भारत में हर साल 5 सितंबर को शिक्षक दिवस मनाया जाता है. यह दिन देश के महान दार्शनिक, शिक्षाविद् और राजनेता डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन की जयंती के अवसर पर मनाया जाता है. उनका जीवन इस बात की मिसाल है कि शिक्षा और ज्ञान किसी व्यक्ति को समाज के साथ-साथ देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद तक पहुंचा सकते हैं. डॉ. राधाकृष्णन 1962 से 19 67 तक भारत के दूसरे राष्ट्रपति रहे. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि डॉ.सर्वपल्ली राधाकृष्णन कितने पढ़े लिखे थे. आइए जानतें हैं.

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कितने पढ़े-लिखे थे डॉ. राधाकृष्णन?

डॉ. राधाकृष्णन की शिक्षा दर्शनशास्त्र के क्षेत्र में हुई थी. उन्होंने मद्रास क्रिश्चियन कॉलेज से पढ़ाई की और आगे चलकर दर्शनशास्त्र के प्रोफेसर बने. उनके शैक्षणिक जीवन की खास बात यह थी कि उन्होंने भारतीय दर्शन और धर्म को पश्चिमी अकादमिक दुनिया के सामने प्रभावी तरीके से प्रस्तुत किया.

सरकारी प्रोफाइल में उनकी शैक्षणिक योग्यताओं में एमए, डी.लिट., एलएलडी, डीसीएल, लिटरेचर डॉक्टरेट और अन्य मानद उपाधियां दर्ज हैं. उन्हें ऑक्सफोर्ड के ऑल सोल्स कॉलेज का मानद फेलो भी बनाया गया था. उनका अकादमिक प्रभाव इतना व्यापक था कि उन्होंने मैसूर विश्वविद्यालय और कलकत्ता विश्वविद्यालय में टीचिंग भी की. बाद में उन्हें ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में पूर्वी धर्म और नैतिकता से संबंधित स्पाल्डिंग प्रोफेसरशिप भी मिली.

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शिक्षक से बने देश के बड़े शिक्षाविद्

राधाकृष्ण का करियर सिर्फ किताबों और कक्षाओं तक सीमित नहीं रहा. वह आंध्र विश्वविद्यालय और बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के कुलपति भी रहे. इसके अलावा उन्होंने विश्वविद्यालय शिक्षा आयोग के अध्यक्ष के रूप में भी काम किया. उनके विचारों में शिक्षा को समाज को बदलने की महत्वपूर्ण शक्ति माना गया. उन्होंने भारतीय दर्शन पर कई महत्वपूर्ण किताबें लिखीं. उनकी चर्चित पुस्तकों में Indian Philosophy, The Hindu View of Life, An Idealist View of Life, Eastern Religions and Western Thought और The Principal Upanishads जैसी रचनाए शामिल हैं.

ऐसे बने भारत के राष्ट्रपति

1962 में देश में राष्ट्रपति चुनाव हुआ. उस समय डॉ. राधाकृष्णन पहले ही दो कार्यकाल उपराष्ट्रपति के रूप में पूरा कर चुके थे और देश-विदेश में एक प्रतिष्ठित दार्शनिक तथा राजनेता के रूप में उनकी पहचान थी. निर्वाचन आयोग के रिकॉर्ड के अनुसार, 1962 के राष्ट्रपति चुनाव में डॉ. राधाकृष्णन निर्वाचित घोषित हुए और 13 मई 1962 को उन्होंने भारत के राष्ट्रपति पद की शपथ ली. उनका कार्यकाल 13 मई 1962 से 12 मई 1967 तक रहा. 1954 में उन्हें देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मानों में से एक भारत रत्न से भी सम्मानित किया गया था.

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