<?xml version="1.0" encoding="UTF-8"?><rss version="2.0" xmlns:content="http://purl.org/rss/1.0/modules/content/" xmlns:wfw="http://wellformedweb.org/CommentAPI/" xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/" xmlns:atom="http://www.w3.org/2005/Atom" xmlns:sy="http://purl.org/rss/1.0/modules/syndication/" xmlns:slash="http://purl.org/rss/1.0/modules/slash/" xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/"><channel><title>गंगा एक्सप्रेसवे: आलू से आंवला तक...यूपी के वन ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था का संकल्प पथ</title><atom:link href="https://www.abplive.com/blog/feed" rel="self" type="application/rss+xml"/><link>https://www.abplive.com/</link><description/><lastBuildDate>Thu, 14 May 2026 19:00:40 +0530</lastBuildDate><language>en-US</language><sy:updatePeriod>hourly</sy:updatePeriod><sy:updateFrequency>1</sy:updateFrequency><generator>https://www.abplive.com</generator><item><title><![CDATA[वित्तीय अनुशासन के रोल मॉडल बने योगी]]></title><link>https://www.abplive.com/blog/up-cm-yogi-adityanath-orders-virtual-meetings-work-from-home-increase-png-metro-public-transport-use-amid-petrol-diesel-crisis-due-to-middle-east-situation-3129752</link><comments>https://www.abplive.com/blog/up-cm-yogi-adityanath-orders-virtual-meetings-work-from-home-increase-png-metro-public-transport-use-amid-petrol-diesel-crisis-due-to-middle-east-situation-3129752#respond</comments><pubDate>Thu, 14 May 2026 14:50:28 +0530 </pubDate><dc:creator><![CDATA[ डॉ .शिरीष मिश्र ]]></dc:creator><category><![CDATA[ इंडिया ]]></category><guid isPermaLink="true">https://www.abplive.com/blog/up-cm-yogi-adityanath-orders-virtual-meetings-work-from-home-increase-png-metro-public-transport-use-amid-petrol-diesel-crisis-due-to-middle-east-situation-3129752</guid><description><![CDATA[&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;संकट केवल आर्थिक मंदी या राजस्व की कमी तक सीमित नहीं होता. संकट का अर्थ होता है, संसाधनों पर बढ़ता दबाव, जनसंख्या की बढ़ती जरूरतें, अवसंरचना पर अतिरिक्त भार और वैश्विक परिस्थितियों का अनिश्चित होना. ऐसे समय में शासन के सामने सबसे बड़ी परीक्षा उसकी नीतियों की नहीं, बल्कि उसके संयम की होती है. क्योंकि जब संसाधन सीमित हों और अपेक्षाएं असीमित, तब संतुलन ही सुशासन का सबसे बड़ा प्रमाण बन जाता है. संसाधनों के विवेकपूर्ण उपयोग का कोई विकल्प नहीं है. किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में सरकार केवल नीतियां नहीं बनाती, वह एक उदाहरण भी प्रस्तुत करती है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;जब शीर्ष नेतृत्व स्वयं अपने आचरण में मितव्ययिता दिखाता है, तो उसका प्रभाव प्रशासनिक संरचना से लेकर आम नागरिक के व्यवहार तक फैलता है. मिडिल ईस्ट में लंबे समय से जारी युद्ध से उपजे वर्तमान वैश्विक संकट को देखते हुए प्रधानमंत्री &lt;a title=&quot;नरेंद्र मोदी&quot; href=&quot;https://www.abplive.com/topic/narendra-modi&quot; data-type=&quot;interlinkingkeywords&quot;&gt;नरेंद्र मोदी&lt;/a&gt; की प्रेरणा से मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने सरकारी फ्लीट में कटौती, अनावश्यक यात्राओं पर नियंत्रण और डिजिटल माध्यमों के अधिकतम उपयोग जैसे कदम उठाने का निर्णय लेकर वित्तीय अनुशासन का ऐसा उदाहरण सामने रखा है जो अन्य राज्यों के लिए अनुकरणीय उदाहरण बनेगा. ऐसे निर्णय केवल तकनीकी या प्रशासनिक सुधार नहीं रहते, बल्कि एक सांस्कृतिक संदेश बन जाते हैं कि राज्य स्वयं संयम का पालन कर रहा है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;एक नई कार्यसंस्कृति का जन्म&amp;nbsp;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;जनता की गाढ़ी कमाई से संचित राजकोष का एक-एक पैसा सार्वजनिक धरोहर है. आज जब मध्य-पूर्व में जारी संघर्ष के चलते विश्व अर्थव्यवस्था की धीमी होती रफ्तार और महंगाई राज्य सरकारों के सामने संसाधनों की तंगी एक वास्तविक चुनौती बन चुकी है, तब सरकारी खर्चों में कटौती महज एक प्रशासनिक निर्णय नहीं, बल्कि एक गहरी नैतिक जिम्मेदारी है. उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री समेत मंत्रियों के फ्लीट में 50 प्रतिशत की कटौती, वर्क फ्रॉम होम की संस्कृति को प्रोत्साहन देना, स्वर्ण की अनावश्यक खरीद को हतोत्साहित करना, पीएनजी, मेट्रो और सार्वजनिक परिवहन के उपयोग पर जोर देना और सरकारी बैठकों, सम्मेलनों और सेमिनारों को वर्चुअल माध्यम से आयोजित करने की पहल इस नैतिक दृष्टिकोण की परिचायक है. यह केवल धन बचाने की कवायद नहीं है, यह एक नई कार्यसंस्कृति भी है. जब मुख्यमंत्री की अपनी कॉन्फ्रेंस वर्चुअली होती है, तो हर अधिकारी और कर्मचारी को स्वयं ही समझ आ जाता है कि आज का युग डिजिटल है और इस युग में यात्राओं, आयोजनों और दिखावे पर होने वाले खर्च को न्यूनतम करना न केवल संभव है, बल्कि आवश्यक भी है. प्रौद्योगिकी का यह सदुपयोग एक साथ कई उद्देश्य साधता है, समय और संसाधनों की बचत और पर्यावरण पर पड़ने वाले दबाव में कमी.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;जन-विश्वास ही असली ताकत&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;यह सोचना भूल होगी कि ये उपाय केवल आर्थिक हैं. इनका एक गहरा सामाजिक और मनोवैज्ञानिक आयाम भी है. जब आम नागरिक देखता है कि उसका मुखिया सार्वजनिक परिवहन की बात करता है, तो वह अपनी रोजमर्रा की कठिनाइयों को अलग नजर से देखने लगता है. जब वह जानता है कि शासन की बागडोर संभाले हाथ भी उन्हीं सिद्धांतों पर चलते हैं जो आम जन से अपेक्षित हैं, तो उसके मन में सरकार के प्रति एक विश्वास जागता है. वह विश्वास जो लोकतंत्र की असली ताकत है. मितव्ययिता जब ऊपर से शुरू होती है, तो वह नीचे तक स्वाभाविक रूप से उतरती है. थोपी हुई किफायत और स्वेच्छा से अपनाई गई किफायत में यही अंतर होता है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;गहरा व्यावहारिक प्रभाव&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;संकट के समय समाज और शासन दोनों की परीक्षा होती है. इतिहास के पन्नों को पलटें तो पाएंगे कि जिन राष्ट्रों ने विपरीत परिस्थितियों में धैर्य, संयम और सामूहिक अनुशासन का परिचय दिया, वे ही दीर्घकाल में समृद्ध और सशक्त बने. जापान की उबरने की कहानी हो, या सिंगापुर के उत्थान की गाथा, इन सबके मूल में एक साझा सूत्र है. संकट में सरकार ने पहले खुद को कसा, फिर जनता से अपेक्षा की. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की ओर से लिए गए निर्णय उसी परंपरा की एक धारा हैं. मुख्यमंत्री ने जो किया, उसका व्यावहारिक प्रभाव गहरा है. पचास प्रतिशत वाहनों की कटौती से जो धनराशि बचेगी, वह किसी गरीब बच्चे की शिक्षा में, किसी गांव की सड़क में, किसी अस्पताल की दवा में काम आ सकती है. वर्चुअल बैठकों से जो समय और धन बचेगा, वह नीति-निर्माण और क्रियान्वयन में लगाया जा सकता है. यह केवल कटौती नहीं है, यह प्राथमिकताओं का पुनर्निर्धारण है. कोविड काल में उत्तर प्रदेश ने धैर्यपूर्वक अपनी प्राथमिकताओं का पालन किया है और इसमें कोई दो राय नहीं कि राज्य अब भी यह कर सकता है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;अब प्रशासनिक तंत्र की जिम्मेदारी&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;आज जब युवा पीढ़ी अपने नेताओं में आदर्श ढूंढती है, जब जनता पारदर्शिता और जवाबदेही की मांग करती है, तब इस तरह के निर्णय एक सकारात्मक संदेश देते हैं. यह साबित होता है कि राजनीति में भी आत्म-अनुशासन संभव है. वित्तीय संकट में एक जिम्मेदार शासन वही करता है जो एक जिम्मेदार परिवार करता है, पहले खर्च घटाओ, फिर आय बढ़ाने के उपाय सोचो. हालांकि यह भी एक कड़वा सत्य है कि मुख्यमंत्री के निर्णयों की सफलता अब इस बात पर निर्भर करेगी कि यह भावना पूरे प्रशासनिक तंत्र में कितनी गहराई से उतरती है. मंत्री से लेकर क्लर्क तक, सचिवालय से लेकर तहसील तक, यदि मितव्ययिता का यह संकल्प एक जन-आंदोलन का रूप ले, तो इसके परिणाम केवल राजकोषीय नहीं, सामाजिक भी होंगे. ऐसा राज्य न केवल आर्थिक रूप से सुदृढ़ होगा, बल्कि नागरिकों का विश्वास भी अर्जित करेगा.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;मितव्ययिता एक दर्शन&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि मितव्ययिता का यह निर्णय केवल एक प्रशासनिक उपाय नहीं है, यह एक दर्शन है, एक संस्कार है. संकट में संयम, विपत्ति में विवेक और सीमित संसाधनों में असीमित सेवा का संकल्प.... यही वह धरातल है जिस पर विश्वसनीय शासन खड़ा होता है. जब जनता देखती है कि उसका नेता कड़े फैसले पहले खुद पर लागू करता है फिर दूसरों से अपेक्षा करता &amp;nbsp;है, तो वह स्वयं भी उस यात्रा का हिस्सा बनने को तैयार हो जाती है. यही लोकतंत्र की असली शक्ति है और यही आज के समय की सबसे बड़ी जरूरत भी. एक पुरानी कहावत है कि जो नाव अपने भार को समझती है, वही तूफान में भी स्थिर रहती है. राज्य भी एक विशाल प्रणाली है और उसका स्थायित्व उसके संतुलन पर निर्भर करता है. यदि खर्च अनियंत्रित हो जाए, तो वह प्रणाली पर बोझ बन जाता है, लेकिन यदि उसे नियंत्रित और उद्देश्यपूर्ण बनाया जाए, तो वही विकास का आधार बनता है और मुख्यमंत्री &lt;a title=&quot;योगी आदित्यनाथ&quot; href=&quot;https://www.abplive.com/topic/yogi-adityanath&quot; data-type=&quot;interlinkingkeywords&quot;&gt;योगी आदित्यनाथ&lt;/a&gt; यही करने का प्रयास कर रहे हैं.