<?xml version="1.0" encoding="UTF-8"?><rss version="2.0" xmlns:content="http://purl.org/rss/1.0/modules/content/" xmlns:wfw="http://wellformedweb.org/CommentAPI/" xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/" xmlns:atom="http://www.w3.org/2005/Atom" xmlns:sy="http://purl.org/rss/1.0/modules/syndication/" xmlns:slash="http://purl.org/rss/1.0/modules/slash/" xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/"><channel><title>सामाजिक न्याय को पोषण देता उत्तर प्रदेश</title><atom:link href="https://www.abplive.com/blog/feed" rel="self" type="application/rss+xml"/><link>https://www.abplive.com/</link><description/><lastBuildDate>Sun, 4 Oct 2026 06:58:08 +0530</lastBuildDate><language>en-US</language><sy:updatePeriod>hourly</sy:updatePeriod><sy:updateFrequency>1</sy:updateFrequency><generator>https://www.abplive.com</generator><item><title><![CDATA[6,500 करोड़ के करार और दुनिया भर का भरोसा, नया आर्थिक भूगोल गढ़ता उत्तर प्रदेश]]></title><link>https://www.abplive.com/blog/uttar-pradesh-agreements-worth-rs-6500-crore-new-economic-geography-3196513</link><comments>https://www.abplive.com/blog/uttar-pradesh-agreements-worth-rs-6500-crore-new-economic-geography-3196513#respond</comments><pubDate>Thu, 1 Oct 2026 22:47:01 +0530 </pubDate><dc:creator><![CDATA[ एबीपी लाइव ]]></dc:creator><category><![CDATA[  ]]></category><guid isPermaLink="true">https://www.abplive.com/blog/uttar-pradesh-agreements-worth-rs-6500-crore-new-economic-geography-3196513</guid><description><![CDATA[&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;ग्रेटर नोएडा के इंडिया एक्सपो सेंटर एंड मार्ट में पांच दिन चला उत्तर प्रदेश अंतरराष्ट्रीय व्यापार मेला (यूपीआईटीएस) संपन्न हो गया है. स्टॉल समेटे जा चुके हैं और क्रेता-विक्रेता अपने-अपने ठिकानों को लौट गए हैं. उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने जिस भव्यता के साथ यह आयोजन किया और जिस उत्साह से इसमें उद्यमी और खरीदार शामिल हुए, उसका प्रभाव आने वाले दिनों में देखने को मिलेगा. इंडियन इंडस्ट्रीज एसोसिएशन (आईआईए) का प्रतिनिधि होने के नाते मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि यूपीआईटीएस ने वैश्विक बाजार में एक बड़ी छलांग लगाई है और अब हम आर्थिक धरातल के एक महत्वपूर्ण पड़ाव पर हैं.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;25 से 29 सितंबर 2026 तक चले इस मेले में लगभग 4,400 समझौता ज्ञापन हुए, जिनका मूल्य करीब 680 मिलियन डॉलर, यानी लगभग 6,500 करोड़ रुपये है. कारोबारी पूछताछ के आधार पर लगभग 15,500 करोड़ रुपये के संभावित व्यापार का अनुमान सामने आया. ये आंकड़े उल्लेखनीय हैं, लेकिन इनसे भी बड़ा संकेत उस गतिविधि में छिपा है, जो इसके पीछे चली. फेडरेशन ऑफ इंडियन एक्सपोर्ट ऑर्गनाइजेशन (फियो) के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, इस बार 41,500 बी2बी बैठकें हुईं, जो पिछले वर्ष की 31,650 बैठकों की तुलना में 31% से अधिक हैं. व्यापार में विश्वास की मुद्रा बैठकों से बनती है और जब बैठकों की संख्या एक वर्ष में लगभग एक-तिहाई बढ़ जाए, तो यह प्रमाण है कि उत्तर प्रदेश को लेकर दुनिया की जिज्ञासा गहरी हो रही है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;इस उपलब्धि की जड़ें योगी सरकार की सुविचारित नीति-दृष्टि में हैं. पिछले कुछ वर्षों में राज्य ने अपनी अर्थव्यवस्था को केवल कृषि और पारंपरिक उद्योगों की सीमा में नहीं बांधा है. एक्सप्रेसवे का विस्तृत होता नेटवर्क, औद्योगिक गलियारे, नोएडा-ग्रेटर नोएडा में इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना-प्रौद्योगिकी का उभार, लॉजिस्टिक्स पार्कों की योजनाएं और जेवर में बनने वाला हवाई अड्डा एक ही दिशा की ओर इशारा करते हैं. यह दिशा उस राज्य की है, जो उत्पादन, निर्यात और निवेश, तीनों में अग्रणी भूमिका निभाना चाहता है. केंद्र और राज्य की नीतियों के समन्वय, जिसे आम बोलचाल में &amp;lsquo;डबल इंजन&amp;rsquo; की सरकार कहा जाता है, ने इस यात्रा को गति दी है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;इस मेले की आत्मा &amp;lsquo;एक जिला, एक उत्पाद&amp;rsquo; (ओडीओपी) की अवधारणा है, जो योगी सरकार की सबसे मौलिक आर्थिक पहलों में गिनी जाती है. इसके पीछे सीधी-सी, लेकिन गहरी समझ है: हर ज़िले के पास कोई न कोई विशिष्ट हुनर है और उसे पहचान, ब्रांड और बाजार मिलना चाहिए. भदोही की कालीन हो या मुरादाबाद का पीतल, वाराणसी का रेशम हो या लखनऊ की चिकनकारी, इन परंपराओं को पीढ़ियों ने संवारा और आगे बढ़ाया है, लेकिन बाजार तक सीधी पहुंच के अभाव में इनका पूरा मूल्य इन्हें गढ़ने वाले कारीगर तक नहीं पहुंच पाता था. ओडीओपी की इस पहल ने प्रदेश के हर ज़िले की स्थानीय विशेषता को राज्य की साझा पूंजी में बदल दिया. इस बार भी यह पहल मेले का सबसे आकर्षक केंद्र बनकर उभरी. इसी कड़ी में नए जुड़े &amp;lsquo;ओडीओसी&amp;rsquo; की अनदेखी नहीं की जा सकती. ओडीओपी की तरह यह भी यूपी के आर्थिक भविष्य का हिस्सा है और चूंकि इस ट्रेड शो में सभी 75 जिलों से ओडीओसी की छतरी तले उद्यमियों की पहुंच हुई है, यह इस बात का प्रमाण है कि राज्य का आर्थिक भूगोल नए सिरे से लिखा जा रहा है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;आर्थिक विकास का बुनियादी सिद्धांत कहता है कि जो समाज अपने उत्पादकों को बाज़ार से सीधे जोड़ता है, वह न केवल आय बढ़ाता है, बल्कि उद्यम की संस्कृति भी रचता है. मेले में &amp;lsquo;रिवर्स बायर-सेलर मीट&amp;rsquo; जैसी व्यवस्था इसी सिद्धांत का व्यावहारिक रूप है, जिसमें क्रेता खुद उत्पादक के पास आता है. इस बार इस हिस्से में लगभग 13,500 बैठकें हुईं, जबकि मुख्य प्रदर्शनी क्षेत्र में करीब 28,000 कारोबारी संवाद हुए. इसका अर्थ यह है कि गांव-कस्बे का छोटा उद्यमी, जिसे कभी दिल्ली-मुंबई के निर्यातकों की कृपा पर निर्भर रहना पड़ता था, अब सीधे अंतरराष्ट्रीय खरीदार के सामने अपनी बात रख रहा है. यही समावेशी विकास के लक्षण हैं.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;मेले का मानवीय पक्ष भी उतना ही महत्वपूर्ण है. उत्तर प्रदेश कौशल विकास मिशन के मंडप में 16 कौशलों का जीवंत प्रदर्शन हुआ. यह तथ्य स्थापित करता है कि सरकार मानव-पूंजी के निर्माण को भी प्राथमिकता देती है. देश के सबसे युवा राज्यों में से एक के लिए यह जनसांख्यिकीय लाभ तभी ताकत बनता है, जब युवाओं के हाथ में हुनर हो और हुनर के सामने बाज़ार. जब कोई नौजवान अपने प्रशिक्षण को वैश्विक मंच पर प्रदर्शित होते देखता है, तो उसके भीतर यह विश्वास जन्म लेता है कि उसका भविष्य उसकी अपनी मिट्टी में सुरक्षित है. कभी पलायन की पीड़ा से जूझ चुके इस प्रदेश के लिए यह मनोवैज्ञानिक परिवर्तन किसी भी अनुबंध से अधिक मूल्यवान है. दिल्ली-एनसीआर के स्कूलों की भागीदारी ने भी इस आयोजन को नई पीढ़ी के लिए सीखने का मंच बनाया.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;उत्तर प्रदेश की भौगोलिक स्थिति और आकार में उसकी सबसे बड़ी शक्ति छिपी है. देश की सबसे बड़ी आबादी वाला यह राज्य अपने आप में एक विशाल उपभोक्ता बाजार भी है और उत्पादन का विशाल आधार भी. जब इतना बड़ा राज्य निर्यात-संस्कृति अपनाता है, तो उसका असर पूरे देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ता है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा भारत को विकसित राष्ट्र बनाने के संकल्प में उत्तर प्रदेश की भूमिका निर्णायक है, क्योंकि कोई भी राष्ट्रीय लक्ष्य इस प्रदेश की भागीदारी के बिना पूर्ण नहीं हो सकता. इस लिहाज से यूपीआईटीएस उस बड़े राष्ट्रीय स्वप्न में राज्य का ठोस योगदान है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;इस उपलब्धि का अर्थ यह नहीं कि यात्रा पूरी हो गई है. किसी भी बड़े लक्ष्य की तरह इसमें भी निरंतरता सबसे बड़ी शर्त है. हुए समझौतों को उत्पादन-आदेशों में बदलना, नए बाज़ारों की तलाश जारी रखना, ज़िलों के छोटे कारीगरों तक निर्यात की जानकारी और सुविधाएं पहुंचाना और लॉजिस्टिक्स की लागत घटाना, ये सब जरूरी काम हैं, जो हो भी रहे हैं. जिस सरकार ने चार वर्षों में इस मंच को इतना विस्तार दिया है, उससे यह अपेक्षा स्वाभाविक है कि वह इस गति को कायम रखेगी. बैठकों में 31% की वृद्धि यही बताती है कि पहिया सही दिशा में घूम रहा है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;यूपीआईटीएस को एक आयोजन के रूप में नहीं, बल्कि एक विचार के रूप में देखा जाना चाहिए. विचार यह है कि उत्तर प्रदेश अब दूसरों की ओर देखने वाला नहीं, बल्कि दुनिया को अपनी ओर देखने के लिए आमंत्रित करने वाला राज्य है. जिस भूमि ने सभ्यता को ज्ञान, कला और शिल्प की अनगिनत परंपराएं दीं, वह आज उन्हें आधुनिक बाजार की भाषा में प्रस्तुत कर रही है.&lt;/p&gt;]]></description><slash:comments>0</slash:comments><media:thumbnail url="https://feeds.abplive.com/onecms/images/uploaded-images/2026/10/01/91002cd0df45107b2a3c7b8a83989d001790874941912708_original.jpg" width="220"/></item><item><title><![CDATA[यूपीआईटीएस: गांव से ग्लोबल तक नारी शक्ति, बदलते उत्तर प्रदेश का नया चेहरा बनीं महिला उद्यमी]]></title><link>https://www.abplive.com/blog/upits-women-empowerment-from-village-to-global-uttar-pradesh-3196064</link><comments>https://www.abplive.com/blog/upits-women-empowerment-from-village-to-global-uttar-pradesh-3196064#respond</comments><pubDate>Wed, 30 Sep 2026 23:13:05 +0530 </pubDate><dc:creator><![CDATA[ एबीपी लाइव ]]></dc:creator><category><![CDATA[  ]]></category><guid isPermaLink="true">https://www.abplive.com/blog/upits-women-empowerment-from-village-to-global-uttar-pradesh-3196064</guid><description><![CDATA[&lt;p&gt;बदलाव की यह तस्वीर उत्साहजनक है. कभी जिस महिला की पहचान उसके पति, पिता या बेटे के नाम से होती थी, वह आज अपने उद्यम और अपने ब्रांड के नाम से जानी जा रही है. यह महज नाम बदलने की बात नहीं, बल्कि समाज की बदलती सोच और महिला सशक्तीकरण के वास्तविक स्वरूप का प्रमाण है. किसी महिला की पहचान जब उसके अपने काम, हुनर और उपलब्धियों से बनने लगे, तो समझिए कि बदलाव की नींव मजबूत हो रही है.