महिला सुरक्षा की बात करने से पहले मेरा एक प्रश्न सभी से है कि हम कैसा समाज बनाना चाहते हैं. ऐसा समाज जहां बेटियां आशंकाओं की सीमाओं में सिमटकर जिएं या ऐसा जहां वे खुले आकाश में उड़ान भरें. एक दशक पहले हमने आशंकाओं का माहौल भी देखा है और अब निर्भयता का वातावरण भी देख रहे हैं. यह अंतर काफी भारी है और पूरे समाज को प्रभावित करने वाला है. राज्य का प्रथम धर्म नागरिक की रक्षा है, और जब नागरिक आधी आबादी हो, तो यह धर्म सबसे ऊपर आ जाता है. शक्ति की असली आराधना भी यही है कि हर महिला को सुरक्षा और सम्मान मिले. योगी सरकार ने इसी विचार को अपनी शासन-दृष्टि का केंद्र बनाया है कि सुरक्षा कृपा नहीं, अधिकार है. वर्ष 2017 से पहले प्रदेश में महिलाओं में असुरक्षा का जो भाव था, वह सभी जानते हैं. सार्वजनिक स्थलों पर भी महिलाओं का अकेले निकलना खतरे से खाली नहीं था. स्कूल-कॉलेज जाने वाली छात्राओं और कामकाजी महिलाओं के लिए तमा रास्ते चिंता से भरे होते थे, लेकिन सत्ता संभालने के बाद योगी आदित्यनाथ की सरकार ने जिस दृढ़ इच्छाशक्ति के साथ महिला सुरक्षा को शासन की सर्वोच्च प्राथमिकता की वेदी पर स्थापित किया, उसने महिलाओं में एक नए आत्मविश्वास का संचार भी किया है. लोकतंत्र में मिली अभिव्यक्ति की आजादी का लाभ उठाकर कोई व्यक्ति यदि आज यूपी में महिला सुरक्षा पर सवाल उठाता है तो इसका मतलब यही है कि वह निहित स्वार्थ के चलते इस सत्य को अस्वीकार कर रहा है. सत्य यह है कि महिला सुरक्षा अब सुदृढ़ कानून-व्यवस्था का मुख्य स्तंभ है.

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इस पूरे परिदृश्य को बदलने में राज्य सरकार ने सबसे पहला और प्रभावी कदम पुलिस बल के बुनियादी ढांचे में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाकर उठाया. लंबे समय तक पुलिसिंग को पुरुष-प्रधान क्षेत्र माना जाता रहा है, जिसके कारण महिलाएं अपनी शिकायतें लेकर थानों तक जाने में असहज महसूस करती थीं. योगी सरकार ने इस मनोवैज्ञानिक और व्यावहारिक बाधा को तोड़ने के लिए पुलिस भर्ती में महिलाओं को 20 प्रतिशत का आरक्षण प्रदान किया. वर्ष 2017 तक उत्तर प्रदेश पुलिस में महिला पुलिसकर्मियों की कुल संख्या बमुश्किल 10 हजार के आसपास हुआ करती थी, जो आज बढ़कर 44 हजार के आंकड़े को पार कर चुकी है.

आज प्रदेश के हर जिले, हर थाने और हर मोहल्ले में महिला बीट पुलिसिंग, पिंक पेट्रोलिंग और महिला हेल्प डेस्क जैसी व्यवस्थाएं काम कर रही हैं. जब एक महिला सड़क पर खाकी वर्दी में दूसरी महिला को गश्त करते हुए देखती है, तो उसके भीतर सुरक्षा का जो भरोसा पैदा होता है, वह किसी भी सरकारी दावे से कहीं अधिक शक्तिशाली होता है. महिला सुरक्षा के दृष्टिगत राज्य में 3 महिला पीएसी बटालियन का गठन किया जा चुका है तथा 5 अन्य महिला बटालियन के गठन की प्रक्रिया भी तेजी से गतिमान है.