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;नोट - (ये लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. ये जरूरी नहीं कि एबीपी न्यूज ग्रुप इससे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है)&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;]]></description><slash:comments>0</slash:comments><media:thumbnail url="https://feeds.abplive.com/onecms/images/uploaded-images/2026/05/14/70f20885b19d8d4a79ef94a6df3cdaf11778749093172628_original.jpg" width="220"/></item><item><title><![CDATA[जिला कारागार देहरादून में जब सुनाई दी प्रेमचंद की ईदगाह, जुड़ गया तिनका जेल पाठशाला का नया अध्याय]]></title><link>https://www.abplive.com/blog/jila-jail-dehradun-tinka-tinka-foundation-organise-program-for-prisoners-premchand-ki-idgah-3129477</link><comments>https://www.abplive.com/blog/jila-jail-dehradun-tinka-tinka-foundation-organise-program-for-prisoners-premchand-ki-idgah-3129477#respond</comments><pubDate>Wed, 13 May 2026 21:53:24 +0530 </pubDate><dc:creator><![CDATA[ डॉ. वर्तिका नन्दा ]]></dc:creator><category><![CDATA[  ]]></category><guid isPermaLink="true">https://www.abplive.com/blog/jila-jail-dehradun-tinka-tinka-foundation-organise-program-for-prisoners-premchand-ki-idgah-3129477</guid><description><![CDATA[&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-weight: 400;&quot;&gt;जिला जेल, देहरादून की महिला बैरक से 13 मई यानी बुधवार को महक और दीपिका को एक खास वजह से जेल रेडियो के रूम में बुलाया गया. इस जेल में निरुद्ध दीपिका आजीवन कारावास पर है जबकि महक विचाराधीन बंदिनी है. इन दोनों को यहां बुलाए जाने की वजह है- जेल के रेडियो पर शुरू होने वाला एक नया कार्यक्रम. यह दोनों बंदिनियां पिछले कई दिनों से जेल के रेडियो के साथ जुड़ी हैं. इन दोनों का चयन इस जेल रेडियो के नए कार्यक्रम- जेल में साहित्य के लिए किया गया है.&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;महिला बंदिनियों के लिए विशेष व्यवस्था&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-weight: 400;&quot;&gt;इस जेल में&amp;nbsp; महिला बंदिनियों की क्षमता 40 है. अमूमन यहां 50 के आस-पास बंदिनियां रहती हैं. दून जेल रेडियो की शुरुआत 2021 में तिनका तिनका फाउंडेशन और जिला जेल देहरादून ने मिलकर की थी. तब महिलाओं के लिए इस रेडियो पर कार्यक्रम प्रस्तुत कर पाना संभव नहीं था लेकिन बाद में जेल प्रशासन ने इसकी व्यवस्था भी कर दी. एक रिकॉर्डर का इंतजाम हुआ ताकि वे अपने कार्यक्रमों को रिकॉर्ड करके पुरुष सेक्शन तक भेज सकें जहाँ पर जेल का रेडियो स्थापित है.&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;जेल में साहित्य&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-weight: 400;&quot;&gt;अब एक नए बदलाव के तहत वे जेल के साहित्यिक कार्यक्रमों पर काम करेंगी. इस बात की घोषणा&amp;nbsp; उत्तराखंड जेल के उप महानिरीक्षक दधी राम मौर्य, जेलर पवन कोठारी और प्रोफेसर वर्तिका नंदा, संस्थापक तिनका तिनका फाउंडेशन ने की. यह भारत में एक नई तरह की पहल है.&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;कार्यक्रम का मकसद और तिनका जेल पाठशाला&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-weight: 400;&quot;&gt;इस पहल का मकसद है-बंदियों को साहित्य और समाज से अवगत कराना, उनके खाली समय में सार्थकता भरना और उन्हें लेखन और पाठन के लिए प्रोत्साहित करना. 1947 से 1980 का कालखंड हिंदी साहित्य के लिए बेहद समृद्ध रहा है. इस दौरान 'नई कहानी', 'नई कविता' और 'प्रगतिशील' आंदोलनों ने हिंदी साहित्य को नई दिशा दी. इस दौर में लेखकों&amp;nbsp; ने अपनी लेखनी से समाज, रिश्तों और स्त्री चेतना को गहराई और संवेदना से उकेरा. इस साहित्य के वाचन के जरिए जेल का वातावरण बेहतर बनाने की कोशिश की जाएगी.&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-weight: 400;&quot;&gt;इस कार्यक्रम का प्रसारण हर रोज 5 मिनट के लिए किया जाएगा. इनमें भारतेंदु हरिश्चंद्र,&amp;nbsp; प्रेमचंद,धर्मवीर भारती, राही मासूम रजा, निर्मल वर्मा, जैनेंद्र कुमार, अज्ञेय, फणीश्वर नाथ 'रेणु&amp;rsquo;, मोहन राकेश, हरिशंकर परसाई आदि लेखकों और कृष्णा सोबती, शिवानी, मन्नू भंडारी जैसी लेखिकाओं की कृतियों का वाचन होगा. शुरुआती दिनों में यह वाचन दीपिका औऱ महक करेंगी.&amp;nbsp; इस कड़ी में पहली कहानी है- प्रेमचंद की कहानी- ईदगाह.&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;जेल से रिहा एक नेत्रहीन बंदी करेंगे कहानियों का संपादन&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-weight: 400;&quot;&gt;मैंने 2021 में&amp;nbsp; (प्रोफेसर वर्तिका नंदा, संस्थापक, तिनका तिनका फाउंडेशन) इस जेल रेडियो की परिकल्पना की थी. श्री दधी राम मौर्य, उप महानिरीक्षक, श्री पवन कोठारी, जेलर और के सहयोग से जेल रेडियो साकार रूप ले सका. तब 14 बंदियों का रेडियो जॉकी के तौर पर चयन किया गया था जिनकी अगुवाई डॉ. सुचित नारंग ने की थी. वे एक नेत्रहीन बंदी हैं और जेल में आने से पहले संगीत के शिक्षक थे. उनके साथ अरुण और रोहित ने जेल रेडियो की कमान संभाली. आज डॉ. सुचित नारंग जेल से रिहा हो गए हैं, लेकिन जेल रेडियो के लिए उनका सहयोग बरकरार है. वही इस कथावाचन का संपादन करेंगे. उन्होंने 2023 में जेल रेडियो के सिग्नेचर ट्यून को बनाया था.&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;जेल रेडियो का प्रभाव&amp;nbsp;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-weight: 400;&quot;&gt;रेडियो की वजह से जेल के वातावरण में साफ तौर पर बहुत बदलाव आया है. शुरुआत में जेल का रेडियो सिर्फ पुरुष बंदियों तक सीमित था लेकिन धीरे-धीरे इसकी पहुँच महिला बंदिनियों तक की गई. जेल प्रशासन मानता है कि रेडियो ने जेल के माहौल में जबरदस्त सकारात्मकता भर दी है.&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;जेल रेडियो की कुछ उपलब्धियां&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-weight: 400;&quot;&gt;दून जेल रेडियो अपनी शुरुआत से ही बंदियों के लिए संवाद और भावनात्मक सुकून का जरिया बन रहा है.&amp;nbsp; अप्रैल में उत्तराखंड लीगल अथॉरिटी और नालसा ने मिलकर देहरादून में एक क्षेत्रीय कान्फ्रेंस का आयोजन किया था. उसका उद्घाटन भारत के मुख्य न्यायाधीश श्री सूर्यकांत&amp;nbsp; ने किया था. इस कॉन्फ्रेंस में वर्तिका नंदा ने उत्तराखंड की जेल में लाए गए रेडियो की यात्रा को उत्तर भारत के न्यायाधीशों के सामने प्रस्तुत किया था.&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;तिनका रिसर्च सेल करेगा शोध&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-weight: 400;&quot;&gt;2021 में तिनका तिनका रिसर्च सेल की स्थापना हुई थी. इस दौरान उत्तराखंड की देहरादून जेल रेडियो पर भी कई तरह के शोध किए गए जिससे जेल में संगीत की जरूरतों का भी आकलन किया गया.&amp;nbsp; 13 मई, 2023 को जिला जेल, देहरादून और तिनका तिनका के बीच तीन करार किए गए थे जिनका मकसद इस जेल को एक मॉडल जेल के तौर पर स्थापित करना है. 2024 में नेशनल&amp;nbsp; बुक ट्रस्ट से आई किताब रेडियो इन प्रिजन&amp;nbsp; में भी इस जेल का विशेष उल्लेख किया गया है. इसी तरह 2023 में स्पेन और 2022 में नार्वे में हुई अंतर्राष्ट्रीय कान्फ्रेंस में भी दून जेल रेडियो का विशेष जिक्र किया गया था.&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-weight: 400;&quot;&gt;[ये लेखक के निजी विचार है]&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;]]></description><slash:comments>0</slash:comments><media:thumbnail url="https://feeds.abplive.com/onecms/images/uploaded-images/2026/05/13/f9cdf9de8ef39921d2e915032b79281d1778689232576120_original.png" width="220"/></item><item><title><![CDATA[सत्ता का सेज और विचारों की विरासत की टूटी खाट के बीच खड़ी पार्टियां]]></title><link>https://www.abplive.com/blog/tamil-nadu-politics-how-dmk-and-aiadmk-corner-opines-anil-chamadia-3129309</link><comments>https://www.abplive.com/blog/tamil-nadu-politics-how-dmk-and-aiadmk-corner-opines-anil-chamadia-3129309#respond</comments><pubDate>Wed, 13 May 2026 16:14:14 +0530 </pubDate><dc:creator><![CDATA[ अनिल चमड़िया ]]></dc:creator><category><![CDATA[  ]]></category><guid isPermaLink="true">https://www.abplive.com/blog/tamil-nadu-politics-how-dmk-and-aiadmk-corner-opines-anil-chamadia-3129309</guid><description><![CDATA[&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;भारत के इतिहास में सत्ता में नेतृत्व परिवर्तन का रास्ता लोगों के संगठित आंदोलनों के बीच से निकलता है. 1947 में भारत के लोगों के संगठित आंदोलनों ने ब्रिटिश सत्ता को बेदखल किया. इसके बाद कॉग्रेस के नेतृत्व के खिलाफ पूरे देश में &amp;nbsp;सत्ता से बेदखली के लिए आंदोलनों के नतीजे 1967 में सामने आए. नौ राज्यों में संविद सरकारें बनी. इसी क्रम में तमिलनाडु के समाज में भी एक निर्णायक राजनीतिक मोड़ आया जब ऐतहासिक द्रविड़ आंदोलन की विरासत की जमीन पर तैयार नेताओं ने सत्ता अपने हाथों में ली. द्रमुक के नेता अन्नादुराई ने 1949 में द्रविण महासंघ के विभाजन के बाद अस्तित्व में आया था. 1972 में फिर द्रमुक में विभाजन हो गया और लोकप्रिय फिल्म स्टार एम के रामचंद्रन ने अन्नाद्रमुक का गठन किया.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;फिल्म के जरिये लोकप्रिय होने वाले एम करुणानिधि के नेत़ृत्व में एक तरफ डीएमके और दूसरी तरफ रामचंद्रन के नेतृत्व में अन्नाद्रमुक के बीच संसदीय सत्ता सिमट गई. लेकिन 2026 में 234 सदस्यों वाली तमिलनाडु विधानसभा &amp;nbsp; में दोनों ही द्रविण पार्टियां सत्ता के आपसी खेल से बाहर हो गई.1980 के बाद संसदीय राजनीति के चरित्र में एक बड़ा बदलाव आने के संकेत मिलने लगे. एक बड़ा बदलाव यह आया कि पार्टियां व्यक्ति केन्द्रित हो गई.