नई दिल्लीः पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव के नतीजे आने में 50 घंटे से थोड़ा ज्यादा समय ही बचा हुआ है. इसी के साथ केंद्र सरकार की ओर से कई बड़े फैसले लेने के लिए उल्टी गिनती भी शुरु हो चुकी है. ये वो फैसले है जो चुनावी आचार संहिता की वजह से अटके पड़े थे. तकनीकी तौर पर चुनावी आचार संहिता 11 मार्च को मतदान पूरी होने तक लागू रहेगी. मतलब ये है मतगणना का काम पूरा होने के साथ ही केंद्र सरकार उन सारे मुद्दों पर फैसले ले सकती है जिनपर आचार संहिता की मुहर लगी हुई थी.

केंद्रीय कर्मियों का भत्ता सबसे पहले उम्मीद है कि केंद्र सरकार के कर्मचारियों के भत्तों में फेरबदल को लेकर फैसला होगा. सातवे वेतन आयोग की सिफारिशों पर अमल तो हो चुका है औऱ सितम्बर से लोगों को बढ़ी हुई तनख्वाह भी मिल रही है. लेकिन आवास भत्ता और दूसरे भत्तों में अभी तक बदलाव नहीं हुआ है. इसकी वजह ये है कि आयोग ने कुल 196 तरह के भत्तों में 52 खत्म करने का सुझाव दिया. साथ ही कुछ को मिलाने की सिफारिश की. सबसे ज्यादा विवाद आवास भत्ता यानी एचआरए को लेकर था जिसे महानगरों के लिए मूल वेतन का 30 फीसदी से घटाकर 24 फीसदी करने की सिफारिश की गयी. विवादों को देखते हुए सरकार ने एक समिति बनायी. समिति ने अपनी रिपोर्ट सौंप दी है. सूत्रों की मानें तो तो समिति की रिपोर्ट के आधार पर कैबिनेट नोट तैयार किया जा रहा है औऱ जल्द ही इस पर फैसला हो सकेगा. समझा जाता है कि समिति ने आवास भत्ते की दर में किसी तरह का बदलाव नहीं करने की सिफारिश की है. ऐसा अगर हुआ तो 50 लाख के करीब सरकारी कर्मचारियों के लिए अच्छी खबर होगी.

इसके साथ ही नजर महंगाई भत्ते को लेकर भी है. केंद्र सरकार के कर्मचारियों के लिए महंगाई भत्ते में 2 बार फेरबदल होता है. पहला बदलाव पहली जनवरी से प्रभावी होता है जबकि दूसरा पहली जुलाई से. फेरबदल के लिए खुदरा महंगाई दर यानी सीपीआई में होने वाले बदलाव को आधार बनाया जाता है. उम्मीद है कि पहली जनवरी 2017 से महंगाई भत्ते में 2 से 4 फीसदी के बीच बढ़ाया जा सकता है.

प्रत्यक्ष विदेशी निवेश यानी एफडीआई रक्षा और खुदरा कारोबार में विदेशी निवेश की शर्तों की और उदार बनाने का प्रस्ताव है. इसकी पहली झलक बजट भाषण देखने को मिली थी जब वित्त मंत्री अरुण जेटली ने विदेशी निवेश संवर्द्धन बोर्ड यानी एफआईपीबी खत्म करने के साथ विदेशी निवेश की प्रक्रिया को और आसान बनाने की बात कही थी. वैसे तो चर्चा थी कि रक्षा और खुदरा कारोबार के अलावा खबरिया चैनलों में विदेशी निवेश की शर्तें आसान की जाती है, लेकिन अब ये जानकारी मिल रही है कि खबरिया चैनलों को लेकर काफी ज्यादा विरोध है. इसीलिए यहां कोई बदलाव होने के आसार नहीं है. लेकिन रक्षा और खुदरा (सिंगल ब्रांड और मल्टी ब्रांड) को लेकर सरकार मन बना चुकी है. रक्षा में वैसे तो अभी 49 फीसदी तक ऑटोमेटिक (यानी बगैर सरकारी मंजूरी के) और उसके ऊपर मामला-दर-मामला आधार पर सरकारी मंजूरी के साथ विदेशी निवेश की अनुमति है. लेकिन परेशानी ये है कि अभी तक कोई खास निवेश नहीं आय़ा है. इसीलिए शर्तों को और आकर्षक बनाने की कोशिश की जा रही है.

खुदरा कारोबार में जहां सिंगल ब्रांड में 100 फीसदी विदेशी निवेश की इजाजत है, वहीं मल्टी ब्रांड में ये सीमा 51 फीसदी है. यहां परेशानी शर्तों को लेकर है. शर्त ये है कि विदेशी निवेशकों को एक तय सीमा तक माल घरेलू स्रोतों से खरीदना होगा. अब उम्मीद की जा रही है कि इन शर्तों में कुछ बदलाव होगा.

राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति दो बार से कैबिनेट की बैठक में इस नीति पर फैसला टलता रहा है. फिलहाल, आगे इसके टलने के आसार नहीं है. दरअसल, ये नीति पिछले दो साल से लंबित है. इसके तहत लोगों को सुनिश्चित स्वास्थ्य सेवाएं देने की बात है. पहले सुनिश्चित स्वास्थ्य सेवाओं को मौलिक अधिकार बनाने की बात कही गयी थी. लेकिन अब मौलिक अधिकार शब्द को हटा दिया गया है.