जब साल 2025, अपनी अच्छी-बुरी यादों को अपने दामन में समेटते हुए सफर पूरा कर रहा था तभी एक खुशखबरी का एलान हुआ. 29 दिसंबर को भारत सरकार की आधिकारिक सूचना एजेंसी पीआईबी से ये सुखद जानकारी साझा की गई कि जापान को पछाड़कर अपना प्यारा देश दुनिया की चौथी बड़ी अर्थव्यवस्था बन गया है.
हर हिंदुस्तानी के लिए ये खबर राहत भरी है. मसर्रत से लबरेज़ करने वाली है. इस लम्हे का गवाह बनने के लिए आजाद भारत को करीब-करीब 75 साल का लंबा इंतजार करना पड़ा. हमारी पीढ़ी खुशनसीब है कि उसे ये वक्त देखने का मौका मिला. जैसे ही ये रिपोर्ट नज़र से गुजरी, दिल ने इस अमीरी के सच को बहुत गर्मजोशी के साथ महसूस नहीं किया. जेहन में ये सवाल कौंध गया कि ये महज़ मेरा दिमागी फितूर है या धड़कते दिल के एहसास की यही सच्चाई होनी चाहिए.
सच्चाई के सफर पर निकलें, उससे पहले ये जानते हैं कि खुशखबरी भरे इस एलान में क्या फरमाया गया है. बकौल पीआईबी, आईएमएफ की वर्ल्ड इकोनॉमिक आउटलुक रिपोर्ट (अप्रैल 2025) के मुताबिक भारत की अर्थव्यवस्था 4.18 ट्रिलियन डॉलर पहुंच गई है और इस तरह से देश ने जापान को पीछे छोड़ते हुए दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था का ताज अपने सर पर सजा लिया है.
2030 तक जीडीपी 7.3 ट्रिलियन डॉलर रहने की उम्मीद
रिपोर्ट में ये भी दावा किया गया कि अमीरी का ये सफर यूं ही जारी रहेगा और अगले ढाई से तीन साल में जर्मनी को भी पीछे छोड़कर तीसरे पायदान पर पहुंचना भी देश का मुकद्दर होगा. साल 2030 तक भारत की जीडीपी 7.3 ट्रिलियन डॉलर रहने की उम्मीद जताई गई है.
आसान भाषा में समझें तो इस तरक्की का मतलब हुआ कि अब हमारे पास ज्यादा पैसा हो गया है यानी देश का ख़ज़ाना पैसों से भर गया है. लेकिन इस अमीरी की एक तल्ख हकीकत ये है कि जनता समृद्ध नहीं हुई है यानी जो दौलत बढ़ी है, वो समान रूप से नहीं बंटी. इसलिए जो अमीरी आई है वो चंद लोगों के पास आई या अमीरों की अमीरी में रौशनी ज्यादा बढ़ी है, जबकि गरीबों के बीच तरक्की की धूप के जो उजाले छनकर आए वो वहां अंधेरे की हुकमरानी की जंजीर नहीं तोड़ पाए हैं. इसलिए ऐ तरक्की, तू तेज़ रफ्तार से चल, ये जरूरी है, लेकिन तुझसे कुछ गिले-शिकवे हैं. तुम्हारी रफ्तार कुछ अजब है, ये चिराग तो जलाते हैं, लेकिन फासले बढ़ाते हैं. तेरी अमीरी की चाल ऐसी है कि तू बसेरा महलों में करती है, उससे शिकायत भी नहीं है, लेकिन तू तो झुग्गियों को उड़ाकर ही किले तामीर करती है. और ऐसा सुलूक तू करोड़ों लोगों के साथ करता है, ये तकलीफदेह है, दर्द भी है और तुम्हारे विकास का एक नंग सच भी.
आखिर तू, इतना बेदर्द क्यों रहना चाहता है, क्या गरीबों को उजाड़े बिन तुम्हें नहीं आराम आएगा. नहीं मिलेगी रफ्तार. तुम्हारा अतीत तो यही किस्सा दोहरा रहा है तो फिर ये बताओ- तेरी इस आमद पे तेरे रस्ते में फूल क्यों बिछाए जाएं. तरक्की की धूप से जब उजाले मिलने की उम्मीद ही नहीं है तो आमद पे तेरी इत्र ओ चराग़ ओ सुबू क्योंकर?
