दिल्ली स्थित जामिया मिल्लिया इस्लामिया देश के प्रमुख केंद्रीय विश्वविद्यालयों में शामिल है. विश्वविद्यालय की शैक्षणिक और ऐतिहासिक पहचान जितनी मजबूत है, उतनी ही चर्चा यहां छात्र राजनीति को लेकर भी होती रही है. जामिया का इतिहास भी इसे सामान्य विश्वविद्यालयों से अलग बनाता है. इसकी स्थापना राष्ट्रीय आंदोलन और शिक्षा के उद्देश्य से जुड़ी रही है. इसलिए यहां छात्र राजनीति का सवाल केवल चुनाव कराने या न कराने तक सीमित नहीं है, बल्कि विश्वविद्यालय की प्रशासनिक संरचना, छात्र भागीदारी और कैंपस संस्कृति से भी जुड़ा हुआ है. हालांकि, दूसरे कई विश्वविद्यालयों की तरह जामिया में नियमित रूप से छात्रसंघ चुनाव नहीं होते. ऐसे में अक्सर सवाल उठता है कि आखिर यहां छात्रसंघ चुनाव क्यों नहीं कराए जाते हैं?

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अनुशासन है बड़ी वजह

जामिया में छात्रसंघ चुनावों का इतिहास उतार-चढ़ाव भरा रहा है. विश्वविद्यालय प्रशासन ने समय-समय पर परिसर में चुनाव और छात्र राजनीति को लेकर अलग-अलग निर्णय लिए हैं. चुनाव नहीं होने की एक बड़ी वजह विश्वविद्यालय प्रशासन की ओर से परिसर में शैक्षणिक माहौल, अनुशासन और प्रशासनिक व्यवस्था को प्राथमिकता देना रही है.

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छात्र संगठन उठाते हैं छात्रों की आवाज

जामिया में छात्र प्रतिनिधित्व का मुद्दा हालांकि पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है. छात्रों की समस्याओं को प्रशासन तक पहुंचाने के लिए अलग-अलग छात्र संगठन और प्रतिनिधि सक्रिय रहे हैं. छात्र संगठन फीस, हॉस्टल, परीक्षा, छात्रवृत्ति, सुविधाओं और अन्य शैक्षणिक मुद्दों को लेकर अपनी आवाज उठाते रहे हैं. लेकिन ये गतिविधियां नियमित निर्वाचित छात्रसंघ के समान नहीं हैं. छात्र विभिन्न माध्यमों से अपनी शिकायतें और मांगें विश्वविद्यालय प्रशासन तक पहुंचाते हैं.

क्या कहते हैं समर्थक?

छात्रसंघ चुनाव के समर्थकों का तर्क है कि चुनाव छात्रों को लोकतांत्रिक प्रक्रिया में भाग लेने का अवसर देते हैं. इससे छात्र अपनी समस्याओं के लिए चुने हुए प्रतिनिधियों के जरिए विश्वविद्यालय प्रशासन से संवाद कर सकते हैं. उनका मानना है कि कैंपस में लोकतांत्रिक भागीदारी छात्रों के नेतृत्व कौशल को भी विकसित करती है. दूसरी ओर, चुनावों के विरोध या उन्हें सीमित रखने के पक्ष में यह तर्क दिया जाता है कि राजनीतिक गतिविधियों के कारण पढ़ाई का माहौल प्रभावित होता है. बड़े स्तर पर चुनाव होने पर परिसर में गुटबाजी, प्रदर्शन और विवाद की स्थिति बनने की आशंका भी जताई जाती है. केंद्रीय विश्वविद्यालयों में प्रशासन अक्सर शैक्षणिक गतिविधियों और परिसर में अनुशासन बनाए रखने को प्राथमिकत देता है.

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