<?xml version="1.0" encoding="UTF-8"?><rss version="2.0" xmlns:content="http://purl.org/rss/1.0/modules/content/" xmlns:wfw="http://wellformedweb.org/CommentAPI/" xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/" xmlns:atom="http://www.w3.org/2005/Atom" xmlns:sy="http://purl.org/rss/1.0/modules/syndication/" xmlns:slash="http://purl.org/rss/1.0/modules/slash/" xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/"><channel><title>Opinion: युवाओं में मानसिक तनाव, एंग्जायटी और डिजिटल बर्नआउट, क्यों एक बढ़ती हुई चुनौती?</title><atom:link href="https://www.abplive.com/blog/feed" rel="self" type="application/rss+xml"/><link>https://www.abplive.com/</link><description/><lastBuildDate>Sun, 28 Jun 2026 21:10:14 +0530</lastBuildDate><language>en-US</language><sy:updatePeriod>hourly</sy:updatePeriod><sy:updateFrequency>1</sy:updateFrequency><generator>https://www.abplive.com</generator><item><title><![CDATA[Opinion: भरत तिवारी कांड ने बिहार के सामाजिक समीकरण को बदल दिया]]></title><link>https://www.abplive.com/blog/bharat-tiwari-encounter-case-may-change-bihar-social-equations-opines-manoj-mukul-3151649</link><comments>https://www.abplive.com/blog/bharat-tiwari-encounter-case-may-change-bihar-social-equations-opines-manoj-mukul-3151649#respond</comments><pubDate>Sat, 27 Jun 2026 19:14:03 +0530 </pubDate><dc:creator><![CDATA[ मनोज मुकुल ]]></dc:creator><category><![CDATA[ इंडिया ]]></category><guid isPermaLink="true">https://www.abplive.com/blog/bharat-tiwari-encounter-case-may-change-bihar-social-equations-opines-manoj-mukul-3151649</guid><description><![CDATA[&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;भरत तिवारी एनकाउंटर का मुद्दा बिहार की सियासत का टर्निंग प्वाइंट साबित हो सकता है. &amp;nbsp;इस हत्याकांड ने बिहार में जाति की राजनीति को फिर से जिंदा कर दिया है. विधानसभा चुनाव में जातीयता भुलाकर NDA को अप्रत्याशित जीत मिली थी. लेकिन इस कांड ने उस जाति के दौर को फिर से जिंदा कर दिया जिसे लोग पीछे छोड़कर आगे निकल रहे थे. भरत तिवारी के एनकाउंटर से पहले न तो पुलिस वालों ने सोचा रहा होगा और ना ही आदेश देने वालों ने. लेकिन जो हुआ और हो रहा है उसने मौजूदा मुख्यमंत्री की छवि को कोर वोटरों में बिगाड़ दिया.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;सम्राट चौधरी अपनी छवि एक मजबूत ताकतवर नेता की स्थापित करना चाहते थे. लेकिन इस मामले ने उन्हें अपनों का दुशमन बना दिया है. सम्राट को मालूम था कि उन्हें काँटों का ताज मिला है. बावजूद इसके उन्होंने इसे संभालने में भूल की. अब उनके खिलाफ पूरा सिस्टम एक्टिव होगा. अभी तत्कालिक तौर पर भले ही कोई नुकसान न हो लेकिन बीजेपी ने नुकसान तो कर लिया है . इसकी भरपाई पार्टी और मुख्यमंत्री कैसे करते हैं ये देखना रहेगा.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;पीके की अब जातिवादी राजनीति&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;सम्राट चौधरी के पास गृहमंत्रालय है. बिना उनके मंत्रालय की मर्जी के गोली चलाने का फैसला नहीं हो सकता. प्रशांत किशोर ने इस दबे हुए सवाल को हवा दी है.पीके अब तक जाति की राजनीति से दूर थे. लेकिन इस एपिसोड ने उन्हें सवर्णों खासकर ब्राह्मणों का नेता बनने की राह पर बढ़ा दिया है. पीके अब स्थापित तौर पर ब्राह्मण समाज के नेता होंगे इसमें कोई दो राय नहीं है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;भरत तिवारी कोई पेशेवर अपराधी नहीं था. उसने कोई बहुत बड़ा अपराध नहीं किया था. उसने हथियार दिखाकर पुलिस वालों को धमकाया ये गलत किया. लेकिन हथियार डालने के बाद उसको गोली मार देना वो भी एक दो नहीं तीन चार गोली. इस आरोप को पुख्ता करता है कि पुलिस ने गोली जानकर मारी . इस गुरूर में कि उनका कुछ नहीं बिगड़ेगा.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;पुलिस के आला अधिकारी मान लिए कि गलती हुई लेकिन मुख्यमंत्री और उनके समाज के शुभचिंतक नहीं मान पाए. गलती हुई. पहले दूसरे दिन ही कोई प्रशासनिक कार्रवाई हो जाती तो सम्राट चौधरी हीरो बन जाते. अब ऐसा लग रहा जैसे सम्राट विलेन हो चुके हैं. इसका दाग़ उन्हें राजनीतिक करियर में क्या नुकसान करेगा ये तो नहीं पता लेकिन इतना तय हो गया कि इस हत्याकांड ने सत्ता के समर्थन और विरोध में नया समीकरण खड़ा कर दिया है. जिस तरह से यादव जाति के लोग खुलकर भरत तिवारी के समर्थन में उतरे. और जिस तरह से कुशवाहा नेताओं ने इस एनकाउंटर को सही साबित करने के लिए भड़काऊ बयान दिए उसने सामाजिक सियासत की नई लकीर खींच दी है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;सवर्णों की नाराजगी का खामियाजा&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;उपेंद्र कुशवाहा, नागमणि, रामेश्वर महतो, संतोष कुशवाहा जैसे मुख्यमंत्री के स्वजातीय नेताओं ने एनकाउंटर को सही बताया उससे ये स्पष्ट है कि अब जातीय ध्रुवीकरण में कुशवाहा जाति को आगे की लड़ाई बहुत जगह अकेले लड़नी पड़ सकती है. सम्राट सरकार में बेटा मंत्री नहीं बना तो आनंद मोहन ने पहले ही मोर्चा खोल रखा था. बृजबिहारी प्रसाद की पुण्य तिथि में बीजेपी के पहले सीएम का जाना भूमिहारों को खल गया. और इस एनकाउंटर में ब्राह्मण. ये तीनों जातियां बीजेपी की समर्थक हैं. लेकिन इस वक्त जमीन पर तीनों नाराज.&amp;nbsp; याद कीजिए 2022 में बोचहाँ विधानसभा का उपचुनाव. 2020 में nda की सरकार बनने के बाद पहले उपचुनाव था . Vip के विधायक मुसाफ़िर पासवान के निधन से सीट खाली हुई.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;तब बीजेपी ने तारकिशोर प्रसाद और रेणु देवी को डिप्टी सीएम बनाया था. भूमिहारों में नाराजगी थी. NDA के 100 विधायक , 20 से ज्यादा सांसद और केंद्रीय मंत्री को बीजेपी ने उपचुनाव के प्रचार में उतारा, गिरिराज सिंह, ललन सिंह पैदल घूम रहे थे. बावजूद इसके NDA को ओपन चैलेंज देकर भूमिहारों ने हरवा दिया. राजद की जीत हुई . सुशील मोदी ने खुलकर कहा कि भूमिहार, ब्राह्मण सरकार से खुश नहीं हैं. इस चुनाव के 3 महीने बाद नीतीश ने रास्ता बदल लिया. बीजेपी विपक्ष में चली गई.&amp;nbsp; भूमिहारों की नाराजगी दूर करने के लिए तब बीजेपी ने विजय सिन्हा को नेता विपक्ष बनाया.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;ललन सिंह जेडीयू के अध्यक्ष बने. ये प्रकरण बीजेपी और जेडीयू के नेता भूले नहीं होंगे. &amp;nbsp;भरत तिवारी का मुद्दा सेंटीमेंटल इसलिए हो गया है क्योंकि पुलिस मान चुकी है कि गलती हुई. सारे सबूत फर्जी भरत एनकाउंटर को पुख्ता कर रहे. लाइव वीडियो की वजह से भरत को समाज का शुभचिंतक माना गया. अब जो मीडिया में खुलासे हो रहे हैं वो पुख्ता कर रहा है कि भोजपुर में भ्रष्टाचार का भारी खेल चल रहा था. पूरे देश में ब्राह्मण समाज, सवर्ण समाज साथ खड़ा हो गया, जुलूस निकल रहे, प्रदर्शन हो रहे.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;मधुबनी में ताज़िया के जुलूस में भरत के समर्थन में नारे लगे, पोस्टर लहराए गए . साफ है कि एक वर्ग में भारी नाराजगी है.&amp;nbsp; सरकार ने जो काम हफ्ते भर बाद किया वो पहले दूसरे दिन कर लिया होता तो चीजें हाथ से नहीं निकलती. अब इसकी कीमत बीजेपी के सवर्ण नेता और कार्यकर्ता चुकाएंगे. इस भरोसे के भरने में टाइम लगेगा.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;[नोट- उपरोक्त दिए गए विचार लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. यह ज़रूरी नहीं है कि एबीपी न्यूज़ ग्रुप इससे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही ज़िम्मेदार है.]&amp;nbsp;&lt;/p&gt;]]></description><slash:comments>0</slash:comments><media:thumbnail url="https://feeds.abplive.com/onecms/images/uploaded-images/2026/06/27/51c96ff268c7bc3b7971a0a96d4c4eea1782567564376120_original.jpg" width="220"/></item><item><title><![CDATA[Opinion: लखनऊ आग की घटना ने जब सीएम योगी को अंदर तक झकझोर दिया, संवेदनशील नेतृत्व का मानवीय स्पर्श]]></title><link>https://www.abplive.com/blog/lucknow-fire-incident-uttar-pradesh-cm-yogi-adityanath-get-emotional-3149764</link><comments>https://www.abplive.com/blog/lucknow-fire-incident-uttar-pradesh-cm-yogi-adityanath-get-emotional-3149764#respond</comments><pubDate>Tue, 23 Jun 2026 23:15:18 +0530 </pubDate><dc:creator><![CDATA[ एके जैन ]]></dc:creator><category><![CDATA[  ]]></category><guid isPermaLink="true">https://www.abplive.com/blog/lucknow-fire-incident-uttar-pradesh-cm-yogi-adityanath-get-emotional-3149764</guid><description><![CDATA[&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;कुछ घटनाएं पूरे समाज की चेतना को झकझोर देती हैं और इतनी पीड़ादायी होती हैं कि उनका दंश पूरी जिंदगी भर सालता है. ऐसे में जब कोई मुख्यमंत्री शासक की अपनी भूमिका का निर्वहन करते हुए भी एक अभिभावक की तरह लोगों के दुःख-दर्द पर अपने मर्म भरे हाथ रखता है, तो उसमें यह भाव भी होता है कि वेदना की इस घड़ी में मैं आपके साथ हूं और यह भाव जख्मों पर शीतल मरहम की तरह लोगों का संबल बन जाता है. लखनऊ के अलीगंज में आग से जलकर 15 बच्चों की मौत ऐसी पीड़ादायक घटना है, जिसकी भरपाई तो संभव नहीं लेकिन मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने ऐसे समय अपनी संवेदनशीलता का जो मानवीय स्पर्श व्यथित परिजनों को दिया, वह शासन का एक जिम्मेदार चेहरा है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;सत्ता के शीर्ष पर बैठा व्यक्ति जब लोगों की व्यथा में उनके साथ दिखाई देता है तो न्याय की उम्मीद भी बढ़ जाती है. &amp;nbsp; करुणा और कठोरता दोनों ही सुशासन के महत्वपूर्ण आयाम हैं. संवेदना यदि पीड़ित के घावों पर मरहम रखती है, तो कठोरता यह सुनिश्चित करती है कि कोई भी दोषी बचे नहीं और पीड़ितों को न्याय मिले. लेकिन, यह तभी संभव है जब नेतृत्व संवेदनशील हो. लखनऊ में जिस समय यह घटना हुई, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ अलीगढ़ में एक जनसभा को संबोधित कर रहे थे.