&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;ग्रेटर नोएडा में आयोजित उत्तर प्रदेश इंटरनेशनल ट्रेड शो के गलियारों से गुजरते हुए महसूस होता है कि सशक्तीकरण शब्द को यहां एक नया अर्थ मिल रहा है. यह देखकर सुखद आश्चर्य होता है कि महिलाएं किसी मंच के कोने में खड़ी केवल व्यवस्थाएं संभालती या सजावट का हिस्सा बनती नजर नहीं आतीं, बल्कि अपने-अपने स्टॉल पर पूरे आत्मविश्वास के साथ मौजूद हैं. उनके स्टॉल पर सजे उत्पाद उनकी मेहनत, हुनर और सफलता की कहानी बयां कर रहे हैं.&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;जिन हाथों ने बरसों तक रसोई, खेतों और करघों पर चुपचाप मेहनत की, वही हाथ आज देशी-विदेशी खरीदारों से सौदे तय कर रहे हैं. यह उत्तर प्रदेश का एक नया चेहरा है. आत्मविश्वास से भरी महिलाएं, खरीदारों से संवाद करती युवतियां और बिजनेस-टू-बिजनेस बैठकों में अपनी बात मजबूती से रखते हुए संभावनाओं के नए द्वार तलाशती उद्यमी. नारी सशक्तीकरण का वास्तविक अर्थ यही है, जहां हर महिला अपनी विशिष्ट पहचान और स्वतंत्र अस्तित्व के साथ मौजूद है. वह किसी की कृपा की आकांक्षी नहीं, बल्कि अवसरों का सृजन करने वाली उद्यमी है. वह सहायता पाने वालों की कतार से आगे बढ़कर अब दूसरों के लिए रोजगार और आजीविका के अवसर पैदा कर रही है. इस तस्वीर की सबसे खास बात यह है कि उत्तर प्रदेश के सभी 75 जिलों की 75 महिला उद्यमी एक ही मंच पर अपने हुनर और उद्यम का प्रतिनिधित्व कर रही हैं.&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;यूपी इंटरनेशनल ट्रेड शो पहली नजर में ही किसी अन्य व्यापार मेले से अलग नजर आता है. यहां स्टॉल हैं, उत्पाद हैं, खरीदार हैं और मोलभाव भी, लेकिन थोड़ा ठहरकर देखें तो यह उस बदलाव की झलक भी है, जिसमें 'घर की महिला' की पहचान धीरे-धीरे एक सफल 'उद्यमी' के रूप में स्थापित हो रही है. आगरा की जरी-जरदोजी, अमरोहा के मसाले, अयोध्या की हर्बल चाय, आजमगढ़ की ब्लैक पॉटरी, कन्नौज का इत्र, गोरखपुर की टेराकोटा ज्वेलरी और बनारस के कालीन... इन उत्पादों के पीछे खड़ी हर महिला बदलते उत्तर प्रदेश की एक प्रेरक कहानी है.&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;गाजियाबाद की अंजलि इसका उदाहरण हैं. उन्हें चित्रकारी का शौक था. अक्सर घरेलू जिम्मेदारियों के बीच ऐसे शौक महज 'हॉबी' बनकर रह जाते हैं, लेकिन अंजलि ने अपने हुनर को उद्यम का रूप दिया. जिला ग्रामोद्योग विकास के माध्यम से ऋण लेकर उन्होंने सादे कपड़ों पर चित्रकारी का काम शुरू किया. आज उनके डिजाइन किए सूट, दुपट्टे, जींस और ट्राउजर दस-दस हजार रुपये तक की कीमत पर बिक रहे हैं. इससे भी अहम बात यह है कि उनके उद्यम से सात अन्य महिलाओं को नियमित रोजगार मिल रहा है. यहीं सशक्तीकरण का वास्तविक अर्थ सामने आता है. ऋण ने उनके उद्यम की शुरुआत का रास्ता खोला, लेकिन सात अन्य महिलाओं को रोजगार देकर उन्होंने अवसरों का दायरा बढ़ाया है.&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;जब सहायता पाने वाले हाथ दूसरों को सहारा देने लगें, तब समझिए कि बदलाव टिकाऊ रूप ले रहा है. निर्भरता से आत्मनिर्भरता की यह यात्रा महिला उद्यमिता को सामाजिक कल्याण के साथ-साथ आर्थिक भागीदारी से जोड़ने का परिणाम है. उत्तर प्रदेश में महिला उद्यमिता को प्रोत्साहित करने के लिए योगी सरकार की योजनाओं और संस्थागत प्रयासों ने इस दिशा में अवसर उपलब्ध कराए हैं. स्वयं सहायता समूहों से जुड़ाव ने महिलाओं के आत्मविश्वास को नई ताकत दी है. समूह की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वह अकेली महिला की झिझक को साझा आत्मविश्वास में बदल देता है. गांव की महिला समूह के साथ जुड़कर सीखती है कि हिसाब-किताब कैसे रखा जाता है, उत्पाद की कीमत कैसे तय की जाती है और खरीदारों के साथ बातचीत में अपनी बात मजबूती से कैसे रखी जाती है.&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;ट्रेड शो की सबसे बड़ी उपलब्धि शायद केवल बिक्री के आंकड़ों में नहीं, बल्कि बाजार को समझने के मिले अवसरों में भी छिपी है. ऐसे बड़े आयोजन में सीधे ग्राहकों के बीच पहुंचने से उद्यमियों को अपने उत्पादों के प्रति बाजार की प्रतिक्रिया जानने का मौका मिलता है. जब कोई खरीदार बेडशीट की बुनावट परखता है या अचार की बोतल पर लगे लेबल को ध्यान से पढ़ता है, तो महिला उद्यमी को अपने उत्पाद के बारे में सीधा फीडबैक मिलता है. यही अनुभव उन्हें उत्पाद तैयार करने के साथ-साथ उसकी ब्रांडिंग, बिक्री और बाजार विस्तार की बारीकियां समझने में मदद करता है.&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;ट्रेड शो में 75 जिलों की 75 महिला उद्यमियों की भागीदारी इस बदलाव को व्यापक स्वरूप देती है. वे यहां केवल अपने उत्पादों की प्रदर्शनी नहीं लगा रहीं, बल्कि अपने हुनर, मेहनत और आत्मविश्वास का उत्सव भी मना रही हैं. अमरोहा के मसालों की महक, अयोध्या की हर्बल चाय की ताजगी और कन्नौज के इत्र की खुशबू इस उत्सव को खास बनाती है. योगी सरकार की नीतियों और योजनाओं के तहत उपलब्ध अवसरों ने इन महिलाओं को अपने उत्पादों और उद्यमों को बड़े बाजार तक पहुंचाने का मंच दिया है.&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;इस मंच की एक और खासियत है उत्पादों की विविधता. यहां केवल पारंपरिक हस्तशिल्प ही नहीं, बल्कि नवाचार और नए उद्यमों की झलक भी दिखाई देती है. सिद्धार्थनगर की सरोज देवी केले के रेशे से उत्पाद तैयार कर रही हैं. उनका काम कृषि अपशिष्ट को उपयोगी उत्पादों में बदलने की संभावनाएं सामने रखता है. प्रयागराज की तब्बसुम मकसूद मूंज से टोकरियां और सजावटी सामान बनाती हैं. बलिया की रंजना देवी फिनाइल, टॉयलेट क्लीनर और हैंडवॉश लेकर आई हैं. सोनभद्र की मधुबाला के स्टॉल पर हर्बल साबुन, शहद और जूट बैग हैं, तो खीरी की शफीका जूते-चप्पल और बेल्ट के साथ अपने उद्यम का विस्तार कर रही हैं.&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;उत्पादों की यह विविधता एक महत्वपूर्ण संदेश देती है. महिलाएं जब पारंपरिक दायरों से आगे बढ़कर नए क्षेत्रों में अपनी पहचान बनाती हैं, तो यह उनके आर्थिक आत्मविश्वास के साथ सामाजिक आत्मविश्वास के विस्तार का भी संकेत होता है. वे अपनी रुचि, कौशल और बाजार की जरूरतों के अनुरूप उद्यम चुन रही हैं. इस तरह उनकी भूमिका केवल परिवार की आय में योगदान देने तक सीमित नहीं रह जाती, बल्कि वे स्थानीय अर्थव्यवस्था और रोजगार सृजन में भी भागीदार बनती हैं.&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;यहां सरकार की योजनाओं और नीतिगत प्रयासों की भूमिका भी सामने आती है. कई उद्यमियों ने माना है कि सरकारी योजनाओं और ऋण सुविधाओं से उनके काम को गति मिली. जिला ग्रामोद्योग विकास के माध्यम से मिला ऋण हो या राज्य ग्रामीण आजीविका मिशन के अंतर्गत गठित स्वयं सहायता समूह, ये संस्थागत सहारे उनके लिए शुरुआती पूंजी, मार्गदर्शन और सामूहिक सहयोग का माध्यम बने हैं. इन अवसरों का लाभ उठाकर महिलाओं ने अपने हुनर को कारोबार में बदला और बाजार तक पहुंचने की राह बनाई.&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;नीतियों की सार्थकता इसी में है कि वे महिलाओं को आगे बढ़ने के अवसर दें और समय के साथ उन्हें अपने उद्यम का संचालन स्वतंत्र रूप से करने में सक्षम बनाएं. ट्रेड शो जैसे आयोजन इस प्रक्रिया को गति देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं. यहां महिला उद्यमियों को अपने उत्पादों के प्रदर्शन, खरीदारों से संपर्क और कारोबार के विस्तार की संभावनाएं तलाशने का अवसर मिलता है. उनकी मौजूदगी यह भी दर्शाती है कि ग्रामीण उद्यमिता अब स्थानीय बाजारों तक सीमित नहीं रहना चाहती, बल्कि बड़े और वैश्विक बाजारों तक पहुंच बनाने की दिशा में आगे बढ़ रही है.&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;बदलाव की यह तस्वीर उत्साहजनक है. कभी जिस महिला की पहचान उसके पति, पिता या बेटे के नाम से होती थी, वह आज अपनी फर्म के नाम से जानी जा रही है. चाहे वह 'सॉल फॉर अर्थ' हो, 'अंजलि क्रिएशन' हो या 'प्रतिभा डिजाइनर हब'. नाम का यह बदलाव मामूली नहीं है. इसके पीछे एक महिला की मेहनत, उसका आत्मविश्वास और अपने दम पर कुछ कर दिखाने का संकल्प है. यह बदलाव समाज की सोच को नया आकार देने के साथ महिलाओं की स्वतंत्र पहचान को भी मजबूत करता है.&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;महिला सशक्तीकरण का वास्तविक पैमाना केवल यह नहीं कि किसी महिला को सरकारी योजना का लाभ मिला या उसे कारोबार शुरू करने के लिए आर्थिक सहायता मिली. असली सफलता तब है, जब वह अपने हुनर और मेहनत के बूते एक पहचान बनाती है, अपने फैसले खुद लेती है और दूसरों के लिए भी अवसरों के नए रास्ते खोलती है. उत्तर प्रदेश इंटरनेशनल ट्रेड शो में नजर आ रही ये महिला उद्यमी इसी बदलाव की तस्वीर पेश कर रही हैं. गांव से ग्लोबल तक की उनकी यात्रा केवल कारोबार के विस्तार की कहानी नहीं, बल्कि अपने नाम, अपने ब्रांड और अपनी पहचान के साथ आगे बढ़ती नारी शक्ति की कहानी है.&lt;/p&gt;]]></description><slash:comments>0</slash:comments><media:thumbnail url="https://feeds.abplive.com/onecms/images/uploaded-images/2026/09/30/c293139f8b2e1af197f66860e96ca75e1790789866264708_original.jpg" width="220"/></item><item><title><![CDATA[एआई से सेमीकंडक्टर तक- भविष्य गढ़ रहा उत्तर प्रदेश]]></title><link>https://www.abplive.com/blog/from-ai-to-semiconductors-uttar-pradesh-shaping-future-cm-yogi-adityanath-3191073</link><comments>https://www.abplive.com/blog/from-ai-to-semiconductors-uttar-pradesh-shaping-future-cm-yogi-adityanath-3191073#respond</comments><pubDate>Sat, 19 Sep 2026 15:15:56 +0530 </pubDate><dc:creator><![CDATA[ एबीपी लाइव ]]></dc:creator><category><![CDATA[  ]]></category><guid isPermaLink="true">https://www.abplive.com/blog/from-ai-to-semiconductors-uttar-pradesh-shaping-future-cm-yogi-adityanath-3191073</guid><description><![CDATA[&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&amp;ldquo;सुविचारित, दूरदर्शी और निरंतर प्रयासों की परिणति आज उत्तर प्रदेश में इलेक्ट्रॉनिक्स, सेमीकंडक्टर, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, रोबोटिक्स, डेटा सेंटर और डीप-टेक के विस्तार के रूप में सामने आई है. इन नई वैश्विक तकनीकों पर आधारित उद्योगों से पूरे प्रदेश की तस्वीर बदलती दिखाई दे रही है.&amp;rdquo;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;किसी प्रदेश का नेतृत्व यदि अपने युवाओं के भविष्य को केंद्र में रखकर नहीं सोचता, उनके लिए योजनाएं नहीं बनाता तो वह न अपने दायित्वों के प्रति गंभीर है और न राज्य के प्रति अपने कर्तव्यों का निर्वहन कर रहा है. प्रदेश का भविष्य आने वाली पीढ़ियों के लिए तैयार किए जा रहे अवसरों से तय होता है और योगी सरकार ने इसी दृष्टि से उत्तर प्रदेश के भविष्य का धरातल तैयार किया है, जिसका प्रमुख आधार तकनीक है. तकनीक ही राज्य की विशाल युवा आबादी को कौशल और अवसर से जोड़कर आर्थिक शक्ति में बदल सकती है और निवेश, नवाचार और रोजगार की नई राहें दिखा सकती है. राज्य आज इसमें समर्थ दिख रहा है. अर्थव्यवस्था, रोजगार और सुशासन की नई धुरी के लिए भी यह सोच निर्णायक है.