Petrol- Diesel Price Hike: भारत में कैसे तय होते हैं पेट्रोल-डीजल के दाम? रेट की समीक्षा कब कब की जाती है,यहां समझिए पूरा गणित
Petrol- Diesel Price Hike: इन दिनों हर दूसरे दिन पेट्रोल और डीजल के दाम बढ़ रहे हैं. ऐसे में कई लोगों के मन में ये सवाल है कि आखिर इन सभी तेल के दाम कैसे तय होते हैं और इनकी समीझा कब की जाती है.

Petrol- Diesel Price Hike: देश में पेट्रोल और डीजल की कीमतें बढ़ते ही आम आदमी की चिंता बढ़ जाती है. क्योंकि इसका असर सिर्फ गाड़ी चलाने वालों पर नहीं, बल्कि रोजमर्रा की जिंदगी पर भी पड़ता है. ट्रांसपोर्ट महंगा होता है तो सब्जी, राशन और बाकी जरूरी सामान के दाम भी बढ़ने लगते हैं. ऐसे में लोगों के मन में अक्सर सवाल उठता है कि आखिर भारत में पेट्रोल-डीजल के दाम कैसे तय होते हैं और सरकार कब इनकी समीक्षा करती है.
यह भी पढ़ें- WFH और विदेशी यात्राओं में कटौती, PM मोदी की अपील पर इस दिग्गज कंपनी ने उठाया बड़ा कदम
अंतरराष्ट्रीय बाजार से जुड़ा है पूरा खेल
भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा कच्चे तेल के रूप में विदेशों से खरीदता है. यानी अंतरराष्ट्रीय बाजार में क्रूड ऑयल की कीमतों का सीधा असर देश में पेट्रोल-डीजल पर पड़ता है. अगर वैश्विक बाजार में कच्चा तेल महंगा होता है तो भारत में भी तेल कंपनियों पर दबाव बढ़ता है. हालांकि सिर्फ कच्चे तेल की कीमत ही अंतिम रेट तय नहीं करती. इसके अलावा डॉलर के मुकाबले रुपये की स्थिति, टैक्स, ट्रांसपोर्ट खर्च और डीलर कमीशन भी अहम भूमिका निभाते हैं.
कौन तय करता है पेट्रोल-डीजल की कीमत?
देश में इंडियन ऑयल, भारत पेट्रोलियम और हिंदुस्तान पेट्रोलियम जैसी सरकारी तेल कंपनियां पेट्रोल-डीजल के दाम तय करती हैं. ये कंपनियां अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों और बाकी खर्चों को देखकर रोजाना रेट अपडेट करती हैं. पहले तेल की कीमतों की समीक्षा हर 15 दिन में होती थी, लेकिन जून 2017 से देश में डेली प्राइस रिवीजन सिस्टम लागू कर दिया गया. यानी अब हर दिन सुबह 6 बजे पेट्रोल और डीजल के नए दाम जारी किए जाते हैं. इसी वजह से कई बार लोगों को लगातार कई दिनों तक तेल सस्ता या महंगा होता दिखाई देता है.
यह भी पढ़ें- महंगाई का महा-विस्फोट, अप्रैल में 8.30% पर पहुंची थोक महंगाई, 42 महीने का रिकॉर्ड टूटा
टैक्स का भी बड़ा रोल
भारत में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में सबसे बड़ा हिस्सा टैक्स का होता है. केंद्र सरकार एक्साइज ड्यूटी लगाती है, जबकि राज्य सरकारें VAT यानी वैट वसूलती हैं. अलग-अलग राज्यों में वैट अलग होने की वजह से हर शहर में तेल के दाम भी अलग होते हैं. उदाहरण के तौर पर, दिल्ली और मुंबई में पेट्रोल की कीमतों में अंतर सिर्फ ट्रांसपोर्ट नहीं, बल्कि राज्य सरकारों के टैक्स की वजह से भी होता है.
कब बढ़ते हैं तेल के दाम?
अगर अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें लगातार बढ़ रही हों या डॉलर मजबूत हो रहा हो, तो भारत में तेल महंगा होने की संभावना बढ़ जाती है. इसके अलावा युद्ध, राजनीतिक तनाव या सप्लाई में कमी जैसी वैश्विक घटनाओं का भी असर पड़ता है. हालांकि कई बार सरकार जनता को राहत देने के लिए टैक्स कम कर देती है, जिससे कीमतों में कमी देखने को मिलती है.
आम आदमी पर सीधा असर
पेट्रोल-डीजल महंगा होने का असर हर व्यक्ति पर पड़ता है. ट्रांसपोर्ट खर्च बढ़ने से खाने-पीने से लेकर रोज इस्तेमाल होने वाली चीजें भी महंगी हो जाती हैं. यही वजह है कि तेल की कीमतों पर देशभर की नजर रहती है. आसान भाषा में समझें तो भारत में तेल के दाम सिर्फ सरकार नहीं तय करती, बल्कि इसके पीछे अंतरराष्ट्रीय बाजार, टैक्स और कई आर्थिक फैक्टर मिलकर काम करते हैं.


























