देश में प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले लाखों युवाओं के लिए कोचिंग का खर्च एक बड़ी चुनौती है. इसी को ध्यान में रखते हुए केंद्र और राज्य सरकारें अलग-अलग मुफ्त कोचिंग योजनाएं चला रही हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी 15 अगस्त 2026 को लाल किले से मुफ्त ऑनलाइन कोचिंग नेटवर्क का ऐलान किया, जिससे गरीब और मध्यम वर्ग के छात्रों में एक नई उम्मीद जगी. लेकिन कर्नाटक से उत्तर प्रदेश और दिल्ली तक तमाम योजनाओं के नतीजे बताते हैं कि सिर्फ मुफ्त कोचिंग दे देने से कुछ नहीं होता. तो सवाल ये है कि मुफ्त कोचिंग स्कीमें कामयाब क्यों नहीं हो पाती हैं...
जब हम मुफ्त स्कीमों की गहराई में झांकते हैं, तो नाकामी की 5 बड़ी वजहें सामने आती हैं...
पहली बड़ी वजह: बजट में कटौती और लक्ष्य से बहुत दूर
केंद्र सरकार की SC और OBC छात्रों के लिए फ्री कोचिंग स्कीम का हाल देखिए. संसद की स्थायी समिति ने इस योजना के खराब क्रियान्वयन पर गंभीर चिंता जताई है. सच्चाई आंकड़े खुद बयां कर रहे हैं:
- 2023-24: 3,500 छात्रों के लक्ष्य के मुकाबले सिर्फ 223 (6.4%) छात्रों को कोचिंग मिली
- 2024-25: 2,136 (61%) छात्रों को कवर किया गया
- 2025-26: ये आंकड़ा फिर गिरकर 431 (12.3%) पर आ गया
बजट का हाल भी कुछ ऐसा ही है:
- 2023-24 में 47 करोड़ रुपए आवंटित हुए, लेकिन खर्च सिर्फ 7.76 करोड़ रुपए (16.5%) हुए.
- 2024-25 में 35 करोड़ रुपए दिए, लेकिन खर्च 17.68 करोड़ रुपए (50.5%) हुए.
- 2025-26 में 20 करोड़ रुपए आवंटित हुए, लेकिन खर्च सिर्फ 7.11 करोड़ रुपए (35.6%) हुए.
सबसे हैरान करने वाली बात ये है कि 2025-26 के खराब प्रदर्शन के बावजूद सरकार ने 2026-27 में लक्ष्य दोगुना करके 7,000 स्लॉट कर दिया.
दूसरी बड़ी वजह: घोटाले और भ्रष्टाचार
मुफ्त कोचिंग योजनाओं की एक और बड़ी समस्या है भ्रष्टाचार. दिल्ली की 'जय भीम मुख्यमंत्री प्रतिभा विकास योजना' इसकी सबसे ताजा मिसाल है. ये योजना 2018 में SC, ST और OBC छात्रों को UPSC, NEET और JEE जैसी प्रतियोगी परीक्षाओं की मुफ्त कोचिंग देने के लिए शुरू हुई थी. जांच में सामने आया कि 145 करोड़ रुपए का घोटाला हुआ.
- कोचिंग संस्थानों ने 13,000 छात्रों का डेटा दिखाया, लेकिन सिर्फ 3,000 की पुष्टि हो पाई.
- बाकी के लिए कोई सहायक दस्तावेज नहीं मिले.
- स्कीम का बजट सिर्फ 15 करोड़ रुपए था, लेकिन संस्थानों ने 145 करोड़ रुपए के दावे पेश किए.
- फर्जी बिल, बिना हस्ताक्षर के आवेदन और ऐसे दलित छात्रों के नाम पर दावे जिन्होंने कभी कोचिंग ली ही नहीं.
दिल्ली सरकार की एक और जांच में 9 कोचिंग सेंटर संचालकों को 37.2 करोड़ रुपए के गबन के आरोप में गिरफ्तार किया गया. जांच में पाया गया कि संस्थानों ने स्कीम फंड के लिए अलग बैंक खाता बनाने के नियम का उल्लंघन किया और कुछ ने छात्रों को स्थानीय ट्यूशन सेंटरों में भेज दिया.
जय भीम स्कीम की एक और जांच में 1,000 से ज्यादा लिस्टेड लाभार्थी गैर-मौजूद पाए गए. करीब 35 कोचिंग सेंटर 100 छात्रों का भी वेरिफाइड डेटा देने में नाकाम रहे.
एक्सपर्ट्स का कहना है कि जो शुरू में एक कल्याणकारी पहल थी, वह कमजोर सिस्टम और खराब निगरानी की वजह से घोटाले में बदल गई.