&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&lt;br /&gt;यह पहचान राज्य की सोच बदलने से परिलक्षित हुई है. एक दशक पहले तकनीक के प्रति तत्कालीन सरकारें इस कदर उदासीन थीं कि युवाओं का भविष्य अंधकारमय दिखाई देता था और राज्य के प्रति देश में नकारात्मक धारणा बनने लगी थी. सोच बदली तो मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में समग्र विकास की दिशा में सामूहिक प्रयास भी शुरू हुए. सोची-समझी, दूरदर्शी नीति और निरंतर प्रयासों की परिणति आज इलेक्ट्रॉनिक्स, सेमीकंडक्टर, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, रोबोटिक्स और डीप-टेक को एक साझा दृष्टि से देखने के रूप में सामने है और इसीलिए पूरे प्रदेश की तस्वीर बदलती दिख रही है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;उत्तर प्रदेश की सबसे बड़ी पूंजी उसकी विशाल आबादी और युवा कार्यबल है. लंबे समय तक यही आबादी एक चुनौती मानी जाती रही, लेकिन आज यही जनसंख्या प्रदेश की सबसे बड़ी ताकत बनकर उभरी है. सरकार ने इस ऊर्जा को दिशा देने का काम किया है. राज्य को देश का &amp;lsquo;डीप टेक कैपिटल&amp;rsquo; बनाने का लक्ष्य वह ठोस रणनीति है, जिसके तहत लखनऊ में देश की अग्रणी &amp;lsquo;एआई सिटी&amp;rsquo; के लिए भूमि चिह्नित की जा चुकी है और सात 'सेंटर्स ऑफ एक्सीलेंस' युवाओं को एआई, ब्लॉकचेन, 5जी-6जी जैसी तकनीकों में दक्ष बना रहे हैं. यह उस भावना का प्रतीक है कि प्रदेश अब केवल तकनीक का उपभोक्ता नहीं, बल्कि उसका निर्माता बनना चाहता है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;डेटा और डिजिटल आधारभूत ढांचे की मजबूती के बिना यह संभव नहीं था. डेटा नई सदी का सबसे बड़ा संसाधन है,और उत्तर प्रदेश इस दिशा में तेजी से आगे बढ़ा है. गाजियाबाद के सीईएल परिसर में 30 मेगावाट क्षमता का 'ग्रीन डेटा सेंटर' इस बात का प्रमाण है कि प्रदेश विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाकर चल रहा है. स्मार्ट कूलिंग और रेनवाटर हार्वेस्टिंग जैसी तकनीकों से युक्त यह केंद्र दिखाता है कि आधुनिकता और जिम्मेदारी साथ-साथ चल सकते हैं. इसके अलावा 30 हजार करोड़ रुपये के निवेश से आठ डेटा सेंटर पार्क विकसित किए जा रहे हैं. नोएडा-ग्रेटर नोएडा जैसे क्षेत्र बड़े डेटा सेंटर क्लस्टर के रूप में स्थापित हो रहे हैं जो प्रदेश के डिजिटल भविष्य की नींव का काम करेंगे.&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&lt;br /&gt;इलेक्ट्रॉनिक्स और सेमीकंडक्टर ने राज्य में आत्मनिर्भरता की नई इबारत लिखी है. एक समय था कि इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के लिए भारत को दूसरे देशों पर निर्भर रहना पड़ता था. परंतु आज राज्य में चौंकाने वाले परिणाम सामने आए हैं. गर्वित करने वाला आंकड़ा यह है कि देश में बनने वाले कुल मोबाइल फोन का 55 प्रतिशत हिस्सा अकेले उत्तर प्रदेश में निर्मित हो रहा है और देश की 60 प्रतिशत से अधिक इलेक्ट्रॉनिक कंपोनेंट निर्माण इकाइयां इसी राज्य में सक्रिय हैं. आत्मनिर्भर भारत के सपने में उत्तर प्रदेश की केंद्रीय भूमिका का यह प्रमाण है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;सेमीकंडक्टर क्षेत्र में भी प्रदेश की उपलब्धियां महत्वपूर्ण हैं. यमुना एक्सप्रेसवे क्षेत्र में साढ़े तीन हजार करोड़ रुपये से अधिक के निवेश वाली सेमीकंडक्टर यूनिट की आधारशिला रखी जा चुकी है. उत्तर प्रदेश 'सेमीकंडक्टर नीति-2024' घोषित करने वाला देश का चौथा राज्य बन चुका है. यमुना एक्सप्रेसवे औद्योगिक विकास प्राधिकरण क्षेत्र के सेक्टर-28 में इंडिया चिप प्राइवेट लिमिटेड की सुविधा इस बात की गवाह है कि प्रदेश केंद्र सरकार के महत्वाकांक्षी सेमीकॉन इंडिया प्रोग्राम 2.0 का एक भरोसेमंद साझीदार बनकर उभरा है. इलेक्ट्रॉनिक्स क्षेत्र में 200 से अधिक कंपनियों की मौजूदगी, 43 हजार करोड़ रुपये से अधिक का निवेश और तीन लाख से ज्यादा रोजगार के अवसर, यह सब मिलकर प्रदेश की क्षमता को दर्शाते हैं. ऐसी क्षमता जिसमें एलजी, हायर, डिक्सन, सैमसंग जैसी वैश्विक कंपनियां भी भरोसा कर रही हैं. उत्तर प्रदेश इलेक्ट्रॉनिक्स कंपोनेंट्स मैन्युफैक्चरिंग पॉलिसी-2025 के तहत 3800 करोड़ रुपये से अधिक का निवेश इस भरोसे को विस्तार देते हैं.&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&lt;br /&gt;तकनीकी विकास की यह यात्रा केवल नागरिक उपयोग तक सीमित नहीं है. रक्षा उत्पादन में उत्तर प्रदेश आत्मगौरव का अध्याय लिख रहा है. लखनऊ में स्थापित &quot;ब्रह्मोस एयरोस्पेस&quot; यूनिट में आधुनिक और घातक 'ब्रह्मोस मिसाइल' का निर्माण होना हर उत्तर प्रदेशवासी के लिए गर्व का विषय है. जो प्रदेश कभी रक्षा उत्पादन के नक्शे पर मौजूद नहीं था, वह आज देश की सामरिक शक्ति को मजबूत करने में योगदान दे रहा है. उत्तर प्रदेश अब राष्ट्रीय सुरक्षा की दृष्टि से भी एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और ऐसा तकनीकी को प्रमुखता देने की योगी सरकार की सोच से हुआ है.&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;तकनीकी विकास का असली अर्थ तभी पूरा होता है, जब उसका लाभ अंतिम पंक्ति में खड़े व्यक्ति तक पहुंचे. इस दिशा में सरकार ने ई-साथी मोबाइल ऐप के माध्यम से 24 से अधिक सरकारी सेवाओं को जनता की अंगुलियों तक पहुंचाया है. 2,066 ग्राम पंचायतों तक ऑप्टिकल फाइबर कनेक्टिविटी पहुंचना यह दर्शाता है कि डिजिटल क्रांति अब शहरों की चारदीवारी तक सीमित नहीं रही. प्रोजेक्ट गंगा के माध्यम से 20 लाख ग्रामीण और अर्ध-शहरी घरों तक हाई-स्पीड इंटरनेट पहुंचाने का प्रयास इस बात का प्रमाण है कि सरकार डिजिटल विभाजन को पाटने के लिए गंभीरता से प्रतिबद्ध है.&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;औद्योगिक क्रांति की सफलता उसके आधारभूत ढांचे पर टिकी होती है. जेवर इंटरनेशनल एयरपोर्ट, ईस्टर्न और वेस्टर्न डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर, और सघन एक्सप्रेसवे नेटवर्क ने उत्तर प्रदेश को निवेशकों के लिए एक स्वाभाविक गंतव्य बना दिया है. ग्रेटर नोएडा में 75 एकड़ में फैला रोबोटिक्स एवं एआई कंप्यूटिंग पार्क आने वाले वर्षों में प्रदेश को तकनीकी नवाचार के एक नए केंद्र के रूप में स्थापित करेगा. लखनऊ में 100 एकड़ की एचसीएल आईटी सिटी और सात एसटीपीआई आईटी पार्क, आईटी पॉलिसी के तहत सात हजार करोड़ रुपये से अधिक के निवेश यूपी के भविष्य का आधार हैं. उत्तर प्रदेश की यह तकनीकी यात्रा एक समग्र सोच का परिणाम है जिसमें बुनियादी ढांचा, नीति, प्रतिभा और अवसर एक साथ मिलकर नए भविष्य का निर्माण कर रहे हैं.&lt;/p&gt;
&lt;ul&gt;
&lt;li style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;प्रो. पुनीत कुमार, भौतिकी विभाग, लखनऊ विश्वविद्यालय&lt;/li&gt;
&lt;/ul&gt;]]></description><slash:comments>0</slash:comments><media:thumbnail url="https://feeds.abplive.com/onecms/images/uploaded-images/2026/09/19/f0a3af995e573972944993ebe83d816c1789811124604344_original.jpg" width="220"/></item><item><title><![CDATA[अल्जाइमर से बचाव में जीवनशैली की अहम भूमिका, दिमाग को स्वस्थ रखने के 5 आसान तरीके]]></title><link>https://www.abplive.com/blog/alzheimer-disease-5-easy-ways-to-keep-brain-healthy-3190359</link><comments>https://www.abplive.com/blog/alzheimer-disease-5-easy-ways-to-keep-brain-healthy-3190359#respond</comments><pubDate>Thu, 17 Sep 2026 21:23:49 +0530 </pubDate><dc:creator><![CDATA[ डॉ. दिनेश चौकसे ]]></dc:creator><category><![CDATA[  ]]></category><guid isPermaLink="true">https://www.abplive.com/blog/alzheimer-disease-5-easy-ways-to-keep-brain-healthy-3190359</guid><description><![CDATA[&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;भूलने की समस्या अधिकांश बढ़ती उम्र के लोगों में सामान्य मानी जाती है, लेकिन यदि लगातार भूलने की समस्या होना, रोजाना के कामों में परेशानी होना और निर्णय लेने की क्षमता में बदलाव जैसे लक्षण अल्जाइमर रोग की ओर संकेत कर सकते हैं. अल्जाइमर एक प्रगतिशील न्यूरोडीजेनेरेटिव बीमारी है, जिसमें धीरे-धीरे याददाश्त और सोचने-समझने की क्षमता पर प्रभाव पड़ता है. हालांकि उम्र और आनुवंशिक कारणों जैसे कुछ जोखिम कारकों को बदला नहीं जा सकता, लेकिन स्वस्थ जीवनशैली अपनाकर मस्तिष्क के स्वास्थ्य को बेहतर बनाए रखने और कुछ जोखिम कारकों को कम करने में मदद मिल सकती है. वे कौनसी आवश्यक बातें हैं जिन्हें अपने रोजमर्रा की जिंदगी में अपनाने से अल्जाइमर की समस्या को नियंत्रित किया जा सकता है, उसके बारे में जानना जरूरी है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;1. नियमित शारीरिक गतिविधि अपनाएं अपनी दिनचर्या में&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;नियमित व्यायाम केवल शरीर को स्वस्थ रखने के लिए ही नहीं, बल्कि मस्तिष्क के लिए भी महत्वपूर्ण है. तेज चलना, साइकिल चलाना, तैरना, योग या हल्की एरोबिक एक्सरसाइज जैसी गतिविधियां शरीर में रक्त संचार बेहतर करने में मदद करती हैं. सप्ताह में अधिकांश दिनों पर नियमित शारीरिक गतिविधि करने की आदत बनाना दिमाग और हृदय दोनों के स्वास्थ्य के लिए फायदेमंद हो सकता है. लंबे समय तक लगातार बैठे रहने से बचें और दिनभर में छोटे-छोटे एक्टिविटी ब्रेक लेते रहें.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;2. संतुलित और पौष्टिक आहार आवश्यक&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;मस्तिष्क को स्वस्थ रखने में खान-पान की महत्वपूर्ण भूमिका होती है. भोजन में हरी पत्तेदार सब्जियां, मौसमी फल, साबुत अनाज, दालें, बीन्स, नट्स और बीज शामिल करें. अत्यधिक नमक, चीनी, ट्रांस फैट और प्रोसेस्ड फूड का सेवन सीमित करना बेहतर है. संतुलित आहार शरीर के वजन, ब्लड प्रेशर, ब्लड शुगर और कोलेस्ट्रॉल को नियंत्रित रखने में मदद करता है, जो मस्तिष्क के स्वास्थ्य से भी जुड़े हैं.