CBSE Three Language Policy: केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE) द्वारा कक्षा 9 और 10 के लिए नई तीन-भाषा नीति लागू करने के फैसले ने देश भर के स्कूलों, अभिभावकों और छात्रों के बीच खलबली मचा दी है. राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 और नेशनल करिकुलम फ्रेमवर्क (NCF-SE) 2023 के तहत उठाया गया यह कदम अकादमिक सत्र के बीच में लाया गया है. सत्र की शुरुआत और यूनिट टेस्ट होने के बाद अचानक आए इस नीतिगत बदलाव ने बोर्ड परीक्षाओं की तैयारी में जुटे बच्चों पर मानसिक और पढ़ाई का दबाव अत्यधिक बढ़ा दिया है. इससे न सिर्फ छात्र बल्कि उनके माता-पिता भी परेशान हैं. 

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सत्र के बीच में बदलाव से आफत

सीबीएसई ने सत्र 2026-27 से नया भाषाई फॉर्मूला लागू तो कर दिया, लेकिन इसके लागू करने के समय को लेकर गंभीर सवाल उठ रहे हैं. शिक्षाविदों का कहना है कि जब नया अकादमिक सत्र पहले ही शुरू हो चुका है और बच्चे अपना पहला यूनिट टेस्ट दे चुके हैं, तब इस तरह का बड़ा नीतिगत बदलाव करना कहीं से भी तार्किक नहीं है. किसी भी नए नियम को लागू करने से पहले पूरे साल का कैलेंडर और स्पष्ट दिशानिर्देश जारी होने चाहिए, न कि बच्चों को असमंजस में छोड़ देना चाहिए. 

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बीच सत्र में थोप दिया नया नियम

बोर्ड ने इससे पहले मार्च के अपने सर्कुलर में स्पष्ट कहा था कि कक्षा 9 और 10 के वर्तमान छात्रों पर पुरानी व्यवस्था ही लागू रहेगी और नई नीति को निचली कक्षाओं से धीरे-धीरे आगे बढ़ाया जाएगा. अब अचानक से वर्तमान सत्र के बीच में ही इसे थोप दिए जाने से स्कूलों के सामने भी संकट खड़ा हो गया है. बिना किसी पूर्व सूचना के नियमों को पलटने की बोर्ड की इस कार्यशैली से अभिभावकों में भारी आक्रोश है और वे बच्चों के भविष्य को लेकर चिंतित हैं.

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बोर्ड के छात्रों के लिए चुनौती

जो छात्र कक्षा 9 को एक अलग भाषाई पैटर्न के साथ पास करके कक्षा 10 में आ चुके हैं, उनके लिए यह बदलाव किसी सदमे से कम नहीं है. बोर्ड परीक्षा के महत्वपूर्ण साल में बिल्कुल नई भाषा सीखना और उसमें पास होना छात्रों के लिए बेहद कठिन होगा. भले ही बोर्ड यह दलील दे कि इस अतिरिक्त भाषा के नंबर मेन एग्जाम के रिजल्ट में नहीं जुड़ेंगे, लेकिन आंतरिक मूल्यांकन और प्रमाणपत्र की जरूरतों के कारण छात्रों का कीमती समय और ऊर्जा इसमें बर्बाद होना तय है.

बारहवीं में भी छठी भाषा का बोझ

अभिभावकों को अब इस बात का डर सताने लगा है कि सीबीएसई कल को एक और नया सर्कुलर जारी कर इस अतिरिक्त भाषा को बोर्ड परीक्षा का मुख्य हिस्सा बना सकती है. कुछ स्कूलों ने तो अभी से कक्षा 12 के छात्रों पर भी छठी भाषा को वैकल्पिक के बजाय अनिवार्य विषय के रूप में चुनने का दबाव बनाना शुरू कर दिया है. बारहवीं जैसे करियर के निर्णायक मोड़ पर इस तरह अतिरिक्त विषयों को थोपने से छात्रों के मुख्य विषयों की पढ़ाई पर सीधा असर पड़ रहा है.

छात्रों की मानसिक सेहत पर सीधा असर

पैरेंट्स का कहना है कि कक्षा 9 के स्तर पर छात्र पहले से ही एडवांस्ड मैथमेटिक्स, साइंस और सोशल साइंस जैसे भारी-भरकम और कठिन विषयों के पाठ्यक्रम को संभाल रहे होते हैं. उच्च शिक्षा और प्रतियोगी परीक्षाओं की नींव इसी कक्षा से पड़ती है. ऐसे में एक और अनिवार्य भाषा का बोझ लादने से विषयों की कुल संख्या बढ़ जाएगी. कोचिंग, होमवर्क, प्रोजेक्ट्स और बेहतरीन प्रदर्शन के दबाव से जूझ रहे बच्चों के पास खेलकूद और मानसिक विकास के लिए समय ही नहीं बचेगा.

