यदि एक ही व्यक्तित्व में कठोरता और कोमलता की दो विपरीत धाराएं प्रवाहित होती दिखाई दें और दोनों ही व्यक्तित्व को संपूर्णता दें तो इसके मूल में न्याय की मूल भावना स्थायी रूप से निहित होती है. कठोरता अत्याचार को बर्दाश्त नहीं करती और कोमलता किसी का दुख-दर्द दूर करने के लिए उद्यत करती है. माना जाता है कि जो शासक कानून के प्रति कठोर होगा,  उसमें संवेदना की कमी दिखाई देगी, लेकिन प्रदेश की दो घटनाओं में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के दो अलग-अलग स्वरूप देखने को मिले हैं. एक घटना में उनके हाथ में न्याय की तलवार दिखाई देती है, तो दूसरी में करुणा का दीपक. वह कानून-व्यवस्था के मामले में इतने अडिग हैं कि अपराधी को किसी कीमत पर बख्शने को तैयार नहीं और दूसरी ओर एक असहाय भाई की आंखों में उतरी पीड़ा उन्हें भीतर तक झकझोर देती है. यही द्वैत उन्हें एक सामान्य प्रशासक से कहीं आगे जनता के हृदय का शासक बनाता है और स्वीकारोक्ति देता है.

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शामली में अंकित बालियान की नृशंस हत्या ने उसके पूरे परिवार ही नहीं, पूरे प्रदेश को झकझोर दिया था. ऐसे क्षणों में पीड़ित परिवार की सबसे बड़ी आकांक्षा होती है-शीघ्र और निर्णायक न्याय. यहीं मुख्यमंत्री के प्रशासनिक तेवर सामने आते हैं. पुलिस को तत्काल अपराधियों को दबोचने के लिए स्पष्ट निर्देश गया और महज 86 घंटों के भीतर दोनों अपराधी पुलिस से मुठभेड़ में ढेर हो गए. यह एक संदेश भी है कि उत्तर प्रदेश में अपराध करने वाले के लिए जेल या जहन्नुम ही एकमात्र जगह बची है. जिस गति से यह न्याय हुआ, उसने पीड़ित परिवार के घावों पर मरहम का काम तो किया ही, साथ ही समाज में यह विश्वास भी दृढ़ किया कि सरकार पीडितों के पक्ष में खड़ी है. योगी की यह कठोरता आतंक के लिए नहीं, बल्कि निर्भयता के लिए है. आम नागरिक निर्भय होकर जी सके, इसके लिए अपराधियों में भय पैदा किया जाना आवश्यक है.

