LPG- OIL News: ईरान और अमेरिका के बीच युद्धविराम तो हो गया है. ये युद्धविराम 60 दिनों तक लागू रहेगा. लेकिन सवाल ये है कि 60 दिन के बाद क्या? यदि ईरान और अमेरिका के बीच समझौता नहीं हुआ तब? क्या वापस महंगाई बढ़ेगी? दोबारा तेल और गैस की किल्लत होगी? इन सबसे बड़ा सवाल ये है कि भारत पर इसका असर क्या पड़ेगा?

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भारत पर क्या पड़ेगा असर?दरअसल हाल ही में रेटिंग एजेंसी क्रिसिल ने कुछ नए आंकड़े निकाले हैं, जिससे पता चलता है कि आने वाले समय में क्या हो सकता है. क्रिसिल की इस रेटिंग के मुताबिक अब भारतीय कंपनियों के मुनाफे पर इस संघर्ष का असर पहले की अपेक्षा काफी कम रहेगा. वित्त वर्ष 2026-27 में कंपनियों के परिचालन मुनाफे में अब करीब 1% की कमी आने की उम्मीद है.

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हालांकि इससे पहले ये अंदाजा लगाया जा रहा था कि अगर संघर्ष लंबा चलता है और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में जहाजों की आवाजाही प्रभावित होती, तो मुनाफा 2% तक घट सकता था. ये अनुमान ऐसे समय आया है जब युद्धविराम के बाद स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में जहाजों की आवाजाही फिर से शुरू हो गई है. इसके चलते कच्चे तेल की कीमतों में भी गिरावट आई है. हालांकि, क्रिसिल ने कहा कि मिडिल ईस्ट में तनाव पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है और गैस आपूर्ति सामान्य होने में अभी कुछ समय लग सकता है.

बढ़ेंगे कच्चे तेल के दाम?क्रिसिल की रिपोर्ट के मुताबिक इस वित्त वर्ष में ब्रेंट कच्चे तेल की औसत कीमत 80-85 डॉलर प्रति बैरल रह सकती है. वहीं, गैस आपूर्ति में रुकावट करीब चार महीने तक बनी रह सकती है. 

इन क्षेत्रों पर पड़ सकता है असरपहले जहां 22 क्षेत्रों पर असर पड़ने की आशंका थी, अब ये घटकर 10 क्षेत्रों तक रह गई है. जिन क्षेत्रों पर दबाव बना रह सकता है, उनमें:

  • एविएशन
  • सिरेमिक
  • फ्लेक्सिबल पैकेजिंग
  • स्पेशियलिटी केमिकल्स
  • पॉलिएस्टर टेक्सटाइल
  • हीरा पॉलिशिंग उद्योग शामिल हैं.

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इन उद्योगों पर महंगे कच्चे माल और आपूर्ति (सप्लाई) संबंधी चुनौतियों का असर बना रह सकता है. ऑयल मार्केटिंग कंपनियों (OMCs) को कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट का सबसे ज्यादा फायदा मिलने की उम्मीद है. उर्वरक (फर्टिलाइजर) कंपनियों को भी सस्ते कच्चे तेल और ऊर्जा लागत में कमी से लाभ मिल सकता है. क्रिसिल के अनुसार, तेल की कीमतें कम रहने से इन कंपनियों की कमाई (प्रॉफिटेबिलिटी) में सुधार होने की संभावना है.