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;3. दिमाग सक्रिय रखें&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;जिस तरह शरीर को व्यायाम की जरूरत होती है, उसी तरह मस्तिष्क को भी सक्रिय रखना जरूरी है. किताब पढ़ना, नई भाषा या कोई नया कौशल सीखना, संगीत सुनना या सीखना, पहेलियां हल करना, लिखना और रचनात्मक गतिविधियों में शामिल होना मानसिक सक्रियता बनाए रखने में मदद कर सकता है. परिवार और दोस्तों के साथ बातचीत करना तथा सामाजिक गतिविधियों में भाग लेना भी मानसिक और भावनात्मक स्वास्थ्य के लिए उपयोगी है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;4. सही नींद जरुरी&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;पर्याप्त और अच्छी गुणवत्ता वाली नींद मस्तिष्क के स्वास्थ्य के लिए जरूरी है. रोजाना पर्याप्त नींद लेने और सोने-जागने का नियमित समय बनाए रखने की कोशिश करें. लंबे समय तक रहने वाला तनाव भी स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकता है. ध्यान, योग, गहरी सांस लेने की तकनीक, संगीत या अपनी पसंद की गतिविधियों के माध्यम से तनाव को नियंत्रित करने की कोशिश करें.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;5. ब्लड प्रेशर, डायबिटीज और कोलेस्ट्रॉल को नियंत्रित रखें&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;हाई ब्लड प्रेशर, डायबिटीज और बढ़ा हुआ कोलेस्ट्रॉल जैसे स्वास्थ्य संबंधी जोखिम कारक मस्तिष्क के स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकते हैं. इसलिए नियमित स्वास्थ्य जांच कराना और डॉक्टर की सलाह के अनुसार इन स्थितियों को नियंत्रित रखना महत्वपूर्ण है. धूम्रपान से बचना और शराब का सेवन न करना या सीमित करना भी समग्र स्वास्थ्य के लिए बेहतर है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;अपनाएं स्वस्थ आदतें और तनाव से बचें&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;अल्जाइमर से बचाव की कोई एक निश्चित गारंटी देने वाली रणनीति नहीं है. फिर भी, नियमित व्यायाम, संतुलित आहार, मानसिक सक्रियता, अच्छी नींद और स्वास्थ्य संबंधी जोखिम कारकों का नियंत्रण मस्तिष्क के स्वास्थ्य को लंबे समय तक बनाए रखने में मदद कर सकता है. तनावमुक्त वातावरण से भी अल्जाइमर की समस्या को कम कर सकता है. स्वस्थ आदतों की शुरुआत किसी भी उम्र में की जा सकती है. याददाश्त या सोचने-समझने की क्षमता में लगातार बदलाव दिखाई दें, तो इसे केवल उम्र का असर मानने के बजाय चिकित्सकीय सलाह लेना जरूरी है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;आज के समय में रक्त परीक्षण &amp;nbsp;(Blood Biomarker blood test P tau/Beta amyloid ratio test easily done and next day report come for early diagnosis of Alzheimer&amp;rsquo;s Disease, इन early stage of Mild Cognitive Impairment) उपलब्ध हैं, जिनकी मदद से अल्जाइमर डिमेंशिया का प्रारंभिक चरण में पता लगाया जा सकता है. समय पर निदान होने से रोगी को बेहतर और समग्र उपचार (Comprehensive Management) मिल पाता है, जिससे बीमारी की प्रगति को धीमा करने में सहायता मिलती है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;नई उपचार पध्दतियों को भी अपनाएं&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;डॉ. दिनेश चौकसे बताते हैं कि इन सबके अलावा, अब रोग-संशोधक (Disease-Modifying Therapy medicine like Injection Lacanemab) नई उपचार पद्धतियां भी उपलब्ध हैं, जो चयनित मरीजों में बीमारी की गति को कम करने और उनके जीवन की गुणवत्ता तथा स्वास्थ्य परिणामों को बेहतर बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं.&lt;/p&gt;]]></description><slash:comments>0</slash:comments><media:thumbnail url="https://feeds.abplive.com/onecms/images/uploaded-images/2026/09/17/27883d6ca366750d2791b02504a0e5371789660298654708_original.jpg" width="220"/></item><item><title><![CDATA[25 वर्षों की जनसेवा: राष्ट्र निर्माण के संकल्प से विकसित भारत की यात्रा तक]]></title><link>https://www.abplive.com/blog/pm-narendra-modi-birthday-25-years-in-public-life-samrat-choudhary-bihar-cm-3190001</link><comments>https://www.abplive.com/blog/pm-narendra-modi-birthday-25-years-in-public-life-samrat-choudhary-bihar-cm-3190001#respond</comments><pubDate>Thu, 17 Sep 2026 10:00:58 +0530 </pubDate><dc:creator><![CDATA[ सम्राट चौधरी ]]></dc:creator><category><![CDATA[  ]]></category><guid isPermaLink="true">https://www.abplive.com/blog/pm-narendra-modi-birthday-25-years-in-public-life-samrat-choudhary-bihar-cm-3190001</guid><description><![CDATA[&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;भारत के सार्वजनिक जीवन में 25 वर्षों तक लगातार शासन के प्रमुख के रूप में सेवा करना अपने आप में एक असाधारण उपलब्धि है. यह केवल किसी व्यक्ति की राजनीतिक यात्रा की लंबाई नहीं, बल्कि उस विश्वास, परिश्रम, संकल्प और जनसेवा का प्रमाण है, जिसे देश की जनता ने लगातार मजबूत किया है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सार्वजनिक जीवन में शासन के प्रमुख के रूप में 25 वर्ष इसी असाधारण यात्रा का प्रतीक हैं.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;वर्ष 2001 में गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में शुरू हुई यह यात्रा आज प्रधानमंत्री के रूप में भारत को विकसित राष्ट्र बनाने के विराट संकल्प तक पहुंच चुकी है. इन 25 वर्षों में &amp;nbsp;नरेंद्र मोदी जी ने शासन को केवल प्रशासन चलाने का माध्यम नहीं माना, बल्कि इसे करोड़ों देशवासियों के जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाने का साधन बनाया है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि उनके लिए राजनीति का केंद्र सत्ता नहीं, बल्कि जनता और जनसेवा है. उनसे मिलने का अवसर जब भी मिलता है, उनके व्यक्तित्व की यह विशेषता और अधिक स्पष्ट होकर सामने आती है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मेरी जब भी मुलाकात होती है, मैं उनके अनुभव और मार्गदर्शन से बहुत कुछ सीखने का प्रयास करता हूं. उनकी बातचीत में देश, राज्य, संगठन और सरकार से जुड़े विषयों के साथ सबसे अधिक चिंता आम जनता के जीवन को लेकर दिखाई देती है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;उनसे मुलाकात के दौरान एक बात हमेशा महसूस होती है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की प्राथमिकता स्पष्ट है&amp;mdash;जनता के लिए अधिक से अधिक काम करना और शासन के प्रत्येक निर्णय का लाभ अंतिम व्यक्ति तक पहुंचाना.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;वे हमेशा इस बात पर जोर देते हैं कि जनप्रतिनिधि जनता के बीच रहें, उनकी समस्याओं को सुनें और सरकार की योजनाओं का लाभ वास्तविक पात्र लोगों तक पहुंचाने के लिए लगातार प्रयास करें. उनका यह आग्रह हम सभी जनप्रतिनिधियों के लिए प्रेरणा का स्रोत है. उनका स्पष्ट मानना है कि किसी भी योजना की सफलता केवल उसके निर्माण से नहीं, बल्कि उसके समयबद्ध और प्रभावी क्रियान्वयन से तय होती है. इसलिए हमारा प्रयास होना चाहिए कि पात्र व्यक्ति को उसका अधिकार समय सीमा के भीतर मिले और सरकारी व्यवस्था उसके लिए सहज, पारदर्शी और जवाबदेह बने.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के व्यक्तित्व का सबसे प्रेरणादायी पक्ष यह है कि देश के सर्वोच्च पद पर पहुंचने के बावजूद उनकी कार्यशैली में सामान्य नागरिक के प्रति वही संवेदनशीलता दिखाई देती है. वे देश के गरीब, किसान, मजदूर, युवा, महिला, छोटे उद्यमी और समाज के अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति की चिंता को शासन की प्राथमिकता से जोड़ते हैं.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;यही कारण है कि उनकी सरकार की अनेक योजनाओं का केंद्र समाज का वह वर्ग रहा है, जिसे लंबे समय तक विकास की मुख्यधारा से दूर माना जाता था. गरीबों को आवास, शौचालय, बिजली, बैंकिंग सुविधा, स्वास्थ्य सुरक्षा और खाद्य सुरक्षा से जोड़ने से लेकर महिलाओं के सशक्तिकरण और युवाओं के लिए अवसर पैदा करने तक, सरकार ने जनकल्याण को व्यापक स्वरूप दिया है. यह केवल योजनाओं की सूची नहीं है, बल्कि करोड़ों लोगों के जीवन में आए परिवर्तन की कहानी है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का नेतृत्व केवल योजनाओं और प्रशासनिक उपलब्धियों तक सीमित नहीं है. उन्होंने देश के भीतर एक नया आत्मविश्वास पैदा किया है. आज भारत अंतरिक्ष, डिजिटल तकनीक, स्टार्टअप, आधारभूत संरचना, रक्षा, विनिर्माण और नवाचार जैसे क्षेत्रों में तेजी से आगे बढ़ रहा है. दुनिया भारत को एक नई दृष्टि, नई क्षमता और बढ़ती हुई वैश्विक भूमिका के साथ देख रही है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;भारत की बढ़ती वैश्विक प्रतिष्ठा का एक महत्वपूर्ण उदाहरण BRICS के मंच पर भी दिखाई देता है. आज भारत वैश्विक दक्षिण की आवाज को मजबूती से रखने वाले प्रमुख देशों में है. BRICS जैसे महत्वपूर्ण बहुपक्षीय मंच पर भारत की सक्रिय और प्रभावी भूमिका यह दर्शाती है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत केवल वैश्विक घटनाक्रम का दर्शक नहीं, बल्कि विश्व व्यवस्था को प्रभावित करने वाला महत्वपूर्ण भागीदार बन रहा है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;BRICS की सफलता भारत के लिए केवल कूटनीतिक उपलब्धि नहीं है. यह भारत की आर्थिक क्षमता, तकनीकी सामर्थ्य, युवा शक्ति और वैश्विक विश्वसनीयता का भी प्रमाण है. अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत की बढ़ती स्वीकार्यता प्रत्येक भारतीय के लिए गर्व का विषय है. आज दुनिया भारत की ओर केवल एक बड़े बाजार के रूप में नहीं, बल्कि समाधान देने वाली शक्ति, विश्वसनीय साझेदार और भविष्य के नेतृत्वकर्ता के रूप में देख रही है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;हाल के वर्षों में भारत की उपलब्धियों को देखकर बिहार के रूप में हमें भी नई संभावनाएं दिखाई देती हैं. जब भारत विश्व स्तर पर अपनी पहचान मजबूत कर रहा है, तब बिहार को भी अपनी क्षमता के अनुरूप आगे बढ़ना होगा. बिहार की युवा शक्ति, कृषि क्षमता, सांस्कृतिक विरासत, ज्ञान परंपरा और उद्यमशीलता को आधुनिक अवसरों से जोड़ना हमारी प्राथमिकता है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;मुझे व्यक्तिगत रूप से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की एक और बात अत्यंत प्रभावित करती है&amp;mdash;उनका निरंतर सीखने और काम करने का भाव. इतने लंबे सार्वजनिक जीवन के बावजूद उनमें काम के प्रति ऊर्जा और उत्साह आज भी उसी प्रकार दिखाई देता है. वे हर विषय को गहराई से समझने, उसके प्रभाव को जानने और परिणामों की समीक्षा करने में विश्वास रखते हैं.