Aligarh Muslim University Election: अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में पूरे आठ साल के लंबे इंतजार के बाद एक बार फिर छात्रसंघ चुनावों की सुगबुगाहट तेज हो गई है. यूनिवर्सिटी प्रशासन द्वारा चुनाव कराने की घोषणा के बाद से ही कैंपस में सियासी पारा सातवें आसमान पर पहुंच चुका है. छात्र नेता अपनी-अपनी जीत के दावे कर रहे हैं, तो वहीं नामांकन रद्द होने और छात्र आंदोलनों की खबरें भी लगातार सुर्खियों में बनी हुई हैं.

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इस चुनावी सरगर्मी के बीच हर किसी की नजर इस बात पर टिकी है कि आखिर इस बार AMU के चुनाव में कुल कितने छात्र वोटर्स हिस्सा ले रहे हैं, इनमें महिला छात्राओं की हिस्सेदारी कितनी है और देश की अन्य बड़ी यूनिवर्सिटीज की तुलना में यहां का जमीनी हाल कैसा है.

AMU में कुल कितने स्टूडेंट्स और वोटर्स?

अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी देश के सबसे बड़े और प्रतिष्ठित केंद्रीय विश्वविद्यालयों में से एक है. वर्तमान आंकड़ों के अनुसार, AMU के मुख्य परिसर और विभिन्न विभागों को मिलाकर कुल नामांकित छात्रों की संख्या लगभग 24,000 से 28,000 के बीच है. चुनाव के लिहाज से बात करें, तो इस पूरी छात्र आबादी में से जो छात्र सीधे तौर पर मुख्य छात्रसंघ के लिए वोट डालते हैं, उनकी संख्या भी काफी बड़ी है. चूंकि यह एक आवासीय यूनिवर्सिटी है, इसलिए यहां का चुनाव पूरी तरह से छात्र हितों और कैंपस की राजनीति पर केंद्रित रहता है.

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कैंपस इलेक्शन में लड़कियों की संख्या और चुनावी पेंच

AMU में महिला शिक्षा को हमेशा से महत्व दिया गया है और कुल छात्रों में लड़कियों की हिस्सेदारी लगभग 41 से 42 प्रतिशत के करीब बैठती है. लेकिन इस बार के छात्रसंघ चुनाव में एक बहुत बड़ा और दिलचस्प पेंच फंसा हुआ है, जिसे लेकर सोशल मीडिया से लेकर कैंपस तक में बहस छिड़ गई है.

दरअसल, AMU के मुख्य छात्रसंघ चुनाव के अलावा यहां के विमेंस कॉलेज का अपना एक अलग छात्रसंघ होता है, जो मुख्य परिसर से करीब 2 किलोमीटर दूर है. इस बार विमेंस कॉलेज की लगभग 4,000 महिला छात्राओं को मुख्य AMU छात्रसंघ चुनाव में वोट डालने के अधिकार से अलग रखा गया है, क्योंकि उनके लिए अलग से विमेंस कॉलेज छात्रसंघ के चुनाव आयोजित हो रहे हैं. 

इस दोहरी व्यवस्था और अलग-अलग यूनियन के नियमों के कारण महिला छात्राओं के एक बड़े वर्ग को मुख्य चुनाव में वोटिंग राइट्स नहीं मिल पाए हैं, जिसे लेकर लैंगिक असमानता और प्रतिनिधित्व की कमी के सवाल भी उठ रहे हैं. हालांकि, मुख्य कैंपस की अन्य पोस्ट्स के लिए महिला उम्मीदवार भी चुनावी मैदान में खड़ी हो रही हैं.

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दूसरी सेंट्रल यूनिवर्सिटीज की तुलना में क्या है हाल?

अगर AMU के इस चुनावी माहौल और छात्र संख्या की तुलना देश की अन्य प्रमुख सेंट्रल यूनिवर्सिटीज जैसे जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी, दिल्ली यूनिवर्सिटी या जामिया मिल्लिया इस्लामिया से करें, तो स्थिति काफी अलग नजर आती है.

दिल्ली यूनिवर्सिटी- DU देश की सबसे बड़ी यूनिवर्सिटी है जहां रेगुलर कॉलेजों को मिलाकर 1.5 लाख से ज्यादा छात्र वोटर्स हैं. वहां लिंगदोह कमेटी के नियमों के तहत हर साल चुनाव होते हैं और ABVP व NSUI जैसी राष्ट्रीय पार्टियों के छात्र संगठनों का सीधा दबदबा रहता है. इसकी तुलना में AMU का चुनाव किसी बाहरी पार्टी के सिंबल पर नहीं, बल्कि पूरी तरह क्षेत्रीय और छात्र मुद्दों पर लड़ा जाता है.

जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी- JNU में कुल छात्रों की संख्या लगभग 8,000 से 9,000 के बीच है, जो AMU से काफी कम है. JNU में लड़कियों की राजनीतिक भागीदारी और वोटिंग प्रतिशत बेहद शानदार रहता है, और वहां की मुख्य छात्रसंघ में लड़कियां शीर्ष पदों पर चुनी जाती रही हैं. AMU के छात्र भी इस बार JNU की तर्ज पर लोकतांत्रिक अधिकारों की बहाली की मांग कर रहे हैं.

जामिया मिल्लिया इस्लामिया- AMU में आठ साल बाद चुनाव की घोषणा होने का असर पड़ोसी यूनिवर्सिटी जामिया पर भी देखने को मिल रहा है. जामिया में भी लंबे समय से छात्रसंघ चुनाव बंद हैं, और AMU से प्रेरणा लेकर वहां के छात्रों ने भी चुनाव कराने की मांग को लेकर भूख हड़ताल और प्रदर्शन तेज कर दिए हैं.

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