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;परिवारवाद से निकल रही संसदीय राजनीति&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;संसदीय राजनीति में पार्टियों का नेतृत्व परिवार से निकलने लगा. तमिलनाडु में भी द्रमुक परिवार में सिमटती गई. एम करूणानिधि ने पुत्र एम के स्टालीन को सत्ता सौप दी. लेकिन देश में जिस तरह की राजनीतिक संस्कृति विकसित हो रही थी, उसका यह एक उदाहरण भर था. पूरे देश में पार्टियों के जिस नेतृत्व के परिवार थे उन्होने परिवार को अपना राजनीतिक विरासत सौपने के इर्द गिर्द सत्ता समीकरण बनाने पर जोर लगा दिया. जिस नेतृत्व के परिवार की अगली पीढ़ी नहीं थी, उनका संकट ज्यादा गहरा हो गया. तमिलनाडु की अन्नाद्रमुक उनमे एक है. एम जी रामचंन्द्रन की विरासत उनकी एक अभिन्न मित्र और फिल्म स्टार के रुप में सहयोगी जयललिता के पास आ गई. जयललिता भी शादी शुदा नहीं थी.लिहाजा परिवार को राजनीतिक विरासत सौपने का एक संकट यहां मौजूद रहा &amp;nbsp;और यह पार्टी व्यक्तियों के महत्वकांक्षाओं के दबाव में बिखरती रही.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;आंदोलनों का उद्देश्य सामाजिक परिवर्तन में निहित होता है. यानी एक सामूहिक चेतना का निर्माण आंदोलन करती है. सामूहिक चेतना का मतलब इस तरह की सोच कि मिल जूलकर किस तरह का समाज तैयार करना है. जिस तरह के लोग मिलते जुलते है और अपने तरीके का समाज बनाने के लिए संगठित होते हैं, उस विचार को &amp;nbsp;वामपंथ, दक्षिण पंथ व अन्य रुपों में परिभाषित किया जाता है. &amp;nbsp; &amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;सामूहिक चेतना के आधार पर बने संगठन, सत्ता और सत्ता को चलाने वाले पर दबाव बनाते है. लेकिन सत्ता का उद्देश्य सामाजिक परिवर्तन में निहित नहीं होता है बल्कि अपने वजूद के पक्ष में सामाजिक समीकरणों और स्थितियों को संतुलित करना होता है. वह संसाधनों के मामले में ज्यादा संगठित-शक्तिशाली तो होती ही है. उसकी बनाई गई संस्थाएं उनके बीच भी जिंदा रहती है जो कि किसी आंदोलनो से नये समाज का निर्माण करने के लिए आगे बढ़ती है. &amp;nbsp; &amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;आंदोलनों के जरिए आ रहे बदलाव&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;संसदीय राजनीति में 1980 के बाद से आंदोलनों के जरिये सामाजिक बदलाव के विचार पर जोर देने की सोच कम से कम हो गई और सत्ता को ही समाज में सुधार के मुख्य औजार के रुप में देखने और उसे इस्तेमाल करने की संस्कृति विकसित हो गई. नई आर्थिक नीतियों ने सत्ता को विनियोग के एक सहयोगी उद्योग के रुप में भी विकसित कर लिया. राजनीतिक पार्टियों का जोर सत्ता के लिए समीकरणों पर ज्यादा रहा. इसका उदाहरण तमिलानाडु में सामाजिक न्याय के आंदोलन की विरासत पर द्रमुक पार्टियां बनी लेकिन उनका सत्ता समीकरण उनके साथ भी समय समय पर हुआ जो कि सामाजिक न्याय की उस अवधारणा के खिलाफ थी जिस पर रामास्वामी पेरियार ने आंदोलन की जमीन तैयार की थी.&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;इस तरह उन पार्टियों में तो एक दबाव बनाने की स्थिति रही जिसमे नेतृत्व की अवधारणा भले ही परिवारों तक सीमित हो गई हो लेकिन उस नेतृत्व ने किसी वर्ग, जाति &amp;ndash;समीकरणों या जाति विशेष के समूहों के नेतृत्व के रुप में खुद को तैयार करने में फौरी कामयाबी हासिल कर ली. उदाहरण स्वरुप द्रमुक में 2026 के चुनाव नतीजों के बजाय विखराव नहीं हुआ लेकिन अम्मा द्रमुक में फिर से सत्ता के लिए &amp;nbsp;विभाजन की घटना देखने को मिली है. &amp;nbsp;इसकी मुख्य वजह यही है कि उसके नेतृत्व के पास पारिवारिक विरासत भी नहीं है और ना ही कोई &amp;lsquo; लोकप्रियता &amp;rsquo; का ब्रांड. भले ही वह अपने आपको को समाजवादी और धर्म निरपेक्षता की &amp;nbsp;विचारधारा का वाहक होने का दावा करती हो लेकिन वह उसकी सुविधा का हिस्सा ज्यादा है. विरासत की टूटी फूटी खाट पर उसका जीवन आश्रित है. जब कभी राज्य के राजनीतिक हालात ऐसे बन जाते हैं जिसमे उन्हें चुनावी गणित में नंबर हासिल करने की गुंजाइश होती है. वे अपनी राजनीतिक विरासत की सक्रियता के आधार पर संगठित करने के प्रयासों के नतीजे नहीं माने जा सकते हैं.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;संसदीय पार्टियों में नेतृत्व क्षमता सत्ता के नेतृत्व की क्षमताओं के आगे कभी भी अपने असली रुप में सामने आ जाती है जब सत्ता को उसे चुनौती देने की जरुरत महसूस हो. तमिलनाडु भी उसका एक उदाहरण है लेकिन यह कोई नई राजनीतिक प्रवृति नहीं है. राजनीतिक परिवार हो लेकिन पैसा, और प्रचार का प्रभाव नहीं हो तो ससंदीय राजनीति में &amp;nbsp;सांगठनिक ढांचे को बनाए रखना एक बड़ी चुनौती होती है. लेकिन राजनीतिक नेतृत्व वाले परिवार में परिवारों के लिए पदों के लिए स्रोत और उसकी स्वीकार्यता &amp;nbsp;नहीं हो तो वहां भारतीय घरों की तरह विभाजन की संस्कृति प्रभावी होती है. अन्नाद्रमुक के पास न परिवार है और ना ही पदों का प्रभाव. वैचारिक विरासत भी कई तरह की दरारें दिखती है. ऐसै में सत्ता का सेज आकर्षित करता है तो हैरानी नहीं. ना ही इसे किसी राजनीतिक नैतिकता से नापा जा सकता है.&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;[नोट- उपरोक्त दिए गए विचार लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. यह ज़रूरी नहीं है कि एबीपी न्यूज़ ग्रुप इससे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही ज़िम्मेदार है.]&amp;nbsp;&lt;/p&gt;]]></description><slash:comments>0</slash:comments><media:thumbnail url="https://feeds.abplive.com/onecms/images/uploaded-images/2026/05/13/ed8f597d75c3554dda0c2436f1efc5db1778668895122120_original.jpg" width="220"/></item><item><title><![CDATA[राज्यपाल, SIR और चुनावी संकट: क्या भारतीय लोकतंत्र को सुधार की जरूरत है?]]></title><link>https://www.abplive.com/blog/sir-controversy-and-rises-doubts-there-are-any-need-to-reform-democracy-3128422</link><comments>https://www.abplive.com/blog/sir-controversy-and-rises-doubts-there-are-any-need-to-reform-democracy-3128422#respond</comments><pubDate>Mon, 11 May 2026 21:33:00 +0530 </pubDate><dc:creator><![CDATA[ शिवाजी सरकार ]]></dc:creator><category><![CDATA[ इंडिया ]]></category><guid isPermaLink="true">https://www.abplive.com/blog/sir-controversy-and-rises-doubts-there-are-any-need-to-reform-democracy-3128422</guid><description><![CDATA[&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;असम, बंगाल, केरल, तमिलनाडु और पुडुचेरी के चुनाव नतीजों ने भारतीय राजनीति को एक बड़ा संदेश दिया है. इन परिणामों ने साफ कर दिया कि देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था में जनता आज भी सबसे बड़ी ताकत है, लेकिन इसके साथ ही चुनावी प्रक्रिया, राज्यपालों की भूमिका और संस्थाओं की निष्पक्षता को लेकर कई गंभीर सवाल भी खड़े हो गए हैं. असम, बंगाल और पुडुचेरी में बीजेपी को बढ़त मिली, केरल में कांग्रेस-यूडीएफ मजबूत रही, जबकि तमिलनाडु में अधूरा जनादेश सामने आया. वहां सरकार गठन का मामला अब राज्यपाल और छोटे राजनीतिक दलों के फैसलों पर टिका दिखाई दे रहा है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;यह सिर्फ चुनावी जीत-हार की कहानी नहीं है. यह लगभग सभी राजनीतिक दलों की कमजोरियों और लोकतांत्रिक संस्थाओं पर बढ़ते अविश्वास की तस्वीर भी पेश करता है. कहीं सत्ता पक्ष पर मनमानी के आरोप लगे, तो कहीं विपक्ष जनता का भरोसा खोता दिखा. हिंसा करने वाले भी सवालों के घेरे में हैं और हिंसा झेलने वाले भी.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;सबसे ज्यादा बहस राज्यपालों की भूमिका को लेकर हो रही है. कई राजनीतिक दलों और विशेषज्ञों का आरोप है कि कुछ राज्यपाल निष्पक्ष नहीं दिख रहे और उनके फैसले जनता के जनादेश को प्रभावित कर रहे हैं. तमिलनाडु इसका ताजा उदाहरण बन गया है, जहां TVK नेता विजय के बहुमत के दावे के बावजूद सरकार गठन को लेकर असमंजस बना हुआ है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;न्यायपालिका पर भी सवाल उठे हैं. चुनाव आयोग को स्वायत्त संस्था बताते हुए अदालतें कई बार हस्तक्षेप से बचती हैं, लेकिन दूसरी स्वायत्त संस्थाओं के मामलों में सक्रिय भूमिका निभाती हैं. ऐसे में लोगों के मन में सवाल उठ रहे हैं कि वोटर लिस्ट से नाम हटने, चुनावी गड़बड़ियों और विवादित &amp;ldquo;स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन&amp;rdquo; यानी SIR प्रक्रिया पर अदालतें अधिक सख्त क्यों नहीं दिखीं.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;SIR प्रक्रिया सबसे बड़ा विवाद बनकर उभरी है. भारत में दशकों से मतदाता सूची का नियमित संशोधन होता आया है, लेकिन इस बार लाखों नाम हटाए जाने को लेकर गंभीर सवाल उठे. सिर्फ बंगाल में करीब 91 लाख नाम हटने की बात सामने आई, जिनमें से लगभग 27 लाख नाम &amp;ldquo;लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी&amp;rdquo; यानी रिकॉर्ड या स्पेलिंग की गलतियों के कारण हटे बताए गए. आलोचकों का कहना है कि इससे चुनावी परिणाम प्रभावित हुए.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;विश्लेषण बताते हैं कि जिन सीटों पर ज्यादा नाम हटाए गए, वहां तृणमूल कांग्रेस को अधिक नुकसान हुआ और बीजेपी को फायदा मिला. कई सीटों पर जीत और हार का अंतर तीसरे उम्मीदवार को मिले वोटों से भी कम रहा. इस मुद्दे पर अदालतों में भी चर्चा हुई.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) की भूमिका पर भी चर्चा तेज रही. संघ ने बंगाल, असम और दक्षिण भारत के कई राज्यों में बड़े पैमाने पर जनसंपर्क अभियान चलाए. कुछ लोग दावा कर रहे हैं कि वोटर लिस्ट और SIR प्रक्रिया में भी उसकी अप्रत्यक्ष भूमिका रही. हालांकि इसे राष्ट्रहित का कार्य बताया गया, लेकिन सवाल यह है कि क्या इतने बड़े बदलाव से पहले व्यापक चर्चा और पारदर्शिता जरूरी नहीं थी?