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;कार्यक्रम की बीच आग की सूचना&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;भाषण चल रहा था, मंच सजा था, कार्यक्रम में उत्साह था और तभी उन्हें वह खबर मिली जिसने उन्हें भीतर तक झकझोर दिया. उन्होंने पीड़ा भरे स्वर में मंच से कहा, &amp;lsquo;मुझे आज अलीगढ़ में रुकना था लेकिन अभी-अभी लखनऊ में एक दुखद घटना की जानकारी मिली है जिसमें कुछ बच्चों की अग्निकांड में मृत्यु हो गई है. मैंने अधिकारियों को वहां भेजा है और स्वयं भी तुरंत लखनऊ लौट रहा हूं.&amp;rsquo; यह एक मुख्यमंत्री के भीतर के इंसान की आवाज़ थी, जो घटना से व्यथित था और अपनी जिम्मेदारियों को जल्द से जल्द पूरा करने का आग्रही था.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;उनका मंतव्य समझते हुए उप-मुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक घटनास्थल पर पहुंच चुके थे और विह्वल थे. लखनऊ पहुंचते ही मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ सीधे घटनास्थल पर गए और वहां का निरीक्षण किया. जब एक मुख्यमंत्री किसी घटना का संज्ञान लेकर खुद मैदान में उतरता है तो प्रशासनिक मशीनरी भी उतनी ही सक्रिय हो जाती है. वह घायलों को देखने केजीएमयू अस्पताल भी गए और मृतकों के परिजनों को को धीरज बंधाया. आश्वस्त किया कि दोषी किसी भी सूरत में बख्शे नहीं जाएंगे.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;आक्सीजन सपोर्ट पर अपना इलाज करा रही एक युवती से उन्होंने बात कर पूरी जानकारी ली. मृतकों के परिजनों को पांच-पांच लाख रुपये और घायलों को 50-50 हजार की आर्थिक सहायता की घोषणा की. शाम तक यह राशि शोक संतप्त परिवारों को सौंप भी दी गई. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी पीएमएनआरएफ से दो-दो लाख रुपये देने का ऐलान किया.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;आर्थिक मदद से किसी का जीवन नहीं लौटता, लेकिन यह संदेश जरूर देता है कि व्यवस्था उदासीन नहीं है, आपके साथ है. रात में ही रक्षामंत्री और लखनऊ के सांसद राजनाथ सिंह भी घटनास्थल और अस्पताल पहुंच गए, जो इस बात का प्रतीक था कि चाहे केंद्र सरकार हो या राज्य सरकार, आपदा की स्थिति में लोगों को अकेला नहीं छोड़ती. &amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;राजनीति की परिभाषाएं बहुत हैं, लेकिन जब कोई राजनेता अपना कार्यक्रम बीच में छोड़कर, मंच से उठकर, दर्द की आग में जलते किसी परिवार के पास दौड़ता है और उनके आंसू पोछता है तो सारी परिभाषाएं धूमिल पड़ जाती हैं. रह जाती है सिर्फ मनुष्यता की परिभाषा. लेकिन इसके साथ ही प्रशासकीय दायित्वों का निर्वहन भी जरूरी है. आधी रात तक मुख्यमंत्री के आवास पर उच्चस्तरीय बैठकें चलती रहीं. लापरवाही बरतने वाले चार अधिकारियों को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया गया. बिल्डिंग मालिक वीरेंद्र प्रसाद शुक्ला सहित चार मुख्य आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया गया.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;अलीगंज थाने में छह नामजद अभियुक्तों समेत अन्य जिम्मेदारों के खिलाफ एफआईआर दर्ज हुई. अपर मुख्य सचिव अमृत अभिजात और अपर पुलिस महानिदेशक प्रवीण कुमार की दो सदस्यीय एसआईटी गठित की गई, जिसे सात दिनों में रिपोर्ट सौंपने का निर्देश दिया गया. इसका संदेश दूर तक गया. कानपुर में फिजिक्स वाला सहित 22 कोचिंग संस्थानों को सील कर दिया गया. प्रदेश में हर कोचिंग संस्थान जाकर इस बात की पड़ताल शुरू हो गई कि वहां बच्चों के लिए क्या सुरक्षा उपाय हैं. भविष्य की त्रासदियों को रोकने के लिए भी यह जरूरी है. &amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;संजीदा होकर स्थिति संभाली&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;राज्य में जब भी आपदा की स्थिति आई है, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की संवेदनशीलता उभार पर देखने को मिली है. आंधी, आकाशीय बिजली, अतिवृष्टि या दुर्घटनाओं से प्रभावित परिवारों को समय पर राहत पहुंचे, यह उन्होंने हर बार सुनिश्चित किया है. यहां तक कि सभी जिलों के प्रभारी मंत्रियों को भी ऐसे परिवारों से मुलाकात कर उनका दुःख-दर्ट बांटने के निर्देश हैं. उत्तर प्रदेश में जब भी कोई बड़ी प्राकृतिक या मानवजनित आपदा आई, मुख्यमंत्री ने अपना दफ्तर छोड़ा और स्वयं उस दर्द के पास जाकर खड़े हुए. पूर्ववर्ती शासकों से इसी भिन्नता ने उन्हें जननायक बनाया है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;प्रयागराज में महाकुंभ-25 के दौरान हुई भगदड़ में भी उन्होंने सुनिश्चित किया कि हर प्रभावित तक राहत और मुआवजा पहुंचे और ऐसे इंतजाम कराए कि दोबारा इसकी पुनरावृत्ति न हो. कोविड-19 महामारी के दौरान जब लाखों प्रवासी मजदूर सड़कों पर थे, तब भी योगी सरकार संकटमोचक बनी. यह ऐसा शासन-दर्शन है, जिसमें सत्ता केवल कुर्सी नहीं, जिम्मेदारी का भाव देती है. &amp;nbsp; अलीगंज अग्निकांड को लेकर सीएम योगी की गंभीरता का अहसास इसी बात से लगाया जा सकता है कि उन्होंने अगले दिन के अपने सभी आधिकारिक कार्यक्रम रद्द कर दिए.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;उम्मीद है कि एसआईटी भी अपनी जांच को पूरी गंभीरता से अंजाम देकर इस अग्निकांड के लिए दोषी लोगों को कठोर दंड दिलाना सुनिश्चित कराएगी. ऐसा होने पर नियम-कानूनों की अवहेलना करने वालों और उनको प्रश्रय देने वालों तक शासन का कठोर संदेश पहुंचेगा. इससे होने वाले संभावित हादसों को भी रोका जा सकेगा, ताकि किसी और बच्चे या निर्दोष की जान न जाए. &amp;nbsp; सत्ता के गलियारों में अनेक नेता आते हैं.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;वादे करते हैं, लेकिन जो नेता दर्द की आग के पास जाकर खड़ा होता है, लोग उसे ही याद रखते हैं. सरकार की संवेदनशीलता तब पूरी होती है, जब वह आंसू पोंछने के बाद उस वातावरण को भी समाप्त करे जो इन आंसुओं का कारण बना. सुरक्षा एक स्थायी प्रतिबद्धता है. जो चला जाता है, वह लौटता नहीं, यह कठोर सच है लेकिन जब एक मुख्यमंत्री रोती हुई मां के सिर पर हाथ रखता है, अस्पताल में बिस्तर पर पड़े बच्चे का हाथ थामता है, तो एक असहाय परिवार को भरोसा मिलता है. यही वह विश्वास का धागा है, जो सरकार और जनता के बीच बंधा होता है और जिसकी मजबूती लोकतंत्र के लिए बहुत जरूरी है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;[नोट- उपरोक्त दिए गए विचार लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. यह ज़रूरी नहीं है कि एबीपी न्यूज़ ग्रुप इससे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही ज़िम्मेदार है.]&amp;nbsp;&lt;/p&gt;]]></description><slash:comments>0</slash:comments><media:thumbnail url="https://feeds.abplive.com/onecms/images/uploaded-images/2026/06/23/38837dff2d59c59e49a660d7de13bc5c1782236371171120_original.jpg" width="220"/></item><item><title><![CDATA[Opinion: उत्तर प्रदेश के ग्रामीण समाज में जाति धर्म के आगे प्रेम-हत्या क्यों बढ़ रही है?]]></title><link>https://www.abplive.com/blog/uttar-pradesh-why-horror-killing-cases-increased-know-reasons-3148104</link><comments>https://www.abplive.com/blog/uttar-pradesh-why-horror-killing-cases-increased-know-reasons-3148104#respond</comments><pubDate>Sat, 20 Jun 2026 13:35:04 +0530 </pubDate><dc:creator><![CDATA[ एबीपी लाइव ]]></dc:creator><category><![CDATA[  ]]></category><guid isPermaLink="true">https://www.abplive.com/blog/uttar-pradesh-why-horror-killing-cases-increased-know-reasons-3148104</guid><description><![CDATA[&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ जिले के लालगंज में पिता ने रेस्टोरेंट में बेटी और उसके प्रेमी को गोली मार दी. गौरतलब है कि आजमगढ़ में इस दौरान कई ऐसी घटनाएं हुई जहां लड़के लड़की के बीच प्रेम संबंधों की वजह से हत्याएं या हिंसक वारदातें हुई है और उन घटनाओं में इसाफ की मांगों की आवाज उंचे स्वरों में गूंजी. लेकिन लालगंज घटना में इंसाफ की मांग उस तरह से नहीं उठी. आखिर क्यों ? &amp;nbsp;क्या शायद इसलिए कि पिता ने बेटी को मारा. क्या इसका मतलब यह कि हमारा समाज इस क़त्ल को इंसाफ के बतौर देखता है. इस तरह के सवालों का जवाब ढूंढने की कोशिश यहां हम कर सकते हैं.&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;लाल गंज की घटना के बाद शायद ही कोई राजनीतिक या सामाजिक संगठन के लोग लड़की और लड़के के घर गए हो और घटना पर प्रतिक्रिया दी हो. एक तरह से चुप्पी और सन्नाटा. फिर सवाल इस तरह से उभरा कि क्या ये सब इसलिए देखने को मिल रहा है क्योंकि दोनों एक ही जाति के है. जिसे क्षत्रीय जाति कहते हैं. अगर दोनों अलग जातियों के होते तो ऐसा नहीं होता.क्या प्रेम संबंधों की हत्या कोई राजनीतिक दायरे का विषय नहीं है? बेटी की पिता द्वारा की गई हत्या की कारवाई पितृसत्तात्मक विचारधारा के विरोध का आधार नहीं बनता है ? &amp;nbsp; क्या इनकी हत्या के बाद इंसाफ का दायरा सिकुड़ ही नहीं जाता है बल्कि इंसाफ के दरवाजे बंद हो जाते हैं. अगर हम इंसाफ की मांग नहीं करते तो क्या इस हत्या को जायज मानते हैँ या इससे मुँह छिपा लेना ही उचित समझा जाता है. इस तरह भारतीय समाज में जडता के समर्थक होने के अलावा कोई और प्रमाण नहीं दे रहे हैं. &amp;nbsp;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;क्यों बढ़ रहे हॉरर किलिंग के मामले?&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;इस घटना के दूसरे दिन लालगंज उस रेस्टोरेंट पर गया जिसके मालिक रेस्टोरेंट का सामान हटा रहे थे. पूछने पर कहा कि बंद कर रहे हैँ. वे कुछ व्यक्तियों से लड़की और लड़के के घर के बारे में पूछने पर पिता द्वारा की गई वारदात को जायज ठहराते हुए गौरवान्वित भाव में घटना की कहानी सुनाते हैँ. आखिर उस लड़की के इंसाफ की बात किससे करते. &amp;nbsp;लड़के के घर का पताकर पहुंचे तो मालूम चला कि वाराणसी में किसी अस्पताल में भर्ती है जहां उसका आपरेशन होने वाला है.