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Explained: 30 भारतीयों की मौत, 1.2% GDP गिरी और 2.5% तक बढ़ी महंगाई! अमेरिका-ईरान युद्ध में भारत का कितना नुकसान?

Middle East War Impact on India: भारत अपनी जरूरत का 85% कच्चा तेल आयात करता है, जिसका एक बड़ा हिस्सा होर्मुज के रास्ते ही आता है. जब होर्मुज बंद हुआ, तो तेल की आपूर्ति बुरी तरह प्रभावित हुई.

जब दुनिया के दो देश आपस में लड़ते हैं, तो उसकी आग में सबसे ज्यादा वो देश जलता है, जो न तो किसी का दोस्त होता है और न ही दुश्मन. वो सिर्फ अपना काम कर रहा होता है. अमेरिका-ईरान युद्ध के दौरान भारत बिल्कुल इसी स्थिति में खड़ा दिखा. न हम युद्ध के पक्षकार थे, न ही हमने किसी पर हमला किया. लेकिन इस जंग ने भारत को जान और माल पर बहुत गहरी चोट दी है. एक्सप्लेनर में समझते हैं कि मिडिल ईस्ट वॉर में भारत ने क्या-क्या गवा दिया...

भारत का वो नुकसान जो कभी नहीं भरेगा

अमेरिका-ईरान युद्ध के दौरान होर्मुज स्ट्रेट और फारस की खाड़ी में काम कर रहे भारतीय नाविकों को भारी कीमत चुकानी पड़ी. ये वो लोग थे जो तेल टैंकरों और शिपिंग जहाजों पर काम करते थे. इनका न तो युद्ध से कोई लेना-देना था, न ही वे किसी सेना का हिस्सा थे. लेकिन जब होर्मुज इलाके में मिसाइलें दागी गईं और जहाजों को निशाना बनाया गया, तो ये नाविक सबसे ज्यादा असुरक्षित थे.

घटना मरने वालों की संख्या
होर्मुज स्ट्रेट के पास जहाजों पर हमले 22 भारतीय नाविकों की मौत
जहाजों में आग लगने और डूबने से मौतें 8 भारतीय नाविक
कुल भारतीय मौतें 30 भारतीय नागरिक

ये वो लोग थे जो अपने परिवार का पेट पालने विदेशी जहाजों पर सवार हुए थे. केरल, तमिलनाडु, गुजरात, महाराष्ट्र और आंध्र प्रदेश के ये नाविक अपने घरों में कभी नहीं लौट पाए. भारत सरकार ने ईरान और अमेरिका दोनों के सामने इस मुद्दे को जोरदार तरीके से उठाया और मृतकों के शवों को वापिस लाने के लिए कूटनीतिक कोशिशें कीं.

वो भारतीय मजदूर जो खाड़ी देशों में फंसे रह गए

युद्ध शुरू होते ही UAE, कतर, ओमान और सऊदी अरब जैसे खाड़ी देशों में रह रहे लाखों भारतीय प्रवासी मजदूरों की जान पर बन आई. ये लोग सीधे युद्ध क्षेत्र में नहीं थे, लेकिन जब होर्मुज बंद हुआ और हवाई यात्रा पर पाबंदी लगी, तो ये अपने घरों में फंस गए. हालांकि, बड़े पैमाने पर बारतीयों की मौत की पुष्टि रिपोर्ट यहां से नहीं आई, लेकिन जान का जोखिम लगातार बना रहा. भारत सरकार ने 'ऑपरेशन होर्मुज सेफ्टी' के तहत हजारों भारतीयों को निकाला.

तेल की कीमतों की आग में जली भारत की अर्थव्यवस्था

अंतरराष्ट्रीय खाद्य नीति अनुसंधान संस्थान (IFPRI) की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत पर इस युद्ध का आर्थिक प्रभाव तीन स्तरों पर पड़ा:

1. तेल की कीमतों में उछाल

युद्ध शुरू होने के बाद कच्चे तेल की कीमत 82 डॉलर प्रति बैरल से उछलकर 100 डॉलर प्रति बैरल के पार चली गई. भारत अपनी जरूरत का 85% कच्चा तेल आयात करता है, जिसका एक बड़ा हिस्सा होर्मुज के रास्ते ही आता है. जब होर्मुज बंद हुआ, तो तेल की आपूर्ति बुरी तरह प्रभावित हुई. IFPRI के मुताबिक:

प्रभाव का क्षेत्र अनुमानित नुकसान (IFPRI रिपोर्ट)
भारत की GDP में गिरावट 0.8% से 1.2% तक की कमी
डोमेस्टिक इनकम में गिरावट करीब 1.5% की गिरावट
उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) में बढ़ोतरी 1.8% से 2.5% तक की अतिरिक्त महंगाई

भारत ने इस युद्ध की आर्थिक आग को कुछ हद तक झेल लिया, लेकिन इसकी कीमत चुकानी पड़ी:

  • भारत का क्रूड ऑयल आयात बिल युद्ध से पहले के मुकाबले करीब 25-30% बढ़ गया.
  • पेट्रोल और डीजल की खुदरा कीमतों में 8-12 रुपये प्रति लीटर तक की बढ़ोतरी हुई.
  • LPG सिलेंडर की कीमत में 150-200 रुपये तक का इजाफा हुआ, जिसका सीधा असर आम रसोई पर पड़ा.
  • भारत को रूस, इराक और सऊदी अरब जैसे वैकल्पिक तेल इम्पोर्टर्स से तेल खरीदना पड़ा, लेकिन लंबे रास्ते और ज्यादा भाड़े की वजह से हर बैरल पर 5-7 डॉलर का अतिरिक्त बोझ पड़ा.
  • अकेले शिपिंग भाड़े में 40-50% की बढ़ोतरी हुई, क्योंकि जहाजों को होर्मुज से बचकर लंबे रास्ते से जाना पड़ा.
  • भारत के विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव बढ़ा, जो युद्ध के दौरान करीब 15-20 अरब डॉलर तक घट गया.