&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;दूसरी ओर ममता बनर्जी की राजनीति पर भी सवाल उठे. आलोचकों का कहना है कि अगर उन्होंने अपने करीबी नेताओं और सत्ता के केंद्रीकरण पर नियंत्रण रखा होता, तो जनता में नाराजगी इतनी ज्यादा नहीं बढ़ती. हालांकि कई राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि SIR विवाद के बिना भी तृणमूल कांग्रेस को नुकसान हो सकता था.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;तमिलनाडु में स्थिति और भी दिलचस्प बन गई है. TVK नेता विजय की लोकप्रियता ने सभी राजनीतिक समीकरण बदल दिए. लेकिन राज्यपाल द्वारा 118 विधायकों के समर्थन की सूची मांगने को लेकर विवाद गहरा गया. आलोचकों का कहना है कि एस.आर. बोम्मई फैसले के अनुसार बहुमत साबित करना विधानसभा का विषय है, न कि राज्यपाल का. ऐसे फैसले &amp;ldquo;हॉर्स ट्रेडिंग&amp;rdquo; यानी विधायकों की खरीद-फरोख्त को बढ़ावा दे सकते हैं.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;भारत की राजनीति आज एक बड़े बदलाव के दौर से गुजर रही है. जनता अब सिर्फ वादों से संतुष्ट नहीं है, बल्कि संस्थाओं की निष्पक्षता और लोकतंत्र की पारदर्शिता भी चाहती है. राज्यपालों को अधिक संवेदनशील और निष्पक्ष भूमिका निभानी होगी. साथ ही प्रभावशाली सामाजिक संगठनों को भी लोकतंत्र मजबूत करने की दिशा में सकारात्मक योगदान देना होगा.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;1959 में केरल की पहली कम्युनिस्ट सरकार को अनुच्छेद 356 लगाकर बर्खास्त किए जाने से लेकर आज तक भारत ने लंबा सफर तय किया है. एस.आर. बोम्मई फैसले ने राष्ट्रपति शासन के दुरुपयोग पर रोक लगाने की कोशिश की. अब उम्मीद यही है कि भविष्य में लोकतंत्र और मजबूत होगा, जनता का विश्वास कायम रहेगा और भारत अधिक पारदर्शी, निष्पक्ष और जनहितकारी राजनीति की ओर आगे बढ़ेगा.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;[ये लेखक के निजी विचार है]&lt;/p&gt;]]></description><slash:comments>0</slash:comments><media:thumbnail url="https://feeds.abplive.com/onecms/images/uploaded-images/2026/05/11/f46ab6ab32cec0aa6c0252720f2ae0091778515271889120_original.jpg" width="220"/></item><item><title><![CDATA[NCRB रिपोर्ट में यूपी मॉडल: आंकड़ों से आगे भरोसे की बहाली की कहानी]]></title><link>https://www.abplive.com/blog/up-model-in-the-ncrb-report-a-story-of-restoring-trust-beyond-the-statistics-3128844</link><comments>https://www.abplive.com/blog/up-model-in-the-ncrb-report-a-story-of-restoring-trust-beyond-the-statistics-3128844#respond</comments><pubDate>Sat, 9 May 2026 17:18:47 +0530 </pubDate><dc:creator><![CDATA[ एके जैन ]]></dc:creator><category><![CDATA[ उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड ]]></category><guid isPermaLink="true">https://www.abplive.com/blog/up-model-in-the-ncrb-report-a-story-of-restoring-trust-beyond-the-statistics-3128844</guid><description><![CDATA[&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;अपनी बात एक सवाल के साथ शुरू करूंगा. किसी राज्य की कानून व्यवस्था को आप अपनी दृष्टि में किस आधार पर मापेंगे? थानों की संख्या, पुलिस बल के आकार या बजट आवंटन से. वस्तुतः कानून व्यवस्था के आकलन का यह पैमाना हो ही नहीं सकता. इसके आकलन का आधार उस मनोविज्ञान से होना चाहिए जो समाज के सबसे साधारण व्यक्ति के भीतर होता है कि क्या वह रात को निर्भय होकर सो सकता है, क्या वह अपनी शिकायत लेकर थाने जाने का साहस रखता है, और क्या उसे यह विश्वास है कि अपराधी को दंड मिलेगा.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;भयग्रस्त समाज कभी सृजनशील नहीं हो सकता. जहां असुरक्षा होती है, वहां व्यक्ति अपनी ऊर्जा विकास और रचनात्मकता में नहीं, बल्कि स्वयं को बचाने में खर्च करने लगता है. इसके विपरीत, जब नागरिक सुरक्षित महसूस करता है, तभी वह जोखिम उठाता है, उद्यम करता है, शिक्षा और संस्कृति की ओर बढ़ता है और भविष्य के प्रति आशावान बनता है. सामाजिक सुरक्षा केवल कानून-व्यवस्था का प्रश्न नहीं, बल्कि सभ्यता, अर्थव्यवस्था और लोकतंत्र-तीनों की आधारशिला है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;इस कसौटी पर राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो की वर्ष 2024 की रिपोर्ट को रखते हैं जो उत्तर प्रदेश के विषय में ऐसी तस्वीर प्रस्तुत करती है, जो न केवल प्रशासनिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण है, बल्कि लोकतांत्रिक समाज की गहरी समझ की मांग करती है. अपराध-विमर्श में प्रायः घटनाओं की कुल संख्या को ही आधार बना लिया जाता है, जो भ्रामक होती है. एक पूर्व डीजीपी होने के नाते मैं उन तथ्यों को सामने रखना &amp;nbsp;चाहता हूं जो महत्वपूर्ण हैं.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;किसी भी राज्य की वास्तविक स्थिति समझने के लिए क्राइम रेट &amp;nbsp;अर्थात् प्रति एक लाख जनसंख्या पर अपराधों की संख्या &amp;nbsp;ही प्रामाणिक और तुलनीय संकेतक है. यही मानक जनसंख्या और भूगोल के असंतुलन को निष्पक्ष रूप से संतुलित करता है. उत्तर प्रदेश जैसे देश के सर्वाधिक जनसंख्या वाले राज्य के लिए यह कसौटी और भी अनिवार्य हो जाती है. इस कसौटी पर उत्तर प्रदेश की अपराध दर राष्ट्रीय औसत से उल्लेखनीय रूप से नीचे है, और देश की 17 प्रतिशत जनसंख्या के साथ कुल अपराधों में उसका स्थान 18वां है. यह अंतर साधारण नहीं योगी सरकार की नीति और इच्छाशक्ति का परिणाम है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;मेरा मानना है कि अपराध नियंत्रण का मूल्यांकन शासन की नैतिक विश्वसनीयता से किया जाना चाहिए. जब राज्य अपराध के प्रति नरम दिखाई देता है, तब अपराध केवल सामाजिक समस्या नहीं रह जाता, वह सत्ता संरचना का हिस्सा बनने लगता है.&lt;/p&gt;
&lt;h3 style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;राजनीतिक संरक्षण की आड़ में अपराधी निर्भय हो जाते हैं&lt;/strong&gt;&lt;/h3&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;मैंने अपनी सेवा के दौरान स्वयं यह देखा है कि जब राजनीतिक संरक्षण की आड़ में अपराधी निर्भय हो जाते हैं, तो सबसे पहले पुलिस का मनोबल गिरता है &amp;nbsp;और उसके बाद नागरिक के भरोसे का. एक बार जब समाज के भीतर यह धारणा जड़ पकड़ ले कि प्रभावशाली व्यक्ति कानून से ऊपर है, तो उसे उखाड़ना पीढ़ियों का काम बन जाता है. लंबे समय तक उत्तर प्रदेश ठीक इसी चुनौती से जूझता रहा. अपराधियों का राजनीतिक संरक्षण, प्रशासनिक दबाव और कानून के प्रति भय का क्षरण, इन सबने समाज को गहरे अविश्वास में धकेल दिया था. पिछले नौ सालों में उत्तर प्रदेश इसी अविश्वास की छाया से उबरा है.&lt;/p&gt;
&lt;h3 style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;हत्या की दर का तेलंगाना, पंजाब और झारखंड जैसे राज्यों से कम&lt;/strong&gt;&lt;/h3&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;फिरौती के लिए अपहरण और डकैती जैसे अपराधों में उत्तर प्रदेश का पूरे देश में सबसे नीचे यानी 36वें स्थान पर होना विशेष रूप से महत्वपूर्ण है. क्योंकि ये अपराध केवल कानूनी उल्लंघन नहीं, बल्कि समाज में भय और अराजकता की संस्कृति पैदा करते हैं. यह महज़ एक पुलिसिया उपलब्धि नहीं है. पुलिस-विज्ञान में एक स्थापित सिद्धांत है कि संगठित अपराध तभी पनपता है जब उसे संरक्षण का पारिस्थितिकी-तंत्र मिले. जब वह तंत्र भंग होता है तो अपराधी को यह स्पष्ट हो जाता है कि न राजनीतिक पैरवी काम आएगी, न प्रशासनिक दबाव. तभी संगठित अपराध की कमर टूटती है. हत्या की दर का तेलंगाना, पंजाब और झारखंड जैसे राज्यों से कम होना इस परिवर्तन की गहराई को रेखांकित करता है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;किंतु इस पूरी रिपोर्ट में जो आंकड़ा मुझे सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण लगता है, वह है महिलाओं के विरुद्ध अपराधों में दोषसिद्धि दर. उत्तर प्रदेश 76.6 प्रतिशत की दर के साथ देश में शीर्ष पर है. एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी के रूप में मैं यह समझाना चाहूंगा कि यह आंकड़ा केवल अदालत की कार्यवाही का परिणाम नहीं होता. दोषसिद्धि की उच्च दर तभी संभव होती है जब पुलिस जांच पुख्ता हो, साक्ष्य-संकलन व्यवस्थित हो, अभियोजन पक्ष सक्षम और प्रतिबद्ध हो, और इन सबके ऊपर, न्यायालय में मामले को ईमानदारी से आगे बढ़ाने का प्रशासनिक संकल्प हो. पश्चिम बंगाल में यह दर 1.6 प्रतिशत, कर्नाटक में 4.8 और केरल में 17 प्रतिशत है. यह केवल सांख्यिकीय अंतर नहीं, यह शासन की प्राथमिकताओं का अंतर है. जिन राज्यों को प्रायः 'प्रगतिशील' कहा जाता है, वहां महिला अपराध में अपराधी के बच निकलने की दर 75 से 98 प्रतिशत तक है. ऐसे तथ्यों की अनिवार्य रूप से उत्तर प्रदेश के आंकड़ों से तुलना की जानी चाहिए.&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;इसे पूरे क्रम में जांच प्रक्रिया की भी बात की जानी चाहिए. जांच-प्रक्रिया केवल तेज नहीं, परिणाममूलक भी हुई है. अपने अनुभव में मैंने देखा है कि चार्जशीट दर तब सुधरती है जब पुलिस थाने पर यह दबाव न हो कि मामला दर्ज न हो, बल्कि यह अपेक्षा हो कि मामला दर्ज होने के बाद उसका तार्किक अंजाम निकले. यह मानसिकता का परिवर्तन है और यह ऊपर से नीचे की ओर आता है.&lt;/p&gt;
