देश में कई लोगों को अभी भी पूरी तरह साफ नहीं है कि फीफा राष्ट्रीय फूफाओं का कोई संगठन है या फुटबॉल का अंतरराष्ट्रीय फेडरेशन. वे बस इसलिए फीफा-फीफा कर रहे हैं क्योंकि दूसरे लोग कर रहे हैं. दूसरों में कई इसलिए फीफा-फीफा कर रहे हैं क्योंकि पहले में कई फीफा-फीफा कर रहे हैं. फीफा कप में भले भारतीय टीम नहीं खेल रही, लेकिन भारतीयों की दिलचस्पी का आलम यह है कि कई हनीमून जोड़े हनीमून के लिए रूस पहुंच गए हैं. एक पंथ दो काज.
फीफा कप से हिन्दुस्तान को कई फायदे हुए हैं. पहला, बेगानी शादी में सिर्फ अब्दुल्ला नहीं बल्कि पूरा देश दीवाना है और इससे सरकार ने राहत की सांस ली है. कोई आंदोलन, कोई धरना-प्रदर्शन नहीं हो रहा. सब शायद वर्ल्ड कप खत्म होने तक के लिए टाल दिए गए हैं. वैसे भी धरने प्रदर्शन का क्या है. 100-200 यार जुटे, जलेबी-कचौड़ी खायी और बैठ गए किसी रेल की पटरी पर. ज्यादा उत्साह हुआ तो एक-आध पटरी उखाड़ दी. लेकिन- फुटबॉल वर्ल्ड कप 4 साल में एक बार होता है और भारतीय वक्त की कद्र करना जानते हैं.
फीफा कप का एक फायदा यह भी हुआ है कि चार आखर फुटबॉल के पढ़कर बंदे पंडित हो लिए हैं. जिस शख्स ने जिंदगी में आजतक पेले के अलावा किसी का नाम नहीं सुना था, वो बताता हुआ मिल जाएगा-'यार, कल नेमार ने जैसा हेडर मारा, वो वन ऑफ दे बेस्ट था वर्ल्ड कप का.' कोई कहते हुए मिल जाएगा-'अर्जेंटीना ने जैसा बकवास खेल खेला है, वैसा वर्ल्ड कप हिस्ट्री में कभी नहीं दिखा. अच्छा होता मैराडोना आज भी मैदान में होता.' मतलब फुटबॉल आईक्यू में अचानक ऐसा उछाल हुआ है कि गिनीज बुक वाले जांचे तो भारतीयों के नाम पर वर्ल्ड रिकॉर्ड हो सकता है.
एक फायदा यह हुआ है कि कुछ बच्चे अचानक फुटबॉल खेलने लगे हैं तो फुटबॉल की बिक्री बढ़ गई है. कुछ मां-बाप को अपने बच्चों में नेमार, रोनाल्डो और मेसी दिखने लगा है तो वो उन्हें फुटबॉल कोचिंग सेंटर में भर्ती करा आए हैं. इससे पूर्व खिलाड़ी टाइप के लोगों को कुछ दिन के लिए काम मिल गया है. वैसे,यही मां बाप अभी थोड़े दिन बाद क्रिकेट वर्ल्ड कप के दौरान बच्चों को क्रिकेट कोचिंग कराएंगे और फिर ओलंपिक के वक्त स्विमिंग कोचिंग में यह सोचते हुए दाखिल कराएंगे कि उनके बच्चे में फेल्प्स बनने की पूरी संभावना है. फिर यही मां बाप 12वीं के इम्तिहान में बच्चे से 90 फीसदी अंकों की यह सोचते हुए अपेक्षा करेंगे कि उनका बच्चा रामानुजम से कम तो दिखता नहीं.
वैसे, इसमें कोई शक नहीं कि हम हिन्दुस्तानी महाज्ञानी हैं. लेकिन हमारा ज्ञान आयोजनात्मक ढर्रे के मुताबिक चलता है. मतलब जैसा आयोजन वैसा ज्ञान. हमारे भीतर एक चिप लगी हुई है, जिससे खास आयोजन के वक्त हमारे भीतर का एंटीना वातावरण की तरंगों को पकड़कर खुद ही ज्ञान अर्जित कर लेता है. क्रिकेट से लेकर इकनॉमिक्स और फुटबॉल से लेकर राजनीति तक हर मुद्दे पर बिंदास चर्चा कर सकते हैं. टेलीविजन न्यूज एंकर इस महाज्ञानी समुदाय के प्रणेता हैं. आज हर शख्स इतना ज्यादा 'रायजादा' है कि वो एक्सपर्ट को भी राय देता है. पानी की गुमटी चलाने वाला विराट कोहली को समझा सकता है कि उसे सीधे बल्ले से क्यों खेलना चाहिए और परचून की दुकान वाला प्रधानमंत्री मोदी की यह कहते हुए आलोचना कर सकता है कि उनकी विदेशी नीति पूरी तरह फेल है और उन्हें क्यों अमेरिका से 'टू प्लस टू' वार्ता नहीं करनी चाहिए.
लेकिन अभी देश का ध्यान फुटबॉल पर है तो ज्ञान फुटबॉल का बढ़ा हुआ है. जल्द चुनाव आने हैं. और फिर देखिएगा देश में कितने पॉलिटिकल पंडित पैदा होते हैं. यह धरा महाज्ञानियों की है. गूगल को भी चाहिए कि वो हमें नमन करे.
(नोट- उपरोक्त दिए गए विचार व आंकड़े लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. ये जरूरी नहीं कि एबीपी न्यूज ग्रुप सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है.)