India Iran Trade Relations: अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव का असर सिर्फ दोनों देशों तक सीमित नहीं रहने वाला है. ट्रंप टैरिफ और सख्त नीतियों की वजह से अगर ईरान से व्यापार पर रोक और कड़ी होती है, तो इसका असर भारत समेत दूसरे देशों पर भी देखने को मिल सकता है.  

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खास तौर पर भारत जैसे देश, जो पहले से ही 50 फीसदी अमेरिकी टैरिफ का सामना कर रहे हैं. नए फरमान से यह एक नई चुनौती बन सकती है. इससे न सिर्फ व्यापारिक संतुलन बिगड़ने की संभावना है. बल्कि ऊर्जा, आयात-निर्यात और कूटनीतिक रिश्तों पर भी असर पड़ सकता है. आइए जानते हैं, भारत-ईरान के व्यापारिक संबंधों के बारे में....

क्या कहते हैं आंकड़े?

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मीडिया रिपोर्ट से मिली जानकारी के अनुसार, भारत से ईरान को जाने वाले निर्यात में जैविक रसायनों की हिस्सेदारी सबसे बड़ी रही है. जिसकी कीमत 512.92 मिलियन डॉलर है. इसके बाद फल, मेवे, खट्टे फलों के छिलके और खरबूज जैसे कृषि उत्पाद आते हैं. जिनका निर्यात 311.60 मिलियन डॉलर का रहा है.

वहीं, भारत ईरान से खनिज ईंधन, तेल और डिस्टिलेशन से जुड़े उत्पादों का करीब 86.48 मिलियन डॉलर का आयात करता है. हालांकि भारत-ईरान व्यापारिक संबंधों पर अमेरिकी प्रतिबंधों का असर साफ देखने को मिलता है. 2018-19 में जहां दोनों देशों के बीच व्यापार 17.03 अरब डॉलर था, वह 2019-20 में घटकर 4.77 अरब डॉलर रह गया और 2025 तक आते-आते यह आंकड़ा सिर्फ 1.68 अरब डॉलर तक सिमट गया. यानी कुल मिलाकर इन आंकड़ों में भारी गिरावट दर्ज की गई.

भारत पर सिर्फ टैरिफ नहीं इस फैक्टर से भी हो सकता है नुकसान

अमेरिका के दबाव और दूसरे कारणों से अगर भारत और ईरान के बीच दूरियां पैदा होती है. तो इसका असर सिर्फ कारोबार तक सीमित नहीं रहेगा. ईरान भारत के लिए एक अहम ट्रांजिट रास्ता है. जिसके जरिए रूस, मध्य एशिया और यूरोप तक भारतीय व्यापार की पहुंच होती है. भारत इन क्षेत्रों से संपर्क के लिए बड़े पैमाने पर ईरान के रास्तों पर निर्भर रहता है, इसलिए किसी भी तरह की रुकावट दूर तक असर डाल सकती है.

ईरान का चाबहार बंदरगाह भारत के लिए खास महत्व रखता है. इसके जरिए अफगानिस्तान और मध्य एशिया के देशों से सीधे कारोबार किया जा सकता है और पाकिस्तान से गुजरने की जरूरत नहीं पड़ती. इसके साथ ही अंतरराष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारा INSTC भी ईरान से होकर ही गुजरता है, जो भारत को रूस और यूरोपीय देशों से जोड़ता है.  

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