चीन के शंघाई स्टॉक एक्सचेंज में एक ऐसा नजारा देखने को मिला, जिसने पूरी दुनिया का ध्यान खींच लिया. 19 अगस्त 2026 को चीनी रोबोटिक्स कंपनी यूनिट्री (Unitree) ने अपने IPO के पहले ही दिन 460 फीसदी से ज्यादा की छलांग लगा दी. कंपनी का मार्केट कैपिटलाइजेशन IPO के 90 अरब डॉलर से बढ़कर करीब 660 अरब डॉलर हो गया. यह सिर्फ एक कंपनी की कामयाबी नहीं है. यह चीन की रोबोटिक्स ताकत का एलान है. चीन हर साल लाखों रोबोट बना रहा है, वहीं अमेरिका सॉफ्टवेयर और AI में अपनी बढ़त बनाए हुए है. लेकिन दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी आबादी और तेजी से बढ़ता टेक इकोसिस्टम वाला भारत क्यों इस रेस में पीछे छूट रहा है...

Continues below advertisement

यूनिट्री IPO: चीन के रोबोटिक्स सपने की परीक्षा

यूनिट्री रोबोटिक्स कोई नई कंपनी नहीं है. इसके ह्यूमनॉइड और क्वाड्रुपेड रोबोट सोशल मीडिया पर बैकफ्लिप करते और डांस करते वायरल होते रहे हैं. यहां तक कि सुपरमैन नाम का रोबोट खड़े-खड़े 2 मीटर ऊंची छलांग   लगा सकता है और 12.66 मीटर प्रति सेकंड की रफ्तार से दौड़ सकता है.

Continues below advertisement

2025 में कंपनी का रेवेन्यू 392.77 मिलियन युआन से बढ़कर 1.70 बिलियन युआन हो गया. उसी साल कंपनी ने 5,000 से ज्यादा ह्यूमनॉइड यूनिट शिप कीं. कंपनी पहले से ही मुनाफे में है. 2025 में 278.21 मिलियन युआन का नेट प्रॉफिट हुआ था. इसके निवेशकों में अलीबाबा, टेनसेंट, एंट ग्रुप और डीपसीक जैसे दिग्गज शामिल हैं.

इस IPO ने एक और बात साबित कर दी कि चीनी शेयर बाजार रोबोटिक्स कंपनियों को कितना महत्व देता है. यूनिट्री का 460% का पहले दिन का गेन इस साल चीन के नए लिस्टिंग के औसत 279% के ओपनिंग-डे पॉप से कहीं ज्यादा है. यह भी ध्यान देने वाली बात है कि यह उछाल उस दिन आया, जब चीन का बेंचमार्क इंडेक्स 3% गिर रहा था.

वहीं, जुलाई 2026 में फेडरल कम्युनिकेशंस कमीशन (FCC) ने विदेशी ह्यूमनॉइड और क्वाड्रुपेड रोबोट को अपनी 'कवर्ड लिस्ट' में डाल दिया. यानी अमेरिका में इन रोबोटों की बिक्री पर रोक लगाने की कोशिश. यूनिट्री की 2025 की रेवेन्यू का 44% हिस्सा ओवरसीज से आया था और करीब 18% अमेरिका से.

चीन बनाम अमेरिका: दो अलग-अलग ताकतें

रोबोटिक्स की दुनिया में आज चीन और अमेरिका दो अलग-अलग मॉडल पर काम कर रहे हैं. दोनों की अपनी-अपनी ताकत है:

चीन: 'बॉडी' का बादशाह

  • नेशनल स्ट्रैटेजी: अमेरिकन एसोसिएशन फॉर एडवांसिंग ऑटोमेशन (A3) के प्रेसिडेंट जेफ बर्नस्टीन ने खुद माना, 'चीन आगे है क्योंकि उसके पास एक दशक से ज्यादा पुरानी नेशनल स्ट्रैटेजी है. चीन ने रोबोट और AI को भविष्य के रूप में देखा.' 'मेड इन चाइना 2025' के तहत रोबोटिक्स को 10 बड़े बिजनेस में शामिल किया गया. 2025 के 15वीं पंचवर्षीय योजना के प्रस्ताव में पहली बार 'एम्बोडिड इंटेलिजेंस' को शामिल किया गया.
  • सप्लाई चेन की ताकत: चीन के पास 130 से ज्यादा रोबोट कंपनियां हैं. हार्मोनिक रिड्यूसर, सर्वो मोटर और विजन एल्गोरिथम समेत सब कुछ घरेलू बाजार में मिलता है. एक नया प्रोडक्ट 6 से 9 महीने में मार्केट में आ जाता है, जबकि अमेरिका में सिर्फ रिसर्च साइकिल 1-2 साल की होती है. 38 रोबोटिक्स कंपनियों में से 19 चीनी हैं. इन्होंने कुल 3.4 अरब डॉलर जुटाए हैं.
  • स्किल और डिप्लॉयमेंट: 2026 की पहली छमाही में चीनी निर्माताओं ने करीब 18,500 ह्यूमनॉइड रोबोट बेचे, जबकि अमेरिकी कंपनियों ने सिर्फ 4,000. ग्लोबल ह्यूमनॉइड शिपमेंट में चीन की हिस्सेदारी 97% से ज्यादा है. मॉर्गन स्टैनली ने 2030 तक चीन की ह्यूमनॉइड डिलीवरी का अनुमान बढ़ाकर लगभग 4.5 लाख कर दिया है. चीन के उद्योग और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MIIT) का कहना है कि 2026 में ह्यूमनॉइड रोबोट का आउटपुट 1 लाख यूनिट से ज्यादा हो सकता है.
  • कीमत का कमाल: चीनी रोबोट 'बहुत सस्ते' हैं. अमेरिका में एक ह्यूमनॉइड रोबोट बनाने में 55,000-60,000 डॉलर लगते हैं. भारत में 16,500 डॉलर   में बन जाता है. चीन की कीमतें इससे भी कम हैं.

