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जब भी इंडिया में शेयर मार्केट की बात होती है, सबसे पहले जो नाम दिमाग़ में आता है वो है सेंसेक्स (Sensex). इसे बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (BSE) का मेन इंडेक्स माना जाता है और ये मार्केट की धड़कन जैसा है. निवेशक, ट्रेडर्स और आम लोग सब सेंसेक्स की मूवमेंट देखकर अंदाज़ा लगाते हैं कि आगे मार्केट ऊपर जाएगा या नीचे. इस आर्टिकल में हम सिंपल शब्दों में समझेंगे कि सेंसेक्स क्या है, कैसे काम करता है और हमें शेयर मार्केट ट्रेंड्स के बारे में क्या सिखाता है.

सेंसेक्स क्या है?

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सेंसेक्स का फुल फॉर्म है Sensitive Index. ये BSE की 30 बड़ी और टॉप कंपनियों का एवरेज परफॉर्मेंस दिखाता है. इन कंपनियों में बैंकिंग, IT, ऑटो, FMCG, फार्मा जैसे अलग-अलग सेक्टर्स शामिल रहते हैं. अगर इन कंपनियों के शेयर प्राइस बढ़ते हैं तो सेंसेक्स ऊपर जाता है और अगर प्राइस गिरते हैं तो सेंसेक्स नीचे. इसलिए इसे शेयर मार्केट का थर्मामीटर कहा जाता है.

सेंसेक्स क्यों ज़रूरी है?

1. आर्थिक हेल्थ का पैमाना सेंसेक्स ऊपर जाने का मतलब है कंपनियाँ अच्छा कर रही हैं, जबकि गिरने का मतलब है प्रॉब्लम्स या अनिश्चितता.

2. निवेशकों का मूड जब सेंसेक्स चढ़ता है तो लोग शेयर खरीदने में इंटरेस्टेड रहते हैं, और गिरने पर डर का माहौल बन जाता है.

3. विदेशी निवेश FIIs और DIIs भी सेंसेक्स देखकर डिसाइड करते हैं कि इंडिया में पैसा लगाना है या निकालना.

सेंसेक्स से समझ आने वाले ट्रेंड्स

1. बुलिश ट्रेंड (तेज़ी)

अगर सेंसेक्स (Sensex) लगातार ऊपर जाता है, तो इसे बुलिश कहते हैं. इसका मतलब है मार्केट में पॉजिटिविटी है और लोग खरीदारी कर रहे हैं.

2. बियरिश ट्रेंड (मंदी)

जब सेंसेक्स लगातार गिरता है, तो ये बियरिश ट्रेंड होता है. ये अक्सर इकोनॉमिक क्राइसिस, पॉलिटिकल अनस्टेबिलिटी या ग्लोबल इश्यूज़ से होता है.

3. साइडवेज़ ट्रेंड

कभी-कभी सेंसेक्स ज्यादा ऊपर या नीचे नहीं जाता, बस एक लेवल पर टिकता रहता है. इसे साइडवेज़ ट्रेंड कहते हैं. इस दौरान इन्वेस्टर्स को वेट-एंड-वॉच स्ट्रेटेजी अपनानी चाहिए.

सेंसेक्स को प्रभावित करने वाले फैक्टर्स

गवर्नमेंट पॉलिसीज़ बजट, टैक्स रिफॉर्म्स, डिसइन्वेस्टमेंट जैसी चीज़ें.

ग्लोबल इवेंट्स अमेरिका, यूरोप या एशिया की पॉलिटिकल और इकॉनॉमिक न्यूज़.

RBI की ब्याज दरें मॉनेटरी पॉलिसीज़ मार्केट मूवमेंट पर डायरेक्ट असर डालती हैं.

कंपनियों के रिज़ल्ट्स क्वार्टरली/एनुअल रिज़ल्ट्स शेयर प्राइस और सेंसेक्स दोनों को बदलते हैं.

FII और DII एक्टिविटी जब विदेशी पैसा आता है तो सेंसेक्स ऊपर जाता है, और बाहर निकलने पर नीचे.

सेंसेक्स से इन्वेस्टर्स को क्या सीखना चाहिए?

1. लॉन्ग टर्म फोकस सेंसेक्स शॉर्ट टर्म में ऊपर-नीचे होता है, लेकिन लंबे समय में हमेशा ग्रो करता है.

2. डायवर्सिफिकेशन जैसे सेंसेक्स में अलग-अलग सेक्टर की कंपनियाँ हैं, वैसे ही पोर्टफोलियो को भी डायवर्स रखना चाहिए.

3. इमोशन्स कंट्रोल करें डर या लालच में फैसले लेने से बचें.

4. राइट टाइम डिसीजन सेंसेक्स देखकर समझ सकते हैं कब खरीदना है और कब बेचना.

सेंसेक्स बनाम निफ्टी

सेंसेक्स BSE का इंडेक्स, 30 कंपनियाँ.

निफ्टी NSE का इंडेक्स, 50 कंपनियाँ.

दोनों इंडिया की इकोनॉमी और मार्केट का परफॉर्मेंस दिखाते हैं, बस प्लेटफॉर्म अलग है.