&lt;br /&gt;इस घटना के अलावां पिछले दिनों कई घटनाओं में देखने को आया कि समाज में प्रेम को लेकर हो रही घटनाओं में जाति और धर्म के इर्द गिर्द ज़्यदा बहसें हुई है. निश्चित रूप से जाति और धर्म हमारे समाज पर अपना वर्चस्व रखता है . पर प्रेम को अस्वीकार करता समाज भी वास्तविकता है और सम्मान के लिए हत्या या हिंसा को जायज ठहराते हुए दिखता है. क्या यही जाति और धर्म का भी सच है ?&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;आजमगढ़ के जीयनपुर में एक दलित युवक की एक यादव जाति की लड़की से प्रेम के चलते सरेराह पीटने के वीडियो के साथ उसकी मृत्यु की चर्चा खूब हुई. मृतक के घर वालों का आरोप था कि उसे पीटने के बाद दवा के नाम पर जहर खिला दिया गया. वहीं लड़की की तरफ वालों का कहना था कि उसने खुद जहर खाया. इस मामले में जब लड़की भी सामने आई तो उसने कहा कि उसने खुद जहर खाकर उसके घर वालों को आरोप लगा दिया. इसके बाद तो सोशल मीडिया पर लड़के और लड़की की फोटो वायरल होने लगी. जाँच और कानून तय करेगा कि हकीकत क्या है. पर जो बातें आईं उससे साफ है कि यह प्रेम का मामला था. चाहे वह आपस में किसी तरफ से कम या ज्यादा रहा हो. उस दलित युवक को पीटा गया यह हकीकत वायरल वीडियो से स्पष्ट है. आखिर उस दलित युवक को प्रेम की&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;वजह से ही पीटा गया. यह पिटाई जातीय विद्वेष के साथ सामाजिक ऊंच-नीच तथाकथित सम्मान के नाम पर ही की गई. जैसे पहली घटना जिसमें क्षत्रीय जाति लड़का लड़की का था उसमें दबे स्वर में यही कहा जा रहा था कि एक ही जाति के थे सुलझा लेना चाहिए था .उसी तरह दलित युवक जो कि सरकारी नौकरी करता था , उसके सम्बद्ध में कहा गया कि जाति को भूल जाना चाहिए था. आखिर लड़का सरकारी नौकरी कर रहा था.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;इससे अलग आजमगढ़ के ही तरवाँ थाने में दलित युवक की हिरासत में मौत के बाद बड़े पैमाने पर विरोध और आगजनी हुई. लड़के के परिवार का कहना था कि जिस लड़की की वजह से यह सब हुआ उसी लड़की के घर के सामने अंतिम संस्कार करेंगे. मामला यह था कि लड़का-लड़की एक जाति के थे. लड़की के पिता अध्यापक और लड़के के पिता देश के एक महानगर में मजदूर. घटना के कुछ दिनों पहले ही लड़की के घर वालों ने पुलिस को शिकायत की जिसको लेकर दोनों पक्षो में समझौता हुआ कि दोनों बात नहीं करेंगे. फिर हुआ कि दोनों बात फिर से करने लगे. जिसकी शिकायत थाने को की गई. &amp;nbsp;थाने ने फिर से लड़के को हिरासत में लिया और हिरासत में लड़के की मौत हो गई.&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;राजनीतिक-सामाजिक संदर्भों में हिरासत में दलित युवक की हत्या और इंसाफ का सवाल ही उठा. जिस प्रेम की वजह से हत्या हुई उसके विषय में बातचीत नहीं हुई क्योंकि उसकी सामाजिक अस्वीकारता है. जबकि उस युवक की मौत का कारण प्रेम था. दो व्यक्तियों के प्रेम को कैसे समाज-परिवार तय करेगा.परिवार की भी क्या सीमाएं हो सकती है. क्या प्रेम इसलिए अस्वीकार कर दिया जाएगा कि दोनों एक ही गांव में चंद फासले पर उनके घर थे. यहाँ शायद एक जाति होने के बाद भी यह बात नहीं कही गई क्योंकि कि दोनों एक जाति के.&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;यहाँ ग्रामीण-शहरी समाज, आधुनिकता बनाम रूढ़ि और एक जाति के होने के बावजूद वर्ग के अन्तर्विरोधों को नजर अंदाज किया जा रहा. एक फिल्मी गाना है मेरे सामने वाली खिड़की में चांद का टुकड़ा रहता है. क्या इस गाने को जिस ग्रामीण समाज में गांव की लड़की को पूरे गांव की लड़की, बहन या मां के रूप में देखा जाता है वहां सोचा जा सकता है. अगर सोचेंगे तो क्या वह ग्रामीण ढांचा इसकी इज़ाज़त देगा. एक नजरिए से देखें तो यह परम्परा ग्रामीण ढांचे को मजबूत करती है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;ऐसे में व्यक्ति के लिए स्वयत्ता-स्वतंत्रता जैसे शब्द बेमानी हो जाते हैं. आधुनिकता बनाम रूढ़ि के इस संघर्ष में वर्गीय चरित्र भी अहम है .लड़की का पिता अध्यापक और लड़के का पिता मजदूर. प्रेम तो जाति-पूंजी को भुला देता है. पर इन प्रेमियों का जो सामाजिक घेराव है ,वह इसी आधार पर खड़ा है. उसका अस्तित्व,मान-सम्मान, स्वाभिमान सब इसी पर टिका है. यह इतना मजबूत है कि सामाजिक राजनीतिक संगठन भी इसके खिलाफ तो दूर इस पर बात नहीं करेंगे.&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;झूठी शान के नाम पर कत्ल&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;मुस्लिम समाज के ऊपर धार्मिकता का लेबादा लगाकर लव जेहाद का आरोप लगाया जाता है. खासतौर जब हिन्दू लड़की से मुस्लिम लड़का प्रेम विवाह से जुड़ जाता है. उस मुस्लिम समाज में भी लड़के-लड़की के कई मामलों में यह सुना जाता कि मुस्लिम लड़कियां मर गयीं थीं क्या. सबसे बड़ा सवाल लड़की जाति कैसे तय कर सकती है. यह वो मानसिकता है जो किसी की जान तक ले सकती है. यह तय न करने के अधिकार के बगैर कितनी कहानियां अधूरी रह जाती हैँ.&lt;br /&gt;सोचिए वह लड़की जिसके प्रेम की हत्या हो गई, वह क्या जिंदगी भर अपने जीवन की सबसे बड़ी त्रासद घटना को भूल सकेगी. उसे तो उस चाहरदिवारी में रोने-सिसकने का अधिकार नहीं. दूसरी तरफ वो परिवार उसे अपने बेटे को लील ले जाने वाली के रूप में देखता है. वह समाज जो सम्मान के नाम पर हुई हत्या पर दम्भ भरता है, वह उस लड़की के चरित्र का प्रमाणपत्र बांटता है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;इस तरह की मानसिकता जाति विशेष तक सीमित नहीं है. आजमगढ़ के कप्तानगंज में पिछले दिनों दलित समाज की लड़की से फोन पर बात करने को लेकर पिछडी राजभर जाति के लड़के की हत्या हो गई. इसी थाने के एक गांव में एक पिछडी जाति की लड़की और दलित जाति के लड़के के बात करने का मामला थाने गया तो थाने वालों ने सुबह बुलाया. लेकिन सुबह तो सबने देखी सिवाय उस लड़की के. लड़की ने फांसी लगाकर जान दे दी . ऐसा अख़बारों में दर्ज हुआ. ये सब लड़के-लड़कियां लगभग वे हैँ जो अभी कुछ बालिग़ होने की सीढ़ी चढ़ रहे. कुछ प्रेम में बालिग़ हुए जहाँ अपने को परिपक्व कहने वाले समाज की व्यवस्था ने उनकी जान ले ली.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;वैसे तो लड़के-लड़कियों दोनों को इसे झेलना पड़ता है. लड़कों की लड़ाई तो पुरूषवादी समाज में आत्म सम्मान स्वाभिमान के नाम पर थोड़ी लड़ ली जाती है. पर लड़कियों के इंसाफ की लड़ाई तो दूर उससे ज़्यादा उठाने पर कोसने के लिए होती है. यही सभ्य समाज कहता है. बंद करो इज्जत की क्यों बाट लगा रहे. हाँ जातीय या धार्मिक दृष्टिकोण &amp;nbsp;सामाजिक-राजनीतिक बहसो में रहती है. प्रेम संबधों को स्वीकारने को खुलेमन से तैयार नहीं.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;आजमगढ़ शहर में ही एक स्कूल की बच्ची के छत से कूदने की खबर आई. छत से कूदने से पहले बच्ची को प्रिंसिपल के रूम से निकलते हुए सीसीटीवी फुटेज में देखा गया. सवाल उठा कि ऐसा क्या हुआ जो उसने ऐसा कदम उठाया. आरोप मढ़ देना आसान है. उसके पास से मोबाइल फोन और कुछ आपत्तीजनक वस्तुएं मिली. शायद उसको किसी से प्रेम था ऐसा भी. सवाल है कि प्रेम था तो ऐसा क्या हो गया जो वह बच्ची अपनी जिंदगी से नफरत कर बैठी.&lt;/p&gt;
&lt;div id=&quot;article-hstick-inner&quot; class=&quot;abp-story-detail abp-story-detail-blog&quot;&gt;
&lt;p&gt;&lt;strong&gt;[नोट- उपरोक्त दिए गए विचार लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. यह ज़रूरी नहीं है कि एबीपी न्यूज़ ग्रुप इससे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही ज़िम्मेदार है.]&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;/div&gt;
&lt;div class=&quot;article-footer&quot;&gt;
&lt;div class=&quot;article-footer-left &quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;/div&gt;]]></description><slash:comments>0</slash:comments><media:thumbnail url="https://feeds.abplive.com/onecms/images/uploaded-images/2026/06/20/d72d99856f141679fa3f516b3edd38191781942570629120_original.jpg" width="220"/></item><item><title><![CDATA[Opinion: दलगत भावना से ऊपर सीएम योगी आदित्यनाथ का राजधर्म]]></title><link>https://www.abplive.com/blog/uttar-pradesh-chief-minister-yogi-adityanath-work-style-above-party-politics-3148095</link><comments>https://www.abplive.com/blog/uttar-pradesh-chief-minister-yogi-adityanath-work-style-above-party-politics-3148095#respond</comments><pubDate>Sat, 20 Jun 2026 13:11:22 +0530 </pubDate><dc:creator><![CDATA[ आलोक चंद्रा ]]></dc:creator><category><![CDATA[  ]]></category><guid isPermaLink="true">https://www.abplive.com/blog/uttar-pradesh-chief-minister-yogi-adityanath-work-style-above-party-politics-3148095</guid><description><![CDATA[&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;राजनीति में प्रतिद्वंद्विता का अपना व्याकरण होता है और कोई भी राजनेता अपने विरोधी पर आक्रमण से नहीं चूकता. ऐसा स्वाभाविक भी है क्योंकि हर दल की अपनी विचारधारा होती है, चुनावी रणनीतियां होती हैं और इसी के आधार पर जनता उनका आकलन करती है. लेकिन, जब कोई शासक दलगत सीमाओं को लांघकर समाज के समग्र हित में खड़ा होता है, तो वह राजनीति में विशिष्ट दिखाई देने लगता है. वह राजधर्म का पालन करने वाले शासक के रूप में दिखाई देने लगता है. ऐसे समय में जबकि राजनीतिक संस्कृति का क्षरण होने लगा है, जहां विरोधी दल के नेता को शत्रु मानकर बयानबाजियां की जाने लगी हैं, यहां तक कि परिवार तक को निशाने पर लिया जाने लगा है, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ राजधर्म का पालन करते हुए राजनीति का आदर्श प्रस्तुत करते हुए एक सामान्य राजनेता से ऊपर दिखाई देते हैं.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;पूर्व मुख्यमंत्री और समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव की बेटी को लेकर जब कुछ लोगों ने सोशल मीडिया पर भ्रामक और आपत्तिजनक सामग्री फैलाई तो सीएम योगी ने न सिर्फ इसे गंभीरता से लेते हुए मुकदमा दर्ज करने का निर्देश दिया बल्कि आजमगढ़ में सभा के दौरान ऐसे लोगों को स्पष्ट संदेश भी दिया- &amp;lsquo;बेटी के खिलाफ कोई भी अपमानजनक टिप्पणी स्वीकार नहीं है. बेटी तो बेटी है. हम उन संस्कारों में पले-बढ़े हैं जहां गांव की बेटी सबकी बेटी होती है, बहन पूरे गांव की होती है.