भारतीय संविधान हमें एक साफ और स्वस्थ पर्यावरण में जीने का अधिकार देता है और यह सरकार की जिम्मेदारी है कि वह पर्यावरण की रक्षा करे. इसके बावजूद, देश भर में हवा की खराब स्थिति किसी से छिपी नहीं है. जब हम मुंबई की बात करते हैं, तो हमें समझना होगा कि मुंबई MMR (मुंबई महानगरीय क्षेत्र) का हिस्सा है. यह 6,300 वर्ग किलोमीटर में फैला एक घनी आबादी वाला इलाका है, जिसमें ठाणे, नवी मुंबई, रायगढ़, कल्याण-डोंबिवली और वसई-विरार जैसे क्षेत्र शामिल हैं.

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इस पूरे इलाके में उद्योगों का धुआं, गाड़ियों का प्रदूषण, निर्माण कार्य (कन्स्ट्रक्शन) की धूल और समुद्र से आने-जाने वाली हवाएं मिलकर प्रदूषण का एक जटिल चक्र बनाती हैं. IIT बॉम्बे के अनुमान बताते हैं कि मुंबई में मिलने वाले बारीक प्रदूषण कणों (PM2.5) का लगभग आधा हिस्सा (50%) खुद मुंबई के बाहर से (पड़ोसी शहरों से) आता है.

मुंबई नहीं, पूरा MMR है एक 'एयरशेड'

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महाराष्ट्र प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (MPCB) भी अब पूरे MMR को एक ही पर्यावरण सिस्टम मानने लगा है (जैसे हाल ही में ठाणे और नवी मुंबई के कंक्रीट प्लांटों पर कार्रवाई की गई). लेकिन मीडिया, रिपोर्टिंग सिस्टम और सरकारी एजेंसियां अभी भी मुंबई को एक अलग शहर मानकर काम करती हैं. जब तक हम समस्या के इस असली दायरे को नहीं पहचानेंगे, इसका समाधान नहीं हो सकता.

पर्यावरण संरक्षण अधिनियम (1986) और वायु प्रदूषण नियंत्रण अधिनियम (1981) के तहत सरकारों के पास प्रदूषण पर नजर रखने और कार्रवाई करने के पूरे अधिकार हैं. साल 2024 में महाराष्ट्र में 167 मॉनिटरिंग स्टेशन थे, जिनमें 69 रियल-टाइम (तुरंत आंकड़े देने वाले) स्टेशन शामिल थे. लेकिन पूरे MMR में ये स्टेशन समान रूप से नहीं फैले हैं. कई घनी आबादी वाले इलाकों में सिर्फ एक ही स्टेशन है.

बीएमसी (BMC), एमपीसीबी (MPCB), सीपीसीबी (CPCB), सफर (SAFAR) और कई प्राइवेट एजेंसियां हवा की गुणवत्ता नापती तो हैं, लेकिन सबके तरीके, मशीनें और रिपोर्टिंग सिस्टम अलग-अलग हैं. इन आंकड़ों को एक जगह मिलाने वाला कोई साझा प्लेटफॉर्म नहीं है.अध्ययनों में पाया गया है कि इन मॉनिटरिंग स्टेशनों में मशीनों की खराबी, गलत रीडिंग, यूनिट्स (इकाइयों) की विसंगति और स्टेशनों को गलत जगहों पर लगाने जैसी गंभीर कमियां हैं.

'डेटा स्पाइन' (एकीकृत डेटा सिस्टम) की जरूरत

ऐसा मानना है कि पूरे MMR क्षेत्र के लिए एक 'डेटा स्पाइन' (Data Spine) यानी एक ऐसा डिजिटल ढांचा होना चाहिए, जो सभी सरकारी और निजी एजेंसियों के आंकड़ों को एक जगह इकट्ठा करे और उन्हें एक समान मानक पर परखे. इस सिस्टम में बड़ी सरकारी मशीनों के साथ-साथ कम लागत वाले सेंसर, सैटेलाइट और मोबाइल सेंसरों को एक साथ जोड़ा जाना चाहिए. इससे जनता को लाइव और सटीक जानकारी मिल सकेगी. कोर्ट के फैसले (जैसे वेल्लोर सिटीजंस मामला और बॉम्बे हाईकोर्ट में 2023 की जनहित याचिका) भी इसी तरह की कानूनी और प्रशासनिक कार्रवाई का समर्थन करते हैं.

बजट और तकनीक का फायदा 

अगर हम केवल महंगी और बड़ी सरकारी मशीनें लगाने के बजाय, उनके साथ छोटे और कम लागत वाले आधुनिक सेंसर्स का इस्तेमाल करें, तो बहुत कम खर्चे में पूरे शहर की हवा पर नजर रखी जा सकती है. IIT कानपुर ने मुंबई में ऐसा ही एक प्रयोग किया था, जिसने पारंपरिक व्यवस्था के मुकाबले बेहद कम खर्च में मुंबई के 1,200 से ज्यादा पॉइंट्स से हवा के सटीक आंकड़े जुटाकर दिखाए थे. लेकिन इस प्रोजेक्ट को कभी बड़े पैमाने पर लागू नहीं किया गया.

यानी, आज के समय में मुंबई और इसके आस-पास के इलाकों में हवा का संकट तकनीक या कानून की कमी के कारण नहीं है, बल्कि आंकड़ों के सही प्रबंधन (Data Governance) न होने के कारण है. हमारे पास कानून भी है और तकनीक भी, बस कमी है तो एक ऐसे 'एकीकृत ढांचे' की जो पूरे MMR को एक इकाई माने.

साल के इस समय (गर्मी और मानसून के दौरान) हवा साफ रहती है, इसलिए लोग इस समस्या को भूल जाते हैं. लेकिन ध्यान बनाए रखने का यही सबसे सही समय है, क्योंकि जैसे ही मौसम ठंडा होगा, प्रदूषण फिर लौट आएगा. हमें प्रशासन पर लगातार दबाव बनाए रखना होगा ताकि हम स्वच्छ हवा के अपने मौलिक अधिकार का आनंद ले सकें.

[नोट- उपरोक्त दिए गए विचार लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. यह ज़रूरी नहीं है कि एबीपी न्यूज़ ग्रुप इससे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही ज़िम्मेदार है.]