तीसरी बड़ी वजह: ऑनलाइन कोचिंग का मॉडल
कर्नाटक सरकार की मुफ्त कोचिंग स्कीम का उदाहरण लें. CET, NEET और JEE जैसी परीक्षाओं के लिए चल रही इस योजना के नतीजे दूसरे साल भी निराशाजनक रहे. आंकड़े देखिए:
- सरकारी PU कॉलेजों के सिर्फ 22 छात्र KCET 2026 में टॉप 1,000 में आ पाए
- इनमें इंजीनियरिंग स्ट्रीम से एक भी छात्र नहीं रहा
- सिर्फ 191 छात्र टॉप 5,000 में और 226 टॉप 10,000 में आ पाए
DPUE के निदेशक भारत एस ने माना कि प्रदर्शन और नतीजे संतोषजनक नहीं हैं. उन्होंने कहा कि इस साल 7,620 छात्रों ने KCET दिया, लेकिन बड़ी संख्या में छात्र कोचिंग में नियमित तौर पर हाजिर नहीं होते या परीक्षा ही नहीं देते.
समस्या का एक बड़ा कारण ये था कि पिछले दो सालों से कोचिंग ऑनलाइन मोड में हो रही थी. इसे कई छात्रों ने फॉलो नहीं किया. अब सरकार ने फैसला किया है कि कोचिंग को ऑफलाइन मोड में शिफ्ट किया जाएगा और कॉलेज के लेक्चरर ही पढ़ाएंगे.
चौथी और सबसे बड़ी वजह: न डाउट क्लियरिंग, न मेंटॉरशिप
ये वो पॉइंट है जिस पर सबसे कम ध्यान दिया जाता है लेकिन इसका असर सबसे ज्यादा होता है.
डाउट क्लियरिंग सेशंस, मेंटरशिप, पर्सनलाइज्ड गाइडेंस और इमोशनल सपोर्ट प्राइवेट कोचिंग की ताकत हैं. एक अच्छा मेंटर न सिर्फ पढ़ाता है, बल्कि स्टूडेंट को इमोशनली और एकेडमिकली गाइड करता है. सरकारी मुफ्त कोचिंग स्कीमों में ये सब गायब है. ज्यादातर स्कीमों में सिर्फ रिकॉर्डेड लेक्चर और ऑनलाइन क्लासेस का इंतजाम होता है.
यही वजह है कि हाशिए पर रहने वाले समुदायों के छात्रों को मेंटॉरशिप, मजबूत एकेडमिक फाउंडेशन, मानसिक स्वास्थ्य सहायता और स्टडी मटेरियल की सबसे ज्यादा जरूरत होती है, लेकिन उन्हें ये मिलता नहीं.
ORF की रिपोर्ट के मुताबिक, 'इंडिया की फ्री ऑनलाइन कोचिंग पहल का असर 2 बातों पर निर्भर करेगा. पर्सनलाइजेशन को स्कूलों और सेलेक्शन सिस्टम में गहरे सुधार के साथ जोड़ा जाता है या नहीं.'
पांचवीं बड़ी वजह: आय सीमा की बाधा
केंद्र की फ्री कोचिंग स्कीम के लिए 8 लाख रुपए सालाना पारिवारिक आय की सीमा तय है. संसदीय समिति ने कहा है कि यही आय सीमा कई पात्र छात्रों को इस योजना का लाभ लेने से रोक रही है. समिति ने इस सीमा पर पुनर्विचार करने की मांग दोहराई है.
उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री अभ्युदय योजना का उदाहरण लें. मुरादाबाद में 132 छात्रों ने 2024-25 में इस योजना के तहत मुफ्त कोचिंग ली, लेकिन सिर्फ 4 को ही सफलता मिली.
जिले में अभ्युदय कोचिंग सेंटर पर 149 अभ्यर्थी रजिस्टर्ड हैं. इनमें 84 सिविल सेवा की तैयारी के लिए और 65 SSC, बैंकिंग, रेलवे और पुलिस जैसी वन-डे परीक्षाओं के लिए. 2025-26 में किसी भी छात्र का चयन नहीं हुआ, यानी 149 छात्रों में से जीरो रिजल्ट.
तो इसका हल क्या है?
एक्सपर्ट्स का मानना है कि मुफ्त कोचिंग स्कीम को कामयाब बनाने के लिए कुछ जरूरी कदम उठाने होंगे:
- डाउट क्लियरिंग सेशंस को अनिवार्य करना होगा. सिर्फ लेक्चर देने से काम नहीं चलेगा, हर छात्र के सवालों का जवाब देने के लिए एक सिस्टम चाहिए.
- हर छात्र को एक मेंटर देना होगा. तेलंगाना के छात्रों ने भी यही मांग उठाई है कि सरकार को प्राइवेट एडटेक प्लेटफॉर्म के बजाय इन-हाउस कोचिंग सिस्टम बनाना चाहिए. इसमें सब्जेक्ट एक्सपर्ट्स, क्लासरूम टीचिंग, प्रिंटेड मटीरियल और रेगुलर मेंटरिंग हो.
- ऑनलाइन को ऑफलाइन के साथ जोड़ना होगा. कर्नाटक के उदारण से साफ है कि सिर्फ ऑनलाइन कोचिंग से बड़ी संख्या में छात्र जुड़ नहीं पाते.
- पारदर्शिता और निगरानी बढ़ानी होगी. जय भीम स्कीम के घोटाले ने साफ कर दिया है कि कमजोर निगरानी से कल्याणकारी योजनाएं कैसे घोटाले में बदल जाती हैं.
- आय सीमा को बढ़ाना या हटाना होगा ताकि ज्यादा से ज्यादा जरूरतमंद छात्र इसका फायदा उठा सकें.
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