&amp;rsquo; ऐसे संकल्प मुख्यमंत्री के सांस्कारित सामाजिक बोध को दर्शाते हैं.&amp;nbsp; राजनीति में प्रतिद्वंद्विता की परिभाषा में विरोधी को कमज़ोर करना, उसके आधार क्षेत्रों की उपेक्षा करना और उसके अतीत से गड़े मुर्दे उखाड़कर वार करना आदि तरीके शामिल हैं.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;सोशल मीडिया में यह तरीके और भी आक्रामक हो जाते हैं जिसमें अब नेताओं के परिवार को शामिल करने की विकृति भी दिखाई देने लगी है. यह राजनीतिक संस्कृति का वह क्षरण है जिस पर समाज के हर सचेत व्यक्ति को चिंता होनी चाहिए. ऐसे में समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव की बेटी को लेकर की गई टिप्पणी पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने जो कदम उठाया, वह राजनीतिक आचार-व्यवहार का आदर्श है जिसमें यह संदेश निहित है कि सत्ता का उपयोग केवल अपने दल के हितों की रक्षा के लिए न होकर समता का होना चाहिए. लोकतंत्र में मतभेद संभव है, विवाद संभव है, तीखी बहसें भी स्वीकार्य हैं लेकिन व्यक्तिगत गरिमा का हनन नहीं होना चाहिए और मन भेद भी नहीं होना चाहिए.&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;योगी सरकार में यह वैचारिक परिपक्वता और गहरी तथा व्यापक नज़र आती है. उत्तर प्रदेश में चल रहे विकास कार्यों की ही बात करें. प्रदेश की राजनीति में एक अलिखित और पक्षपातपूर्ण नियम दशकों से चला आ रहा था, विकास वहीं जहां सत्ता के विधायक हों. इस व्यवस्था का कोई आदेश नहीं जारी होता था लेकिन नेता, अधिकारी और यहां तक कि &amp;nbsp;जनता भी जानती थी. सत्ता के इस सौतेलेपन को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने तोड़ा. आजमगढ़ का ही उदाहरण लें, जहां आतंकवाद की जड़ें थीं, पिछड़ेपन का बोझ था, अपराधियों का बोलबाला था, योगी सरकार की प्राथमिकता से वहां बदलाव हुआ. राजनीतिक रूप से आजमगढ़ में सपा का वर्चस्व रहा है. पहले मुलायम सिंह यादव फिर अखिलेश यादव का प्रभाव रहा है .&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;वर्तमान में भी यहां न भाजपा का कोई विधायक है और न ही सांसद. मुख्यमंत्री ने राजनीतिक प्रतिशोध की राह नहीं अपनाई और आज़मगढ़ को पूर्वांचल एक्सप्रेसवे, विश्वविद्यालय, एयरपोर्ट, संगीत महाविद्यालय आदि क्या कुछ नहीं मिला.&amp;nbsp; योगी मानते हैं कि विकास को वोट के तराजू पर नहीं तौला जाना चाहिए. रामपुर उनकी इस अवधारणा को चरितार्थ करता है. रामपुर वर्षों तक एक ऐसा राजनीतिक किला बना रहा, जहां एक नेता की इच्छा ही कानून था. केंद्र व राज्य की योजनाएं भी उक्त नेता के अनुग्रह की मोहताज थीं. वहां की किलेबंदी टूटी तो समावेशी भाव में विकास भी हुआ. मैनपुरी को भी इस श्रृंखला में रखा जा सकता है जो सपा की भावनात्मक धड़कन है. वहां भी सरकारी योजनाओं ने अपना रास्ता बनाया.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;जल जीवन मिशन का पानी उन घरों की रसोई तक भी पहुंचा जिनके दरवाजों पर समाजवादी पार्टी का झंडा लहरा रहा था. यह भी सबका साथ सबका विकास कि नीति पर केंद्रित था. 2024 के लोकसभा चुनाव में सपा ने कई सीटों पर जीत हासिल की लेकिन योगी सरकार ने संकुचित मानसिकता नहीं दिखाई और वहां भी अनवरत विकास कार्य होते रहे. सदियों से पलायन और सूखे का दंश झेल रहा बुंदेलखंड किसी एक दल का अभेद्य गढ़ भले ही नहीं रहा लेकिन योगी सरकार में बुंदेलखंड एक्सप्रेसवे का उपहार उसे भी मिला.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;विकास को वोटों की दृष्टि से न देखना ही लोकतांत्रिक परिपक्वता की असली पहचान है. सत्ता में ऐसा ही नैतिक साहस होना चाहिए.&amp;nbsp; राजनीति में पूर्ण निस्पृहता का दावा करना उचित नहीं होगा, लेकिन इस पर तो विचार किया ही जाना चाहिए कि कौन शासक वोट के लिए काम कर रहा है और कौन सिर्फ इसलिए अच्छा काम कर रहा क्योंकि वह उसे अपना धर्म समझता है. जब कोई शासक अपने राजनीतिक विरोधी की बेटी की अस्मिता से स्वयं को जोड़कर प्रभावी कदम उठाता है तो यह उसकी अंतरात्मा की शुचिता को सामने रखता है. भारतीय संविधान की प्रस्तावना से लेकर उसके अनुच्छेदों तक, सभी जगह यही भाव है कि राज्य का संरक्षण और उसके संसाधन किसी एक वर्ग, जाति, दल या क्षेत्र के लिए नहीं हो सकते. शासन को निष्पक्ष होना चाहिए.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;दलगत भावना से ऊपर उठकर काम करना उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक सांस्कृतिक हस्तक्षेप है और इस मानसिकता को चुनौती देती है जो यह मानकर चलती हैं कि राजनीति की कोई मर्यादा नहीं होती, नैतिकता नहीं होती. सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव की बेटी के प्रति अशोभनीय टिप्पणी लोग &amp;nbsp;कल भूल जाएंगे लेकिन एक बात यह जरूर याद रहेगी कि योगी जी के रूप में एक मुख्यमंत्री ने यह उदाहरण रखा था कि सत्ता मनुष्यता की दुश्मन नहीं होती. यह बोध जब सभी राजनीतिक दलों में आ जाएगा तो लोकतंत्र का वास्तविक स्वरूप और स्वर्णिम दिखाई देगा.&lt;/p&gt;
&lt;div id=&quot;article-hstick-inner&quot; class=&quot;abp-story-detail abp-story-detail-blog&quot;&gt;
&lt;p&gt;&lt;strong&gt;[नोट- उपरोक्त दिए गए विचार लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. यह ज़रूरी नहीं है कि एबीपी न्यूज़ ग्रुप इससे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही ज़िम्मेदार है.]&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;/div&gt;]]></description><slash:comments>0</slash:comments><media:thumbnail url="https://feeds.abplive.com/onecms/images/uploaded-images/2026/06/20/3414ec50560785de9390a1fe5302d3e41781941073342120_original.jpg" width="220"/></item><item><title><![CDATA[करनाल की जिला जेल लिखने जा रही आवाज की दुनिया में नई इबारत, 20 कैदियों को RJ की ट्रेनिंग]]></title><link>https://www.abplive.com/blog/karnal-district-jail-role-model-for-country-20-prisoner-trained-to-become-rjs-3146352</link><comments>https://www.abplive.com/blog/karnal-district-jail-role-model-for-country-20-prisoner-trained-to-become-rjs-3146352#respond</comments><pubDate>Wed, 17 Jun 2026 00:45:13 +0530 </pubDate><dc:creator><![CDATA[ डॉ. वर्तिका नन्दा ]]></dc:creator><category><![CDATA[  ]]></category><guid isPermaLink="true">https://www.abplive.com/blog/karnal-district-jail-role-model-for-country-20-prisoner-trained-to-become-rjs-3146352</guid><description><![CDATA[&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;करनाल जिला जेल में सुधार और पुनर्वास की दिशा में एक नया अध्याय शुरू होने जा रहा है. यहां के 20 जेल बंदियों ने 'तिनका जेल रेडियो' के लिए रेडियो जॉकी (RJ) बनने का प्रशिक्षण शुरू कर दिया है. इस विशेष बैच में तीन महिला कैदी भी शामिल हैं, जिनके लिए यह अपनी रचनात्मक सोच को आवाज देने और जेल जीवन में सार्थक योगदान करने का एक अनूठा अवसर है. यह प्रशिक्षण कार्यक्रम बंदियों को न केवल प्रसारण, संचार और तकनीकी ज्ञान प्रदान करेगा, बल्कि उनमें आत्मविश्वास, अनुशासन और जिम्मेदारी की भावना भी विकसित करेगा. इस कार्यक्रम का संचालन पत्रकारिता विभाग, लेडी श्रीराम कॉलेज (दिल्ली विश्वविद्यालय) की प्रमुख और 'तिनका तिनका फाउंडेशन' की संस्थापक प्रोफेसर (डॉ.) वर्तिका नंदा की ओर से किया जा रहा है, जिन्होंने साल 2020 में हरियाणा में जेल रेडियो की परिकल्पना की थी.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;हरियाणा कारागार के डीजी आलोक मित्तल (IPS) के सहयोग और 'तिनका तिनका फाउंडेशन' के प्रयासों से हरियाणा साल 2020 में एक संरचित जेल रेडियो प्रणाली स्थापित करने वाला देश का पहला राज्य बना था. इसकी शुरुआत सबसे पहले जिला जेल, पानीपत से हुई थी. कोविड-19 महामारी के कठिन दौर में इस पहल ने कैदियों को सही जानकारी, उम्मीद और आपसी जुड़ाव प्रदान करने में बेहद महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी. आज यह अनूठा मॉडल राज्य की कई अन्य जेलों में भी सफलतापूर्वक काम कर रहा है, जहां कैदियों द्वारा संचालित रेडियो स्टेशन स्वास्थ्य, शिक्षा, संस्कृति और पुनर्वास से जुड़े सकारात्मक कार्यक्रम प्रसारित कर रहे हैं. इसे देश-दुनिया में जेल सुधार और सुधारात्मक दर्शन के एक बेहतरीन उदाहरण के रूप में देखा जाता है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;जेल रेडियो केवल मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि बंदियों के जीवन में सकारात्मक परिवर्तन का एक मजबूत माध्यम साबित हुआ है. इसने कैदियों को नए कौशल सिखाने के साथ-साथ उनमें एक उद्देश्य की भावना जगाई है, जिससे उन्हें अकेलेपन और अवसाद से लड़ने में काफी मदद मिली है. इस संबंध में करनाल जेल के अधीक्षक लखबीर सिंह बरार का कहना है कि जेल रेडियो ने बंदियों के मानसिक स्वास्थ्य और जेल परिसर के समग्र वातावरण को बेहतर बनाने में अपनी उपयोगिता साबित की है. अब कैदी हर दिन इन कल्याकारी प्रसारणों का बेसब्री से इंतजार करते हैं.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;हरियाणा के इस सुधारात्मक मॉडल को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी सराहना मिली है और इसे जेल सुधारों से जुड़े कई वैश्विक सम्मेलनों में प्रस्तुत किया जा चुका है. इस पहल की अभूतपूर्व सफलता को नेशनल बुक ट्रस्ट (NBT) द्वारा प्रकाशित पुस्तक &amp;ldquo;रेडियो इन प्रिजन&amp;rdquo; में भी दर्ज किया गया है. इस पुस्तक में उन कैदियों की संघर्षपूर्ण और प्रेरक कहानियां शामिल हैं, जिन्होंने रेडियो जॉकी बनकर अपने जीवन को एक नई दिशा दी.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;करनाल जिला जेल में शुरू हुआ यह रेडियो जॉकी प्रशिक्षण केवल एक कार्यक्रम नहीं, बल्कि बंदियों के सुधार, पुनर्वास और उन्हें समाज की मुख्यधारा से दोबारा जोड़ने का एक जीवंत आंदोलन है. कैदियों को रचनात्मक अभिव्यक्ति की आजादी देकर हरियाणा का जेल प्रशासन सजा की पारंपरिक परिभाषा को 'दंड से परिवर्तन' की ओर ले जा रहा है. आने वाले दिनों में जब ये 20 कैदी प्रसारण की दुनिया में कदम रखेंगे, तो वे जेल की दीवारों के भीतर से आशा, सृजनात्मकता और नवजीवन का एक नया संदेश प्रसारित करेंगे.