भारत इन दिनों एनर्जी के मोर्चे पर बड़ी मुश्किल से गुजर रहा है. एक तरफ देश की लिक्विड नेचुरल गैस (LNG) की सप्लाई संकट में है, क्योंकि सितंबर 2026 से अब तक भारत का सबसे बड़ा गैस सप्लायर कतर अब तक कोई बेहतर सप्लाई प्लान नहीं दे पाया है. दूसरी तरफ कच्चे तेल की बात करें तो भारत अपनी 85 फीसदी से ज्यादा जरूरत पूरी करने के लिए आयात पर निर्भर है. देश के पास स्ट्रैटेजिक रिजर्व यानी आपातकालीन भंडार मुश्किल से 9.5 दिन का ही है. कच्चे तेल के मामले में भी भारत की मुश्किलें बढ़ती जा रही हैं. इस एक्सप्लेनर में LNG और कच्चे तेल की किल्लत से पर्दा उठाएंगे...

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कतर से LNG सप्लाई नहीं आई तो क्या होगा?

भारत LNG का बहुत बड़ा आयातक है. 2025 में भारत ने कुल 26 मिलियन टन LNG का आयात किया था. इसमें से 59 फीसदी यानी करीब 15 मिलियन टन कतर और UAE से आया था. यानी भारत की हर दो में से एक गैस की गाड़ी कतर या UAE से आती थी.

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मार्च 2026 में ईरानी हमलों ने कतर के रास लाफन इलाके में LNG बनाने वाली दो बड़ी यूनिटों को नुकसान पहुंचा दिया. इसके बाद कतर एनर्जी ने फोर्स मेज्योर यानी बिना किसी गलती के आपूर्ति रोकने की कानूनी छूट लागू कर दी. यह फोर्स मेज्योर अगस्त 2026 तक बढ़ा दी गई है. कतर अब भी सितंबर के लिए कोई पक्का प्लान नहीं दे पाया है.

पेट्रोनेट LNG के CEO ए के सिंह ने कहा, 'उन्होंने सितंबर के लिए LNG सप्लाई का कोई निश्चित प्लान नहीं दिया है. सब कुछ स्ट्रेट ऑफ होर्मुज और उनके स्टार्ट-अप प्लान्स पर निर्भर है.'

भारत का अब तक कितना नुकसान हो चुका है?  

अब तक 56 LNG कार्गो (शिपमेंट) प्रभावित हो चुके हैं. पेट्रोनेट ने अपने तीन टैंकर दिशा, राही और असीम को खड़ा कर दिया है, क्योंकि कतर से माल लाने के लिए ही उन्हें किराए पर लिया गया था. देरी वाले कार्गो को   अप्रैल 2028 तक सप्लाई किया जा सकता है, क्योंकि तब तक मौजूदा लॉन्ग-टर्म कॉन्ट्रैक्ट खत्म हो जाएगा.

LNG संकट का भारत पर क्या असर पड़ रहा है?

  • सप्लाई में भारी कटौती: जब मार्च 2026 में पहली बार संकट आया, तो भारत में इंडस्ट्री और सिटी गैस वितरण कंपनियों को 40% तक कम गैस मिली. CNG और घरेलू PNG को प्राथमिकता दी गई, लेकिन फैक्ट्रियों और बड़े उपभोक्ताओं को भारी झटका लगा.
  • कीमतें आसमान पर: कतर से सस्ती कॉन्ट्रैक्टेड LNG नहीं मिली, तो भारत को स्पॉट LNG (तुरंत बाजार से) खरीदनी पड़ी. इसकी कीमत दोगुनी से भी ज्यादा थी. इससे CNG का फायदा खत्म हो गया और लोग इलेक्ट्रिक गाड़ियों की ओर रुख करने लगे.
  • कंपनियों के मुनाफे पर मार: इंद्रप्रस्थ गैस लिमिटेड (IGL) का मुनाफा 44% तक गिर गया क्योंकि LNG की कीमतों में उतार-चढ़ाव ने उनके मार्जिन को बुरी तरह प्रभावित किया.
  • होर्मुज सबसे बड़ा जोखिम: स्ट्रेट ऑफ होर्मुज दुनिया के 20% तेल और बड़ी मात्रा में LNG का रास्ता है. अगर यह रास्ता बंद हो गया, तो हर महीने 1.45 मिलियन टन LNG की डिलीवरी पर असर पड़ सकता है. भारत के लिए यह रास्ता बेहद अहम है, क्योंकि उसकी ज्यादातर LNG इसी रास्ते से आती है.

इस संकट से निपटने के लिए भारत क्या कर रहा है?

संकट से निपटने के लिए भारत ने अपनी LNG आयात की रणनीति तेजी से बदली है:

  • नए देशों से खरीदारी: भारत अब 15 देशों से LNG खरीद रहा है, जबकि पहले सिर्फ 6 देशों से आयात होता था. ओमान, अमेरिका, नाइजीरिया, अंगोला, ब्राजील और मोजाम्बिक जैसे देश अब नए सप्लायर बनकर उभरे हैं.
  • अमेरिका नंबर-1 बना: मई-जुलाई 2026 के दौरान अमेरिका भारत का सबसे बड़ा LNG सप्लायर बन गया. इस दौरान कतर से आयात 91% तक गिर गया. अमेरिका, अफ्रीका और खाड़ी के दूसरे देशों ने कतर की कमी को पूरा किया.
  • ऑस्ट्रेलिया से भी उम्मीद: पेट्रोनेट को ExxonMobil के जरिए ऑस्ट्रेलिया के गोर्गन प्रोजेक्ट से 6,00,000 टन LNG मिलेगा. पेट्रोनेट पहले ही इस प्रोजेक्ट से 1.42 मिलियन टन प्रति साल आयात कर रहा है. लेकिन एक्सपर्ट्स देते हुए कहते हैं कि एक ही देश (अमेरिका) पर बहुत ज्यादा निर्भरता भी खतरे से खाली नहीं है.

