भारत दुनिया का सबसे बड़ा चीनी उपभोक्ता है और दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक. लेकिन अगस्त 2026 में देश चीनी संकट की एक ऐसी लहर से गुजर रहा है, जिसने आम आदमी से लेकर मिठाई बेचने वाले तक सबको प्रभावित किया है. पिछले दो महीनों में चीनी की कीमतों में 40 फीसदी तक का उछाल आया है. 18 अगस्त 2026 को चीनी का औसत खुदरा दाम 52.30 रुपये प्रति किलो पर पहुंच गया, जो एक साल पहले 46.34 रुपये था. कुछ शहरों में तो चीनी 65 रुपये किलो हो गई है. इस संकट की सबसे बड़ी वजह है सरकार की E20 इथेनॉल ब्लेंडिंग नीति. फिर भी किसानों को फायदा नहीं मिल रहा. आखिर क्या है पूरा माजरा...

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कैसे खत्म हो गई चीनी की मिठास?

अचानक चीनी महंगी होने की 5 बड़ी वजहें हैं:

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1. E20 इथेनॉल ब्लेंडिंग नीति

मोदी सरकार ने 2026 तक पेट्रोल में 20% इथेनॉल मिलाने (E20) का टारगेट रखा था. इसके लिए देश भर में 499 साइटों पर इथेनॉल उत्पादन क्षमता 1,822 करोड़ लीटर प्रति वर्ष तक पहुंच गई. गन्ना इथेनॉल फीडस्टॉक का   30-35% हिस्सा बनाता है. इसके लिए गन्ने का एक बड़ा हिस्सा चीनी बनाने की बजाय इथेनॉल उत्पादन में डायवर्ट किया जा रहा है. कांग्रेस के वरिष्ठ नेता जयराम रमेश ने दावा किया कि 25 लाख टन चीनी पैदा करने वाले गन्ने को इथेनॉल में डायवर्ट किया गया.

2. मानसून में कम बारिश

इस बार मानसून सामान्य से 13% कम रहा है. जून के अंत में तो यह कमी 40% से ज्यादा थी. इससे गन्ने की फसल पर बुरा असर पड़ा और उत्पादन घटने की आशंका बढ़ गई.

3. चीनी का घटता भंडार

उद्योग के अनुमान के मुताबिक, 2026-27 सीजन (1 अक्टूबर से) की शुरुआत 40-42 लाख टन के भंडार से होगी, जबकि कुछ अनुमानों में यह 32-35 लाख टन तक गिर सकता है. देश की सालाना जरूरत करीब 50 लाख टन है. यानी आपूर्ति मांग से काफी कम है. 2025-26 सीजन की शुरुआत 47 लाख टन के भंडार से हुई थी.

4. त्योहारी सीजन की बढ़ती मांग  

भारत दुनिया का सबसे बड़ा चीनी उपभोक्ता है. अगस्त से नवंबर के बीच गणेश चतुर्थी, दशहरा और दिवाली जैसे त्योहारों की वजह से चीनी की मांग आम दिनों से काफी बढ़ जाती है. इस सीजन में घरों से लेकर बिस्कुट, कन्फेक्शनरी और पेय पदार्थ बनाने वाली कंपनियों तक सभी की मांग बढ़ जाती है.

5. निर्यात पर रोक के बावजूद कीमतें नहीं रुकीं

सरकार ने मई 2026 में चीनी के निर्यात पर 30 सितंबर 2026 तक रोक लगा दी थी. साथ ही सरकार ने जुलाई 2026 में डीलरों के लिए 30 दिन और 4,000 क्विंटल से ज्यादा स्टॉक रखने पर रोक लगा दी थी. लेकिन कीमतें पिछले एक महीने में करीब 10% और बढ़ गईं.

चीनी के दाम बढ़ने से रोकने के लिए सरकार ने क्या कदम उठाए?