ट्रांसफर वाली नौकरियों में भारी दिक्कत

शिक्षाविदों का कहना है कि इस नीति को तैयार करते समय देश के उन परिवारों की समस्याओं को नजरअंदाज कर दिया गया है जो बार-बार एक राज्य से दूसरे राज्य में ट्रांसफर होने वाली नौकरियों में हैं. उदाहरण के लिए देखें तो यदि किसी अभिभावक का तबादला तमिलनाडु से असम या कर्नाटक हो जाता है, तो उनके बच्चे के लिए हर बार एक नई क्षेत्रीय भाषा को अपनाना और उसमें पढ़ाई करना नामुमकिन जैसा होगा. इस भाषाई विविधता के कारण बच्चे बीच सत्र में पूरी तरह पिछड़ जाएंगे. 

नॉर्थ-ईस्ट में संसाधनों का टोटा

शिक्षाविदों की मानें तो इस नीति के तहत दो स्थानीय या भारतीय भाषाओं का होना अनिवार्य किया गया है, लेकिन जमीनी हकीकत इससे बिल्कुल अलग है. भारत के उत्तर-पूर्वी राज्यों में सीबीएसई के पास ऐसा कोई भाषाई ढांचा नहीं है जो इस नीति में आसानी से फिट हो सके. इन राज्यों के अधिकांश स्कूलों में हिंदी या संस्कृत के योग्य शिक्षकों और पर्याप्त अध्ययन सामग्री की भारी कमी है. ऐसी स्थिति में इस नीति को वहां जमीन पर उतारना व्यावहारिक रूप से संभव नहीं दिखता है. 

नौवीं से ही शुरू होती है बोर्ड की दौड़

अभिभावकों का कहना है कि कक्षा 9 कोई सामान्य क्लास नहीं है, बल्कि यह कक्षा 10 की बोर्ड परीक्षा की तैयारी का पहला कदम होती है. ऐसे में उत्तर लिखने का तरीका, मार्किंग स्कीम को समझना और पूरे पाठ्यक्रम को समय पर पूरा करने की दौड़ इसी साल से शुरू हो जाती है. बच्चे पहले दिन से ही बोर्ड परीक्षा के दबाव में रहते हैं. ऐसे संवेदनशील समय पर अचानक किसी नई भाषा को रटने का दबाव बच्चों को उनकी संस्कृति के करीब लाने के बजाय पढ़ाई से दूर कर देगा.

विदेशी भाषा चुनने वालों को बड़ा झटका

अभिभावकों की एक बड़ी चिंता यह भी है कि इस नई नीति में छात्रों को लैंग्वेज चुनने की कोई फ्लेक्सिबिलटी नहीं दी गई है. जो छात्र पिछले कई सालों से फ्रेंच या जर्मन जैसी विदेशी भाषाएं पढ़ रहे थे और उनमें रुचि विकसित कर चुके थे, उन्हें अब बीच सफर में उन भाषाओं को छोड़ने या किसी भारतीय भाषा को जबरन अपनाने के लिए मजबूर किया जा रहा है. सालों की मेहनत और लगन पर इस फैसले से एक झटके में पानी फिर गया है.

विदेश में पढ़ाई की योजनाएं हुईं प्रभावित

कई छात्रों ने अपने भविष्य के करियर और विदेशी विश्वविद्यालयों में उच्च शिक्षा की योजनाओं को ध्यान में रखकर स्कूलों में विदेशी भाषाएं चुनी थीं. जर्मन या फ्रेंच सीखना उनके दीर्घकालिक अकादमिक प्लान का एक महत्वपूर्ण हिस्सा था, ताकि वे वर्ष 2028 के नए बोर्ड परीक्षा पैटर्न के लिए खुद को तैयार कर सकें. बीच सत्र में आई इस अनिश्चितता ने छात्रों का ध्यान भटका दिया है और वे अब गणित तथा विज्ञान जैसे मुख्य विषयों पर भी ध्यान केंद्रित नहीं कर पा रहे हैं.

अभिभावकों का बोर्ड बदलने का डर

अभिभावक इस बात को साफ कर रहे हैं कि वे बहुभाषी शिक्षा या भारतीय भाषाओं को बढ़ावा देने के खिलाफ नहीं हैं, लेकिन इसे थोपने का तरीका पूरी तरह गलत है. उनकी मांग है कि वर्तमान में कक्षा 9 और 10 के बैच को सत्र की शुरुआत में चुने गए पुराने विकल्पों के साथ ही आगे बढ़ने की अनुमति दी जाए. यदि बोर्ड ने शिक्षकों की कमी, अध्ययन सामग्री की उपलब्धता और बच्चों के मानसिक तनाव जैसे मुद्दों को जल्द नहीं सुलझाया, तो कई परिवार सीबीएसई बोर्ड को छोड़कर दूसरे शिक्षा बोर्ड में जाने पर मजबूर हो जाएंगे.

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