यामानाशी के 200 सदस्यीय प्रतिनिधि मंडल के वर्तमान दौरे ने उत्तर प्रदेश और जापान के संबंधों को नया आयाम जरूर दिया है, लेकिन इतिहास को देखें तो रिश्तों की यह डोर बहुत पुरानी है जो समय के साथ और मजबूत ही हुई है. एक सिरा सारनाथ की पवित्र भूमि पर बंधा है, जहां बुद्ध ने अपना पहला उपदेश दिया था तो दूसरा सिरा जापान के किसी बौद्ध मंदिर से जुड़ता है. इस परिदृश्य में यामानाशी के प्रतिनिधिमंडल का आगरा, लखनऊ और वाराणसी जाना सिर्फ शिष्टाचार-भ्रमण नहीं, बल्कि सांस्कृतिक मिलन भी होगा. सदियों पहले जो रिश्ता आस्था और अध्यात्म की भाषा में जापान पहुंचा था, वह आज निवेश, तकनीक और रोजगार की भाषा में लौटकर उत्तर प्रदेश के दरवाजे पर दस्तक दे रहा है. यह इतिहास का सुनियोजित, तार्किक विस्तार है और उत्तर प्रदेश के भविष्य की एक झलक भी.
उत्तर प्रदेश और जापान के बीच के आध्यात्मिक संबंधों का प्रतीक हैं सारनाथ, कुशीनगर और श्रावस्ती, जहां बुद्ध ने अपने जीवन के सर्वाधिक वर्ष बिताए. जापान में बौद्ध धर्म आस्था के साथ सांस्कृतिक अस्तित्व का हिस्सा है. हर साल हजारों जापानी श्रद्धालु और पर्यटक इसी आध्यात्मिक खिंचाव के चलते बौद्ध परिपथ की यात्रा करते हैं. यही आध्यात्मिक निकटता आर्थिक अवसर में बदल रही है. यामानाशी प्रान्त के गवर्नर कोटारो नागासाकी के नेतृत्व में 200 से अधिक शीर्ष जापानी उद्योगपति यह अवसर लेकर उत्तर प्रदेश पहुंचे हैं तो इसका एक बड़ा कारण यह है कि योगी सरकार ने अपने शासनकाल में निवेश अनुकूल माहौल बनाकर प्रदेश में हुए बदलाव और अपनी युवा विशाल शक्ति से उन्हें परिचित कराया.
प्रतिनिधिमंडल के लिए आगरा का चुना जाना संयोग नहीं, सुनियोजित है. यह शहर विश्व-प्रसिद्ध है, लेकिन इसकी पर्यटन अर्थव्यवस्था लंबे समय से एक ही स्मारक के इर्द-गिर्द सिमटी रही है. जापानी निवेशकों की उपस्थिति यहां हॉस्पिटेलिटी और नागरिक अवसंरचना के नए दरवाज़े खोल सकती है. जापानी पर्यटक अनुशासन, स्वच्छता और सांस्कृतिक गहराई को महत्व देते हैं. बौद्ध सर्किट (कुशीनगर, सारनाथ, श्रावस्ती, कपिलवस्तु) जापानी पर्यटक प्रवाह का स्वाभाविक केंद्र है.
कुशीनगर में अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे का निर्माण इसी सोच का नतीजा था, ताकि जापान व अन्य देशों के श्रद्धालु सीधे बौद्ध स्थलों तक पहुंच सकें. लेकिन इस निवेश मीट का विस्तार और बड़ा दायरा बनाता है. सबसे महत्वाकांक्षी हिस्सा है यमुना एक्सप्रेसवे औद्योगिक विकास प्राधिकरण के क्षेत्र में प्रस्तावित 500 एकड़ की 'जापानी सिटी'. एक ऐसा औद्योगिक-आवासीय पारिस्थितिकी तंत्र, जहां जापानी कंपनियां अपनी परिचित कार्यसंस्कृति और सुविधाओं के साथ काम कर सकें. अनुमान है कि इससे 10 हज़ार से अधिक युवाओं को सीधा रोजगार मिलेगा. यह वन ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था के बड़े लक्ष्य का हिस्सा है, जिसे मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ बार-बार दोहराते रहे हैं. जापान जैसे तकनीकी रूप से उन्नत, अनुशासित पूंजी वाले साझेदार के साथ यह लक्ष्य पाना आसान हो जाएगा.