भारत के पास कच्चे तेल का कितना भंडार है?

देश में जहां LNG का संकट गहरा है, वहीं कच्चे तेल के मामले में भी भारत की स्थिति चिंताजनक है. भारत का स्ट्रैटेजिक पेट्रोलियम रिजर्व (SPR) आपात स्थिति के लिए बनाया गया कच्चे तेल का भूमिगत भंडार है. इसे इंडियन स्ट्रैटेजिक पेट्रोलियम रिजर्व्स लिमिटेड (ISPRL) चलाती है.

23 मार्च 2026 को संसद में बताए गए आंकड़ों के मुताबिक, ISPRL के पास करीब 3.372 MMT कच्चा तेल मौजूद है. यह कुल क्षमता का करीब 64% है. यानी 36% स्टोरेज खाली पड़ा है.

  • सिर्फ स्ट्रैटेजिक रिजर्व (SPR): 5.33 MMT की क्षमता भारत की करीब 9.5 दिन की जरूरत पूरी कर सकती है. फिलहाल 64% भरा है, तो और भी कम.
  • कुल भंडार: ऑयल मार्केटिंग कंपनियों (IOC, BPCL, HPCL) के पास भी तेल का स्टॉक होता है. इसे मिलाकर भारत की कुल भंडारण क्षमता करीब 74 दिन की है. असली स्टॉक करीब 60 दिन का है.

अंतरराष्ट्रीय मानक: IEA का 90 दिन का लक्ष्य

इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी (IEA) के मानक के मुताबिक, सदस्य देशों को कम से कम 90 दिन के नेट आयात के बराबर आपातकालीन तेल भंडार रखना चाहिए. भारत IEA का सदस्य है, लेकिन 74 दिन की क्षमता और 60 दिन   के वास्तविक स्टॉक के साथ वह इस मानक से काफी दूर है.

भारत की तुलना जापान और दक्षिण कोरिया से करें तो वहां 200 दिनों से ज्यादा का रिजर्व होता है.

क्या हो रहा है विस्तार की दिशा में?  

सरकार ने SPR के दूसरे चरण (फेज-2) की मंजूरी दी थी, जिसमें 6.5 MMT की अतिरिक्त क्षमता जोड़ी जानी थी. चंडीखोल (ओडिशा) में 4 MMT और पादुर (कर्नाटक) में 2.5 MMT. पूरा होने पर कुल क्षमता 11.88 MMT हो जानी थी.

जमीन अधिग्रहण, लागत और बोली प्रक्रिया में देरी के कारण यह प्रोजेक्ट लटक गया है. हालांकि, पादुर में काम शुरू हो चुका है. सरकार बीना (मध्य प्रदेश) और बीकानेर (राजस्थान) में नए SPR स्थलों की भी योजना बना रही है.

LPG में भी बदलाव से अमेरिका पर निर्भरता बढ़ी

LNG और कच्चे तेल के अलावा LPG के मामले में भी भारत ने अपनी रणनीति बदली है. पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने बताया कि भारत की 67% LPG अब अमेरिका से आती है. पहले यह आंकड़ा सिर्फ 10% था. यह बदलाव   स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में संकट के कारण किया गया है.

भारत की एनर्जी सुरक्षा कितनी मजबूत है?

एक्सपर्ट्स के मुताबिक, सच्चाई यह है कि भारत की एनर्जी सुरक्षा अभी कमजोर है. आंकड़े साफ बोलते हैं:

  • LNG: 59% कतर और UAE पर निर्भरता है. अब कतर से सप्लाई ठप हो गई है और कोई बड़ा गैस भंडार नहीं है.
  • कच्चा तेल: 85% से ज्यादा आयात निर्भरता है. SPR सिर्फ 9.5 दिन का है और फेज-2 विस्तार में देरी हो रही है.
  • LPG: 67% अमेरिका पर निर्भरता है, जो खतरनाक भी साबित हो सकता है.

स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में चल रही जंग और वेस्ट एशिया में तनाव भारत के लिए सबसे बड़ा जोखिम बना हुआ है. जब तक भारत अपनी स्ट्रैटेजिक रिजर्व क्षमता को 90 दिनों के IEA मानक तक नहीं ले जाता और LNG के लिए कोई बैकअप स्टोरेज व्यवस्था नहीं बनाता, तब तक एनर्जी सुरक्षा संकट की चपेट में ही रहेगी.

भारत सरकार ने अमेरिका, ओमान, नाइजीरिया और ऑस्ट्रेलिया से खरीदारी की दिशा में कदम उठाए हैं, लेकिन ये अल्पकालिक समाधान हैं. जब तक भारत अपने भंडारण ढांचे को मजबूत नहीं करता, तब तक हर बड़े भू-राजनीतिक संकट पर भारत की एनर्जी सुरक्षा दांव पर लगी रहेगी.