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;[नोट- उपरोक्त दिए गए विचार लेखिका के व्यक्तिगत विचार हैं. यह ज़रूरी नहीं है कि एबीपी न्यूज़ ग्रुप इससे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखिका ही ज़िम्मेदार है.]&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;]]></description><slash:comments>0</slash:comments><media:thumbnail url="https://feeds.abplive.com/onecms/images/uploaded-images/2026/06/16/18da7de99ab1abcbb8874156b1d294431781629919683708_original.jpg" width="220"/></item><item><title><![CDATA[Opinion: सपा नेता जावेद अली ने बहुसंख्यक जहर वाले यूं ही नहीं दिया बयान, इसके पीछे छिपे बड़े सियासी मायने]]></title><link>https://www.abplive.com/blog/javed-ali-khan-claim-bjp-spreading-poison-majority-society-samajwadi-party-akhilesh-yadav-3145743</link><comments>https://www.abplive.com/blog/javed-ali-khan-claim-bjp-spreading-poison-majority-society-samajwadi-party-akhilesh-yadav-3145743#respond</comments><pubDate>Mon, 15 Jun 2026 22:07:10 +0530 </pubDate><dc:creator><![CDATA[ राहुल लाल, राजनीतिक विश्लेषक ]]></dc:creator><category><![CDATA[  ]]></category><guid isPermaLink="true">https://www.abplive.com/blog/javed-ali-khan-claim-bjp-spreading-poison-majority-society-samajwadi-party-akhilesh-yadav-3145743</guid><description><![CDATA[&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;समाजवादी पार्टी (सपा) के राज्यसभा सांसद जावेद अली खान ने मुरादाबाद में एक कार्यक्रम के दौरान आरोप लगाया कि बीजेपी ने बहुसंख्यक आबादी में जहर घोल दिया गया है. राजनीतिक विश्लेषक राहुल लाल उनके बयान को चौंकाने वाला और बड़काऊं बताया. उन्होंने कहा कि जावेद अली खान के इस बयान से पार्टी को लाभ होने की संभावना कम दिखती है. यदि यह माना जाए कि बहुसंख्यक समाज जहरीला हो गया है, तो हमें 2024 के लोकसभा चुनाव के संदर्भ में देखना होगा. उस समय बीजेपी ने राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा के माध्यम से एक लहर बनाने की कोशिश की थी, बावजूद इसके उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी ने स्वर्गीय मुलायम सिंह यादव का भी रिकॉर्ड तोड़ते हुए 37 सीटें जीतीं.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;जावेद अली के बयान से 'रिवर्स पोलराइजेशन' का खतरा&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;इसका मतलब है कि उन्हें मुस्लिम समाज के साथ-साथ मौर्य, शाक्य, सैनी, पाल, कुर्मी और निषाद जैसे बहुसंख्यक समाज का भी भारी समर्थन प्राप्त हुआ. यहां तक कि दलितों ने भी, जो कभी सपा से नाराज माने जाते थे, उन्हें जमकर वोट दिया और सामान्य सीटों पर भी सपा के दलित उम्मीदवार जीते. ऐसे में जब जावेद अली यह कहते हैं कि बहुसंख्यक समाज जहरीला हो गया है, तो इस बयान को स्वीकार करना मुश्किल होता है. यह एक प्रकार का &quot;सेल्फ गोल&quot; है जो भारतीय जनता पार्टी के नैरेटिव को ही आगे बढ़ाता है. वर्तमान में देश महंगाई (जो 9% पार कर चुकी है), बेरोजगारी और NEET पेपर लीक जैसे गंभीर मुद्दों से जूझ रहा है. युवाओं ने बीजेपी से नाराज होकर सपा और कांग्रेस को भारी वोट दिए थे. इसलिए सपा को PDA (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) के सर्व-समावेशी स्लोगन और जन सरोकार के मुद्दों को गंभीरता से उठाना चाहिए. जावेद अली का यह कहना कि बहुसंख्यक क्षेत्रों में समझाना मुश्किल है, सपा की रणनीति के विपरीत &quot;रिवर्स पोलराइजेशन&quot; पैदा कर सकता है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;अखिलेश यादव की छवि हिंदू विरोधी होने का डर&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;अखिलेश यादव ने 2017 और 2019 की गलतियों से सीखकर बहुत कठोर परिश्रम किया है, जिसके परिणामस्वरूप सपा देश की तीसरी सबसे बड़ी पार्टी बनी है. ऐसे में इस तरह के बयान उन ओबीसी और दलित मतदाताओं को आहत कर सकते हैं जो बीजेपी छोड़कर सपा की तरफ आए थे और वे फिर बीजेपी की ओर रुख कर सकते हैं. इससे बीजेपी को यह कहने का मौका मिल जाएगा कि सपा &quot;बहुसंख्यक विरोधी&quot; या &quot;हिंदू विरोधी&quot; है. जबकि अखिलेश यादव स्वयं हिंदू सेंटीमेंट की रक्षा के लिए इटावा में भव्य मंदिर बनवा रहे हैं और अयोध्या में जमीन घोटाले जैसे मुद्दों को प्रमुखता से उठा रहे हैं. इन्ही प्रयासों के कारण 2024 में अयोध्या और उसके आसपास की सीटों पर इंडिया गठबंधन को जीत मिली.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;मुस्लिम वोटों का बिखराव रोकने की कोशिश&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;विपक्ष के लिए यह जरूरी है कि वह सर्वसमावेशी और मूलभूत मुद्दों पर ही केंद्रित रहे. जनता में पहले से ही आक्रोश और निराशा है. जावेद अली जैसे नेताओं को समझना चाहिए कि चाहे यह बयान अति-उत्साह में दिया गया हो या किसी दबाव में, यह अखिलेश यादव द्वारा संविधान की सुरक्षा, 69000 शिक्षक भर्ती और जातिगत जनगणना के लिए किए जा रहे प्रयासों को नुकसान पहुंचाता है. कुछ लोग तर्क देते हैं कि यह बयान मुस्लिम वोटों के बिखराव को रोकने के लिए दिया गया होगा, लेकिन जो लोग सांप्रदायिक राजनीति से दूर विकास चाहते हैं, उनमें ऐसे बयानों से असंतोष पैदा होता है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;अब जबकि सबकी निगाहें 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव पर टिकी है, इस तरह की बयानबाजी उचित नहीं है. चाहे ओवैसी बंधुओं का प्रभाव कम करना हो या मुस्लिम वोटों को सुरक्षित करना, सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के बजाय महंगाई, बेरोजगारी, कानून-व्यवस्था और बिजली कटौती जैसे जन सरोकार के मुद्दों को उठाना ही सपा के लिए बेहतर होगा.&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;[नोट- उपरोक्त दिए गए विचार लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. यह ज़रूरी नहीं है कि एबीपी न्यूज़ ग्रुप इससे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही ज़िम्मेदार है.]&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;]]></description><slash:comments>0</slash:comments><media:thumbnail url="https://feeds.abplive.com/onecms/images/uploaded-images/2026/06/15/1547d505cbc55115697ddb1b28538ac31781540956713708_original.jpg" width="220"/></item><item><title><![CDATA[US-ईरान डील: मिडिल ईस्ट के भयावह युद्ध का अंत नजदीक, अगले 60 दिन काफी महत्वपूर्ण, जानें क्यों?]]></title><link>https://www.abplive.com/blog/iran-us-deal-end-middle-east-war-end-strait-of-hormuz-donald-trump-frozen-funds-nuclear-program-3145549</link><comments>https://www.abplive.com/blog/iran-us-deal-end-middle-east-war-end-strait-of-hormuz-donald-trump-frozen-funds-nuclear-program-3145549#respond</comments><pubDate>Mon, 15 Jun 2026 15:31:49 +0530 </pubDate><dc:creator><![CDATA[ रुमान हाशमी, वरिष्ठ पत्रकार ]]></dc:creator><category><![CDATA[  ]]></category><guid isPermaLink="true">https://www.abplive.com/blog/iran-us-deal-end-middle-east-war-end-strait-of-hormuz-donald-trump-frozen-funds-nuclear-program-3145549</guid><description><![CDATA[&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;मिडिल ईस्ट में कई महीनों से जारी तनाव और सैन्य टकराव का आखिरकार खात्मा हो चुका है. अब ऐसा माना जा सकता है कि दुनिया ने इस संकट से राहत की सांस ली है, भले इजरायल इस डील से नाखुश हो. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दावा किया है कि अमेरिका और ईरान के बीच एक व्यापक समझौता हो गया है, जबकि ईरान की सुप्रीम नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल ने भी युद्ध समाप्ति से जुड़े एक मेमोरेंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग को अंतिम रूप दिए जाने की पुष्टि की है. अगर आने वाले दिनों में यह समझौता औपचारिक रूप से लागू हो जाता है तो इसे पिछले कई दशकों में मिडिल ईस्ट की सबसे महत्वपूर्ण कूटनीतिक उपलब्धियों में गिना जा सकता है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;यह समझौता सिर्फ युद्धविराम तक ही सीमित नहीं है. इसके राजनीतिक, आर्थिक और रणनीतिक पहलू इतने व्यापक हैं कि इनके असर पूरी दुनिया में महसूस किए जा सकते हैं. इस जंग की वजह से कॉर्पोरेट जगत में जो शिथिलता आ गई थी, अब जल्द ही इसमें तेजी देखने को मिलेगी, खास कर एशिया के बाजारों में.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;डील के मुख्य बिंदु क्या हैं?&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;अब तक सामने आई जानकारी के मुताबिक समझौते के सात बड़े पहलू हैं.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;सबसे पहला और महत्वपूर्ण बिंदु है सैन्य कार्रवाइयों का तत्काल और स्थायी अंत. ईरानी और अमेरिकी पक्ष का कहना है कि सभी सक्रिय मोर्चों पर सैन्य गतिविधियां रोकी जाएंगी. पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने दावा किया है कि लेबनान में चल रही सैन्य गतिविधियां भी इस व्यवस्था के दायरे में आएंगी.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;दूसरा बड़ा बिंदु है स्ट्रेट ऑफ हॉरमुज़ का दोबारा खुलना. दुनिया के समुद्री तेल व्यापार का बड़ा हिस्सा इसी रास्ते से गुजरता है. हाल के तनावों के कारण वैश्विक ऊर्जा बाजारों में भारी अनिश्चितता पैदा हो गई थी. यूरोपीय देशों ने भी इस जलमार्ग को तत्काल और बिना शर्त खोलने की मांग की थी.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;तीसरा बिंदु है अमेरिकी नौसैनिक नाकाबंदी का अंत. ट्रंप ने घोषणा की है कि अमेरिका ईरानी बंदरगाहों पर लगी नौसैनिक पाबंदियां हटाएगा, जिससे टैंकर और मालवाहक जहाज़ सामान्य रूप से काम कर सकेंगे.