यामानाशी जापान का एक ऐसा प्रांत है जो सटीक यंत्र निर्माण, ऑप्टिकल उपकरण, स्वच्छ ऊर्जा, मोबिलिटी जैसे क्षेत्रों में अपनी विशेषज्ञता के लिए जाना जाता है. इस दौरे में जिन समझौता ज्ञापनों (एमओयू) पर हस्ताक्षर हुए, वे उत्तर प्रदेश के औद्योगिक ढांचे में सीधा योगदान देने वाले साबित हो सकते हैं. सटीक यंत्र निर्माण और ऑटो कंपोनेंट क्षेत्र में यामानाशी की कंपनियों की रुचि नोएडा और यमुना एक्सप्रेसवे क्षेत्र में पहले से मौजूद ऑटोमोबाइल और इलेक्ट्रॉनिक्स आपूर्ति शृंखला को और सशक्त बनाएगी. जेवर का नोएडा अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा इस पूरी योजना की रीढ़ है, क्योंकि जापानी उद्योगों को कच्चे माल और तैयार उत्पाद की आवाजाही के लिए एक भरोसेमंद हवाई कार्गो केंद्र चाहिए, और यह हवाई अड्डा प्रस्तावित जापानी सिटी के समीप है. यामानाशी से हो रहे करार की एक और बड़ी उपलब्धि कौशल विकास और मानव संसाधन के क्षेत्र में हुए समझौते हैं. जापान की कार्यसंस्कृति में अनुशासन, गुणवत्ता और दीर्घकालिक प्रशिक्षण को काफी महत्व दिया जाता है. इसे देखते हुए उत्तर प्रदेश सरकार ने राज्य के आईटीआई और पॉलिटेक्निक संस्थानों को जापानी मानकों के अनुरूप ढालने की दिशा में सहमति बनाई है. इसका सीधा लाभ यह होगा कि प्रदेश के युवाओं को न सिर्फ स्थानीय जापानी इकाइयों में, बल्कि सीधे जापान में भी तकनीकी नौकरियों के अवसर मिलेंगे.
जापान वर्तमान में कार्यबल की चुनौती से जूझ रहा है और उत्तर प्रदेश की युवा जनसंख्या इस कमी को पूरा करने वाली एक स्वाभाविक साझेदार के रूप में उभर रही है. भाषा प्रशिक्षण केंद्रों की स्थापना, जापानी भाषा को कौशल पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाना और प्रदेश के तकनीकी संस्थानों के साथ यामानाशी के विश्वविद्यालयों की साझेदारी, यह सब मिलकर एक ऐसा मार्ग बनाएंगे जिस पर रोजगार और शिक्षा दोनों दिशाओं में जाया जा सकेगा.
स्पष्ट निहितार्थ यह है कि योगी सरकार में उच्च शिक्षा अब केवल डिग्री देने का माध्यम नहीं रह गई, बल्कि अंतरराष्ट्रीय आर्थिक कूटनीति तक पहुंच रही है. यामानाशी प्रीफेक्चर सरकार के साथ एमओयू और यामानाशी यूनिवर्सिटी के साथ एलओआई का एक साथ होना दिखाता है कि सरकार और शिक्षा जगत दोनों मिलकर एक समांतर ट्रैक पर काम कर रहे हैं. दूसरा महत्वपूर्ण पहलू है ग्रीन हाइड्रोजन और क्लीन एनर्जी पर केंद्रित शोध सहयोग.
जापान, विशेषकर यामानाशी प्रांत, हाइड्रोजन तकनीक के क्षेत्र में वैश्विक स्तर पर अग्रणी माना जाता है और भारत अपने ऊर्जा संक्रमण तथा नेट-ज़ीरो लक्ष्यों को लेकर तेज़ी से आगे बढ़ रहा है. ऐसे में यह साझेदारी केवल अकादमिक जिज्ञासा नहीं बल्कि भारत की राष्ट्रीय हाइड्रोजन मिशन जैसी नीतिगत प्राथमिकताओं से सीधे जुड़ जाएगी. बड़ी संख्या में रोजगार की संभावनाओं को तो अभी से दिशा मिलने लगी है. निवेश सम्मेलन में कुबोटा और मिंडा के प्रोजेक्ट्स की वर्चुअल ग्राउंड ब्रेकिंग हो चुकी है. 3195 करोड़ के निवेश से 10 हजार लोगों के लिए रोजगार के दरवाजे खुलेंगे.
इस पूरी यात्रा का सबसे बड़ा संदेश यह है कि उत्तर प्रदेश अब केवल एक बड़ा उपभोक्ता बाजार नहीं, बल्कि एक भरोसेमंद उत्पादन और निवेश गंतव्य के रूप में स्थापित हो रहा है. यामानाशी के साथ हुए समझौते सिर्फ पूंजी निवेश के आंकड़े नहीं हैं, बल्कि यह दो संस्कृतियों के बीच एक दीर्घकालिक साझेदारी की नींव हैं जिसमें आस्था, तकनीक, शिक्षा और रोजगार सब एक साथ गुंथे हुए हैं. सारनाथ से शुरू हुई वह यात्रा जो सदियों पहले जापान पहुंची थी, आज यमुना एक्सप्रेसवे के औद्योगिक गलियारे में एक नए रूप में लौट रही है.
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