार और पूर्व विधायक नरेंद्र शर्मा भी चुनाव मैदान में हैं. ये सभी उम्मीदवार अपनी-अपनी जीत का दावा कर रहे हैं. वहीं दूसरी ओर राजनीतिक दल यह दावा कर रहे हैं कि वे पुंडरी में इतिहास बनाएंगे और इस बार निर्दलीय चुनाव नहीं जीतेगा. अब देखना दिलचस्प होगा कि पुंडरी एक बार फिर इतिहास दोहराएगा या नया इतिहास बनाएगा.

हरियाणा में 21 अक्टूबर को चुनाव होने हैं और 24 अक्टूबर को नतीजे घोषित किए जाएंगे. राज्य के प्रमुख दलों में बीजेपी, कांग्रेस, इनेलो और जेजेपी हैं.

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