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;चौथा और शायद आर्थिक दृष्टि से सबसे महत्वपूर्ण पहलू है प्रतिबंधों में राहत. रिपोर्टों के अनुसार अमेरिका ईरान के तेल और पेट्रोकेमिकल क्षेत्र पर लगाए गए प्रतिबंधों को निलंबित करेगा. इससे ईरान को अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक दोबारा पहुंच मिल सकती है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;पांचवां बिंदु है विदेशों में फ्रीज किए गए ईरानी फंड्स की वापसी. पिछले तकरीबन सैतालिस सालों से कई देशों में जमे अरबों डॉलर के ईरानी संसाधनों को चरणबद्ध तरीके से रिलीज़ करने की चर्चा है. ईरान लंबे समय से इसे अपनी प्रमुख मांगों में शामिल करता रहा है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;छठा बिंदु है ईरान के पुनर्निर्माण और बुनियादी ढांचे के विकास के लिए लगभग 300 अरब डॉलर तक के संभावित निवेश और सहायता कार्यक्रम. यदि यह योजना व्यवहारिक रूप लेती है तो ईरान की अर्थव्यवस्था के लिए यह ऐतिहासिक राहत साबित हो सकती है. ऊर्जा, परिवहन, उद्योग और सार्वजनिक अवसंरचना के क्षेत्र में बड़े निवेश की संभावना जताई जा रही है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;सातवां और सबसे संवेदनशील मुद्दा है ईरान का परमाणु कार्यक्रम. अमेरिकी प्रशासन ने साफ तौर पर ये कहा है कि किसी भी अंतिम समझौते का आधार यह होगा कि ईरान परमाणु हथियार विकसित नहीं करेगा. अमेरिकी रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ ने दोहराया है कि ईरान कभी भी परमाणु बम हासिल नहीं करेगा. दूसरी ओर, ईरान इस बात पर जोर देता रहा है कि उसका परमाणु कार्यक्रम शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;अभी अंतिम समझौता नहीं हुआ है&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;हालांकि इन घोषणाओं ने दुनिया भर में सुर्खियां बटोरी हैं, लेकिन यह समझना जरूरी है कि यह अभी अंतिम और व्यापक शांति संधि नहीं है. मौजूदा जानकारी के मुताबिक स्विट्ज़रलैंड में प्रस्तावित हस्ताक्षर के बाद अगले 60 दिनों तक लंबी बातचीत जारी रहेगी. इन्हीं वार्ताओं में परमाणु कार्यक्रम, प्रतिबंधों की पूरी समाप्ति, आर्थिक सहयोग और क्षेत्रीय सुरक्षा से जुड़े जटिल मुद्दों पर आखिरी फैसले लिए जाएंगे.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;पाकिस्तान और कतर की भूमिका क्यों महत्वपूर्ण है?&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;दिलचस्प बात यह है कि ईरानी बयान में पाकिस्तान और कतर का विशेष रूप से धन्यवाद किया गया है. इससे संकेत मिलता है कि पर्दे के पीछे कई महीनों से चल रही मध्यस्थता में इन देशों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है. हाल के वर्षों में कतर ने अमेरिका और विभिन्न क्षेत्रीय शक्तियों जैसे की तालिबान के बीच संवाद स्थापित कराने में सक्रिय भूमिका निभाई है, जबकि पाकिस्तान भी समय-समय पर क्षेत्रीय कूटनीति में मध्यस्थ के रूप में सामने आता रहा है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;इजरायल की चिंता अभी खत्म नहीं हुई&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;इस पूरे घटनाक्रम का सबसे दिलचस्प पहलू अमेरिका और इजरायल के बीच उभरते मतभेद हैं. ट्रंप ने हालिया बयान में प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू को &quot;मुश्किल व्यक्ति&quot; बताते हुए कहा कि उन्होंने लगभग इस समझौते को पटरी से उतार दिया था. ट्रंप का यह बयान असामान्य माना जा रहा है और यह दिखाता है कि ईरान को लेकर वॉशिंगटन और तेल अवीव की प्राथमिकताओं में अंतर मौजूद है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;इजरायल की सबसे बड़ी चिंता यह है कि प्रतिबंधों में राहत और आर्थिक संसाधनों की वापसी से ईरान क्षेत्रीय स्तर पर अधिक प्रभावशाली हो सकता है. वहीं अमेरिका का तर्क है कि नियंत्रित समझौता और कूटनीति, निरंतर टकराव से बेहतर विकल्प है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;क्या यह वास्तव में ऐतिहासिक मोड़ है?&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;फिलहाल दुनिया की निगाहें 19 जून पर टिकी हुई हैं, जब इस समझौते पर स्विट्ज़रलैंड में औपचारिक हस्ताक्षर होने की उम्मीद है. यदि हस्ताक्षर सफलतापूर्वक हो जाते हैं और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पूरी तरह खुल जाता है तो तेल बाजारों से लेकर वैश्विक व्यापार तक कई क्षेत्रों में राहत देखने को मिल सकती है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;हालंकि मिडिल ईस्ट का इतिहास यह भी बताता है कि कागज पर हुए समझौते और जमीन पर उनके सफल क्रियान्वयन के बीच अक्सर लंबा फासला होता है. इसलिए अभी जश्न मनाने से पहले यह देखना होगा कि आने वाले 60 दिनों की बातचीत किस दिशा में जाती है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;फिर भी, अगर बंदूकें खामोश रहती हैं, प्रतिबंधों में वास्तविक राहत मिलती है और परमाणु विवाद का शांतिपूर्ण समाधान निकलता है, तो यह समझौता केवल अमेरिका और ईरान के बीच नहीं बल्कि पूरे मिडिल ईस्ट के लिए एक नए अध्याय की शुरुआत साबित हो सकता है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;[नोट- उपरोक्त दिए गए विचार लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. यह ज़रूरी नहीं है कि एबीपी न्यूज़ ग्रुप इससे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही ज़िम्मेदार है.]&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;]]></description><slash:comments>0</slash:comments><media:thumbnail url="https://feeds.abplive.com/onecms/images/uploaded-images/2026/06/15/4d7f9154a8690f598e7a559a08da230a1781517056248708_original.jpg" width="220"/></item><item><title><![CDATA[पीएम मोदी का विजन-सीएम योगी का मिशन]]></title><link>https://www.abplive.com/blog/pm-narendra-modi-completed-12-years-as-prime-minister-vision-bjp-cm-yogi-adityanath-3144704</link><comments>https://www.abplive.com/blog/pm-narendra-modi-completed-12-years-as-prime-minister-vision-bjp-cm-yogi-adityanath-3144704#respond</comments><pubDate>Sat, 13 Jun 2026 18:39:54 +0530 </pubDate><dc:creator><![CDATA[ एबीपी लाइव ]]></dc:creator><category><![CDATA[  ]]></category><guid isPermaLink="true">https://www.abplive.com/blog/pm-narendra-modi-completed-12-years-as-prime-minister-vision-bjp-cm-yogi-adityanath-3144704</guid><description><![CDATA[&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;समाज के स्वप्न तब साकार होते हैं, जब देश का नेतृत्व सशक्त, संकल्पित और उसकी दृष्टि लोक कल्याणकारी हो. आज जबकि प्रधानमंत्री के रूप में नरेन्द्र मोदी 12 साल पूरे कर चुके हैं और उन्होंने चुने हुए प्रधानमंत्रियों में पं. जवाहर लाल नेहरू के कार्यकाल को भी पीछे छोड़ दिया है तो उनकी दृष्टि को उत्तर प्रदेश के विकास के संदर्भ में देखना प्रासंगिक होगा. इसलिए कि यह प्रदेश नेहरू का भी रहा है और उनके बाद उनकी बेटी, प्रधानमंत्री रहीं इंदिरा गांधी का भी. यही वह प्रदेश है जिसे भारत के पुनर्निमाण की सबसे बड़ी प्रयोगशाला के रूप में सबसे पहले प्रधानमंत्री मोदी ने देखा और इसीलिए यह राज्य हमेशा उनकी प्राथमिकता में रहा. आज जब यह प्रदेश देश की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की ओर अग्रसर है तो यह भी विचार करना होगा कि आखिर ऐसा पहले क्यों नहीं हुआ? क्या उत्तर प्रदेश में ऐसा नेतृत्व पहले नहीं था कि केंद्रीय नीतियों के साथ स्वयं को अंगीकार कर सके? &amp;nbsp;यही वह बिंदु है जहां दूरदर्शी पीएम मोदी के साथ कर्मयोगी के रूप में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का चेहरा दिखाई देने लगता है.&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&lt;br /&gt;उत्तर प्रदेश सिर्फ एक राज्य भर नहीं है. यह भारत का सांस्कृतिक हृदय है, जनशक्ति का अक्षय स्रोत है. प्रधानमंत्री मोदी के मन में कोई संशय नहीं था कि इस राज्य में देश की आर्थिक धुरी बनने की पूरी क्षमता है और यदि यहां नितांत ईमानदारी से योजनाओं को मूर्त रूप दिया जाए तो ऐसा बड़ी सहजता से हो भी सकता है. 2014 में उन्होंने देश का नेतृत्व संभाला और तब से उत्तर प्रदेश में उनका विजन नीतियों, परियोजनाओं और प्राथमिकताओं में प्रतिबिंबित हो रहा है. 2017 में इस राज्य में योगी सरकार बनी और उसने पीएम मोदी की दृष्टि को विकासात्मक प्रतिबद्धता दी. कहने की बात नहीं कि केंद्र और राज्य की सरकारें जब एक दिशा में प्रयास करती हैं तो परिणाम न सिर्फ सकारात्मक होते हैं, बल्कि लोक कल्याण को भी सही अर्थ मिलता है. 2017 के पहले के तीन साल राष्ट्रीय स्तर पर पीएम मोदी के ही नेतृत्व के थे, लेकिन तब राज्य में समाजवादी पार्टी की सरकार थी. यह कहने में कोई हिचक नहीं कि तब तत्कालीन मुख्यमंत्री ने केंद्र की योजनाओं को कोई महत्व नहीं दिया. उन योजनाओं को भी, जो सीधे तौर पर जनता के लिए लाभकारी थीं.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;2017 में सत्ता में आने के बाद योगी आदित्यनाथ ने पीएम मोदी के विजन को नीतिगत दस्तावेज़ में नहीं, बल्कि जन-जन के जीवन में उतारा. सीएम योगी ने उनके विजन को मिशन बनाया और अनवरत, अथक और अविचल रहे. दोनों के बीच का यह वैचारिक तालमेल विकास की गाथाओं में कभी लिखा जाएगा. केंद्र की योजना और राज्य का क्रियान्वयन, यह समन्वय सहजता और निष्ठा का है जिसके परिणाम अपेक्षित ही नहीं, असाधारण हैं. कैसे हैं, इसके लिए पुराने पन्ने पलटने होंगे. 2017 से पहले उत्तर प्रदेश की स्थिति पर गौर करना होगा. माफिया राज, जातीय हिंसा, उद्योगों का पलायन, किसानों की दुर्दशा और सड़कों का अभाव, यह उस समय राज्य की तस्वीर थी. निवेशक यहां आने से कतराते थे, प्रतिभाएं यहां से भागती थीं और आम नागरिक असुरक्षा की छाया में जीता था. प्रधानमंत्री मोदी का विजन था कि उत्तर प्रदेश को इस स्थिति से उबारा जाए. मुख्यमंत्री योगी ने इसे मिशन बनाया. कानून का राज स्थापित हुआ, अपराधियों पर शिकंजा कसा और प्रदेश ने एक नई सांस ली. विकास के लिए सुरक्षा पहली शर्त है, यह सिद्धांत यहां व्यवहार में सिद्ध हुआ.