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;जब भी उनसे मिलने का अवसर मिलता है, उनका मार्गदर्शन केवल राजनीतिक या प्रशासनिक विषयों तक सीमित नहीं रहता. वे इस बात पर बल देते हैं कि जनता के साथ निरंतर संवाद होना चाहिए. सरकार जो काम कर रही है, उसकी जानकारी जनता तक पहुंचे और जनता की जो अपेक्षाएं हैं, वे सरकार तक पहुंचें&amp;mdash;लोकतंत्र की यही सबसे महत्वपूर्ण कड़ी है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;बिहार के मुख्यमंत्री के रूप में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का मार्गदर्शन मेरे लिए विशेष महत्व रखता है. बिहार के विकास को लेकर हमारी सरकार की प्राथमिकताओं पर चर्चा के दौरान भी उनका स्पष्ट संदेश रहता है कि बिहार के लोगों की आकांक्षाओं को केंद्र में रखकर तेजी से काम किया जाए. विकास का लाभ किसी एक वर्ग, क्षेत्र या शहर तक सीमित न रहे, बल्कि गांव-गांव और समाज के हर वर्ग तक पहुंचे.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;बिहार आज एक नए दौर में प्रवेश कर रहा है. हमारी सरकार का लक्ष्य है कि राज्य में रोजगार के नए अवसर पैदा हों, निवेश आए, उद्योग स्थापित हों, शिक्षा और स्वास्थ्य की सुविधाएं बेहतर हों तथा युवाओं को अपने राज्य में ही आगे बढ़ने के अवसर मिलें. प्रधानमंत्री &amp;nbsp;नरेंद्र मोदी जी के विकसित भारत 2047 के विजन से प्रेरणा लेते हुए हमारा प्रयास है कि बिहार भी विकसित भारत की यात्रा का एक मजबूत इंजन बने.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;बिहार की सबसे बड़ी ताकत उसका युवा है. हमारे युवाओं में प्रतिभा की कोई कमी नहीं है. आवश्यकता इस बात की है कि उन्हें गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, कौशल, रोजगार, उद्यमिता और तकनीक के पर्याप्त अवसर मिलें. हमारी सरकार इसी दिशा में काम कर रही है. हमारा लक्ष्य ऐसा बिहार बनाना है जहां युवा रोजगार मांगने वाले ही नहीं, बल्कि रोजगार देने वाले भी बनें.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ मेरे संवाद का एक महत्वपूर्ण पक्ष उनका यह आग्रह है कि जनता की सेवा में कोई कमी नहीं रहनी चाहिए. वे हमेशा जनप्रतिनिधियों को अधिक मेहनत करने, लोगों के बीच जाने और उनकी समस्याओं को समझने के लिए प्रेरित करते हैं. यह संदेश मेरे लिए व्यक्तिगत रूप से भी बहुत महत्वपूर्ण है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;एक मुख्यमंत्री के रूप में मेरा प्रयास है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के इस मार्गदर्शन को बिहार के शासन में अधिकतम रूप से लागू किया जाए. सरकार की योजनाएं केवल कागज पर न रहें, बल्कि उनका वास्तविक लाभ गरीब और जरूरतमंद व्यक्ति तक पहुंचे&amp;mdash;यही हमारी प्राथमिकता है. प्रशासन में जवाबदेही हो, योजनाओं का समयबद्ध क्रियान्वयन हो और जनता को अनावश्यक कठिनाइयों का सामना न करना पड़े, इसके लिए लगातार प्रयास किया जा रहा है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की 25 वर्षों की यात्रा हमें यह भी सिखाती है कि बड़े परिवर्तन के लिए लंबे समय तक निरंतर परिश्रम और स्पष्ट लक्ष्य आवश्यक है. गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में उन्होंने जिस विकास मॉडल पर काम किया, उसी अनुभव को उन्होंने राष्ट्रीय स्तर पर व्यापक रूप दिया. आज भारत की अर्थव्यवस्था, आधारभूत संरचना, डिजिटल व्यवस्था और वैश्विक भूमिका में आए परिवर्तन उसी दीर्घकालिक सोच का परिणाम हैं.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की यात्रा का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष केवल उपलब्धियां नहीं हैं. यह यात्रा विश्वास की यात्रा है&amp;mdash;जनता के विश्वास की, कार्यकर्ताओं के विश्वास की और एक ऐसे भारत के विश्वास की, जो अपनी क्षमता को पहचानकर विश्व में नेतृत्व की भूमिका निभा सकता है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;उनके नेतृत्व में भारत ने यह आत्मविश्वास हासिल किया है कि हम अपनी समस्याओं का समाधान स्वयं कर सकते हैं, अपनी तकनीक विकसित कर सकते हैं, अपने युवाओं को अवसर दे सकते हैं और दुनिया के सामने अपनी शर्तों पर आगे बढ़ सकते हैं.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;आज भारत का आत्मविश्वास उसके युवाओं में दिखाई देता है, उसके स्टार्टअप में दिखाई देता है, उसके वैज्ञानिकों की उपलब्धियों में दिखाई देता है, उसके इंफ्रास्ट्रक्चर में दिखाई देता है और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उसकी बढ़ती प्रतिष्ठा में दिखाई देता है. यह आत्मविश्वास ही विकसित भारत के निर्माण की सबसे बड़ी पूंजी है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;बिहार की जनता के लिए भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का नेतृत्व आशा और अवसर का प्रतीक है. बिहार की ऐतिहासिक क्षमता, प्रतिभाशाली युवा शक्ति और विशाल मानव संसाधन को विकास की नई दिशा देने के लिए केंद्र और राज्य के बीच मजबूत समन्वय आवश्यक है. हमारी डबल इंजन सरकार इसी उद्देश्य के साथ काम कर रही है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;हमारा प्रयास है कि बिहार की पुरानी चुनौतियों का समाधान आधुनिक सोच और नई तकनीक के माध्यम से किया जाए. सड़क, बिजली, पानी, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सुविधाओं के साथ-साथ अब हमें उद्योग, निवेश, डिजिटल अर्थव्यवस्था, पर्यटन, कृषि-प्रसंस्करण, हस्तशिल्प और नई तकनीक आधारित क्षेत्रों में भी बिहार की क्षमता को विकसित करना है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जिस विकसित भारत का सपना देश के सामने रखा है, उसमें बिहार की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है. बिहार के बिना विकसित भारत की कल्पना पूर्ण नहीं हो सकती. इसलिए हमारा संकल्प केवल बिहार को आगे बढ़ाने का नहीं, बल्कि बिहार को विकसित भारत के निर्माण में अग्रणी भागीदार बनाने का है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;17 सितंबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जन्मदिवस के अवसर पर मैं बिहार की जनता की ओर से उन्हें हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं देता हूं. मैं उनके स्वस्थ, दीर्घायु और निरंतर सक्रिय जीवन की कामना करता हूं.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;प्रधानमंत्री जी के जन्मदिवस को केवल उत्सव के रूप में मनाना पर्याप्त नहीं है. यह अवसर उनके जीवन से प्रेरणा लेकर सेवा, सुशासन और राष्ट्र निर्माण के संकल्प को और मजबूत करने का अवसर है. उनके 25 वर्षों के सार्वजनिक जीवन की सबसे बड़ी सीख यही है कि राजनीति का वास्तविक अर्थ समाज और राष्ट्र की सेवा है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;मेरे लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी केवल देश के प्रधानमंत्री नहीं, बल्कि ऐसे मार्गदर्शक हैं, जिनसे हर मुलाकात के बाद जनता के लिए और अधिक काम करने की प्रेरणा मिलती है. उनका जीवन हमें बताता है कि सार्वजनिक जीवन में पद महत्वपूर्ण नहीं होता, महत्वपूर्ण होता है&amp;mdash;जनता के प्रति दायित्व, राष्ट्र के प्रति समर्पण और अंतिम व्यक्ति तक विकास पहुंचाने का संकल्प.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;उनकी 25 वर्षों की यात्रा हमें यह विश्वास देती है कि यदि लक्ष्य स्पष्ट हो, नीयत साफ हो और निरंतर परिश्रम की भावना हो, तो असंभव दिखाई देने वाले लक्ष्य भी प्राप्त किए जा सकते हैं.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;आइए, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 25 वर्षों के शासन और जनसेवा के अनुभव से प्रेरणा लेते हुए हम बिहार को विकास, सुशासन और जनकल्याण के नए युग में आगे ले जाने का संकल्प लें.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;विकसित भारत के संकल्प के साथ विकसित बिहार का निर्माण&amp;mdash;यही हमारी प्रतिबद्धता है और यही प्रधानमंत्री &amp;nbsp;नरेंद्र मोदी जी के प्रति हमारी सच्ची शुभकामना भी है.&lt;/p&gt;]]></description><slash:comments>0</slash:comments><media:thumbnail url="https://feeds.abplive.com/onecms/images/uploaded-images/2026/09/17/48710eeb427980fdc47ad77bb77de0831789619424127344_original.jpg" width="220"/></item><item><title><![CDATA[विजन से एक्शन तक: PM मोदी के लीडरशिप मॉडल से क्या सीखें Gen Z]]></title><link>https://www.abplive.com/blog/pm-modi-birthday-gen-z-gen-alpha-up-politics-3189890</link><comments>https://www.abplive.com/blog/pm-modi-birthday-gen-z-gen-alpha-up-politics-3189890#respond</comments><pubDate>Wed, 16 Sep 2026 21:46:56 +0530 </pubDate><dc:creator><![CDATA[ पंकज चौधरी ]]></dc:creator><category><![CDATA[  ]]></category><guid isPermaLink="true">https://www.abplive.com/blog/pm-modi-birthday-gen-z-gen-alpha-up-politics-3189890</guid><description><![CDATA[&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जन्मदिवस के अवसर पर देश और दुनिया भर से उन्हें शुभकामनाएं मिल रही हैं. जनसेवा और राजनीति में लंबे समय से सक्रिय लोगों के लिए यह दिन केवल एक उत्सव नहीं, बल्कि उनके दूरदर्शी नेतृत्व और निस्वार्थ राष्ट्र सेवा के प्रति आभार व्यक्त करने का अवसर है. पीएम मोदी ने शासन व्यवस्था की परिभाषा बदलते हुए यह स्पष्ट किया है कि नेतृत्व का मतलब सत्ता नहीं, बल्कि जिम्मेदारी, अनुशासन और देश के प्रति समर्पण है. उनका मूल मंत्र हमेशा समाज की अंतिम पंक्ति में खड़े व्यक्ति तक विकास पहुंचाना रहा है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;उनके नेतृत्व में भारत ने इंफ्रास्ट्रक्चर, डिजिटल तकनीक और अर्थव्यवस्था के क्षेत्र में ऐतिहासिक प्रगति की है. 'आत्मनिर्भर भारत' के विजन ने देश के युवाओं को सिर्फ नौकरी ढूंढने वाला नहीं, बल्कि नौकरी देने वाला (उद्यमी) बनने के लिए प्रेरित किया है. पीएम मोदी की नीतियों ने देश की आर्थिक स्थिति को मजबूत करने के साथ-साथ कल्याणकारी योजनाओं के जरिए समाज के हर वर्ग को सशक्त बनाया है. इसी वजह से आज भारत विश्व स्तर पर एक मजबूत आर्थिक शक्ति के रूप में पहचान बना चुका है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;उत्तर प्रदेश के विकास में भी प्रधानमंत्री के मार्गदर्शन की महत्वपूर्ण भूमिका रही है. