Defence Budget 2025: यह माना जाता है कि किसी भी देश की फॉरेन पॉलिसी उतनी ही मजबूत होती है, जितना मजबूत उसका रक्षा तंत्र होता है. जिस देश की सैन्य और सुरक्षा क्षमता मजबूत होती है, वह अंतरराष्ट्रीय मंच पर बिना किसी दबाव के अपने हितों की बात रख सकता है. यही वजह है कि आज दुनिया के लगभग सभी बड़े देश अपने रक्षा बजट पर भारी खर्च कर रहे हैं.

अमेरिका ने वर्ष 2027 के लिए अपने रक्षा बजट को बढ़ाकर 1.5 ट्रिलियन डॉलर करने का प्रस्ताव रखा है, जो पहले के अनुमानों से करीब 50 प्रतिशत अधिक है. वहीं भारत का पड़ोसी चीन भी लगातार अपने सैन्य खर्च में इजाफा कर रहा है. वित्त वर्ष 2025-26 में चीन ने रक्षा बजट पर करीब 245 अरब डॉलर खर्च किए.

भारत का रक्षा खर्च: जीडीपी के मुकाबले स्थिति

पिछले 15 वर्षों में भारत के रक्षा खर्च का रुझान देखें तो जीडीपी के अनुपात में इसमें लगातार गिरावट देखने को मिलती है. 2010-11 में रक्षा खर्च जीडीपी का 2.71% था.

2015-16 में यह 2.41%

2020-21 में 2.88%

2022-23 में 2.21%

2023-24 में 1.97%

2024-25 में 1.89%

2025-26 में घटकर 1.90% के आसपास रह गया. यह आंकड़े साफ संकेत देते हैं कि बढ़ते वैश्विक तनावों के बावजूद भारत का रक्षा खर्च जीडीपी के अनुपात में सीमित होता जा रहा है.

वित्त वर्षजीडीपी का कितना हिस्सा बजट पर खर्च प्रतिशत में
2015-162.41
2020-212.88
2022-232.21
2023-241.97
2024-251.89

बढ़ते वैश्विक तनाव और भारत की रणनीति

आज वैश्विक हालात बेहद अस्थिर हैं. ईरान, वेनेजुएला, यूक्रेन युद्ध और मिडिल ईस्ट में जारी तनाव ने सुरक्षा चुनौतियों को और गहरा कर दिया है. ऐसे में सवाल उठता है कि बजट 2026 में भारत को रक्षा खर्च को लेकर कैसी रणनीति अपनानी चाहिए? आर्थिक मामलों के जानकार मनीष कुमार गुप्ता का कहना है कि अब रक्षा क्षेत्र में निवेश सिर्फ जीडीपी, रोजगार या व्यापार तक सीमित नहीं है. यह सीधे तौर पर भारत की सामरिक शक्ति और वैश्विक प्रभाव का पैमाना बन चुका है.

जब भारत रक्षा उपकरणों का निर्यात करता है, तो वह सिर्फ हथियार नहीं बेचता, बल्कि खुद को दुनिया के ताकतवर देशों की कतार में स्थापित करता है. एक मजबूत रक्षा निर्यातक देश की बात अंतरराष्ट्रीय मंचों पर ज्यादा गंभीरता से सुनी जाती है.

डिफेंस सेक्टर और आर्थिक विकास

मनीष गुप्ता के अनुसार, आईएमएफ और विश्व बैंक द्वारा भारत की विकास दर को लेकर जताया गया भरोसा भी काफी हद तक डिफेंस सेक्टर से जुड़ा है. डिफेंस एक हाई-वैल्यू मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर है, जो टेक्नोलॉजी, एमएसएमई और स्किल डेवलपमेंट को एक साथ जोड़ता है. इससे आयात घटता है, निर्यात बढ़ता है और करंट अकाउंट बैलेंस पर सकारात्मक असर पड़ता है. फिलहाल डिफेंस सेक्टर का जीडीपी में योगदान करीब 2 प्रतिशत है, जिसे सही नीतियों से 2.5 प्रतिशत तक ले जाया जा सकता है.

जरूरी सुधार और चुनौतियां

हालांकि इसके लिए कुछ कड़े फैसले जरूरी हैं.

रक्षा खरीद प्रक्रिया में पारदर्शिता

टेंडर सिस्टम में ‘लॉबिंग’ और बार-बार रद्द होने की समस्या पर लगाम

सेना की खरीद में 75 प्रतिशत तक स्वदेशी उत्पादों की हिस्सेदारी

एमएसएमई को सस्ता कर्ज और समय पर भुगतान की गारंटी

इन सुधारों के बिना आत्मनिर्भर रक्षा उद्योग की कल्पना अधूरी रहेगी.

बदल चुका है युद्ध का स्वरूप

मनीष गुप्ता का कहना है कि आज की लड़ाई तोप-गोले से ज्यादा डेटा, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और साइबर टेक्नोलॉजी की है. इसलिए बजट 2026 में एआई, साइबर सिक्योरिटी और अत्याधुनिक टेक्नोलॉजी पर विशेष जोर दिया जाना चाहिए.

हालांकि डिफेंस निर्यात कई गुना बढ़ा है और 50 हजार करोड़ रुपये तक ले जाने का लक्ष्य है, लेकिन घोषणाओं और जमीनी अमल के बीच अभी भी बड़ा अंतर है.

एयरफोर्स और बेसिक इंडस्ट्री पर फोकस जरूरी

वहीं रक्षा विशेषज्ञ और रिटायर्ड विंग कमांडर प्रफुल्ल बख्शी का मानना है कि भारत को सबसे ज्यादा ध्यान वायुसेना (Air Force) पर देना होगा, क्योंकि आधुनिक युद्ध की शुरुआत और दिशा तय करने में एयरफोर्स की भूमिका सबसे अहम होती है. उनके मुताबिक, रिसर्च एंड डेवलपमेंट पर निवेश बढ़ाना बेहद जरूरी है.

प्रफुल्ल बख्शी यह भी कहते हैं कि भारत की सबसे बड़ी कमजोरी उसकी बेसिक इंडस्ट्रियल क्षमता है. जब तक राष्ट्रीय उद्योग मजबूत नहीं होगा, तब तक रक्षा उद्योग भी मजबूत नहीं हो सकता.

आज भारत मेटल-ग्रेड इंजन जैसी कई अहम चीजें खुद नहीं बना पा रहा है. अगर युद्ध के समय हथियारों के लिए दूसरे देशों पर निर्भर रहेंगे, तो लंबे समय तक संघर्ष नहीं कर पाएंगे. इसलिए दीर्घकालिक सुरक्षा के लिए स्वदेशी उद्योग और मैन्युफैक्चरिंग को मजबूत करना अनिवार्य है.

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