  • 10 लाख टन शुल्क-मुक्त आयात: 20 अगस्त 2026 को सरकार ने करीब एक दशक में पहली बार 10 लाख टन कच्ची चीनी के शुल्क-मुक्त आयात की अनुमति दी. यह आयात 31 अक्टूबर 2026 तक शुल्क-मुक्त रहेगा. इससे पहले कच्ची चीनी के आयात पर 100% कस्टम ड्यूटी लगती थी.
  • बल्क उपभोक्ताओं के लिए स्टॉक लिमिट सख्त: सरकार ने मिठाई बनाने वालों, कोल्ड ड्रिंक निर्माताओं और फूड प्रोसेसिंग उद्योगों जैसे बल्क उपभोक्ताओं के लिए 15 दिन से ज्यादा स्टॉक रखने पर रोक लगा दी. यह महीने में 10 टन से अधिक चीनी इस्तेमाल करते हैं. यह आदेश 1 सितंबर से 30 नवंबर 2026 तक लागू रहेगा. इससे पहले डीलरों के लिए 30 दिन की स्टॉक लिमिट थी.
  • निर्यात पर रोक और निगरानी: सरकार ने पहले ही 30 सितंबर 2026 तक चीनी के निर्यात पर रोक लगा दी थी. इसके अलावा चीनी मिलों को 17, 18 और 19 अगस्त की बिक्री और लेन-देन का पूरा ब्योरा 20 अगस्त दोपहर 12 बजे तक सरकार को देना था, ताकि कालाबाजारी और सट्टेबाजी पर लगाम लगाई जा सके.
  • आगे की योजना: सरकार अक्टूबर से शुरू होने वाले नए चीनी सीज़न में इथेनॉल के लिए डायवर्ट किए जाने वाले गन्ने की मात्रा कम करने पर विचार कर रही है, ताकि ज्यादा गन्ना चीनी उत्पादन में आ सके और कीमतों पर कंट्रोल कर सके.

जब चीनी के दाम बढ़ रहे, तो किसान फायदे से क्यों दूर?

चीनी के दाम चढ़ने के बावजूद गन्ना किसानों को मिलों से भारी बकाया का सामना करना पड़ रहा है. 16 फरवरी 2026 तक देश में गन्ना बकाया 16,087 करोड़ रुपए था. महाराष्ट्र में अकेले 4,898 करोड़ रुपए का बकाया है. पंजाब में निजी मिलों ने करीब 1,000 करोड़ रुपए का भुगतान किया है, लेकिन करीब 250 करोड़ रुपए अभी भी बकाया है.

सहारनपुर (उत्तर प्रदेश) की मिलों पर किसानों का 211.58 करोड़ रुपए का बकाया है. बेलगावी (कर्नाटक) में मिलों पर 1,500 करोड़ रुपए से ज्यादा का बकाया है. उत्तर प्रदेश में अकेले 4,000 करोड़ रुपए से ज्यादा का भुगतान अटका हुआ है.

गन्ने की उत्पादन लागत और चीनी के बिक्री मूल्य के बीच का अंतर लगातार बढ़ रहा है. चीनी की एक्स-मिल कीमत 25.60-26.22 रुपये किलो चल रही है, जो लागत से कम है. चीनी के दाम चढ़ने से मिलों का कैश फ्लो बढ़ रहा है, लेकिन किसानों को उनका हक नहीं मिल पा रहा.

दिल्ली कांग्रेस अध्यक्ष देवेंद्र यादव ने आरोप लगाया कि इथेनॉल नीति से मिलों को फायदा हो रहा है, किसानों को नहीं. वैधानिक रूप से किसानों को गन्ना देने के 14 दिनों के भीतर भुगतान पाने का अधिकार है, लेकिन मिलें इसका पालन नहीं कर पा रही हैं.

इसी का नतीजा है कि बकाया भुगतान को लेकर देशभर में किसान आंदोलन कर रहे हैं. छत्तीसगढ़ में किसानों ने 30 जून 2026 से अनिश्चितकालीन सड़क अवरोध की धमकी दी. पीलीभीत (यूपी) में किसानों ने मंत्री के आवास तक मार्च किया.