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के साथ मिलकर 'डबल इंजन सरकार' ने राज्य की पुरानी छवि को पूरी तरह बदल दिया है. आज यूपी नए एक्सप्रेस-वे, औद्योगिक गलियारों और आधुनिक हवाई अड्डों के साथ देश का प्रमुख ग्रोथ इंजन बन चुका है. वाराणसी जैसे ऐतिहासिक और सांस्कृतिक शहरों में प्राचीन विरासत और आधुनिक इंफ्रास्ट्रक्चर का बेहतरीन तालमेल देखने को मिल रहा है, जिससे राज्य में बड़े पैमाने पर वैश्विक निवेश आ रहा है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;पीएम मोदी की बिना थके लगातार काम करने की शैली आज की युवा पीढ़ी मिलैनियल्स, &amp;nbsp;Gen Z और Gen Alpha के लिए एक व्यावहारिक सीख है. तुरंत परिणाम चाहने वाले इस दौर में उनका जीवन सिखाता है कि सफलता के लिए दूरगामी सोच, धैर्य और निरंतर मेहनत जरूरी है. उन्होंने युवाओं को तकनीक अपनाने, स्वास्थ्य पर ध्यान देने और अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़े रहकर बड़े सपने देखने का संदेश दिया है. पूरा देश आज उनके स्वस्थ और दीर्घायु जीवन की कामना करते हुए 'विकसित भारत' के निर्माण का संकल्प दोहरा रहा है.&lt;/p&gt;]]></description><slash:comments>0</slash:comments><media:thumbnail url="https://feeds.abplive.com/onecms/images/uploaded-images/2026/09/16/f3fe29d0c9669e7bc14faf2dbce40e251789575843967708_original.jpg" width="220"/></item><item><title><![CDATA[दिल्ली में ब्रिक्स: दुनिया बदल रही है, और ब्रिक्स भी बदल रहा है !]]></title><link>https://www.abplive.com/blog/brics-summit-2026-india-presidency-in-new-delhi-know-how-world-changing-3188904</link><comments>https://www.abplive.com/blog/brics-summit-2026-india-presidency-in-new-delhi-know-how-world-changing-3188904#respond</comments><pubDate>Mon, 14 Sep 2026 23:25:52 +0530 </pubDate><dc:creator><![CDATA[ रुमान हाशमी, वरिष्ठ पत्रकार ]]></dc:creator><category><![CDATA[  ]]></category><guid isPermaLink="true">https://www.abplive.com/blog/brics-summit-2026-india-presidency-in-new-delhi-know-how-world-changing-3188904</guid><description><![CDATA[&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;नई दिल्ली में दो दिन से चल रही 18वीं ब्रिक्स समिट 13 सितंबर को सिमट चुकी है. और विदेशी नेता भी दिल्ली से रवाना हो चुके हैं या होने लगे हैं . चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग भी दिल्ली से रवाना हो चुके हैं.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;इस बार की बैठक इसलिए ख़ास है क्योंकि दुनिया एक बेहद ख़तरनाक दौर से गुज़र रही है. एक तरफ़ अमेरिका और ईरान के बीच जंग के और फैलने का ख़तरा &amp;nbsp;है, दूसरी तरफ ग़ज़्ज़ा में सीज़फायर के बावजूद फिलिस्तीनी इलाकों में इज़राइली हमले जारी हैं. और उधर यमन में ईरान समर्थित हूती लड़ाकों ने लाल सागर के बेहद अहम बंदरगाह मोखा पर कब्ज़ा कर लिया है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;इसलिए दिल्ली में बैठे मोदी, पुतिन, शी जिनपिंग और ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेज़ेशकियान के सामने सिर्फ व्यापार या विकास का सवाल नहीं था&amp;mdash;सवाल यह भी था कि दुनिया की बड़ी उभरती ताकतें इस बदलती हुई दुनिया में आखिर अपनी सामूहिक आवाज़ कितनी मजबूत कर सकती हैं. ब्रिक्स में अब 11 देश हैं और ये देश दुनिया की लगभग आधी आबादी और वैश्विक अर्थव्यवस्था के लगभग 40 प्रतिशत हिस्से का प्रतिनिधित्व करते हैं.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;मोदी और शी की मुलाक़ात, शायद सबसे महत्वपूर्ण घटनाक्रम&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;समिट से अलग नरेंद्र मोदी और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की मुलाक़ात पर पूरी दुनिया की निगाह थी. शी करीब सात साल बाद भारत आए हैं. दोनों नेताओं ने सीमा पर शांति, व्यापार, बाज़ार तक पहुंच और दोनों देशों के रिश्तों को धीरे-धीरे सामान्य बनाने पर बात की. मोदी ने साफ़ कहा कि सीमा पर शांति और स्थिरता अच्छे भारत-चीन संबंधों की बुनियाद है. शी ने लंबे समय का नजरिया अपनाने और आपसी सहयोग बढ़ाने की बात कही.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;यह इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि चीन और भारत ब्रिक्स के दो सबसे बड़े सदस्य हैं, लेकिन दोनों के बीच सीमा विवाद और आर्थिक प्रतिस्पर्धा भी है. यानी ब्रिक्स को मज़बूत बनाना है तो भारत-चीन रिश्ते सुधरना बेहद ज़रूरी है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;पुतिन का बड़ा प्रस्ताव&amp;mdash;Su-57&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ मोदी की बातचीत भी काफी अहम रही. रूस ने भारत को अपने पांचवीं पीढ़ी के अत्याधुनिक स्टील्थ फाइटर सुखोई Su-57 की पेशकश की है. लेकिन यह सिर्फ विमान बेचने का मामला नहीं है. रूस ने भारत के साथ Su-57 की संयुक्त उत्पादन और तकनीक साझा करने की पेशकश की है. इसके अलावा भारत के Su-30MKI विमानों को बड़े स्तर पर अपग्रेड करके &amp;ldquo;सुपर सुखोई&amp;rdquo; बनाने का प्रस्ताव भी चर्चा में है. अगर भारत Su-57 के संयुक्त उत्पादन और टेक्नोलॉजी ट्रांसफर पर आगे बढ़ता है, तो यह भारतीय वायुसेना के लिए बड़ा फ़ैसला &amp;nbsp; होगा. हालांकि अभी इसे अंतिम डील समझना जल्दबाजी होगी.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;ब्रिक्स की कॉमन करेंसी, असल कहानी क्या है?&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;ब्रिक्स में अपनी एक अलग &amp;ldquo;ब्रिक्स करेंसी&amp;rdquo; बनाने की कोई औपचारिक योजना इस समिट में पास नहीं हुई. फरवरी 2026 में ब्राज़ील के राष्ट्रपति लूला दा सिल्वा ने एक इंटरव्यू में साफ़ &amp;nbsp;कहा था कि ब्राज़ील ब्रिक्स की नई मुद्रा बनाने का प्रस्ताव नहीं कर रहा. उनकी बात थी कि देशों को डॉलर पर निर्भरता कम करने और आपस में अपनी राष्ट्रीय मुद्राओं में व्यापार करने की संभावना तलाशनी चाहिए.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;यानी बात &amp;ldquo;एक नई ब्रिक्स करेंसी&amp;rdquo; से ज़्यादा डॉलर के बजाय रुपये, युआन, रूबल, रियाल, रियाल आदि में आपसी व्यापार और भुगतान की है. और यहां भारत का रुख़ अपेक्षाकृत सावधान है. भारत ब्रिक्स को अमेरिका-विरोधी आर्थिक गठबंधन में बदलना नहीं चाहता. मोदी ने भी बार-बार कहा है कि ब्रिक्स किसी के खिलाफ नहीं है. यही शायद ब्रिक्स की सबसे बड़ी कमज़ोरी भी है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;चीन डॉलर के प्रभुत्व को चुनौती देना चाहता है, रूस पश्चिमी प्रतिबंधों से बाहर निकलने का रास्ता चाहता है, ईरान अमेरिकी प्रतिबंधों से परेशान है, जबकि भारत अमेरिका के साथ भी अपने रिश्ते मज़बूत रखना चाहता है. इसीलिए ब्रिक्स में एक जैसी विदेश नीति बनाना आसान नहीं है. &amp;nbsp;कि चीन-भारत तनाव, अलग-अलग भू-राजनीतिक हित और ब्रिक्स को कितना राजनीतिक बनाया जाए, इन सब पर सदस्य देशों में मतभेद हैं.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;मध्य-पूर्व का संकट ब्रिक्स के सामने&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;इस समिट का सबसे बड़ा अंतरराष्ट्रीय मुद्दा शायद यही था. ब्रिक्स के 11 देशों ने नई दिल्ली डिक्लेरेशन में मध्य-पूर्व की बिगड़ती स्थिति पर गंभीर चिंता जताई और ज़्यादा संयम बरतने, बातचीत और कूटनीति के रास्ते से समाधान निकालने की अपील की. ख़ास बात यह है कि ब्रिक्स में एक तरफ ईरान है और दूसरी तरफ यूएई &amp;nbsp;जैसे देश हैं, जिनके हित इस संघर्ष में अलग-अलग हैं. इसके बावजूद दोनों ने संयुक्त बयान का समर्थन किया.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;चीन के शी जिनपिंग ने तो ब्रिक्स से मध्य-पूर्व में शांति क़ायम कराने में ज्यादा सक्रिय भूमिका निभाने की अपील की. उधर यमन में हूती लड़ाकों ने रणनीतिक मोखा बंदरगाह पर कब्ज़ा कर लिया है. यह जगह बाब-अल-मंदेब के नज़दीक है और दुनिया के अहम समुद्री व्यापार मार्गों में से एक पर इसका असर पड़ सकता है.&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;गाज़ा और ब्रिक्स की भाषा&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;गाज़ा को लेकर भी ब्रिक्स ने युद्धविराम, मानवीय मदद और फ़िलिस्तीन के अधिकारों का समर्थन किया है. लेकिन यहां भी एक दिलचस्प बात है, अंतिम घोषणा की भाषा काफी सावधान रखी गई है. पश्चिमी मीडिया बहसों में ब्रिक्स की यही समस्या सामने आती रही है: संगठन में इतनी अलग-अलग राजनीतिक सोच वाले देश हैं कि कड़ा और एकजुट राजनीतिक बयान देना मुश्किल हो जाता है. यानी ब्रिक्स अमेरिका और पश्चिमी व्यवस्था को चुनौती देने की क्षमता तो रखता है, लेकिन अभी वह नाटो जैसा एकजुट राजनीतिक-सैन्य गठबंधन नहीं है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;और इसी बीच दिल्ली के आम लोग.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;इस पूरी अंतरराष्ट्रीय चमक-दमक का दूसरा पहलू दिल्ली की सड़कों पर दिखाई दिया. समिट के कारण कई इलाकों में ट्रैफिक प्रतिबंध और डायवर्जन लगाए गए. 35 से ज्यादा सड़कें प्रभावित हुईं और 22 डायवर्जन प्वाइंट बनाए गए. सरकारी दफ्तर और स्कूल 11 सितंबर को बंद रखे गए थे,लेकिन मेट्रो चलती रही और 13 सितंबर को तो सभी लाइनों पर सुबह 6 बजे से सेवा शुरू की गई.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;फिर भी आम लोगों को परेशानी हुई, खासकर उन लोगों को जो रोज़ काम के लिए एक हिस्से से दूसरे हिस्से में जाते हैं. कई कर्मचारियों, डिलीवरी वर्करों और कम आमदनी वाले लोगों को लंबे और महंगे रास्ते अख़्तियार करने पड़े.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;और सबसे ज्यादा विवाद उन नीले-सफेद पर्दों को लेकर हुआ जो वसंत विहार के कूली कैंप जैसी बस्तियों के सामने लगाए गए. स्थानीय लोगों का कहना था कि शायद सर्कार हमें कूड़ा समझती है इसलिए विदेशी मेहमानों की नज़र से बस्ती को छिपाने के लिए ऐसा किया गया है,वहीँ कांग्रेस के साशनकाल में ऐसा नहीं होता था. यही तस्वीर इस पूरे आयोजन का एक बड़ा विरोधाभास दिखाती है, दुनिया को ग्लोबल साउथ की आवाज़ दिखाने वाली समिट उसी ग्लोबल साउथ के गरीब लोगों को पर्दे के पीछे क्यों रखे?&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;अब एक बड़ा सवाल, आख़िर ब्रिक्स से हासिल क्या हुआ?&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;मेरी नज़र में इस समिट को न तो &amp;ldquo;बहुत बड़ी कूटनीतिक जीत&amp;rdquo; कहना ठीक होगा और न ही &amp;ldquo;ब्रिक्स पूरी तरह नाकाम है.&amp;rdquo; सबसे बड़ा हासिल यह है कि 11 अलग-अलग देशों ने इतने गंभीर अंतरराष्ट्रीय संकट के बीच एक साझा घोषणा पर सहमति बनाई. संयुक्त राष्ट्र में सुधार, ग्लोबल साउथ की ज़्यादा हिस्सेदारी, स्थानीय मुद्राओं में व्यापार, ऊर्जा सुरक्षा, टेक्नोलॉजी, स्वास्थ्य, खाद्य सुरक्षा और डिजिटल सहयोग जैसे मुद्दों पर आगे बढ़ने की बात हुई.&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;लेकिन असली परीक्षा अब शुरू होगी.