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;प्रधानमंत्री मोदी ने पिछले वर्षों में उत्तर प्रदेश की दर्जनों यात्राएं कीं और हर बार एक नई परियोजना, एक नई संभावना, एक नया संकल्प इस धरती को समर्पित किया. काशी विश्वनाथ धाम कॉरिडोर का लोकार्पण उनमें एक बड़ा भावनात्मक क्षण था. दिसंबर 2021 में जब प्रधानमंत्री ने इस दिव्य परिसर को राष्ट्र को समर्पित किया, तो यह भारत की सनातन आत्मा की पुनः प्रतिष्ठा थी, सभ्यतागत पुनर्जागरण था. जनवरी 2024 में अयोध्या में श्रीराम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा, जिसकी प्रतीक्षा शताब्दियों ने की थी. अयोध्या आज एक आधुनिक तीर्थ नगरी के रूप में विकसित हो रही है. महर्षि वाल्मीकि अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा, चौड़ी सड़कें, नवनिर्मित घाट, आधुनिक होटल और पर्यटन अवसंरचना, यह सब उस समग्र दृष्टि का हिस्सा है जिसमें आस्था और अर्थव्यवस्था साथ-साथ चलते हैं. वृंदावन, मथुरा और विंध्यधाम को भी इसी श्रेणी में रखा जाएगा.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;इन्फास्ट्रक्चर के मोर्चे पर उत्तर प्रदेश में जो क्रांति आई है, यह अभूतपूर्व है और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की संकल्पना के बिना यह संभव नहीं था. पूर्वांचल एक्सप्रेसवे, बुंदेलखंड एक्सप्रेसवे, गंगा एक्सप्रेसवे, इन राजमार्गों ने न केवल दूरियां घटाईं, बल्कि उपेक्षित अंचलों को विकास की मुख्यधारा से जोड़ा. पूर्वांचल एक्सप्रेसवे का उद्घाटन करते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने वायुसेना के विमान की लैंडिंग कराकर स्पष्ट संदेश दिया कि यह सड़क केवल यातायात के लिए नहीं, राष्ट्रीय सुरक्षा की दृष्टि से भी एक रणनीतिक संपत्ति है. लखनऊ मेट्रो का विस्तार, कानपुर मेट्रो और आगरा मेट्रो का शुभारंभ, इन परियोजनाओं ने प्रदेश में आधुनिक शहरी परिवहन की स्थापना की. गोरखपुर में एम्स और अन्य बड़े चिकित्सा संस्थानों की स्थापना ने स्वास्थ्य सेवाओं के क्षेत्र में उस रिक्तता को भरा जो वर्षों से बनी हुई थी.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;पीएम मोदी की प्रेरणा से उत्तर प्रदेश को कुशीनगर, अयोध्या व नोएडा (जेवर) के रूप में तीन नए अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट मिले. नोएडा अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा तो एशिया का सबसे बड़ा हवाई अड्डा बनने की दिशा में अग्रसर है. यह अकेला प्रकल्प लाखों रोजगार सृजित करेगा और दिल्ली-एनसीआर क्षेत्र के आर्थिक भूगोल को नए सिरे से परिभाषित करेगा. रक्षा उत्पादन क्षेत्र में बुंदेलखंड और आगरा-लखनऊ के बीच विकसित होता डिफेंस कॉरिडोर पीएम मोदी की 'आत्मनिर्भर भारत' संकल्पना को उत्तर प्रदेश की धरती पर साकार करता है. डेटा सेंटर, टेक्सटाइल पार्क, फार्मा क्लस्टर और फूड प्रोसेसिंग इकाइयां उत्तर प्रदेश की औद्योगिक रूपरेखा को तेज़ी से बदल रही हैं और इस परिवर्तन के केंद्र में है वह विश्वास जो मोदी-योगी की जोड़ी ने अर्जित किया है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;अंत्योदय को अर्थ देने वाली कई योजनाओं को इस अवसर पर विस्मृत नहीं किया जा सकता. प्रधानमंत्री आवास योजना के सर्वाधिक 65 लाख से अधिक लाभार्थी उत्तर प्रदेश में हैं. उज्ज्वला योजना ने करीब 2 करोड़ माताओं-बहनों को धुएं से मुक्ति दी. हर घर जल योजना ने गांव की देहरी तक नल का जल पहुंचाया. किसान सम्मान निधि अन्नदाता का संबल है. मुफ्त राशन योजना करीब 15 करोड़ परिवारों को खाद्य सुरक्षा देती है. यह सब इसलिए संभव हुआ क्योंकि केंद्र की मंशा और राज्य का तंत्र एक ही दिशा में काम कर रहे हैं. यही पीएम मोदी के विजन की असली आत्मा है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;प्रधानमंत्री मोदी के बारह वर्षों की इस यात्रा एक गहरा सत्य प्रत्यक्ष है. उन्होंने वह नक्शा बनाया जिसमें उत्तर प्रदेश प्राथमिकता में था तो सीएम योगी ने उस नक्शे को ज़मीन पर उकेर दिया. मोदी-योगी के कालखंड में भारत के हृदय प्रदेश ने अपनी खोई हुई महिमा को पुनः प्राप्त किया है. उत्तर प्रदेश के पुनर्निर्माण की यह यात्रा अभी जारी है और कोई संशय नहीं कि अभी इसमें कई अध्याय और लिखे जाएंगे.&lt;/p&gt;]]></description><slash:comments>0</slash:comments><media:thumbnail url="https://feeds.abplive.com/onecms/images/uploaded-images/2026/06/13/d70ec772cc8cef5cd9a8da2a18f5e46c1781356103350344_original.jpg" width="220"/></item><item><title><![CDATA[Opinion: होर्मुज में जहाजों पर हुए हमले अंतरराष्ट्रीय कानूनों और युद्ध के नियमों का सीधा उल्लंघन, तय हो जवाबदेही]]></title><link>https://www.abplive.com/blog/oman-coast-attack-on-india-sailors-should-be-investigated-at-international-level-opines-subrata-mukherjee-3144359</link><comments>https://www.abplive.com/blog/oman-coast-attack-on-india-sailors-should-be-investigated-at-international-level-opines-subrata-mukherjee-3144359#respond</comments><pubDate>Sat, 13 Jun 2026 05:05:42 +0530 </pubDate><dc:creator><![CDATA[ डॉ. सुब्रतो मुखर्जी ]]></dc:creator><category><![CDATA[  ]]></category><guid isPermaLink="true">https://www.abplive.com/blog/oman-coast-attack-on-india-sailors-should-be-investigated-at-international-level-opines-subrata-mukherjee-3144359</guid><description><![CDATA[&lt;div class=&quot;qMYqUG_convSearchResultHighlightRoot&quot;&gt;
&lt;div class=&quot;&quot; data-turn-id-container=&quot;request-69ba49f6-23d4-83ab-910e-56c1ec15a303-2&quot; data-is-intersecting=&quot;true&quot;&gt;
&lt;section class=&quot;text-token-text-primary w-full focus:outline-none has-data-writing-block:pointer-events-none [&amp;amp;:has([data-writing-block])&amp;gt;*]:pointer-events-auto R6Vx5W_threadScrollVars scroll-mb-[calc(var(--scroll-root-safe-area-inset-bottom,0px)+var(--thread-response-height))] scroll-mt-[calc(var(--header-height)+min(200px,max(70px,20svh)))]&quot; dir=&quot;auto&quot; data-turn-id=&quot;request-69ba49f6-23d4-83ab-910e-56c1ec15a303-2&quot; data-turn-id-container=&quot;request-69ba49f6-23d4-83ab-910e-56c1ec15a303-2&quot; data-testid=&quot;conversation-turn-899&quot; data-scroll-anchor=&quot;false&quot; data-turn=&quot;assistant&quot;&gt;
&lt;div class=&quot;text-base my-auto mx-auto pb-10 [--thread-content-margin:var(--thread-content-margin-xs,calc(var(--spacing)*4))] @w-sm/main:[--thread-content-margin:var(--thread-content-margin-sm,calc(var(--spacing)*6))] @w-lg/main:[--thread-content-margin:var(--thread-content-margin-lg,calc(var(--spacing)*16))] px-(--thread-content-margin)&quot;&gt;
&lt;div class=&quot;[--thread-content-max-width:40rem] @w-lg/main:[--thread-content-max-width:48rem] mx-auto max-w-(--thread-content-max-width) flex-1 group/turn-messages focus-visible:outline-hidden relative flex w-full min-w-0 flex-col agent-turn&quot; data-conversation-screenshot-content=&quot;&quot;&gt;
&lt;div class=&quot;flex max-w-full flex-col gap-4 grow&quot;&gt;
&lt;div class=&quot;min-h-8 text-message relative flex w-full flex-col items-end gap-2 text-start break-words whitespace-normal outline-none keyboard-focused:focus-ring [.text-message+&amp;amp;]:mt-1&quot; dir=&quot;auto&quot; tabindex=&quot;0&quot; data-message-author-role=&quot;assistant&quot; data-message-id=&quot;59d9c3bc-87cf-495d-b8be-b2dead6d50a6&quot; data-message-model-slug=&quot;gpt-5-5&quot; data-turn-start-message=&quot;true&quot;&gt;
&lt;div class=&quot;flex w-full flex-col gap-1 empty:hidden&quot;&gt;
&lt;div class=&quot;markdown prose dark:prose-invert wrap-break-word w-full light markdown-new-styling&quot;&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot; data-start=&quot;0&quot; data-end=&quot;792&quot;&gt;हाल की अंतरराष्ट्रीय घटनाओं ने एक बार फिर वैश्विक सुरक्षा व्यवस्था, समुद्री कानूनों और भू-राजनीतिक संतुलन पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं. विशेष रूप से उस घटना ने भारत के लिए चिंता बढ़ा दी है, जिसमें तीन भारतीय नागरिकों- जो सैनिक या सुरक्षा से जुड़े कर्मी बताए जा रहे हैं की मृत्यु हुई है. यह घटना न केवल मानवीय दृष्टिकोण से दुखद है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय मानकों और युद्ध संबंधी नियमों के भी विपरीत मानी जा रही है. सबसे बड़ी चिंता इस बात को लेकर है कि अब तक इस घटना पर कोई स्पष्ट जवाबदेही तय नहीं हो पाई है. ऐसे में यह अपेक्षा की जा रही है कि भारत सरकार इस मुद्दे को मजबूती से उठाए और अमेरिका से स्पष्ट जवाब मांगे. साथ ही, भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के लिए लिखित आश्वासन लेने की जरूरत पर भी जोर दिया जा रहा है, क्योंकि बिना ठोस गारंटी के स्थिति को सामान्य मान लेना जल्दबाजी होगी.