देश में शिक्षा के क्षेत्र में लगातार सुधार और नए स्कूलों के विस्तार के बावजूद बड़ी संख्या में ऐसे स्कूल है, जहां पूरी पढ़ाई सिर्फ एक शिक्षक के भरोसे चल रही है. संसद में पेश किए गए शिक्षा मंत्रालय के ताजा आंकड़ों के अनुसार 2025-26 में देश भर में 10,0843 कुल ऐसे हैं, जहां केवल एक शिक्षक कार्यरत हैं. इनमें सरकारी सहायता प्राप्त और प्राइवेट स्कूल शामिल हैं. आंकड़े बताते हैं की सबसे ज्यादा ऐसे स्कूल आंध्र प्रदेश में है, जबकि कई अन्य राज्यों में भी शिक्षकों की कमी एक गंभीर समस्या बनी हुई है. 

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शिक्षा मंत्रालय के आंकड़ों में क्या आया सामने 

शिक्षा मंत्रालय के अनुसार राष्ट्रीय शिक्षा नीति के तहत शिक्षक छात्र अनुपात निर्धारित मानकों के अंदर है. प्राथमिक स्तर पर यह अनुपात 9:19, उच्च प्राथमिक स्तर पर 17:1, माध्यमिक में 15:1 और उच्च माध्यमिक स्तर पर 23:1 है. हालांकि मंत्रालय ने यह भी माना की राष्ट्रीय औसत के अंदर होने के बावजूद कई राज्यों और क्षेत्र में शिक्षकों की उपलब्धता में बड़ा असंतुलन बना हुआ है. 

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आंध्र प्रदेश में सबसे ज्यादा ऐसे स्कूल 

यूडीआईएसई प्लस 2025-26 के आंकड़ों के अनुसार आंध्र प्रदेश में सबसे ज्यादा 16,357 एकल शिक्षक वाले स्कूल है. यह देश के ऐसे कुल स्कूलों का लगभग 16 प्रतिशत है. इसके बाद सबसे ज्यादा ऐसे स्कूल झारखंड में है, जहां कल 9,827 एकल शिक्षक वाले स्कूल हैं. इसके बाद महाराष्ट्र का नंबर आता है, जहां 9,269 ऐसे स्कूल है. वहीं कर्नाटक में 8,042, उत्तर प्रदेश में 7,874, असम में 6,159, मध्य प्रदेश में 4,793, तमिलनाडु में 3,957, उत्तराखंड में 2,655, छत्तीसगढ़ में 2,461 और तेलंगाना में 2,318 ऐसे एकल शिक्षक वाले स्कूल हैं, जहां एक ही शिक्षक को सभी कक्षाओं की जिम्मेदारी संभालती पड़ रही है. 

कुछ राज्यों की स्थिति बेहतर 

वहीं दूसरी और कुछ राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में ऐसे स्कूलों की संख्या काफी कम है. केरल में केवल 16, गोवा में 35,  सिक्किम में 31, लद्दाख में 28, दिल्ली में 7 और अंडमान एवं निकोबार दीप समूह में केवल 1 ऐसा स्कूल दर्ज किया गया है. 

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क्यों बढ़ रही है समस्या? 

शिक्षा मंत्रालय ने राज्यसभा में बताया की एकल शिक्षक वाले स्कूलों की स्थिति केवल शिक्षकों की कमी की वजह से नहीं होती. इसके पीछे रिटायरमेंट, इस्तीफा, छात्र नामांकन में बदलाव, नए पदों का सृजन, प्रमोशन, ट्रांसफर और स्थानीय प्रशासनिक जरूरत जैसे कई कारण भी जिम्मेदार होते हैं. मंत्रालय ने यह भी स्पष्ट किया कि राज्य में शिक्षकों की भर्ती, तैनाती और ट्रांसफर की जिम्मेदारी संबंधित राज्य सरकारों और केंद्र शासित प्रदेशों की होती है. इसलिए राज्यवार रिक्त पदों का अलग से रिकॉर्ड केंद्र सरकार के पास उपलब्ध नहीं है. 

राज्यों को दिए गए निर्देश 

केंद्र सरकार ने राज्य और केंद्र शासित प्रदेशों को सलाह दी है कि वह पारदर्शी भर्ती प्रक्रिया, मेरिट आधारित नियुक्ति, तकनीक आधारित शिक्षण संस्थान और वित्तीय सहायता का उपयोग करते हुए शिक्षकों की कमी को दूर करके करें. इसके अलावा दूर-दराज जनजाति और आकांक्षी जिलों में शिक्षकों की उपलब्धता सुनिश्चित करने पर भी विशेष जोर दिया गया है.

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