&lt;h3 style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;तो यह सीधा संदेश है कि अधिकारियों की जिम्मेदारी निश्चित&lt;/strong&gt;&lt;/h3&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;जब मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जीरो टालरेंस पर जोर देते हैं तो यह सीधा संदेश है कि अधिकारियों की जिम्मेदारी निश्चित की जा रही है. किसी भी राज्य के विकास को मानवीय स्वतंत्रताओं के विस्तार से परिभाषित किया जाना चाहिए. निवेश वहीं आता है जहां कानून का भरोसा हो. उद्योग वहीं फलते हैं जहां सामाजिक स्थिरता हो... और प्रतिभा वहीं रुकती है जहां नागरिक जीवन सुरक्षित हो. उत्तर प्रदेश में निवेश का बढ़ता प्रवाह और कानून-व्यवस्था की बेहतर होती स्थिति, ये दोनों प्रवृत्तियां आकस्मिक नहीं, परस्पर संबद्ध हैं.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;यहां यह भी कहना आवश्यक है कि चुनौतियां अभी शेष हैं. साइबर अपराध एक नई और जटिल समस्या के रूप में उभर रहे हैं जिसके लिए परंपरागत पुलिसिंग के ढांचे से परे जाकर सोचना होगा और वर्तमान में सोचा जा भी रहा है. सामाजिक तनाव और डिजिटल अफवाहें नए खतरे हैं. किसी भी प्रशासन के लिए संतोष का क्षण वह होता है जब चुनौती समाप्त हो लेकिन व्यावहारिक रूप से यह संभव नहीं. लेकिन दिशा का बदलना भी महत्वूपूर्ण है, खासकर ऐसे राज्य में जो दशकों तक आपराधिक छवि का पर्याय रहा हो. निश्चित रूप से हम आज एक महत्वपूर्ण पड़ाव पर हैं.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;उत्तर प्रदेश की वर्तमान कानून-व्यवस्था केवल आंकड़ों का सुधार नहीं, बल्कि शासन और समाज के बीच भरोसे के पुनर्निर्माण की कहानी है. सफलता का पैमाना यह है कि समाज के भीतर यह भरोसा है कि कानून उसके साथ है. जब पीड़ित को यह आश्वासन हो कि उसकी पीड़ा व्यर्थ नहीं जाएगी, और जब अपराधी यह जान ले कि संरक्षण अब उसकी ढाल नहीं, तो मान लीजिए कि राज्य अपनी संवैधानिक भूमिका को पूर्ण कर रहा है. एनसीआरबी के निष्पक्ष आंकड़े उसकी गवाही देते हैं. एक पुलिस अधिकारी के रूप में मैं जानता हूं कि ऐसी गवाही, राजनीतिक आरोपों-प्रत्यारोपों से कहीं अधिक विश्वसनीय होती है.&lt;/p&gt;]]></description><slash:comments>0</slash:comments><media:thumbnail url="https://feeds.abplive.com/onecms/images/uploaded-images/2026/05/12/ad445e64258ff0878b75f595b638f0581778586472211369_original.jpg" width="220"/></item><item><title><![CDATA[ईरान-जंग के बाद बदलती दुनिया: होर्मुज से उठी आग ने ग्लोबल सियासत का नक्शा बदल दिया]]></title><link>https://www.abplive.com/blog/us-iran-war-hormuz-blockade-changes-whole-world-map-opines-ruman-hashmi-3127365</link><comments>https://www.abplive.com/blog/us-iran-war-hormuz-blockade-changes-whole-world-map-opines-ruman-hashmi-3127365#respond</comments><pubDate>Sat, 9 May 2026 13:11:50 +0530 </pubDate><dc:creator><![CDATA[ रुमान हाशमी, वरिष्ठ पत्रकार ]]></dc:creator><category><![CDATA[ विश्व ]]></category><guid isPermaLink="true">https://www.abplive.com/blog/us-iran-war-hormuz-blockade-changes-whole-world-map-opines-ruman-hashmi-3127365</guid><description><![CDATA[&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;मिडिल ईस्ट में ईरान, अमेरिका और इज़राइल के बीच छिड़े संघर्ष और उसके बाद हुए नाज़ुक युद्धविराम ने न केवल खाड़ी क्षेत्र, बल्कि पूरी दुनिया की राजनीति को हिला कर रख दिया है. हालात ऐसे मुकाम पर पहुंच चुके हैं कि यह कहना गलत नहीं होगा कि इस जंग ने एक &amp;ldquo;नया विश्व संतुलन&amp;rdquo; पैदा कर दिया है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;अमेरिका और ईरान के बीच हालिया सैन्य झड़प ने इस युद्धविराम की कमजोरी को फिर उजागर किया है. स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़ में अमेरिकी युद्धपोतों और ईरानी बलों के बीच मिसाइलों, ड्रोन और तेज़ रफ्तार नौकाओं से हुई मुठभेड़ के बाद दुनिया की निगाहें फिर खाड़ी पर टिक गई हैं. अमेरिका ने जवाबी हमले किए, लेकिन डोनाल्ड ट्रंप ने इसे &amp;ldquo;जंगबंदी का उल्लंघन&amp;rdquo; मानने से इनकार करते हुए &amp;ldquo;लव टैप&amp;rdquo; बताया. यह बयान संकेत देता है कि वॉशिंगटन ईरान के साथ बड़े युद्ध से बचना चाहता है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;बड़े युद्ध से बचना चाहता है यूएस&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;अफगानिस्तान और इराक के लंबे युद्धों के बाद अमेरिकी जनता एक और मिडिल ईस्ट युद्ध के पक्ष में नहीं है. अमेरिका के भीतर यह धारणा मजबूत हो रही है कि यह संघर्ष मुख्यतः इज़राइल की सुरक्षा और उसके राजनीतिक हितों से जुड़ा है, न कि सीधे तौर पर अमेरिका के हितों से. यही कारण है कि युद्धविराम से पहले ट्रंप ने बेंजामिन नेतन्याहू को पूरी तरह भरोसे में नहीं लिया, जिससे दोनों देशों के बीच रणनीतिक मतभेद भी उजागर हुए हैं.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;जहां रूस-यूक्रेन युद्ध ने पश्चिमी देशों को एकजुट किया था, वहीं ईरान-इज़राइल तनाव ने उसी गठबंधन में दरारें पैदा कर दी हैं. यूरोप के कई देश अब अमेरिकी सैन्य नीति से दूरी बनाने लगे हैं. खाड़ी क्षेत्र में भी राजनीतिक बदलाव साफ दिखाई दे रहे हैं. संयुक्त अरब अमीरात के भीतर मतभेद बढ़ने की खबरें हैं, जहां कुछ अमीरात, खासकर शारजाह, अबूधाबी और दुबई की इज़राइल के साथ बढ़ती नज़दीकियों से पूरी तरह संतुष्ट नहीं हैं.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;ईरान ने दिखाई कूटनीतिक सक्रियता&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;ईरान ने इस संकट के दौरान सैन्य के साथ-साथ कूटनीतिक स्तर पर भी सक्रियता दिखाई है. वह सऊदी अरब, ओमान और अन्य अरब देशों के साथ संबंध सुधारने की कोशिश कर रहा है. मुस्लिम दुनिया में भी एक नई राजनीतिक धुरी उभरती दिख रही है, जिसमें सऊदी अरब, पाकिस्तान, तुर्किये और मिस्र जैसे देश शामिल हैं.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;इस पूरे संकट की जड़ फिलिस्तीन का मुद्दा है, जो आज भी मिडिल ईस्ट की अस्थिरता का सबसे बड़ा कारण बना हुआ है. जब तक &amp;ldquo;टू-स्टेट सॉल्यूशन&amp;rdquo; लागू नहीं होता, यानी इज़राइल और फिलिस्तीन दोनों को स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में मान्यता नहीं मिलती, तब तक स्थायी शांति संभव नहीं दिखती.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;यह संघर्ष अब केवल सैन्य टकराव नहीं रह गया है, बल्कि बदलते वैश्विक गठबंधनों और शक्ति संतुलन की एक बड़ी लड़ाई बन चुका है, जो आने वाले समय में विश्व राजनीति को गहराई से प्रभावित कर सकता है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;[ये लेखक के निजी विचार है]&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;]]></description><slash:comments>0</slash:comments><media:thumbnail url="https://feeds.abplive.com/onecms/images/uploaded-images/2026/05/09/214c9ca28907e1aeea6fd158ef40cd821778312618090120_original.jpg" width="220"/></item><item><title><![CDATA[खेल शुरू हुआ, अभी और खेला होगा, क्या ममता संभल लेगी?]]></title><link>https://www.abplive.com/blog/west-bengal-mamata-banerjee-election-defeat-now-begin-another-level-of-game-opines-shivaji-sarkar-3126253</link><comments>https://www.abplive.com/blog/west-bengal-mamata-banerjee-election-defeat-now-begin-another-level-of-game-opines-shivaji-sarkar-3126253#respond</comments><pubDate>Thu, 7 May 2026 00:05:00 +0530 </pubDate><dc:creator><![CDATA[ शिवाजी सरकार ]]></dc:creator><category><![CDATA[ इंडिया ]]></category><guid isPermaLink="true">https://www.abplive.com/blog/west-bengal-mamata-banerjee-election-defeat-now-begin-another-level-of-game-opines-shivaji-sarkar-3126253</guid><description><![CDATA[&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot; data-start=&quot;281&quot; data-end=&quot;765&quot;&gt;पश्चिम बंगाल में आखिरकार सत्ता परिवर्तन हो गया और &lt;span class=&quot;hover:entity-accent entity-underline inline cursor-pointer align-baseline&quot;&gt;&lt;span class=&quot;whitespace-normal&quot;&gt;नरेंद्र मोदी&lt;/span&gt;&lt;/span&gt; के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी ने लंबे इंतजार के बाद राज्य में सरकार बना ली. अब मुख्यमंत्री कौन होगा, इसका औपचारिक ऐलान होना बाकी है. लेकिन असली सवाल सरकार बनने का नहीं, बल्कि यह है कि &lt;span class=&quot;hover:entity-accent entity-underline inline cursor-pointer align-baseline&quot;&gt;&lt;span class=&quot;whitespace-normal&quot;&gt;ममता बनर्जी&lt;/span&gt;&lt;/span&gt; जैसी लोकप्रिय नेता सत्ता से बाहर कैसे हो गईं. उनकी जनसंपर्क क्षमता और लोकप्रियता पर उनके विरोधी भी सवाल नहीं उठाते, फिर भी वे जमीन क्यों खो बैठीं, यही समझने की जरूरत है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot; data-start=&quot;281&quot; data-end=&quot;765&quot;&gt;&lt;strong&gt;टीएमसी पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot; data-start=&quot;767&quot; data-end=&quot;1135&quot;&gt;2021 के बाद भाजपा लगातार अभियान मोड में रही और तृणमूल कांग्रेस पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाए गए. शिक्षक भर्ती घोटाले के मामले में अदालत के जरिए हजारों नौकरियां रद्द हुईं और पूर्व मंत्री पार्थ चटर्जी को जेल भेजा गया. इन घटनाओं ने जनता के बीच सरकार की छवि को नुकसान पहुंचाया. जिन लोगों की नौकरियां गईं, उनमें असंतोष बढ़ा और उन्हें लगा कि सरकार स्थिति संभालने में असफल है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot; data-start=&quot;1137&quot; data-end=&quot;1531&quot;&gt;इसके अलावा, केंद्र सरकार की योजनाओं के तहत मिलने वाले फंड में भी बाधाएं आईं, जैसे मनरेगा के भुगतान में देरी, जिससे लाखों मजदूर प्रभावित हुए. इसका सीधा असर जनता के गुस्से के रूप में सामने आया. वहीं, ईडी जैसी एजेंसियों की कार्रवाई और नेताओं पर जांच ने तृणमूल की साख को और कमजोर किया, भले ही ठोस सबूत सामने न आए हों. राजनीति में छवि खराब होना कई बार वास्तविक दोष से भी ज्यादा नुकसान पहुंचाता है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot; data-start=&quot;1137&quot; data-end=&quot;1531&quot;&gt;&lt;strong&gt;कार्यकर्ताओं ने की छवि खराब&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot; data-start=&quot;1533&quot; data-end=&quot;1767&quot;&gt;तृणमूल के कुछ कार्यकर्ताओं पर वसूली और स्थानीय स्तर पर गड़बड़ियों के आरोपों ने भी पार्टी को नुकसान पहुंचाया. इसके साथ ही मतदाता सूची के पुनरीक्षण में बड़ी संख्या में नाम कटने का मुद्दा भी सामने आया, जिससे चुनावी समीकरण प्रभावित हुए. हालांकि, कुछ विश्लेषकों का मानना है कि अगर सरकार की सामाजिक योजनाओं, जैसे लक्ष्मी भंडार, की राशि बढ़ाई जाती तो महिला वोटरों का रुझान बदल सकता था.