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot; data-start=&quot;0&quot; data-end=&quot;792&quot;&gt;&lt;strong&gt;भारतीयों की मौत पर सवाल&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot; data-start=&quot;794&quot; data-end=&quot;1446&quot;&gt;इस पूरे मामले में मुआवजे और सुरक्षा का सवाल भी बेहद अहम बनकर सामने आया है. जिन भारतीय नागरिकों की जान गई है, उनके परिवारों को तत्काल आर्थिक सहायता और उचित मुआवजा मिलना चाहिए. यह सिर्फ एक संवेदनात्मक कदम नहीं, बल्कि राज्य की जिम्मेदारी भी है कि वह अपने नागरिकों के साथ खड़ा दिखाई दे. इसके अलावा, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी इस घटना को उठाकर मुआवजे की मांग करना जरूरी है, ताकि भविष्य में ऐसी घटनाओं के लिए जवाबदेही तय हो सके. खास बात यह है कि आज बड़ी संख्या में भारतीय नागरिक विभिन्न देशों के जहाजों और समुद्री परियोजनाओं पर काम करते हैं. ऐसे में उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करना सिर्फ एक राष्ट्रीय मुद्दा नहीं, बल्कि वैश्विक स्तर पर समन्वय का विषय बन चुका है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot; data-start=&quot;1448&quot; data-end=&quot;2052&quot;&gt;जहाजों पर हुए ये हमले अंतरराष्ट्रीय कानूनों और युद्ध के नियमों का सीधा उल्लंघन माने जा रहे हैं. अंतरराष्ट्रीय समुद्री कानून स्पष्ट रूप से यह कहता है कि युद्ध की स्थिति में भी निर्दोष नागरिकों, वाणिज्यिक जहाजों और तीसरे देशों की संपत्ति को निशाना नहीं बनाया जाना चाहिए. लेकिन हाल की घटनाओं में यह देखा गया है कि संघर्ष में शामिल पक्षों के अलावा अन्य देशों के जहाज भी हमलों का शिकार हो रहे हैं. यह स्थिति न केवल &quot;अनएक्सेप्टेबल&quot; है, बल्कि वैश्विक व्यापार और समुद्री सुरक्षा के लिए भी खतरा पैदा करती है. यदि ऐसे हमलों को रोकने के लिए सख्त कदम नहीं उठाए गए, तो यह अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को कमजोर कर सकता है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot; data-start=&quot;1448&quot; data-end=&quot;2052&quot;&gt;&lt;strong&gt;अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हो जांच&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot; data-start=&quot;2054&quot; data-end=&quot;2588&quot;&gt;इस मामले में एक और महत्वपूर्ण पहलू अंतरराष्ट्रीय जांच की मांग है. चूंकि इस हमले की जिम्मेदारी को लेकर स्पष्टता नहीं है और अलग-अलग पक्ष एक-दूसरे पर आरोप लगा रहे हैं, ऐसे में निष्पक्ष जांच की आवश्यकता महसूस की जा रही है. संयुक्त राष्ट्र या किसी अन्य अंतरराष्ट्रीय एजेंसी के माध्यम से जांच कराने की मांग इसलिए भी उठ रही है, ताकि सच्चाई सामने आ सके और दोषियों की पहचान हो सके. &amp;ldquo;दूध का दूध और पानी का पानी&amp;rdquo; करने के लिए पारदर्शी जांच बेहद जरूरी है, क्योंकि इसके बिना न तो न्याय हो सकता है और न ही भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोका जा सकता है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot; data-start=&quot;2590&quot; data-end=&quot;3130&quot;&gt;इन घटनाओं के पीछे व्यापक भू-राजनीतिक तनाव भी एक बड़ा कारण है. अमेरिका और ईरान के बीच लंबे समय से चल रहा तनाव अब नए मोड़ पर पहुंच गया है, जहां सैन्य कार्रवाई और कूटनीतिक बयानबाजी साथ-साथ चल रही है. एक ओर अमेरिकी नेतृत्व द्वारा कड़े बयान दिए जा रहे हैं, तो दूसरी ओर संभावित समझौते या &quot;डील&quot; की भी चर्चा होती रहती है. यह विरोधाभासी स्थिति वैश्विक स्तर पर अनिश्चितता पैदा कर रही है. हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि इतनी तनावपूर्ण स्थिति लंबे समय तक कायम नहीं रह सकती और अंततः दोनों देशों को किसी न किसी समझौते की दिशा में आगे बढ़ना ही होगा.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot; data-start=&quot;3132&quot; data-end=&quot;3438&quot; data-is-last-node=&quot;&quot; data-is-only-node=&quot;&quot;&gt;यह पूरा घटनाक्रम केवल एक क्षेत्रीय विवाद नहीं, बल्कि वैश्विक सुरक्षा, अंतरराष्ट्रीय कानून और मानवीय मूल्यों से जुड़ा हुआ है. भारत के लिए यह समय सतर्कता और सक्रिय कूटनीति का है, जहां उसे अपने नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अपनी आवाज को मजबूती से उठाना होगा.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot; data-start=&quot;3132&quot; data-end=&quot;3438&quot; data-is-last-node=&quot;&quot; data-is-only-node=&quot;&quot;&gt;&lt;strong&gt;नोट - (उपरोक्त दिए गए विचार लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. ये जरूरी नहीं कि एबीपी न्यूज ग्रुप इससे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है)&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;/div&gt;
&lt;/div&gt;
&lt;/div&gt;
&lt;/div&gt;
&lt;/div&gt;
&lt;/div&gt;
&lt;/section&gt;
&lt;/div&gt;
&lt;/div&gt;]]></description><slash:comments>0</slash:comments><media:thumbnail url="https://feeds.abplive.com/onecms/images/uploaded-images/2026/06/12/0818f4da043cd08f016c71f090a3904f1781285467987120_original.jpg" width="220"/></item><item><title><![CDATA[Opinion: युवाओं में मानसिक तनाव, एंग्जायटी और डिजिटल बर्नआउट, क्यों एक बढ़ती हुई चुनौती?]]></title><link>https://www.abplive.com/blog/why-in-the-digital-era-people-facing-mental-stress-and-anxiety-opines-doctor-vaibhav-chaturvedi-3144344</link><comments>https://www.abplive.com/blog/why-in-the-digital-era-people-facing-mental-stress-and-anxiety-opines-doctor-vaibhav-chaturvedi-3144344#respond</comments><pubDate>Fri, 12 Jun 2026 22:04:12 +0530 </pubDate><dc:creator><![CDATA[ एबीपी लाइव ]]></dc:creator><category><![CDATA[  ]]></category><guid isPermaLink="true">https://www.abplive.com/blog/why-in-the-digital-era-people-facing-mental-stress-and-anxiety-opines-doctor-vaibhav-chaturvedi-3144344</guid><description><![CDATA[&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot; data-start=&quot;0&quot; data-end=&quot;465&quot;&gt;आज के डिजिटल युग में तकनीक ने जहां जीवन को बेहद आसान बना दिया है, वहीं इसके कुछ नकारात्मक प्रभाव भी सामने आने लगे हैं. ऑनलाइन काम, पढ़ाई और सोशल मीडिया के बढ़ते उपयोग ने लोगों की दिनचर्या को पूरी तरह बदल दिया है. खासकर युवाओं में मानसिक तनाव (Mental Stress), एंग्जायटी (Anxiety) और डिजिटल बर्नआउट (Digital Burnout) जैसी समस्याएं तेजी से बढ़ रही हैं. लगातार ऑनलाइन रहने की आदत, करियर का दबाव और सामाजिक अपेक्षाएं युवाओं के मानसिक स्वास्थ्य पर गहरा असर डाल रही हैं.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot; data-start=&quot;467&quot; data-end=&quot;902&quot;&gt;इंदौर स्थित कोकिलाबेन धीरुभाई अंबानी अस्पताल के कंसल्टेंट साइकियाट्रिस्ट डॉ. वैभव चतुर्वेदी के अनुसार, डिजिटल बर्नआउट एक ऐसी स्थिति है जिसमें व्यक्ति लंबे समय तक मोबाइल, लैपटॉप या अन्य डिजिटल उपकरणों के इस्तेमाल से मानसिक और भावनात्मक रूप से थक जाता है. आज के समय में युवा अपना अधिकांश समय सोशल मीडिया, ऑनलाइन क्लास, गेमिंग और वीडियो स्ट्रीमिंग में बिताते हैं, जिससे दिमाग को पर्याप्त आराम नहीं मिल पाता और मानसिक थकान बढ़ने लगती है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot; data-start=&quot;467&quot; data-end=&quot;902&quot;&gt;&lt;strong&gt;क्यों तनाव की जद में लोग?&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot; data-start=&quot;467&quot; data-end=&quot;902&quot;&gt;सोशल मीडिया इस समस्या को और गंभीर बना रहा है. इंस्टाग्राम, फेसबुक जैसे प्लेटफॉर्म पर दूसरों की सफलता और जीवनशैली देखकर युवा खुद की तुलना करने लगते हैं, जिससे आत्मविश्वास में कमी, असंतोष और चिंता बढ़ती है. लाइक्स, कमेंट्स और फॉलोअर्स की संख्या भी उनके आत्मसम्मान को प्रभावित करती है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot; data-start=&quot;1190&quot; data-end=&quot;1451&quot;&gt;मानसिक तनाव और एंग्जायटी के लक्षणों में लगातार चिंता, चिड़चिड़ापन, नींद न आना, ध्यान केंद्रित करने में कठिनाई, थकान और सामाजिक गतिविधियों से दूरी शामिल हैं. समय पर इन संकेतों को पहचानना जरूरी है, क्योंकि नजरअंदाज करने पर यह अवसाद (डिप्रेशन) का रूप ले सकता है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot; data-start=&quot;1453&quot; data-end=&quot;1743&quot;&gt;विशेषज्ञों का मानना है कि डिजिटल संतुलन बनाए रखना बेहद जरूरी है. युवाओं को स्क्रीन टाइम सीमित करना चाहिए और रोजाना कुछ समय डिजिटल डिटॉक्स के लिए निकालना चाहिए. इसके अलावा परिवार और दोस्तों के साथ समय बिताना, खेलकूद, योग और ध्यान जैसी गतिविधियां मानसिक तनाव को कम करने में मददगार होती हैं.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot; data-start=&quot;1453&quot; data-end=&quot;1743&quot;&gt;&lt;strong&gt;सोने से पहले स्क्रीन से दूरी&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot; data-start=&quot;1745&quot; data-end=&quot;1986&quot;&gt;अच्छी नींद भी मानसिक स्वास्थ्य के लिए बेहद जरूरी है. देर रात तक मोबाइल या लैपटॉप का इस्तेमाल नींद की गुणवत्ता को प्रभावित करता है, जिससे तनाव और चिंता बढ़ सकती है. इसलिए सोने से कम से कम एक घंटा पहले स्क्रीन से दूरी बनाना फायदेमंद होता है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot; data-start=&quot;1988&quot; data-end=&quot;2246&quot;&gt;इसमें माता-पिता और शिक्षकों की भूमिका भी अहम है. उन्हें युवाओं के व्यवहार में बदलाव पर नजर रखनी चाहिए और जरूरत पड़ने पर उनसे खुलकर बात करनी चाहिए. यदि किसी युवा में लंबे समय तक तनाव या उदासी के लक्षण दिखें, तो विशेषज्ञ की सलाह लेने में देर नहीं करनी चाहिए.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot; data-start=&quot;2248&quot; data-end=&quot;2506&quot; data-is-last-node=&quot;&quot; data-is-only-node=&quot;&quot;&gt;डिजिटल दुनिया का लाभ उठाना जरूरी है, लेकिन उसके साथ संतुलन बनाए रखना भी उतना ही महत्वपूर्ण है. जागरूकता, स्वस्थ जीवनशैली और समय पर मदद से मानसिक तनाव, एंग्जायटी और डिजिटल बर्नआउट जैसी समस्याओं से बचा जा सकता है और एक संतुलित जीवन जिया जा सकता है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot; data-start=&quot;2248&quot; data-end=&quot;2506&quot; data-is-last-node=&quot;&quot; data-is-only-node=&quot;&quot;&gt;&lt;strong&gt;नोट - (उपरोक्त दिए गए विचार लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. ये जरूरी नहीं कि एबीपी न्यूज ग्रुप इससे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है)&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;]]></description><slash:comments>0</slash:comments><media:thumbnail url="https://feeds.abplive.com/onecms/images/uploaded-images/2026/06/12/39702f0be6cbebb00cb697b8d593b7f21781281884930120_original.jpg" width="220"/></item></channel></rss>