अब बात एमपी के अलीराजपुर की
इस हकीकत से नाराज होने की जरूर नहीं है. इस अमीरी के एहसास के बीच, आएं, देश के सबसे गरीब जिलों में एक मध्य प्रदेश के अलीराजपुर की सैर करते हैं. लेकिन यहां गांवों में जाने के लिए सड़कें नहीं हैं, गाड़ियां नहीं हैं. हजारों लोग दो जून की रोटी के लिए तरस जाते हैं. दो दो दिन भूखे रह जाते हैं. रोटी के पैसे इक्कठे हुए तो कपड़े की कुर्बानी देनी होगी. अगर कपड़े खरीदें तो रोटी से रुठना जरूरी होगा. 90 फीसदी आदिवासी आबादी वाले इस जिले के लोगों की ख्वाहिश है कि बालों के लिए तेल और कंघी मिल जाए. ये हाथों में चूड़ियां, कान में झुमके, नाक में नथ और पैरों में पायल जैसी मामूली चीज़ें पाने की तमन्ना लिए जिंदगी में अच्छे दिन का इंतजार कर रही हैं. ये बातें नीति आयोग की रिपोर्ट में दर्ज हैं जो कहती है कि देश में सबसे ज्यादा गरीबी इसी जिले में है.
दर्द की दास्तान यहीं नहीं रुकती, हम चौथी बड़ी अर्थव्यवस्था की अमीरी को फील करना चाहते हैं, लेकिन पूरी दुनिया की ग़रीबी का आकलन करने वाली संस्था ‘ऑक्सफोर्ड पॉवर्टी एंड ह्यूमन डेवलपमेंट इनिशिएटिव (ओपीएचआई) कहती है कि मध्य प्रदेश के अलीराजपुर विश्व के सबसे ज़्यादा ग़रीबी से प्रभावित इलाकों में से एक है. कहां दुनिया की बड़ी आर्थिक शक्ति की बात.. और कहां सबसे गरीब इलाके का सच. ऐसी अमीरी जो पेट न भर सके, इसके तिलिस्म में खोने के बजाए, सच्चाई को कबूल करना जरूरी है.
छोड़ें, अलीराजपुर की बातें. आएं, जरा देश में अमीरी गरीबी की बढ़ती खाई का सच जानने की कोशिश करते हैं.
वर्ल्ड इनइक्वलिटी रिपोर्ट 2026 कहती है कि वतन-ए-अजीज में अमीरी और गरीबी के बीच जो फासले हैं, वो दुनिया में सबसे ज्यादा हैं. देश की सारी दौलत चंद लोगों के पास है. जरा रिपोर्ट में गहराई से उतरते हैं, दिल थाम कर रखेंगे, अगर सीने में धड़कता दिल होगा, तो दर्द भी महसूस करेंगे. देश के टॉप 10 फीसदी अमीरों के पास कुल दौलत का करीब 65 फीसदी है. अगर इसे एक फीसदी के नंबर पर ले जाएं तो पता चलता है कि उनके पास करीब 40 फीसदी दौलत है. यानी सिर्फ डेढ़ करोड़ लोगों के पास देश की 40 फीसदी दौलत है. अगर डेढ़ अरब लोगों में आपका शुमार उन डेढ़ करोड़ में है तो जरूर इतराएं. लेकिन सितम ये है कि साल दर साल अमीर और ज्यादा अमीर हो रहा है. और गरीबों के हिस्से में अभी तरक्की की सुबह नहीं आई है.
दौलत चंद लोगों की रखैल बन रही है, ये किस्सा कोई नया नहीं है, और न सिर्फ भारत में हो रहा है. बल्कि 1990 के बाद ही खरबपति, अरबपति और करोड़पति... अमीर से अमीर होते जा रहे हैं. हर साल इनकी दौलत में इजाफा 8 फीसदी की दर से हो रहा है. और गरीबों पर सितम जारी है. इनकी दौलत सिर्फ 4 फीसदी बढ़ रही है. एक तो पहले से अमीर और दूसरे- अमीरी में इजाफा भी दोगुनी रफ्तार से. ऐ अमीरी तिरी इस अजब चाल-ढाल पर अभी ताली बजाने का वक्त नहीं आया है.