अमेरिका: 'ब्रेन' का मालिक

  • AI और सॉफ्टवेयर: अमेरिका के पास दुनिया की बेहतरीन AI कंपनियां हैं. जेफ बर्नस्टीन मानते हैं कि अमेरिका की ताकत 'आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और सॉफ्टवेयर' में है.
  • रिस्क कैपिटल: अमेरिका में रिस्क लेने वाली पूंजी बहुत ज्यादा है. 10% सफलता की संभावना पर भी फंडिंग मिल जाती है. अमेरिकी कंपनियां ह्यूमनॉइड हार्डवेयर, फाउंडेशन मॉडल और कंप्यूट इंफ्रास्ट्रक्चर में भारी निवेश कर रही हैं.
  • पॉलिसी शिफ्ट: अमेरिका में कभी कोई नेशनल रोबोटिक्स स्ट्रैटेजी नहीं रही. अब पॉलिसीमेकर्स रोबोटिक्स को की-टेक्नोलॉजी मानने लगे हैं. GUARD Act जैसे कानून लाकर चीनी रोबोटों को अमेरिकी बाजार से बाहर करने की कोशिश.
  • टेस्ला और बोस्टन डायनेमिक्स: यूनिट्री सीधे टेस्ला और हुंडई के बोस्टन डायनेमिक्स से टक्कर ले रही है. हालांकि, अमेरिकी कंपनियां महंगी हैं और उनकी प्रोडक्ट डेवलपमेंट साइकिल लंबी है.

तो फिर भारत इसमें क्यों पीछे है?

भारत को ग्लोबल AI रेस में पिछड़ा हुआ माना जाता है. जब AI-सक्षम रोबोट बनाने की बात आती है, तो चीन और अमेरिका भारत से मीलों आगे हैं. 2024 में भारत में सिर्फ 9,120 रोबोट इंस्टॉल थे, जो दुनिया में छठे नंबर पर है. इसकी 5 बड़ी वजहें हैं:

  • फंडिंग का संकट: भारत में डीप-टेक वेंचर कैपिटल इकोसिस्टम अभी नासमझ है. रोबोटिक्स में जोखिम बहुत ज्यादा है, इसलिए निवेशक भारी पूंजी लगाने से झिझक रहे हैं. IIT मंडी में रोबोटिक्स के प्रोफेसर अमित शुक्ला कहते हैं, 'अमेरिका में 10% सफलता की संभावना पर भी फंडिंग मिल जाती है, जबकि भारत में निवेशक अक्सर 200% गारंटी की तलाश करते हैं.'
  • संसाधनों की कमी: अमित शुक्ला के मुताबिक, चीन के एक विश्वविद्यालय का बजट भारत के सभी IIT के संयुक्त बजट से पांच गुना ज्यादा हो सकता है. यह एक झटका देने वाला आंकड़ा है. रिसर्च और डेवलपमेंट में निवेश के बिना कोई भी देश रोबोटिक्स में आगे नहीं बढ़ सकता.
  • मानसिकता और नौकरशाही: प्रोफेसर शुक्ला कहते हैं, 'हमें अपनी 'गरीबी की मानसिकता' और नौकरशाही से बाहर निकलना होगा.'
  • आयात पर निर्भरता: भारत में इस्तेमाल होने वाले 85% रोबोट आयातित हैं. यानी हम खुद नहीं बना रहे, बल्कि दूसरों से खरीद रहे हैं.
  • वैश्विक सप्लाई चेन से कटाव: चीन के विपरीत, भारत अपनी रोबोटिक्स महत्वाकांक्षाओं को दुनिया से अलग नहीं कर सकता. उसे अंतरराष्ट्रीय सहयोग और घरेलू क्षमता दोनों पर काम करना होगा.

हालांकि, उम्मीद की कुछ किरणें भी हैं:

  • भारत का रोबोटिक्स मार्केट 2026 में 34% YoY की दर से बढ़ रहा है. यह एशिया में सबसे तेज है.
  • 2025 में भारतीय रोबोटिक्स मार्केट 3.28 अरब डॉलर का था, जो 2034 तक 8.06 अरब डॉलर हो सकता है.
  • IIT मद्रास, IIT दिल्ली, IIT कानपुर में रोबोटिक्स रिसर्च लैब हैं. अंडरवाटर रोबोटिक्स, ड्रोन और मेडिकल रोबोटिक्स पर काम हो रहा है.
  • नोएडा में भारत का पहला रोबोटिक क्लस्टर बन रहा है.

भारत की रणनीति क्या होनी चाहिए?

एक्सपर्ट्स के मुताबिक, भारत को तीन काम करने होंगे:

  • फंडिंग इकोसिस्टम मजबूत करना: डीप-टेक स्टार्टअप्स में निवेश बढ़ाना होगा. हार्डवेयर वेंचर मार्केट्स को मजबूत करना होगा.
  • रिसर्च और डेवलपमेंट में निवेश: IIT और अन्य संस्थानों को ज्यादा बजट और उद्योग से जुड़ाव चाहिए.
  • अंतरराष्ट्रीय सहयोग: भारत अकेले दम पर यह रेस नहीं जीत सकता. उसे अमेरिका, जापान और यूरोप के साथ मिलकर काम करना होगा. चीन की तरह अपनी घरेलू क्षमता भी बनानी होगी.