दिल्ली हाईकोर्ट ने जामिया मिल्लिया इस्लामिया यूनिवर्सिटी के उस फैसले को खारिज कर दिया है, जिसमें 2022 में विश्वविद्यालय प्रशासन ने जामिया टीचर्स एसोसिएशन को भंग करने का आदेश दिया था अदालत ने इसे शिक्षकों के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन बताया और कहा कि किसी भी व्यक्ति या संस्था को संविधान के अधिकारों के खिलाफ नहीं जाना चाहिए.
मामला दरअसल यह था कि जामिया प्रशासन ने दो आदेश जारी करके टीचर्स एसोसिएशन को खत्म कर दिया था एसोसिएशन का दफ्तर सील कर दिया गया था और पदाधिकारियों को ऑफिस या फंड्स के इस्तेमाल से रोक दिया गया था इसके बाद टीचर्स एसोसिएशन ने कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था जिसमे आज उनको बड़ी राहत मिली है.
संविधान के अधिकार
जस्टिस सचिन दत्ता ने सुनवाई करते हुए दोनों आदेशों को रद्द कर दिया उन्होंने कहा कि संविधान का अनुच्छेद 19(1)(c) हर नागरिक को किसी एसोसिएशन या संगठन को बनाने चलाने और जारी रखने का अधिकार देता है कोर्ट ने कहा कि यह अधिकार सिर्फ संगठन बनाने तक सीमित नहीं है बल्कि उसे अपने चुने हुए सदस्यों और नियमों के साथ चलाने की आज़ादी भी देता है.जस्टिस दत्ता ने यह भी कहा कि अगर किसी संगठन में विवाद या समस्या है, तो उसका समाधान लोकतांत्रिक प्रक्रिया से होना चाहिए, न कि उसे सीधे भंग कर देने से.
रद्द किया आदेश
जामिया प्रशासन ने अपनी दलील में कहा था कि जामिया मिल्लिया इस्लामिया एक्ट के तहत उन्हें एसोसिएशन को रेगुलेट या भंग करने का अधिकार है लेकिन कोर्ट ने इस तर्क को ठुकराते हुए कहा कि कोई भी संस्था संविधान से ऊपर नहीं हो सकती. कोर्ट के इस फैसले से जामिया के शिक्षकों में खुशी की लहर दौड़ गई है कई शिक्षकों ने इसे “न्याय और लोकतंत्र की जीत” बताया अब जामिया टीचर्स एसोसिएशन फिर से अपने कामकाज की शुरुआत कर सकेगी और शिक्षकों की आवाज को मजबूती से रख सकेगी.
मिसाल बना फैसलायह फैसला देशभर के विश्वविद्यालयों और शैक्षणिक संस्थानों के लिए भी एक मिसाल बना है जो बताता है कि लोकतांत्रिक संस्थाओं और उनके अधिकारों की रक्षा हर हाल में की जाएगी.यह भी पढ़ें - इन 22 यूनिवर्सिटीज में एडमिशन ले लिया तो तबाह हो जाएगा करियर, UGC ने इन्हें बताया फर्जी
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