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot; data-start=&quot;1918&quot; data-end=&quot;2200&quot;&gt;अब सवाल यह है कि क्या तृणमूल कांग्रेस खत्म हो जाएगी? फिलहाल ऐसा नहीं लगता, लेकिन पार्टी के नेताओं पर दबाव बढ़ेगा और अंदरूनी चुनौतियां सामने आएंगी, खासकर &lt;span class=&quot;hover:entity-accent entity-underline inline cursor-pointer align-baseline&quot;&gt;&lt;span class=&quot;whitespace-normal&quot;&gt;अभिषेक बनर्जी&lt;/span&gt;&lt;/span&gt; के लिए. आने वाले समय में ममता बनर्जी पार्टी को कैसे संभालती हैं, यह काफी महत्वपूर्ण होगा. अंततः, यह साफ है कि राजनीतिक &amp;lsquo;खेला&amp;rsquo; अभी खत्म नहीं हुआ है&amp;mdash;यह आगे भी जारी रहेगा और जनता को इसके अगले चरण का इंतजार करना होगा.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot; data-start=&quot;1918&quot; data-end=&quot;2200&quot;&gt;[ये लेखक के निजी विचार हैं.]&lt;/p&gt;]]></description><slash:comments>0</slash:comments><media:thumbnail url="https://feeds.abplive.com/onecms/images/uploaded-images/2026/05/07/5d32422d385979026fe00fcd2659ead31778092360179120_original.jpg" width="220"/></item><item><title><![CDATA[जहां कंक्रीट से 'संवर' रहा विकास, वो आज बन गया उत्तर प्रदेश]]></title><link>https://www.abplive.com/blog/uttar-pradesh-fast-growth-today-opines-prabhanshu-srivastava-3126201</link><comments>https://www.abplive.com/blog/uttar-pradesh-fast-growth-today-opines-prabhanshu-srivastava-3126201#respond</comments><pubDate>Wed, 6 May 2026 20:58:31 +0530 </pubDate><dc:creator><![CDATA[ कैप्टेन प्रभान्शु कुमार श्रीवास्तव ]]></dc:creator><category><![CDATA[ इंडिया ]]></category><guid isPermaLink="true">https://www.abplive.com/blog/uttar-pradesh-fast-growth-today-opines-prabhanshu-srivastava-3126201</guid><description><![CDATA[&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;अंत्योदय की अवधारणा जब नीति की भाषा बनती है, जब योजनाओं की स्याही में उतरती है और जब ज़मीन पर साकार होती है तो इतिहास उसे केवल शासन नहीं, एक सभ्यतागत घटना कहता है. उत्तर प्रदेश आज ऐसी ही एक सभ्यतागत घटना का साक्षी है और पं. दीनदयाल उपाध्याय की उस अवधारणा को साकार कर रहा है, जिसमें वह विकास की परिभाषा अंतिम पंक्ति में खड़े व्यक्ति के जीवन में आए उजाले को मानते थे. ऐसा इसलिए है कि अब नेतृत्व में संकल्प दिखाई देता है, नीति में स्पष्टता है और सुशासन की नींव पर समावेशी विकास की इमारत खड़ी दिखाई देती है. आज उत्तर प्रदेश के विभिन्न हिस्सों में जो एक्सप्रेसवे व कॉरिडोर बन रहे हैं, जो क्लस्टर आकार ले रहे हैं, जो इंडस्ट्रियल पार्क व हब जीवंत हो रहे हैं, वे मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की समावेशी विकास नीति का मूर्त रूप हैं. वे उत्तर प्रदेश में दशकों से चली आ रही आर्थिक असमानता को मिटाने के उपकरण हैं. यह प्रदेश में कंक्रीट से संवारे जा रहे समावेशी विकास की जीवंत तस्वीर भी है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;सामाजिक संकल्प की परियोजनाएं&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;उत्तर प्रदेश कभी अपनी विशालता के बोझ तले दबा था. इतनी बड़ी आबादी, इतना विस्तृत भूगोल, इतनी गहरी विषमताएं और इन सबके बीच एक ऐसी व्यवस्था जो थकी हुई थी, जो अपने ही नागरिकों को रोक नहीं पाती थी, जो पलायन को नियति मान चुकी थी. बुंदेलखंड की फटी धरती, पूर्वांचल की सूनी गलियां और पश्चिम की दबी हुई औद्योगिक क्षमता, यह उत्तर प्रदेश की वह तस्वीर थी जो दशकों से बदलने का नाम नहीं ले रही थी. योगी आदित्यनाथ की सरकार ने जब 2017 में कमान संभाली, तो उत्तर प्रदेश की पहचान बीमारू राज्य के रूप में थी. तब किसी ने शायद सोचा भी न था कि एक दिन यही प्रदेश देश की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की दौड़ में सबसे तेज़ धावक होगा, भारत की अर्थव्यवस्था का ग्रोथ इंजन बनेगा.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;राज्य में विकसित हुए विभिन्न एक्सप्रेसवे, कॉरिडोर्स, क्लस्टर्स, विशेष पार्क व हब भविष्य की अर्थव्यवस्था की बड़ी ताकत साबित होंगे. आगरा से लखनऊ, कानपुर, झांसी और चित्रकूट को जोड़नेवाला डिफेंस कॉरिडोर केवल एक औद्योगिक परियोजना नहीं है, यह एक सामाजिक संकल्प है. इस परियोजना के अंतर्गत अब तक लगभग दो सौ एमओयू पर हस्ताक्षर किए जा चुके हैं. हस्ताक्षरित एमओयू के सापेक्ष हजारों करोड़ के निवेश तथा पचास हजार से ज्यादा लोगों के प्रत्यक्ष रोजगार का अनुमान है. अप्रत्यक्ष रूप में कितनों को रोजगार मिलेगा, इसकी कल्पना सहज ही की जा सकती है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;लेकिन, इससे बड़ी बात यह है कि बुंदेलखंड जो दशकों से सूखे, पलायन और निराशा की कहानी था, अब एक नई पहचान बना रहा है. झांसी की वह भूमि जहाँ कभी रानी लक्ष्मीबाई ने वीरता की इबारत लिखी थी, आज फिर से एक नई शक्ति का केंद्र बन रही है. जब किसी क्षेत्र का युवा पलायन बंद करता है और जड़ें पकड़ता है, तो यह केवल आर्थिक घटना नहीं है, यह सामाजिक पुनर्जन्म है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;आत्मनिर्भरता की नई परिभाषा&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;भारत की आत्मा गांवों में बसती है और योगी सरकार ने इस आत्मा को आर्थिक शक्ति देने का बीड़ा उठाया है. एक जनपद-एक उत्पाद जैसी योजना एक करोड़ से अधिक कारीगरों को प्रत्यक्ष लाभ देती है. जब वाराणसी का कोई बुनकर अपनी साड़ी सीधे ई-कॉमर्स प्लेटफार्म पर बेचने लगता है, तो वह केवल एक व्यापारी नहीं बनता, वह आत्मनिर्भरता की नई परिभाषा गढ़ता है. पूर्वांचल एक्सप्रेसवे, बुंदेलखंड एक्सप्रेसवे, गंगा एक्सप्रेसवे क्षमता विस्तार के नए साधन हैं. जब पूर्वांचल एक्सप्रेसवे के किनारे औद्योगिक क्लस्टर बनते हैं, तो आज़मगढ़ और मऊ का युवक सूरत या मुंबई जाने की मजबूरी से मुक्त होता है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;गंगा एक्सप्रेसवे पर जब इंडस्ट्रियल नोड्स विकसित होते हैं, तो मेरठ से प्रयागराज तक का पूरा भूगोल बदल जाता है. ग्रेटर नोएडा में आईआईटीजीएनएल, बरेली में मेगा फूड पार्क, उन्नाव में ट्रांसगंगा सिटी, गोरखपुर में प्लास्टिक पार्क, गोरखपुर में गारमेंट पार्क तथा अनेक फ्लेटेड फैक्ट्री परिसर, यमुना एक्सप्रेसवे क्षेत्र में जेवर इंटरनेशनल एयरपोर्ट के साथ ही फिल्म सिटी, टॉय पार्क, अपैरल पार्क, हैंडीक्राफ्ट पार्क, लॉजिस्टिक हब व ऐसी ही अन्य योजनाएं आर्थिक ताकत की रीढ़ साबित होंगी.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;नीति के केंद्र में सामाजिक लोकतंत्र&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;नोएडा और ग्रेटर नोएडा में इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग क्लस्टर आज देश के सबसे बड़े मोबाइल उत्पादन केंद्रों में से एक है. सैमसंग, ओप्पो, वीवो जैसी विश्वस्तरीय कंपनियों की उपस्थिति ने यहां एक पूरा पारिस्थितिकी तंत्र खड़ा किया है. लेकिन इस इकोसिस्टम की असली कहानी उन हज़ारों छोटे उद्यमियों की है जो इन बड़ी कंपनियों के लिए कंपोनेंट बना रहे हैं. उन युवा इंजीनियरों की है जो अपने शहर में ही अपनी क्षमता को मूर्त रूप दे रहे हैं. डॉ. भीमराव अंबेडकर ने कहा था, &amp;lsquo;राजनीतिक लोकतंत्र तब तक टिक नहीं सकता जब तक उसकी नींव में सामाजिक लोकतंत्र न हो.&amp;rsquo; योगी सरकार की औद्योगिक नीति इसी सिद्धांत पर आधारित है. ग्रेटर नोएडा में विकसित हो रहा डेटा सेंटर पार्क इसी बात की मिसाल है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;यह पार्क न केवल डिजिटल अर्थव्यवस्था की नींव रखेगा, बल्कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश के युवाओं के लिए उच्च- कौशल रोज़गार के नए द्वार खोलेगा. वस्त्र उद्योग पर विशेष ध्यान देना भी इस संदर्भ में अत्यंत प्रासंगिक है. प्रदेश में लखनऊ, कानपुर, वाराणसी, मुरादाबाद, बरेली और आगरा में टेक्सटाइल पार्क और हैंडलूम क्लस्टर विकसित हो रहे हैं. भारत के कुल हस्तशिल्प निर्यात में उत्तर प्रदेश की हिस्सेदारी 40 प्रतिशत से अधिक है. यह न केवल विदेशी मुद्रा अर्जन का माध्यम है, बल्कि उन लाखों हाथों की गरिमा का प्रश्न भी है जो पीढ़ियों से इस कला को जीवित रखे हुए हैं.