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उत्तर प्रदेश में महिला सुरक्षा के प्रति सरकार की प्रतिबद्धता का दूसरा सबसे बड़ा प्रमाण सार्वजनिक स्थानों को असामाजिक तत्वों से मुक्त कराना रहा है. सड़क पर चलते हुए, स्कूल-कॉलेज जाते हुए या बाजारों में महिलाओं और बालिकाओं के साथ होने वाली छेड़छाड़ की घटनाओं पर पूर्णतया अंकुश लगाने के लिए सत्ता में आते ही 'एंटी रोमियो स्क्वॉड' का गठन किया गया था. आंकड़ों के अनुसार इस स्क्वॉड ने अब तक 5 करोड़ 95 लाख से अधिक व्यक्तियों की चेकिंग की है. दो करोड़ 20 लाख से अधिक व्यक्तियों को सख्त चेतावनी देकर छोड़ा गया, जबकि 42,226 मनचलों और अपराधियों के विरुद्ध कठोर वैधानिक कार्रवाई की गई है. इस व्यापक कार्रवाई ने मनचलों और अपराधियों में कानून का जो खौफ पैदा किया है, उसी का परिणाम है कि आज प्रदेश की बेटियां निडर होकर बाहर निकल रही हैं. महिलाओं की शिकायतों को बिना किसी देरी के दर्ज करने और उन पर त्वरित कार्रवाई करने के लिए 'महिला एवं बाल सुरक्षा संगठन 1090' (वुमेन पावर लाइन) को और अधिक तकनीकी व ढांचागत रूप से मजबूत किया गया. सरकार ने यह भी भली-भांति समझा कि जब तक समाज की मानसिकता में बदलाव नहीं आएगा और महिलाएं स्वयं अपने अधिकारों के प्रति जागरूक नहीं होंगी, तब तक सुरक्षा का चक्र पूरा नहीं हो सकता. मिशन शक्ति ने सुरक्षा, सम्मान और स्वावलंबन के त्रिकोण को पूरा किया. मिशन शक्ति के माध्यम से स्कूलों, कॉलेजों, ग्राम पंचायतों से लेकर शहरी क्षेत्रों तक महिलाओं को उनके अधिकारों और उनके लिए बने कानूनी प्रावधानों के बारे में व्यापक स्तर पर जागरूक किया गया. मिशन शक्ति ने सरकारी योजनाओं का लाभ अंतिम पायदान पर खड़ी महिला तक पहुंचाने में एक सेतु का काम किया है. इस अभियान को और अधिक प्रभावी बनाने के लिए प्रत्येक थाने में 'मिशन शक्ति केंद्र' स्थापित किए गए हैं और 80 हजार से अधिक पुलिसकर्मियों को विशेष रूप से प्रशिक्षित किया गया है.

योगी सरकार की नीतियों का ही प्रतिफल है कि महिलाओं के अपहरण, घरेलू हिंसा, हत्या और बलात्कार जैसे गंभीर व जघन्य अपराधों के मामलों में भारी गिरावट दर्ज की गई है. राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आधिकारिक आंकड़े इसे प्रमाणित करते हैं. साल 2016 में जब प्रदेश में समाजवादी पार्टी की सरकार थी, तब उत्तर प्रदेश में दहेज उत्पीड़न और हत्या के मामलों की दर प्रति लाख महिलाओं पर 2.4 थी, जो योगी सरकार में 2024 के आंकड़ों के अनुसार घटकर 1.8 रह गई है. इसी प्रकार, वर्ष 2016 में सपा राज में महिलाओं के अपहरण के 13,014 मामले दर्ज किए गए थे, जो 2024 में काफी हद तक घटकर 7,919 रह गए. बलात्कार जैसे अत्यंत संवेदनशील और जघन्य अपराधों के आंकड़े देखे जाएं तो 2016 में इसकी दर 4.6 थी, जो अब घटकर 2.8 रह गई है. इसके पीछे अपराधियों के खिलाफ अपनाई गई 'जीरो टॉलरेंस' की नीति और अदालतों में मामलों की प्रभावी पैरवी का अहम योगदान है.

अपराधियों को सजा दिलाने के मामले में सरकार ने एक नजीर पेश की है. पुलिस की प्रभावी जांच और अभियोजन पक्ष की मजबूती के कारण महिलाओं एवं नाबालिगों के विरुद्ध हुए अपराधों में 30 जून 2026 तक की स्थिति के अनुसार, कुल 34,734 अभियोगों में अभियुक्तों को सजा दिलाई गई है. इनमें पॉक्सो (POCSO) अधिनियम के तहत दर्ज 15,402 अभियोग और बलात्कार के 4,714 मामले शामिल हैं, जिनमें अपराधियों को उनके अंजाम तक पहुंचाया गया है. जब अपराधियों को इतनी बड़ी संख्या में और त्वरित गति से सजा मिलती है, तो समाज में एक कड़ा संदेश जाता है कि कानून का राज स्थापित हो चुका है. आज उत्तर प्रदेश की महिलाएं जिस आत्मविश्वास के साथ शिक्षा प्राप्त कर रही हैं, रोजगार के नए क्षेत्रों में कदम रख रही हैं और स्वावलंबन की ओर बढ़ रही हैं, उसकी सबसे बड़ी नींव सुरक्षा का वह आवरण है, जिसे वर्तमान सरकार ने अपनी सर्वोच्च प्राथमिकता मानते हुए तैयार किया है. महिला सुरक्षा अब उत्तर प्रदेश की नई पहचान और उसकी विकास यात्रा का सबसे उज्ज्वल अध्याय बन चुका है.

[इस आर्टिकल में लेखक के निजी विचार हैं]