&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;क्या ब्रिक्स सिर्फ हर साल एक समिट करके घोषणाएं करता रहेगा, या हक़ीक़त में डॉलर पर निर्भरता घटाने वाला पेमेंट सिस्टम, मज़बूत आपसी व्यापार, निवेश, टेक्नोलॉजी सहयोग और राजनीतिक समन्वय तैयार कर पाएगा? मुझे लगता है कि निकट भविष्य में ब्रिक्स की अपनी अलग करेंसी बनने की संभावना कम है, लेकिन राष्ट्रीय मुद्राओं में व्यापार और ब्रिक्स पे जैसे भुगतान तंत्र धीरे-धीरे आगे बढ़ सकते हैं.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;और भारत शायद इसी रास्ते को पसंद करेगा, ब्रिक्स में रहकर चीन और रूस के साथ काम करना, लेकिन अमेरिका और यूरोप से अपने रिश्ते भी ख़राब न करना.&lt;br /&gt;यही मोदी की मौजूदा विदेश नीति का मूल संतुलन है. इसलिए दिल्ली समिट का सबसे बड़ा संदेश शायद यह नहीं है कि ब्रिक्स अब पश्चिम का विकल्प बन गया है. बल्कि यह है कि दुनिया अब एक ही ताकत के इर्द-गिर्द नहीं घूमना चाहती, लेकिन नई मल्टीपोलर &amp;nbsp;दुनिया बनाने वालों के बीच ख़ुद भी काफ़ी &amp;nbsp;मतभेद हैं. और आने वाले वर्षों में ब्रिक्स की असली ताक़त इस बात से तय होगी कि वह इन मतभेदों के बावजूद कितना काम करके दिखाता है.&lt;/p&gt;]]></description><slash:comments>0</slash:comments><media:thumbnail url="https://feeds.abplive.com/onecms/images/uploaded-images/2026/09/14/bb37d10b1cbfd374f800926318415bbe1789408516878120_original.jpeg" width="220"/></item><item><title><![CDATA[म्लादिच मर गया, लेकिन नफरत जिंदा है: जब जेनोसाइड का दोषी ‘राष्ट्रीय नायक’ बना दिया जाए]]></title><link>https://www.abplive.com/blog/vojska-republike-srpska-ratko-mladic-guilty-of-genocide-turned-into-national-hero-3187161</link><comments>https://www.abplive.com/blog/vojska-republike-srpska-ratko-mladic-guilty-of-genocide-turned-into-national-hero-3187161#respond</comments><pubDate>Thu, 10 Sep 2026 22:22:14 +0530 </pubDate><dc:creator><![CDATA[ रुमान हाशमी, वरिष्ठ पत्रकार ]]></dc:creator><category><![CDATA[  ]]></category><guid isPermaLink="true">https://www.abplive.com/blog/vojska-republike-srpska-ratko-mladic-guilty-of-genocide-turned-into-national-hero-3187161</guid><description><![CDATA[&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;रादको म्लादिच को कभी &amp;ldquo;बुचर ऑफ बोस्निआ&amp;rdquo; यानी &amp;ldquo;बोस्निया का कसाई&amp;rdquo; कहा गया था. 1992 से 1995 के बोस्नियाई &amp;nbsp;वॉर &amp;nbsp;के दौरान बोस्नियाई सर्ब आर्मी के इस कमांडर पर लगे आरोप केवल राजनीतिक या नैतिक आरोप नहीं थे, बल्कि अंतरराष्ट्रीय अदालत में साबित किए गए गंभीर अपराध थे. 2017 में इंटरनेशनल क्रिमिनल ट्रिब्यूनल फ़ॉर दा फॉर्मर यूगोस्लाविया &amp;nbsp;(ICTY) ने उसे जेनोसाइड, क्राइम्स अगेंस्ट ह्यूमैनिटी और वॉर क्राइम्स का दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई. 2021 में इंटरनेशनल रेसिडुअल मैकेनिज्म फॉर क्रिमिनल ट्रिब्यूनल्स (IRMCT) की अपील्स चैम्बर ने भी उसकी कन्विक्शन और लाइफ सेंटेंस बरकरार रखी.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;लेकिन 7 सितंबर 2026 को बेलग्रेड में उसकी मौत और अंतिम संस्कार का जो नजारा देखने को मिला, उसने यूरोप के उस पुराने और जख्मखोरदा &amp;nbsp;सवाल को फिर ज़िंदा कर दिया है-क्या एक ऐसा शख्श, जिसे अंतरराष्ट्रीय न्यायालय जेनोसाइड का मुल्ज़िम ठहरा चुका हो, मरने के बाद भी एक &amp;ldquo;राष्ट्रीय नायक&amp;rdquo; में तब्दील किया जा सकता है?&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;म्लादिच 27 अगस्त की हेग में 84 साल की उम्र जेल में मौत हो गई, वो उम्रकैद की सजा काट रहा था. उसके शव को 3 सितंबर को सर्बिआ लाया गया और जिस तरह उसे वापस लाया गया, उसी ने विवाद की शुरुआत कर दी. शव को सर्बियन गवर्नमेंट प्लेन से बेलग्रेड लाया गया और उसे मिलिट्री गार्ड ऑफ़ &amp;nbsp;ऑनर दिया गया. उसके अंतिम संस्कार में हजारों लोग शामिल हुए और उसे स्टेट और मिलिट्री होनोर्स दिए गए.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;सबसे ख़ास बात यह है कि सर्बिआ के प्रेजिडेंट अलेक्सांदर वोसिस खुद तो फ्यूनरल में मौजूद नहीं थे. लेकिन उन्होंने ये सुनिश्चित किआ था की म्लादिच की अंतिम विदाई यादगार और शानदार होनी चाहिए. उनके बेटे दानीलो वोसिस &amp;nbsp;वहां मौजूद थे, कई सर्बियन मिनिस्टर्स फ्यूनरल में पहुंचे, बोस्नियाई सर्ब लीडरशिप के बड़े नेता मिलोरड़ दोदिक भी आए और रूस के सर्बिआ में एम्बेसडर एलेग्जेंडर बोटसन-खरचेंको ने भी म्लादिच को श्रद्धांजलि दी.&lt;br /&gt;यही वह बिंदु है जहां यह मामला महज़ एक मरे व्यक्ति के अंतिम संस्कार का मामला नहीं रह जाता. किसी व्यक्ति के परिवार को उसके मृत शरीर पर अधिकार देना और बात है, लेकिन एक कनविक्टेड वॉर क्रिमिनल को सार्वजनिक तौर पर मिलिट्री और स्टेट-स्टाइल इज़्ज़त के साथ विदा करना बिल्कुल अलग संदेश देता है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;इसी वजह से यूरोपियन यूनियन &amp;nbsp;ने तीखी प्रतिक्रिया दी. यूरोपियन यूनियन की एनलार्जेमेंट कमिश्नर मारता कॉस ने म्लादिच की मौत के बाद हो रही &amp;ldquo;ग्लोरिफिकेशन&amp;rdquo; को EU के मूल्यों के खिलाफ बताया और सर्बिआ की अपनी प्रस्तावित यात्रा रद्द कर दी. उन्होंने साफ कहा कि EU का रास्ता अतीत का सामना करने, जेनुइन रेकन्सीलिएशन और वॉर-क्राइम विक्टिम्स &amp;nbsp;के सम्मान पर आधारित है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;यह प्रतिक्रिया इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि Serbia 2014 से यूरोपियन यूनियन की मेम्बरशिप के लिए नेगोटिएशन्स कर रहा है. ऐसे में ब्रुसेल्स के लिए म्लादिच जैसे व्यक्ति का सार्वजनिक महिमामंडन केवल इतिहास का विवाद नहीं, बल्कि सर्बिआ के यूरोपियन इंटीग्रेशन और रेकन्सीलिएशन की उसकी प्रतिबद्धता का सवाल भी है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;म्लादिच के अपराधों की गंभीरता समझने के लिए स्रेब्रेनिका का नाम ही काफ़ी है. जुलाई 1995 में उसके नेतृत्व वाली बोस्नियाई &amp;nbsp;सर्ब फ़ोर्सेस ने स्रेब्रेनिका में 8,000 से ज़्यादा बॉसनियक मुस्लिम नौजवानों और लड़कों की हत्या की. इंटरनेशनल ट्रिब्यूनल ने उसे स्रेब्रेनिका जेनोसाइड के लिए दोषी पाया. उसे साराजेवो की सिविलियन पापुलेशन पर टेरर फैलाने वाली टारगेट किलिंग और शेलिंग कैंपेन तथा अन्य गंभीर अपराधों के लिए भी दोषी ठहराया गया.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;ऐसे व्यक्ति की कब्र अगर आने वाले वर्षों में नेशनलिस्ट और एक्सट्रेमिस्ट पॉलिटिक्स का पिल्ग्रिमेज साइट बन जाए तो यह केवल बोस्नियाई मुस्लिम्स के लिए ही नहीं, बल्कि पूरे यूरोप की कलेक्टिव मेमोरी के लिए एक गंभीर समस्या होगी. आज अगर उसकी कब्र पर लोग फूल चढ़ाकर उसे &amp;ldquo;जनरल&amp;rdquo;, &amp;ldquo;हीरो&amp;rdquo; या &amp;ldquo;डिफेंडर ऑफ़ सर्बिआ&amp;rdquo; कहेंगे, तो कल वही जगह उस इतिहास को उलटने और बदलने का सिंबल बन सकती है, जिसे इंटरनेशनल जस्टिस ने बड़ी मुश्किल से डॉक्यूमेंट और एस्टब्लिश किया था.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;यहां एक दिलचस्प लेकिन ज़रूरी सवाल भी उठता है: क्या इंटरनेशनल कोर्ट को उसका शव सर्बिआ को सौंपना चाहिए था?&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;मेरी राय में नैतिक स्तर पर यह सवाल समझ में आता है, लेकिन कानूनी हक़ीक़त कुछ अलग है. म्लादिच की निगरानी करने वाली संस्था इंटरनेशनल रेसिडुअल मैकेनिज्म फॉर क्रिमिनल &amp;nbsp;ट्रिब्यूनल्स थी-ICC नहीं. 3 सितंबर को IRMCT ने उसके बॉडी को उसके परिवार को सौंपे. यह फ़ैसला यूनाइटेड नेशंस के नेल्सन मंडेला रूल्स के मुताबिक़ था, जिसके तहत अंतिम संस्कार और शव की जिम्मेदारी परिवार की थी.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;लेकिन मूल चिंता फिर भी बेहद महत्वपूर्ण है: क्या कनविक्टेड वॉर क्रिमिनल्स की क़ब्रों को ऐसा पब्लिक सिंबल बनने देना चाहिए जहां हर साल उनके समर्थक जमा होकर उनके अपराधों का महिमामंडन करें?&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;इसका जवाब शायद कानून से ज्यादा समाज और राजनीति को देना होगा. किसी मरे व्यक्ति को दफनाना एक मानवीय और धार्मिक ज़िम्मेदारी और ज़रूरत हो सकती है; लेकिन उसे सम्मानित करना, उसकी मिलिट्री लिगेसी को सेलिब्रेट करना और उसके नाम को नेशनलिस्ट माइथोलॉजी में बदल देना बिल्कुल अलग बात है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;म्लादिच की मौत के बाद बेलग्रेड में जो कुछ हुआ, वह इसी फर्क को सामने लाता है. एक तरफ स्रेब्रेनिका के नरसंहार में ज़िंदा बच जाने वाले विक्टिम्स के परिवार हैं, जिनके लिए उसका नाम हजारों बिछड़े हुए बेटों, भाइयों और पतियों की याद है. दूसरी तरफ ऐसे नेशनलिस्ट चरमपंथी ग्रुप्स हैं जो आज भी उसे युद्ध-अपराधी नहीं बल्कि अपने समुदाय का प्रोटेक्टर, मसीहा मानते हैं.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;यही न सिर्फ़ यूरोप के इतिहास का बल्कि दुनिआ का सबसे काला सबक़ है: युद्ध खत्म हो सकता है, अदालत फैसला सुना सकती है, अपराधी मर सकता है, लेकिन अगर समाज अपराधी को हीरो बना दे तो इतिहास का अपराध फिर से ज़िंदा हो सकता है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;इसलिए म्लादिच और उन जैसे लोगों की असली विरासत उसकी कब्र नहीं, बल्कि स्रेब्रेनिका और उन जैसे शहरों और राज्यों की वह सामूहिक याद होनी चाहिए जो दुनिया को यह याद दिलाती रहे कि जेनोसाइड को किसी राष्ट्रवाद, धर्म या राजनीतिक विचारधारा के नाम पर जायज़ नहीं ठहराया जा सकता, लेकिन अफसोस की बात है नफ़रत और हिंसा के इस फॉर्मूले को आज़माते हुए आज भी दक्षिणपंती चरमपथी राजनेता कई देशों में न सिर्फ़ मौजूद हैं, बल्कि खून से सनी सत्ता के सिहासन पर ये आज भी बिराजमान है,जब तक समाज संवेदनशील और जागरूक नहीं होगा तब तक रादको म्लादिच जिसे &amp;ldquo;बुचर ऑफ़ बोस्निआ&amp;rdquo; जैसे नेता देश,समाज,और उनमे रहने वाले कमज़ोर समुदाय के लोगों को अपने नफ़रती ज़हर से डसते रहेंगे.