दूसरी ओर योगी का यही व्यक्तित्व जनता दर्शन में लोगों की व्यथा को देखकर सर्वथा भिन्न हो जाता है. वहां कोई मां अपने बच्चे की व्यथा लेकर आती है, तो कोई भाई अपनी बहन की असाध्य बीमारी का बोझ लिए दीनहीन खड़ा है. सोमवार को मुख्यमंत्री आवास पर ऐसा ही कारुणिक दृश्य देखने को मिला. अयोध्या से आए श्याम सोनकर ने व्यथित भाव में मुख्यमंत्री को बताया कि उनकी बहन गंभीर रूप से बीमार है. वह बहुत ही गरीब है और उसे अपनी बहन को अस्पताल में भर्ती कराने में परेशानी हो रही है. एक भाई की करुण पुकार ने मुख्यमंत्री के भीतर के उस कोमल हृदय को झकझोर दिया, जो प्रशासनिक कठोरता की परतों के नीचे छिपा रहता है. उन्होंने बिना विलंब किए श्याम की बहन को लोहिया अस्पताल भिजवाया, तत्काल उपचार आरंभ करवाया और निर्देश दिया कि इलाज का पूरा खर्च सरकार की ओर से दिया जाए. यह संवेदनशीलता का दिखावा नहीं, बल्कि उस मिट्टी की देन है जहां सेवा और तपस्या साथ चलते हैं. मुख्यमंत्री आवास पर लगने वाले जनता दर्शन में योगी का मानवीय और करुणामय पक्ष अक्सर देखने को मिलता है. कानपुर की मूक-बधिर खुशी गुप्ता का ही प्रकरण लें. मुख्यमंत्री से उसकी मुलाकात हुई तो उन्होंने न सिर्फ प्रेमभाव से उसके सिर पर हाथ फेरा, बल्कि उसके इलाज और पढ़ाई की व्यवस्था कराने का भरोसा दिया. यह मामला इसलिए मार्मिक है, क्योंकि एक ऐसी किशोरी, जो अपनी बात सामान्य तरीके से कह भी नहीं सकती थी, उसकी पीड़ा को मुख्यमंत्री ने समझा. ऐसे कई प्रकरण हैं. कभी हृदय रोग से पीड़ित सात महीने के बच्चे के इलाज की व्यवस्था तो कभी थैलेसीमिया पीड़ित बच्चे के इलाज की चिंता करना, उनके व्यक्तित्व के मानवीय पहलू हैं. किसी निर्धन के इलाज का खर्च हो, किसी विद्यार्थी की शिक्षा में आ रही बाधा हो, या किसी असहाय वृद्ध की पेंशन और आश्रय की चिंता हो, मुख्यमंत्री ने व्यक्तिगत रुचि लेकर उनकी समस्याओं का समाधान किया. यह क्षणिक भावुकता की बात नहीं, उनके व्यक्तित्व की मूल प्रकृति का ही अभिन्न हिस्सा है. यहां यह प्रश्न स्वाभाविक रूप से उठता है कि आखिर एक ही व्यक्ति में इतनी कठोरता और इतनी कोमलता कैसे सह-अस्तित्व में रह सकती है? इसका उत्तर शायद इस बात में निहित है कि दोनों ही गुण वास्तव में सुशासन की मूल भावना से उपजते हैं. अपराधी के प्रति कठोरता और पीड़ित के प्रति करुणा, ये दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हैं. जो व्यक्ति निर्दोष की पीड़ा को गहराई से अनुभव कर सकता है, वही अपराधी के विरुद्ध उतनी ही दृढ़ता से खड़ा भी हो सकता है. यदि हृदय में करुणा न हो, तो न्याय के प्रति यह अटूट प्रतिबद्धता भी संभव नहीं.

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आज के दौर में जब राजनीति प्रायः स्वार्थ, सत्ता-संघर्ष और छवि-निर्माण की भूलभुलैया में उलझी दिखाई देती है, ऐसे उदाहरण दुर्लभ होते जा रहे हैं जहां एक शासक अपने भीतर कठोरता और करुणा, दोनों को समान रूप से जीवित रख पाए. मुख्यमंत्री का यह व्यक्तित्व इस बात का प्रमाण है कि शासन कोई यांत्रिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि एक जीवंत उत्तरदायित्व है, जिसमें संवेदना का उतना ही महत्व है जितना अनुशासन का. अंकित बालियान के हत्यारों के विरुद्ध की गई त्वरित कार्रवाई और जनता दर्शन में एक असहाय भाई की पुकार पर तत्काल कदम उठाना, ये दोनों घटनाएं भले ही परस्पर विरोधाभासी प्रतीत हों, परंतु गहराई से देखने पर ये एक ही आत्मा की दो अभिव्यक्तियां हैं. वह आत्मा जो अन्याय को सहन नहीं करती, चाहे वह अपराध के रूप में प्रकट हो या पीड़ा और उपेक्षा के रूप में.

शक्ति का सही उपयोग तब होता है जब अपराधी के लिए भय और निर्दोष के लिए आश्रय, दोनों सुनिश्चित कर सके. मुख्यमंत्री के व्यक्तित्व में यह संतुलन जिस स्वाभाविकता से दिखाई देता है, वह उनके भीतर की सच्ची प्रकृति है. कानून-व्यवस्था की धार और मानवीय संवेदना का स्पर्श, यही वह दुर्लभ संतुलन है, जो एक साधारण शासन को जनता के हृदय में बसे शासन में बदल देता है. शासन जनता के हृदय में बसे विश्वास से चलता है, और यह विश्वास तभी पनपता है, जब शासक स्वयं जनता के सुख-दुख से जुड़ा हो.