लॉन्ग टर्म इन्वेस्टमेंट और सेंसेक्स

अगर आप लॉन्ग टर्म सोचते हैं, तो सेंसेक्स से साफ़ पता चलता है कि इंडिया की इकोनॉमी लगातार ग्रो कर रही है. 1980s में सेंसेक्स कुछ सौ पॉइंट्स पर था, और आज ये 60,000+ तक पहुँच चुका है. यानी इंडिया में लॉन्ग टर्म इन्वेस्टमेंट करने वालों को हमेशा अच्छे रिटर्न्स मिले हैं.

सेंसेक्स से जुड़े कॉमन मिथ्स

1. सिर्फ सेंसेक्स देखकर इन्वेस्ट करो गलत. सही रिसर्च और एनालिसिस भी ज़रूरी है.

2. सेंसेक्स हमेशा ऊपर जाएगा लॉन्ग टर्म में हाँ, लेकिन शॉर्ट टर्म में गिरावट भी आती है.

3. ये सिर्फ बड़े इन्वेस्टर्स के लिए है सच ये है कि स्मॉल इन्वेस्टर्स भी सेंसेक्स देखकर गाइडेंस ले सकते हैं.

सेंसेक्स और भारतीय अर्थव्यवस्था का कनेक्शन

सेंसेक्स सिर्फ शेयर मार्केट (share market) का इंडेक्स नहीं है, बल्कि ये पूरी इंडियन इकोनॉमी की सेहत भी बताता है. जब सेंसेक्स ऊपर जाता है, तो इसका मतलब है कि कंपनियाँ अच्छा कर रही हैं, प्रोडक्शन बढ़ रहा है, लोगों की परचेजिंग पावर बढ़ रही है. वहीं जब सेंसेक्स गिरता है, तो ये इशारा होता है कि इकॉनॉमी पर प्रेशर है चाहे वो महंगाई से हो, राजनीतिक अस्थिरता से या फिर ग्लोबल रुकावटों से. यही वजह है कि इकॉनॉमिस्ट और पॉलिसी मेकर्स भी सेंसेक्स की चाल को ध्यान से मॉनिटर करते हैं.

छोटे निवेशकों के लिए सेंसेक्स क्यों ज़रूरी है?

अक्सर स्मॉल इन्वेस्टर्स सोचते हैं कि सेंसेक्स तो बड़े इन्वेस्टर्स या FIIs के लिए ही मायने रखता है. लेकिन सच्चाई ये है कि हर इन्वेस्टर के लिए सेंसेक्स एक गाइडलाइन है.

अगर सेंसेक्स लगातार ऊपर जा रहा है, तो छोटे निवेशक भी SIP या म्यूचुअल फंड्स के जरिए फायदा उठा सकते हैं.

अगर सेंसेक्स गिर रहा है, तो ये संकेत है कि आपको सतर्क रहना चाहिए और शॉर्ट टर्म ट्रेडिंग से बचना चाहिए.

लॉन्ग टर्म इन्वेस्टर्स के लिए ये अच्छा मौका होता है अच्छे स्टॉक्स को डिस्काउंट पर खरीदने का.

इन्वेस्टिंग स्ट्रेटेजीज़ और सेंसेक्स

1. Buy on Dips जब सेंसेक्स गिरता है, तो अच्छे स्टॉक्स को सस्ते दाम पर खरीदने का मौका मिलता है.

2. SIP Investment हर महीने थोड़ी-थोड़ी रकम म्यूचुअल फंड्स में लगाने से सेंसेक्स की वॉलेटिलिटी का असर कम होता है.

3. Asset Allocation सेंसेक्स देखकर समझ सकते हैं कि कब इक्विटी में ज़्यादा इन्वेस्ट करना है और कब गोल्ड या डेब्ट में शिफ्ट होना है.

निष्कर्ष

सेंसेक्स हर इन्वेस्टर के लिए एक गाइडलाइन है. यह बताता है कि इंडियन मार्केट और इकोनॉमी किस दिशा में जा रहे हैं. अगर आप मार्केट में नए हैं तो सेंसेक्स के मूवमेंट्स को समझना और उसके हिसाब से स्ट्रेटेजी बनाना आपके लिए बेहद फायदेमंद साबित होगा. लॉन्ग टर्म इन्वेस्टर्स को हमेशा याद रखना चाहिए कि सेंसेक्स शॉर्ट टर्म में चाहे गिरता-उठता रहे, लेकिन लंबे समय में ये हमेशा ऊपर ही जाता है. इसलिए सेंसेक्स को सिर्फ एक न्यूज़ हेडलाइन न समझें, बल्कि इसे इंडिया की ग्रोथ स्टोरी का रियल टाइम इंडिकेटर मानें.

डिस्क्लेमर: यह स्पॉन्सर्ड आर्टिकल है. एबीपी नेटवर्क प्रा. लि. और/या एबीपी लाइव इस लेख के कंटेंट या इसमें व्यक्त विचारों का किसी भी रूप में समर्थन या अनुमोदन नहीं करता है. पाठकों से अनुरोध है कि वे अपनी समझ से निर्णय लें.