भारत और सिंगापुर के बीच ऊर्जा सहयोग को एक नई दिशा देने की तैयारी चल रही है. अगर प्रस्तावित योजना आगे बढ़ती है, तो भारत के मणिपुर से दक्षिण-पूर्व एशिया के कई देशों को पार करते हुए सिंगापुर तक बिजली पहुंचाने का रास्ता खुल सकता है.

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करीब 3 हजार किलोमीटर लंबा यह कॉरिडोर क्षेत्रीय बिजली कारोबार को मजबूत करने के साथ ऊर्जा सुरक्षा के लिहाज से भी अहम साबित हो सकता है. हालांकि, फिलहाल यह प्रस्ताव विचाराधीन विकल्पों में शामिल है, इसे अंतिम मंजूरी मिल चुकी परियोजना नहीं समझना चाहिए.

2 हजार मेगावाट बिजली कनेक्शन की योजना

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भारत और सिंगापुर लगभग 2 हजार मेगावाट क्षमता वाले सीमा-पार बिजली कनेक्शन की संभावनाएं तलाश रहे हैं. यह पहल दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों के क्षेत्रीय बिजली नेटवर्क यानी ASEAN पॅावर ग्रिड को मजबूत करने की व्यापक योजना का हिस्सा है.

केंद्रीय बिजली एवं नवीन और नव करणीय ऊर्जा राज्य मंत्री श्रीपाद येसो नाइक ने मनीला, फिलीपींस में आयोजित 20वीं ईस्ट एशिया समिट ऊर्जा मंत्रियों की बैठक में इस प्रस्ताव का उल्लेख किया. उनके मुताबिक, इस तरह की व्यवस्था से अलग-अलग देशों के बीच बिजली का आदान-प्रदान आसान बनाने में मदद मिल सकती है.

किन देशों से होकर गुजरेगा प्रस्तावित रास्ता?

योजना के तहत एक संभावित जमीनी ट्रांसमिशन कॉरिडोर मणिपुर की राजधानी इम्फाल से शुरू होकर म्यांमार, थाईलैंड और मलेशिया के रास्ते सिंगापुर तक पहुंच सकता है. इसकी अनुमानित लंबाई करीब 3 हजार किलोमीटर होगी.

हालांकि, इस मार्ग को लेकर अभी विकल्पों पर विचार किया जा रहा है. परियोजना को जमीन पर उतारने के लिए तकनीकी जरूरतों, देशों के बीच तालमेल और बिजली के सीमा-पार व्यापार से जुड़े पहलुओं पर काम करना होगा.

स्वच्छ ऊर्जा और क्षेत्रीय सुरक्षा को मिलेगा बढ़ावा

इस पहल का उद्देश्य केवल बिजली पहुंचाना नहीं, बल्कि देशों के बीच ऊर्जा सहयोग को भी मजबूत करना है. बेहतर कनेक्टिविटी से जरूरत के समय बिजली का आदान-प्रदान संभव हो सकता है और स्वच्छ ऊर्जा के इस्तेमाल को बढ़ावा मिल सकता है.

भारत ने ASEAN देशों के साथ ऊर्जा क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने की प्रतिबद्धता भी दोहराई है. सरकार के अनुसार, भारत अपने नव करणीय ऊर्जा उत्पादन, बिजली ग्रिड प्रबंधन, ट्रांसमिशन नेटवर्क और ऊर्जा भंडारण से जुड़े अनुभव साझा करने के लिए तैयार है.

आगे क्या है योजना?

यह प्रस्ताव भारत की एक्ट ईस्ट नीति और ASEAN देशों के साथ रणनीतिक संबंधों को आगे बढ़ाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है. यदि योजना को मंजूरी मिलती है और जरूरी व्यवस्थाएं तैयार हो जाती हैं, तो यह क्षेत्रीय बिजली व्यापार का नया रास्ता खोल सकती है. फिलहाल इसकी प्रगति आने वाले समय में होने वाले तकनीकी और अंतरराष्ट्रीय विचार-विमर्श पर निर्भर करेगी.

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