सामाजिक व्यवस्था में जाति की अनदेखी नहीं की जा सकती और कुछ हद तक राजनीति में भी इसे नकारा नहीं जा सकता. किंतु, बड़ा सवाल यह है कि क्या शासन को भी जाति के चश्मे से देखा जाना चाहिए? उत्तर प्रदेश जैसे विशाल और विविध सामाजिक संरचना वाले प्रदेश में यह शासन की प्राथमिकता तय करने वाला प्रश्न है, जिसके जवाब में 2017 के पहले और बाद की शासन शैली का सम्यक विवेचन किया जाना जरूरी है. 

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यह दोनों शासनकाल इसलिए कि इनके बीच की रेखा बिलकुल स्पष्ट है. एक तरफ सपा के अध्यक्ष अखिलेश यादव की वह राजनीति है, जिसने जातीय अस्मिता को सत्ता-संचालन का केंद्रीय आधार बनाया और दूसरी तरफ योगी सरकार का वह मॉडल है, जो कानून का राज स्थापित करने के साथ ही सरकारी योजनाओं के दरवाजे सभी के लिए खोलता है. जहां हर नागरिक के लिए शासन सत्ता के पास समान दृष्टि है.

उत्तर प्रदेश में अलग-अलग जातियों, समुदायों और क्षेत्रों में करोड़ों लोग रहते हैं. ऐसे प्रदेश में सरकार की सफलता इस बात से नहीं आंकी जा सकती कि किस जाति को कितना राजनीतिक प्रतिनिधित्व मिला. असली सवाल यह है कि कानून के सामने नागरिक की पहचान क्या है, अवसर के दरवाजे पर उसकी पात्रता क्या है और विकास की यात्रा में उसके हिस्से की जगह कितनी है? 

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अखिलेश यादव के नेतृत्व वाली सरकार को देखें तो उसमें जाति, धर्म और वोटों के गणित का पैटर्न साफ दिखाई देता है. पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक के नाम पर राजनीति के सहारे समावेशी विकास की कल्पना नहीं की सकती. नौकरी, पुलिस पोस्टिंग, आरक्षण और यहां तक कि कानून-व्यवस्था के मामलों को भी जातीय चश्मे से देखा-दिखाया गया.

जब हर मुद्दे को बार-बार जातीय अस्मिता के फ्रेम में रखा जाता है, तो समाज में विभाजन और अविश्वास की खाई और गहरी होती जाती है. इस साल की घटनाओं को ही देखा जाए तो प्रयागराज में पवन कुमार यादव, रायबरेली के शशिधर यादव, जौनपुर में ललई यादव हत्याकांड या फिर 2023 में सौरभ यादव या फिर पुलिस हिरासत में धर्मपाल यादव की मौत के मामलों को ही सपा प्रमुख ने क्यों उठाया? क्यों अल्पसंख्यकों से जुड़े मामले ही उनकी प्राथमिकता में रहे? इससे यह धारणा मजबूत होती है कि प्रशासनिक और कानूनी मसलों में भी समुदाय-विशेष का पक्ष लिया जा रहा है. इस संदर्भ में 2014 में अखबारों में प्रकाशित एक रिपोर्ट का हवाला भी प्रासंगिक है जिसमें बदायूं, कानपुर, कन्नौज, फर्रुखाबाद और इटावा जैसे जिलों में थाना-प्रभारियों की नियुक्ति में एक जाति विशेष को वरीयता देने की बात कही गई थी.

- प्रो. तेज प्रताप सिंह, विभागाध्यक्ष, राजनीति विज्ञान, सामाजिक विज्ञान संकाय, बनारस हिंदू विश्वविद्यालय

[नोट- उपरोक्त दिए गए विचार लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. यह ज़रूरी नहीं है कि एबीपी न्यूज़ ग्रुप इससे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही ज़िम्मेदार है.]