8th Pay Commission: 8वें वेतन आयोग (8th Pay Commission) की बैठकों में सरकारी कर्मचारी यूनियनों की हमेशा से मांग पुरानी पेंशन योजना (Old Pension Scheme) को बहाल करने की रही है.

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यूनियनों ने सालों से यह मांग की है कि नेशनल पेंशन सिस्टम (NPS) की जगह पुरानी पेंशन योजना (OPS) को लागू किया जाए.लेकिन जैसे-जैसे 8वें वेतन आयोग की चर्चाओं के दौरान यह बहस फिर से जोर पकड़ रही है, अब कर्मचारियों के प्रतिनिधि भी यह मानने लगे हैं कि NPS को पूरी तरह से खत्म करना अब शायद उतना आसान न हो. अब सवाल आता है कि ऐसा क्यों?

OPS पर लौटना क्यों चुनौतीपूर्ण?

दरअसल, NPS को लागू हुए लगभग दो दशक बीत चुके हैं और इस दौरान कर्मचारियों और सरकार के योगदान से सिस्टम में 16.5 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा की रकम जमा हो चुकी है. यह पैसा LIC, SBI, UTI जैसे सरकारी वित्तीय संस्थानों के माध्यम से शेयर बाजार, सरकारी बॉन्ड और विभिन्न कॉर्पोरेट इंस्ट्रूमेंट्स में निवेशित हैं.

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ऐसे में अगर सरकार पूरी तरह से OPS पर लौटती है, तो इस विशाल धनराशि को अचानक बाजार से निकालना होगा. इससे स्टॉक मार्केट और बॉन्ड मार्केट में भारी उथल-पुथल मच जाएगी. ऊपर से लिक्विडिटी का संकट गहराने का खतरा भी है.

यही वजह है कि अब कई कर्मचारी संगठन सिर्फ OPS को वापस लाने की बात नहीं कर रहे हैं, बल्कि मौजूदा NPS या यूनिफाइड पेंशन स्कीम (UPS) के ढांचे के भीतर ही 'OPS जैसी गारंटी' देने की मांग कर रहे हैं.

क्यों फिर भी कर्मचारियों में OPS की चाह?

वित्तीय बाजार की जटिलताओं के बावजूद सरकारी कर्मचारी पुरानी पेंशन योजना (OPS) की मांग इसलिए करते हैं क्योंकि OPS उन्हें जीवनभर के लिए 100% सुरक्षित और महंगाई मुक्त भविष्य का भरोसा देती है. OPS में पेंशन के नाम पर सैलरी से एक रुपया नहीं काटा जाता. पेंशन का पूरा खर्चा सरकार अपने बजट से उठाती है.

NPS/UPS में कर्मचारियों को अपनी बेसिक सैलरी में से हर महीने 10 परसेंट पेंशन फंड में जमा कराना पड़ता है. उनका मानना है कि उनकी मेहनत की कमाई से यह कटौती गलत है. OPS में सरकार साल में दो बार महंगाई भत्ता (DA- Dearness Allowances) बढ़ाती है, जबकि NPS में ऐसा कुछ नहीं है. 

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