2. बिजनेस रूट्स का ब्लॉकेज

नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ सिंगापुर के इंस्टीट्यूट ऑफ साउथ एशियन स्टडीज (ISAS) ने इस पूरे संघर्ष के भारत पर पड़ने वाले प्रभावों पर एक पेपर प्रकाशित किया. इसके मुताबिक:

क्षेत्र प्रभाव का अनुमान
व्यापार घाटा 25-30 अरब डॉलर तक बढ़ने की आशंका
चालू खाता घाटा (CAD) GDP के 1.2% से बढ़कर 2.5% तक पहुंचने का अनुमान
विदेशी मुद्रा भंडार 20-25 अरब डॉलर तक की गिरावट
रुपये की विनिमय दर डॉलर के मुकाबले 2-3% अतिरिक्त गिरावट

3. ग्लोबल इन्फ्लेशन का दबाव

इंटरनेशनल जर्नल ऑफ इकोनॉमिक्स एंड फाइनेंशियल मैनेजमेंट (IJEFM) में प्रकाशित एक रिसर्च पेपर ने इस युद्ध के भारत पर पड़ने वाले असर की गहराई से जांच की. इसके मुताबिक:

  • राजकोषीय घाटे पर दबाव: सरकार को तेल की बढ़ी कीमतों से उपभोक्ताओं को राहत देने के लिए उत्पाद शुल्क में कटौती करनी पड़ी. इससे सरकारी राजस्व में करीब 1 लाख करोड़ रुपये की कमी आने का अनुमान है.
  • उर्वरक संकट और खाद्य सुरक्षा: भारत अपनी DAP उर्वरक जरूरत का 60% और पूरी पोटाश आयात करता है. युद्ध के कारण उर्वरक की कीमतों में 66% तक की बढ़ोतरी हुई, जिसका सीधा असर खरीफ और रबी फसलों की लागत पर पड़ा.
  • शेयर बाजार पर असर: युद्ध की आशंका और होर्मुज बंद होने के बीच सेंसेक्स और निफ्टी में भारी गिरावट देखी गई. एक ही सप्ताह में सेंसेक्स करीब 3,000 अंक तक लुढ़क गया था, जिससे निवेशकों की करोड़ों की संपत्ति साफ हो गई.

क्या भारत इस इम्तिहान में पास हुआ?

टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत ने इस संकट से निपटने में कुछ हद तक कामयाबी पाई. सरकार ने रूस और इराक से सस्ते तेल की खरीद बढ़ाई, रणनीतिक तेल भंडार का इस्तेमाल किया और जरूरत पड़ने पर डॉलर-रुपया स्वैप मैकेनिज्म का सहारा लिया. रिपोर्ट यह भी चेतावनी देती है कि अगर जंग लंबी चली, तो अल नीनो के साथ मिलकर यह भारत के लिए दोहरी मार साबित हो सकती है.

यह युद्ध भले ही हजारों मील दूर लड़ा गया हो, लेकिन इसकी तपिश भारत के हर घर तक पहुंची. जो 30 नाविक अपने परिवारों में नहीं लौट पाए, वो इसकी सबसे बड़ी कीमत हैं. जो आर्थिक झटके आम आदमी की जेब पर पड़े, वो इस बात की याद दिलाते हैं कि दुनिया के किसी भी कोने में लगी आग की लपटें, आज के जुड़े हुए जमाने में किसी को भी अछूता नहीं छोड़तीं.

ज़ाहिद अहमद इस वक्त ABP न्यूज़ में बतौर सीनियर कॉपी एडिटर अपनी सेवाएं दे रहे हैं. टेलीविजन और डिजिटल जर्नलिज्म की दुनिया में उन्हें करीब 9 साल का तजुर्बा है. इससे पहले वे 3 बड़े मीडिया संस्थानों में भी अहम जिम्मेदारियां निभा चुके हैं. वे ओरिजिनल सेक्शन की एक्सप्लेनर टीम में सीनियर सब एडिटर रहे. ज़ाहिद आउटपुट डेस्क, बुलेटिन प्रोड्यूसिंग और बॉलीवुड सेक्शन को बतौर असिस्टेंट प्रोड्यूसर लीड भी कर चुके हैं. देश-विदेश, सियासत, कारोबार, एजुकेशन, एंटरटेनमेंट, चुनाव और समाजी मुद्दों पर उनकी गहरी पकड़ है. आसान लहजे में असरदार और भरोसेमंद एक्सप्लेनर पेश करना उनकी पहचान है.

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