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;समाधान का मॉडल बनता राज्य&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;सुशासन केवल प्रशासनिक उपलब्धि नहीं, नैतिक और सामाजिक विजय है. इन्वेस्ट यूपी की स्थापना और ईज़ ऑफ डूइंग बिज़नेस में प्रदेश की बेहतर रैंकिंग ने निवेश के वातावरण को जो नई ऊंचाई दी है, उसका सामाजिक अनुवाद यह है कि भ्रष्टाचार घटा है, पारदर्शिता बढ़ी है, और सरकार पर नागरिकों का विश्वास मज़बूत हुआ है. लॉजिस्टिक्स पार्क और मल्टी-मॉडल ट्रांसपोर्ट हब का जाल बिछाते हुए योगी सरकार ने एक ऐसी कनेक्टिविटी दी है जो प्रदेश के हर कोने को एक साथ धड़कने की ताकत देती है. दादरी में विकसित हो रहा मल्टी-मॉडल लॉजिस्टिक्स हब एशिया के सबसे बड़े लॉजिस्टिक्स केंद्रों में से एक बनने की राह पर है. जब माल तेज़ी से पहुँचता है, जब किसान की उपज समय पर बाज़ार तक जाती है, जब निर्यातक की समयसीमा पूरी होती है तो इस पूरे चक्र में लाभान्वित होने वाला अंतिम व्यक्ति भी वही है, जो इस श्रृंखला की नींव है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;उत्तर प्रदेश में हो रहा यह औद्योगिक और अवसंरचनात्मक परिवर्तन उस समाज की कहानी है जो सदियों की उपेक्षा के बाद अपनी नियति खुद लिख रहा है. जो प्रदेश कभी समस्याओं का प्रतीक था, आज समाधानों का मॉडल बन रहा है. इतिहास जब इस कालखंड को देखेगा, तो वह इसे महज़ आर्थिक उछाल नहीं कहेगा, वह इसे एक सभ्यतागत पुनर्जागरण कहेगा. हालांकि, इस स्वर्णिम तस्वीर के बीच कुछ कठिन सच्चाइयां भी हैं जिन्हें नज़रअंदाज़ करना उचित नहीं होगा. पर्यावरणीय स्थिरता के सवाल, विशेषकर जल संसाधनों पर बढ़ते दबाव और औद्योगिक प्रदूषण के ख़तरे, भविष्य की नीति-निर्माण के लिए गंभीर विचार मांगते हैं. लेकिन जो समाज अपनी कमज़ोरियों को पहचानकर उनसे लड़ता है, वही स्थायी परिवर्तन की नींव रख सकता है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;[ये लेखक के निजी विचार है]&lt;/p&gt;]]></description><slash:comments>0</slash:comments><media:thumbnail url="https://feeds.abplive.com/onecms/images/uploaded-images/2026/05/06/7870b7791e4d8f47abb7c224ef069db21778081196528120_original.jpg" width="220"/></item><item><title><![CDATA[सनातन का महाशंखनाद: बंगाल से तमिलनाडु तक तुष्टीकरण के 'किले' ध्वस्त]]></title><link>https://www.abplive.com/blog/acharya-pawan-tripathi-reaction-on-bengal-to-tamil-nadu-election-result-2026-bjp-win-narendra-modi-3125369</link><comments>https://www.abplive.com/blog/acharya-pawan-tripathi-reaction-on-bengal-to-tamil-nadu-election-result-2026-bjp-win-narendra-modi-3125369#respond</comments><pubDate>Tue, 5 May 2026 11:31:09 +0530 </pubDate><dc:creator><![CDATA[ आचार्य पवन त्रिपाठी ]]></dc:creator><category><![CDATA[ इंडिया ]]></category><guid isPermaLink="true">https://www.abplive.com/blog/acharya-pawan-tripathi-reaction-on-bengal-to-tamil-nadu-election-result-2026-bjp-win-narendra-modi-3125369</guid><description><![CDATA[&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;भारतीय राजनीति के कालखंड में कुछ क्षण ऐसे आते हैं, जो इतिहास की दिशा बदल देते हैं, लेकिन नरेंद्र मोदी ने जब से भारत की गद्दी संभाली है, तब से आज तक ऐसे क्षण थोक के भाव में दिन प्रतिदिन आ रहे हैं. पीएम मोदी का भारत और भारतीय प्रथम रोजाना पुष्पित पल्लवित हो रहा है. सबका साथ सबका विकास, सुशासन, साफगोई व पारदर्शिता इन सभी ने मिलकर आज जब पश्चिम बंगाल की विधानसभा और दक्षिण भारत के चुनावी नतीजे पटल पर उभरे हैं तो यह साफ कर दिया है कि यह महज एक 'सत्ता परिवर्तन' नहीं है. यह उन करोड़ों दबे-कुचले स्वाभिमानों की हुंकार है, जिन्हें दशकों से 'वोट बैंक' की राजनीति की वेदी पर बलि चढ़ाया जा रहा था.&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में चलने वाली आंधी ने आज अपना परचम जिस तरह से लहराया है, उससे हमें डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी की याद आने स्वाभाविक है. डॉ मुखर्जी ने जिस बंगाल की माटी से 'एक राष्ट्र, एक विधान' का संकल्प लिया था, आज उसी माटी ने उनके विचारों की सरकार को लगभग दो-तिहाई बहुमत देकर नियति का चक्र पूरा कर दिया है.&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&lt;br /&gt;इस ऐतिहासिक जनादेश की नींव केवल विकास के वादों पर नहीं, बल्कि उस सुरक्षा बोध पर टिकी है, जो पिछले एक वर्ष में गंभीर खतरे में था. लगभग दो साल पहले पड़ोसी देश बांग्लादेश में हुए सत्ता परिवर्तन के बाद वहां जो-जो घटा, उसे बंगाल का हिंदू कभी नहीं भूल सकता. पड़ोसी देश बांग्लादेश में जिस तरह तख्तापलट हुआ और शेख हसीना को जान बचाकर भागना पड़ा, उसने सरहद के इस पार रहने वाले बंगाली समाज की रूह कंपा दी थी. 'शांति के दूत' कहे जाने वाले नोबेल विजेता मोहम्मद यूनुस के सत्ता संभालते ही वहां जो तांडव शुरू हुआ, उसने भारत में भी छद्म धर्मनिरपेक्षता का नकाब उतार फेंका.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;वहां के प्रसिद्ध लोक संगीतकार राहुल आनंद का 140 साल पुराना घर जलाया जाना महज एक घटना नहीं, बल्कि एक संस्कृति को मिटाने का प्रयास था. जब उनके हाथों से बने वाद्ययंत्रों को आग के हवाले किया गया, तो उसकी तपिश पश्चिम बंगाल के मालदा, मुर्शिदाबाद और नदिया के जिलों में महसूस की गई. इस्कॉन के संतों की गिरफ्तारी और हिंदुओं के नरसंहार पर जब भारत का 'सेक्युलर जमात' और ममता बनर्जी का प्रशासन मौन साधे बैठा था, तब बंगाल का सामान्य हिंदू यह समझ गया कि यदि आज वह नहीं जागा, तो कल उसकी स्थिति भी वही होगी. मतदान केंद्रों पर लगी लंबी कतारें इसी 'अस्तित्व की लड़ाई' का परिणाम थीं. हिंदुओं ने इस बार 'चुपचाप कमल छाप' का मंत्र नहीं, बल्कि 'खुलकर अधिकार' की नीति अपनाई.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;ममता दीदी की 'इमाम भत्ता' से लेकर 'मजहबी विशेषीकरण' की राजनीति ने बंगाल के मूल स्वरूप को हाशिए पर धकेल दिया था. 'जय श्री राम' के उद्घोष पर जेल भेजने वाली मानसिकता को आज जनता ने सत्ता से बाहर का रास्ता दिखाकर यह सिद्ध कर दिया है कि बंगाल अब 'संदेशखाली' जैसी घटनाओं को और बर्दाश्त नहीं करेगा. महिलाओं के साथ हुए अनाचार और स्थानीय स्तर पर तृणमूल के 'सिंडिकेट राज' ने जो आक्रोश पैदा किया था, उसे बांग्लादेश के घटनाक्रम ने एक ज्वलंत आग में बदल दिया. आज का परिणाम उसी सामूहिक चेतना का प्रतिफल है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;बंगाल की यह लहर दक्षिण की ओर भी उतनी ही तीव्रता से बढ़ी. तमिलनाडु में एम.के. स्टालिन और उनके पुत्र उदयनिधि स्टालिन की हार भारतीय राजनीति का सबसे सुखद संकेत है. जिन लोगों ने सनातन धर्म की तुलना 'डेंगू' और 'मलेरिया' से की थी और इसे मिटाने की कसमें खाई थीं, उन्हें तमिलनाडु की ईश्वर-भक्त जनता ने अपनी शक्ति दिखा दी है. द्रविड़ राजनीति के नाम पर हिंदू संस्कृति का अपमान अब राज्य में स्वीकार्य नहीं है. भाजपा ने वहां न केवल अपना जनाधार बढ़ाया, बल्कि स्टालिन के अभेद्य किले को ढहाकर यह साबित कर दिया कि 'मुरुगन' की धरती अधर्मियों के साथ नहीं खड़ी होगी.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;असम में भाजपा की प्रचंड जीत ने मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा की 'घुसपैठ मुक्त असम' की नीति पर मुहर लगा दी है. असम के मूल निवासियों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि वे अपनी जनसांख्यिकी और संस्कृति से खिलवाड़ नहीं होने देंगे. वहीं, पुडुचेरी जैसे छोटे केंद्रशासित प्रदेश में भाजपा का सरकार बनाना यह दर्शाता है कि कमल अब भारत के हर कोने में खिलने के लिए तैयार है. यह केवल चुनावी जीत नहीं, बल्कि उत्तर से दक्षिण तक एक वैचारिक एकीकरण और सनातन का शंखनाद है. इस चुनाव का सबसे बड़ा संदेश यह है कि अब 'हिंदू' रक्षात्मक नहीं, बल्कि मुखर है. वह अपनी पहचान को लेकर शर्मिंदा नहीं, बल्कि गौरवान्वित है. वह विकास भी चाहता है और अपनी विरासत की सुरक्षा भी. विपक्षी दलों के लिए यह सबक है कि आप बहुसंख्यक समाज की भावनाओं को कुचलकर सत्ता की सीढ़ियां नहीं चढ़ सकते.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;आज जब कोलकाता की सड़कों पर शंख बज रहे हैं, तो यह उस नए युग की शुरुआत है,जहां तुष्टीकरण का कोई स्थान नहीं होगा. पश्चिम बंगाल ने डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी को अपनी सच्ची श्रद्धांजलि दी है. अब चुनौती है इस दो-तिहाई बहुमत के साथ बंगाल को फिर से 'सोनार बांग्ला' बनाने की, जहाँ कानून का राज हो, न कि कट्टरपंथियों का. यह विजय लोकतंत्र के पर्व में 'धर्म' की स्थापना है. यह उन शहीदों को नमन है जिन्होंने बंगाल की अस्मिता के लिए अपने प्राणों की आहुति दी. आज का सूर्योदय एक नए भारत, एक समर्थ भारत और एक सनातनी भारत का उदय है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;नोट - (उपरोक्त दिए गए विचार लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. ये जरूरी नहीं कि एबीपी न्यूज ग्रुप इससे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है)&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;]]></description><slash:comments>0</slash:comments><media:thumbnail url="https://feeds.abplive.com/onecms/images/uploaded-images/2026/05/05/9fccbe7da56714a382e5eefe0543234417779608240621368_original.png" width="220"/></item><item><title><![CDATA[गंगा एक्सप्रेसवे: आलू से आंवला तक...