यानी चीनी के दाम चढ़ रहे हैं, लेकिन किसानों की जेब में पैसा नहीं आ रहा. इसका फायदा बिचौलियों, सट्टेबाजों और चीनी मिलों को मिल रहा है, जबकि किसान अपने पुराने बकाया के बोझ तले दबा हुआ है.

क्या शुल्क-मुक्त आयात से चीनी सस्ती होगी?  

हां, कुछ हद तक सस्ती होगी. 10 लाख टन शुल्क-मुक्त आयात से बाजार में अतिरिक्त आपूर्ति आएगी, जिससे कीमतों में 5 रुपए प्रति किलो तक की गिरावट आ सकती है. सट्टेबाजी पर भी लगाम लगेगी. लेकिन पूरी राहत नहीं मिलेगी, क्योंकि:

  • आयातित चीनी को रिफाइंड होने में समय लगेगा तुरंत असर नहीं होगा.
  • त्योहारी सीजन में मांग बहुत ज्यादा होती है कीमतें पूरी तरह नहीं गिरेंगी.
  • यह आयात 31 अक्टूबर तक सीमित है, इसके बाद फिर से आपूर्ति कम हो सकती है.
  • इथेनॉल डायवर्जन और घटता भंडार जैसी संरचनात्मक समस्याएं बनी हुई हैं.

एक्सपर्ट्स का मानना है कि अगर आप त्योहारों के लिए चीनी खरीद रहे हैं, तो कीमतों में थोड़ी नरमी आ सकती है- शायद 50-55 रुपए प्रति किलो के आसपास. लेकिन 45-46 रुपए जैसी पुरानी कीमतों की उम्मीद न करें, क्योंकि आपूर्ति-मांग का अंतर अभी बहुत बड़ा है. सबसे अच्छा यह है कि थोड़ा इंतजार करें. आयातित चीनी बाजार में आने में कुछ हफ्ते लगेंगे, तब तक कीमतों पर नजर रखें.

  • किसानों के लिए: चीनी के दाम बढ़ने से किसानों को फायदा नहीं हो रहा क्योंकि 16,000 करोड़ रुपए से ज्यादा बकाया है. जब तक मिलें बकाया चुका नहीं देतीं, किसान इस महंगाई से लाभान्वित नहीं हो पाएंगे. मिलों पर वित्तीय दबाव और इथेनॉल नीति ने चीनी उत्पादन को प्रभावित किया है. इससे मिलों की आय तो बढ़ी, लेकिन किसानों का कर्ज नहीं घटा.
  • आम आदमी के लिए: शुल्क-मुक्त आयात और स्टॉक लिमिट जैसे कदमों से त्योहारी सीजन से पहले कीमतों में कुछ राहत मिल सकती है. लेकिन तुरंत और बड़ी गिरावट की उम्मीद नहीं की जा सकती. पूरी तरह से कीमतें कंट्रोल में आने में कुछ हफ्तों से लेकर महीनों का समय लग सकता है.
  • सरकार के लिए: E20 इथेनॉल नीति और चीनी की कीमतों के बीच संतुलन बनाना एक बड़ी चुनौती है. 2026-27 सीजन के लिए इथेनॉल डायवर्जन कम करने का विचार एक सकारात्मक कदम है, लेकिन इसका असर आने वाले महीनों में ही दिखेगा.

सबसे बड़ी विडंबना यह है कि चीनी के दाम चढ़ रहे हैं, लेकिन किसानों की जेब खाली है. सरकार के आयात और स्टॉक लिमिट जैसे कदम कीमतों को काबू करने की कोशिश हैं, लेकिन किसानों का बकाया एक गहरी संरचनात्मक समस्या है. जब तक चीनी मिलों की वित्तीय स्थिति और गन्ना मूल्य भुगतान प्रणाली में सुधार नहीं होता, तब तक किसान इस महंगाई का फायदा नहीं उठा पाएंगे.