यूपी के वन ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था का संकल्प पथ]]></title><link>https://www.abplive.com/blog/ganga-expressway-the-path-to-a-one-trillion-dollar-economy-3121822</link><comments>https://www.abplive.com/blog/ganga-expressway-the-path-to-a-one-trillion-dollar-economy-3121822#respond</comments><pubDate>Wed, 29 Apr 2026 11:17:50 +0530 </pubDate><dc:creator><![CDATA[ श्रीप्रकाश सिंह, प्रोफेसर ]]></dc:creator><category><![CDATA[ उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड ]]></category><guid isPermaLink="true">https://www.abplive.com/blog/ganga-expressway-the-path-to-a-one-trillion-dollar-economy-3121822</guid><description><![CDATA[&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;भारत की सभ्यता का इतिहास गंगा के किनारे पुष्पित और पल्लवित हुआ है. जहां-जहां यह पवित्र नदी पहुँची वहां-वहां जीवन पल्लवित हुआ, संस्कृति फली-फूली और सत्ता और समृद्धि के केंद्र बने. सदियों बाद, उसी गंगा माँ के समानांतर अब एक नई गाथा लिखी जा रही है, कंक्रीट और इस्पात की, विकास और संभावनाओं की. उत्तर प्रदेश का गंगा एक्सप्रेसवे अब केवल एक सड़क नहीं रहा, यह एक सपने की मूर्त अभिव्यक्ति है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;उस सपने की, जिसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देखा और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने ज़मीन पर उतारा. मेरठ से प्रयागराज तक फैला यह 594 किलोमीटर लंबा राजमार्ग महज़ दूरियां कम नहीं करेगा, यह उन करोड़ों जिंदगियों के भाग्य को भी बदलेगा जो इसके दोनों किनारों पर बसी हुई हैं. यह एक्सप्रेसवे योगी सरकार के उस महत्वाकांक्षी रोडमैप की धुरी है जो उत्तर प्रदेश को एक ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनाने का संकल्प लेकर चलता है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;यह सभी महसूस करते होंगे कि उत्तर प्रदेश के साथ ऐतिहासिक अन्याय हुआ है. जिस प्रदेश की जनसंख्या कई यूरोपीय देशों से अधिक है, जिसकी सांस्कृतिक विरासत अतुलनीय है, उसे दशकों तक 'बीमारू' कहकर नकारा गया. पूर्ववर्ती सरकारों ने वोट की राजनीति तो की, लेकिन विकास की नींव नहीं रखी. जो उत्तर प्रदेश कभी पलायन, अराजकता, अपराध और अवसरहीनता का पर्याय बन गया था, वही आज निवेश के लिए देश का सबसे आकर्षक गंतव्य बन रहा है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;गंगा एक्सप्रेसवे उसी परिवर्तन की सबसे बड़ी और सबसे दृश्यमान अभिव्यक्ति है. इस एक्सप्रेसवे की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इससे जुड़े हर जिले अपनी स्थानीय विशेषताओं को उद्योग और बाज़ार से जोड़ सकेंगे. यह हर जिले की अपनी पहचान को उसकी आर्थिक शक्ति में बदलने का एक सुविचारित और सुनियोजित खाका है. यही इस परियोजना की असली प्रतिभा है.&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;मेरा मानना है कि इसकी विशिष्टता को आसानी से समझा जा सकता है. एक्सप्रेसवे का प्रारंभिक बिंदु मेरठ के बिजौली गांव से है, जो दिल्ली-मेरठ एक्सप्रेसवे से जुड़कर राष्ट्रीय राजधानी से सीमलेस कनेक्टिविटी प्रदान करता है. आगे हापुड़ में एक्सप्रेसवे गढ़मुक्तेश्वर यानी ब्रजघाट को सीधे जोड़ता है, जहां गंगा स्नान की सदियों पुरानी महिमा है. यहां विशेष इंटरचेंज विकसित किए गए हैं ताकि श्रद्धालुओं की आवाजाही सहज हो.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;साथ ही, आलू और अन्य फसलों के लिए प्रसिद्ध इस जिले में कोल्ड स्टोरेज और फूड प्रोसेसिंग यूनिट्स स्थापित हो रही हैं. धार्मिक पर्यटन और एग्रो प्रोसेसिंग का यह संगम हापुड़ को एक नई आर्थिक पहचान देगा. बुलंदशहर की ताकत उसकी रणनीतिक लोकेशन है. जेवर स्थित नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट की निकटता इसे एक प्रमुख सप्लाई चेन और लॉजिस्टिक्स हब में बदल रही है, जहां डेयरी आधारित उद्योग ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई ऊर्जा देंगे. अमरोहा की कहानी और भी प्रेरक है. यह जिला अपने पारंपरिक ढोलक और लकड़ी के हस्तशिल्प के लिए देशभर में जाना जाता है, लेकिन अब तक वैश्विक बाज़ार उसकी पहुंच से बाहर था. गंगा एक्सप्रेसवे इस दूरी को पाट देगा.&lt;/p&gt;
&lt;h3 style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;एक्सप्रेसवे का सबसे लंबा हिस्सा केंद्रीय और रणनीतिक बिंदु&amp;nbsp;&lt;/strong&gt;&lt;/h3&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;संभल, जो सीमित कनेक्टिविटी के कारण विकास की दौड़ में पीछे रह गया था, अपने प्रसिद्ध 'हॉर्न और बोन' क्राफ्ट को अब राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय बाज़ारों से जोड़ने की स्थिति में है. स्थानीय कारीगरों को बेहतर दाम, स्थायी रोज़गार और वैश्विक पहचान मिलने का रास्ता खुल रहा है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;परंपरा से प्रगति की यह यात्रा ही गंगा एक्सप्रेसवे का असली चरित्र है. बदायूं में एक्सप्रेसवे के किनारे विकसित हो रही विशाल इंडस्ट्रियल टाउनशिप न केवल उद्योगों को, बल्कि शिक्षा और स्वास्थ्य क्षेत्र में भी निजी निवेश को आकर्षित करेगी. शाहजहांपुर में 3.5 किलोमीटर लंबी हवाई पट्टी, जहां आवश्यकता पड़ने पर फाइटर जेट्स उतर सकते हैं, यह बताती है कि यह एक्सप्रेसवे केवल आर्थिक नहीं, राष्ट्रीय सुरक्षा की दृष्टि से भी सामरिक महत्व का है. हरदोई से गुज़रता एक्सप्रेसवे का सबसे लंबा हिस्सा इसे इस मेगा कॉरिडोर का केंद्रीय और रणनीतिक बिंदु बनाता है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;उन्नाव अब लखनऊ और कानपुर के साथ मिलकर एक &amp;lsquo;ट्राई-सिटी इकोनॉमिक मॉडल&amp;rsquo; बन रहा है. कानपुर के विश्वप्रसिद्ध लेदर उद्योग के उत्पाद अब अंतरराष्ट्रीय बाज़ारों तक तेज़ी से पहुंचेंगे, निर्यात बढ़ेगा और रोज़गार के नए अवसर खुलेंगे.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;प्रतापगढ़ का प्रसिद्ध आंवला अब वैश्विक बाज़ार की दहलीज़ पर खड़ा है और अंत में प्रयागराज, जहां एक्सप्रेसवे का जुदापुर डांडू गांव पर समापन होता है, आस्था, न्याय और वाणिज्य का वह त्रिवेणी संगम बनेगा जहां कुंभ और माघ मेले के करोड़ों श्रद्धालुओं के साथ-साथ हाई कोर्ट और विश्वविद्यालयों से जुड़े लोगों का पश्चिमी उत्तर प्रदेश से आवागमन भी सहज और निर्बाध होगा.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;नीति-विशेषज्ञ कहते हैं कि &amp;lsquo;बुनियादी ढाँचे में किया गया एक रुपये का निवेश अर्थव्यवस्था में पांच रुपये का लाभ लेकर आता है.&amp;rsquo; गंगा एक्सप्रेसवे इस सिद्धांत का जीता जागता उदाहरण है. जब बाज़ार करीब आता है, किसान की उपज की कीमत बढ़ती है. जब लॉजिस्टिक्स सस्ता होता है, उद्योग लगते हैं. जब उद्योग लगते हैं, रोज़गार आता है और जब रोज़गार आता है, पलायन रुकता है. यह एक अखंड श्रृंखला है जिसकी हर कड़ी एक-दूसरे को मज़बूत करती है और यही योगी सरकार के एक ट्रिलियन डॉलर के सपने की असली बुनियाद है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;लेकिन गंगा एक्सप्रेसवे का सबसे गहरा और भावनात्मक आयाम धार्मिक एवं सांस्कृतिक पर्यटन के क्षेत्र में है. उत्तर प्रदेश भारत का वह प्रदेश है जहाँ आस्था की नदी सबसे गहरी बहती है. काशी, मथुरा-वृंदावन और प्रयागराज ये तीनों तीर्थ भारतीय आत्मा के सबसे पवित्र केंद्र हैं. प्रधानमंत्री मोदी की दूरदृष्टि से बने काशी विश्वनाथ धाम की भव्यता और राम जन्मभूमि अयोध्या के पुनरुद्धार के बाद इन तीर्थों में श्रद्धालुओं की संख्या कई गुना बढ़ चुकी है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;गंगा एक्सप्रेसवे इन महातीर्थों को एक सहज और सुगम धुरी में पिरो देगा. इस यात्रा पथ पर केवल बड़े तीर्थ ही नहीं हैं. चित्रकूट, जहाँ भगवान राम ने वनवास के चौदह में से ग्यारह वर्ष बिताए, और विंध्याचल, जहां मां विंध्यवासिनी का शक्तिपीठ स्थित है, ये दोनों धाम भी अब मुख्यधारा के तीर्थ सर्किट से जुड़ेंगे. इन धामों का पर्यटन राजस्व कई गुना बढ़ेगा. होटल, ढाबे, हस्तशिल्प, स्थानीय उत्पाद, गाइड &amp;nbsp;पर्यटन की समृद्धि समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचती है और यही 'सबका साथ, सबका विकास' का वास्तविक अर्थ है.&lt;/p&gt;
&lt;h3 style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;'पहले योजनाएं बनती थीं, फ़ाइलें चलती थीं, भ्रष्टाचार पलता था और...'&lt;/strong&gt;&lt;/h3&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;2025 के प्रयागराज महाकुम्भ ने सिद्ध कर दिया कि जब संसाधन और सुविधाएं हों तो श्रद्धालु दुनिया के कोने-कोने से आते हैं. मेरा मानना है कि गंगा एक्सप्रेसवे इस गति को स्थायित्व देगा. नीति आयोग के अनुमान के अनुसार भारत में धार्मिक पर्यटन का बाज़ार तेज़ी से बढ़ रहा है और उत्तर प्रदेश इसमें सबसे बड़ा हिस्सेदार बनने की स्थिति में है. गंगा एक्सप्रेसवे इस संभावना को वास्तविकता में बदलने का सबसे बड़ा माध्यम है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;पहले योजनाएं बनती थीं, फ़ाइलें चलती थीं, भ्रष्टाचार पलता था और उत्तर प्रदेश 'बीमारू' बना रहता था. आज परियोजनाएं समय पर पूरी होती हैं, स्थानीय श्रमिकों और संसाधनों को प्राथमिकता दी जाती है और लाभ जनता तक पहुँचता है. गंगा एक्सप्रेसवे के निर्माण में क्षेत्रीय संसाधनों का जो अधिकतम उपयोग किया गया, वह 'आत्मनिर्भर भारत' की सोच का जीवंत प्रतिफल है.&lt;/p&gt;
&lt;h3 style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;गंगा एक्सप्रेसवे सड़क नहीं, एक नई शुरुआत&lt;/strong&gt;&lt;/h3&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;जब डिफेंस कॉरिडोर, एक्सप्रेसवे नेटवर्क, नोएडा अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा और गंगा एक्सप्रेसवे मिलकर एक समग्र ढांचा बनाते हैं, तो उत्तर प्रदेश की एक ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था की कल्पना केवल कल्पना नहीं रहती, वह एक निकट और निश्चित भविष्य बन जाती है. गंगा एक्सप्रेसवे सड़क नहीं, एक नई शुरुआत है, उत्तर प्रदेश के पुनर्जागरण की पुनर्निर्माण की , उसकी असीमित क्षमता के उद्घोष की. जैसे गंगा का उद्गम गोमुख में होता है लेकिन उसका प्रभाव सागर तक जाता है, वैसे ही गंगा एक्सप्रेसवे का प्रभाव भी उत्तर प्रदेश की सीमाओं से बहुत आगे तक जाएगा.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;उत्तर प्रदेश का मूल निवासी होने के नाते यह और भी संतोष जनक है कि हमारा प्रदेश विकास के पथ पर बहुत तेज़ी से अग्रसर है जिससे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विकसित भारत के संकल्प को साकार करने में प्रदेश की महत्वपूर्ण भूमिका होगी . मोदी - योगी का यह उपयोगी संयोग सदियों दृश्यमान रहेगा .&lt;/p&gt;]]></description><slash:comments>0</slash:comments><media:thumbnail url="https://feeds.abplive.com/onecms/images/uploaded-images/2026/04/29/f5971fbcc7504fef9d7ecfc9155e875a1777441626877584_original.jpeg" width="220"/></item></channel></rss>