&lt;/p&gt;]]></description><slash:comments>0</slash:comments><media:thumbnail url="https://feeds.abplive.com/onecms/images/uploaded-images/2026/09/10/298637567601c666cc6cfd925570ce021789053289790708_original.jpg" width="220"/></item><item><title><![CDATA[बाढ़ की त्रासदी पर भारी 'योगी मॉडल', विनाशकारी पानी के बावजूद यूपी में जीरो जनहानि]]></title><link>https://www.abplive.com/blog/uttar-pradesh-flood-yogi-adityanath-govt-source-of-reassurance-3185817</link><comments>https://www.abplive.com/blog/uttar-pradesh-flood-yogi-adityanath-govt-source-of-reassurance-3185817#respond</comments><pubDate>Mon, 7 Sep 2026 23:05:30 +0530 </pubDate><dc:creator><![CDATA[ एबीपी लाइव ]]></dc:creator><category><![CDATA[  ]]></category><guid isPermaLink="true">https://www.abplive.com/blog/uttar-pradesh-flood-yogi-adityanath-govt-source-of-reassurance-3185817</guid><description><![CDATA[&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;कौटिल्य के अर्थशास्त्र में राजधर्म के लिए एक नीति वचन है- &amp;lsquo;प्रजा सुखे सुखं राज्ञः, प्रजानां च हिते हितम्.&amp;rsquo; अर्थात शासक का सुख जनता के सुख में और उसका हित जनता के हित में निहित है. राजधर्म के इस नीति वचन में आस्था रखनेवाला व्यक्ति ही बाढ़ जैसी आपदा में जनता के हितों के प्रति संवेदनशील हो सकता है. बाढ़ की तबाही लोगों के भीतर का भरोसा हिला देती है. बाढ़ का पानी जब खेतों की मेड़ों को तोड़ता हुआ गांव की गलियों और घरों में प्रवेश करता है तो उसके साथ भय भी प्रवेश करता है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;आंखों के सामने जीवन भर की कमाई डूबती दिखाई देती है. पशुधन बह जाने का डर, बच्चों-बुजुर्गों की चिंता और अगले दिन की अनिश्चितता. पिछले कुछ दिनों से ऐसे ही संकट से जूझ रहे उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने जिस तरह का राजधर्म निभाया है, वह लोगों के लिए बड़ा संबल है. उन्होंने लखनऊ में बैठकर अधिकारियों से रिपोर्ट लेने के बजाय स्वयं मोर्चे पर पहुंचकर राहत और बचाव कार्यों की निगरानी की. लोगों ने अहसास किया कि आपदा की इस घड़ी में सरकार उनके साथ है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;प्रदेश के कई जिलों में इस बार नदियों ने खतरे के निशान पार किए, गांव के गांव पानी में डूब गए और हजारों परिवार बेघर होने की कगार पर आ खड़े हुए. ऐसे समय में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने स्वयं फ्रंट पर आकर राहत कार्यों की कमान संभाली. बाढ़ग्रस्त इलाकों के हवाई और जमीनी दौरे कर उन्होंने न केवल स्थिति का जायजा लिया, बल्कि अधिकारियों को स्पष्ट निर्देश दिए कि राहत में कोई कोताही बर्दाश्त नहीं होगी. नेतृत्वकर्ता की सक्रियता न सिर्फ अधिकारियों-कर्मचारियों का उत्साह बढ़ाती है, बल्कि उन्हें भी युद्धस्तर पर जुटने का प्रोत्साहन देती है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;इसका प्रत्यक्ष परिणाम भी देखने को मिला, जब एनडीआरएफ व एसडीआरएफ की टीमों के साथ-साथ जिला प्रशासन के वरिष्ठ अफसर खुद लाइफ-जैकेट पहनकर पानी में उतरे और बचाव अभियानों का नेतृत्व किया. इस दृश्य के बहुत गहरे अर्थ इसलिए भी हैं क्योंकि एक दशक पहले तक ऐसी विषम आपदा को देख अधिकारियों के चेहरे पर एक अजीब सी चमक आ जाती थी. बाढ़ राहत के नाम पर लूट-खसोट के अवसर दिखाई देते थे और तत्कालीन सरकारें भी मूक दर्शक बनी रहती थीं.&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&lt;br /&gt;उत्तर प्रदेश में बाढ़ की विभीषिका के बावजूद सुखद व संतोषजनक तथ्य यह है कि अब तक एक भी जन या पशुहानि नहीं हुई. यह बाढ़ से निपटने व राहत कार्यों की सुनियोजित तैयारी का नतीजा है. राहत आयुक्त कार्यालय की ओर से जुलाई-अगस्त के दौरान 591 करोड़ से अधिक अलर्ट मैसेज भेजे गए, जिन्होंने लाखों लोगों को समय रहते मौसम और बाढ़ के संभावित खतरे से सचेत किया. यह अलर्ट सिस्टम सचमुच जीवनरक्षक साबित हुआ. लोगों को नदियों के जलस्तर और मौसम की चेतावनी समय पर मिलने से वे स्वयं भी सुरक्षित स्थानों की ओर बढ़ सके. यही वह दूरदर्शिता है, जो किसी भी आपदा प्रबंधन को सफल बनाती है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;इसी कड़ी में 1070 हेल्पलाइन भी बड़ा सहारा बनकर उभरी. फंसे हुए लोगों की कॉल आते ही उनकी सटीक लोकेशन प्राप्त कर जिला प्रशासन और एनडीआरएफ-एसडीआरएफ की टीमों को तत्काल मौके पर भेजा गया. मौसम की हर चेतावनी पर सरकार की नजर बनी रही, जिससे प्रतिक्रिया का समय न्यूनतम रहा. इसी सतर्कता ने उत्तर प्रदेश को बाढ़ प्रबंधन के मामले में देश के लिए उदाहरण के रूप में प्रस्तुत किया है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;आंकड़े जब मानव जीवन से जुड़ते हैं तो हर संख्या के पीछे एक चेहरा, एक परिवार और एक कहानी होती है. राहत अभियान के तहत सरकार ने अब तक करीब 20 हजार लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया है. यह आंकड़ा बताता है कि रेस्क्यू अभियान औपचारिकता भर नहीं रहा. इसे युद्धस्तर पर चलाया गया. प्रभावित परिवारों के भोजन की चिंता करते हुए सरकार ने अब तक छह लाख से अधिक लंच पैकेट और एक लाख से अधिक बाढ़ राहत किट वितरित की हैं. किसी बाढ़ग्रस्त परिवार के लिए भोजन और जरूरी सामग्री मिलना कितना बड़ा संबल होता है, यह वही समझ सकता है जो उस स्थिति से गुजरा हो. राहत केवल भोजन और आश्रय तक सीमित नहीं रही.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;बाढ़ के बाद सबसे बड़ा खतरा जलजनित बीमारियों का होता है, और सरकार ने इस पहलू पर भी गंभीरता दिखाई. लाखों क्लोरीन टैबलेट और ओआरएस पैकेट वितरित किए गए, ताकि दूषित पानी और डायरिया जैसी बीमारियों से लोगों को बचाया जा सके. प्रभावित जिलों में प्रभारी मंत्रियों की तैनाती कर उन्हें राहत सामग्री वितरण की जिम्मेदारी सौंपी गई, जिससे मंत्री स्तर पर भी निगरानी और जवाबदेही सुनिश्चित हुई. यह पूरा तंत्र दिखाता है कि योगी सरकार ने आपदा को राजनीतिक नेतृत्व की प्राथमिकता के रूप में लिया है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;लोकतंत्र में हर संकट की घड़ी में जवाबदेही का पुनर्परीक्षण होता है. उत्तर प्रदेश की इस बाढ़ में सरकार ने जिस तरह अलर्ट सिस्टम, हेल्पलाइन, रेस्क्यू अभियान और राहत वितरण को एक साथ जोड़कर काम किया, वह प्रशासनिक स्तर पर संवेदनशील कार्यसंस्कृति पनपने की भी प्रमाण है. इस बार की बाढ़ ने यह संदेश दिया है कि सरकार, प्रशासन और तकनीक मिलकर काम करें, तो सबसे विकट प्राकृतिक आपदा में भी जनहानि को शून्य तक ले जाया जा सकता है.&lt;/p&gt;]]></description><slash:comments>0</slash:comments><media:thumbnail url="https://feeds.abplive.com/onecms/images/uploaded-images/2026/09/07/9b8acdf53f3ef38f157218de1dab3f1a1788801506456708_original.jpg" width="220"/></item><item><title><![CDATA[सामाजिक न्याय को पोषण देता उत्तर प्रदेश]]></title><link>https://www.abplive.com/blog/uttar-pradesh-fosters-social-justice-cm-yogi-adityanath-3185140</link><comments>https://www.abplive.com/blog/uttar-pradesh-fosters-social-justice-cm-yogi-adityanath-3185140#respond</comments><pubDate>Sun, 6 Sep 2026 14:58:54 +0530 </pubDate><dc:creator><![CDATA[ एबीपी लाइव डेस्क ]]></dc:creator><category><![CDATA[  ]]></category><guid isPermaLink="true">https://www.abplive.com/blog/uttar-pradesh-fosters-social-justice-cm-yogi-adityanath-3185140</guid><description><![CDATA[&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;सामाजिक न्याय का उद्देश्य समाज में नई खाइयां बनाना नहीं, पुरानी खाइयों को पाटना है. आरक्षण उस पुल का एक हिस्सा है, पूरा पुल नहीं. शिक्षा, कौशल, अवसर, निष्पक्ष चयन, पारदर्शी व्यवस्था और कानून का समान अनुपालन उस पुल के दूसरे हिस्से हैं. यदि सरकार इन सभी को साथ लेकर चलती है तो सामाजिक न्याय राजनीतिक नारे से निकलकर शासन का संस्कार बनता है. आरक्षण उसका साधन है, प्रतिनिधित्व उसका माध्यम है और अवसर की वास्तविक समानता उसका लक्ष्य. सामाजिक न्याय की यही अवधारणा उत्तर प्रदेश की योगी सरकार में चरितार्थ हो रही है और समाज के सभी वर्गों को इसका लाभ मिल रहा है. योगी सरकार में की गईं तमाम भर्तियां इसका सशक्त प्रमाण भी हैं.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;आरक्षण की बात करने से पहले इसकी मूल अवधारणा को समझना जरूरी है. इसे सिर्फ सामाजिक न्याय के रूप में ही देखना इस गंभीर विषय के साथ न्याय नहीं होगा. मूल विचार यह है कि जन्म, जाति, आर्थिक हालात या किसी और सामाजिक कारण से जो व्यक्ति अवसरों की दौड़ में पिछड़ गया, उसे आगे बढ़ने का न्यायसंगत मौका मिले. आरक्षण इस लक्ष्य तक पहुंचने का एक संवैधानिक जरिया है, यह खुद मंज़िल नहीं है. इसलिए सामाजिक न्याय को सिर्फ सीटों की संख्या से नहीं आंका जा सकता, बल्कि यह भी देखना जरूरी है कि अवसर किस तरह बंटे, हकदार लोगों तक उनका अधिकार पहुंचा या नहीं और पूरी प्रक्रिया कितनी पारदर्शी और निष्पक्ष रही.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;यहीं राजनीति और शासन के तरीके का फर्क सामने आता है. राजनीति में किसी व्यवस्था को अपने पक्ष-विपक्ष में दिखाना आसान है, पर प्रशासन के लिए कानून के मुताबिक उसे ज़मीन पर उतारना कहीं ज्यादा मुश्किल काम है. आरक्षण के मामले में भी यही फर्क अहम है. एक तरफ इसके राजनीतिक मायने निकाले जाते हैं, दूसरी तरफ प्रशासनिक और चयन संस्थाओं पर संवैधानिक प्रावधानों को सही तरीके से लागू करने की ज़िम्मेदारी होती है. उत्तर प्रदेश में 1 अप्रैल 2017 से 31 मार्च 2026 तक हुई सरकारी नियुक्तियों के आंकड़ों को इसी नजरिये से देखा जाना चाहिए. इन आंकड़ों के मुताबिक कुल नियुक्तियों में सामान्य वर्ग की हिस्सेदारी 37.93 प्रतिशत रही. ओबीसी वर्ग को 36.38 प्रतिशत, अनुसूचित जाति को 20.14 प्रतिशत, अनुसूचित जनजाति को 0.97 प्रतिशत और आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग को 4.58 प्रतिशत हिस्सेदारी मिली. ये आंकड़े यह समझने का आधार देते हैं कि आरक्षण और नियुक्ति की व्यवस्था असल में किस दिशा में चल रही है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;इन आंकड़ों को दखते हुए हमें उन गलतफहमियों पर बात करनी चाहिए जो &amp;lsquo;अनारक्षित&amp;rsquo; शब्द को लेकर पैदा होती हैं या फिर की जाती हैं. अनारक्षित का मतलब है किसी खास जाति या वर्ग के लिए तय नहीं. अगर आरक्षित वर्ग का कोई अभ्यर्थी अपनी काबिलियत से अनारक्षित वर्ग की कटऑफ से ज्यादा अंक लाता है, तो वह अनारक्षित सीट पर भी चुना जा सकता है. यानी आरक्षण और योग्यता के बीच वह टकराव है ही नहीं, जिसे राजनीतिक बहसों में अक्सर बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जाता है. अब आरक्षण के दर्शन की बात करते हैं, यह उन लोगों को मौका देता है जिन्हें सामाजिक और ऐतिहासिक वजहों से बराबरी की प्रतिस्पर्धा नसीब नहीं हुई, लेकिन जब वही अभ्यर्थी खुली प्रतियोगिता में बेहतर करता है, तो उसकी प्रतिभा को आरक्षण की सीमा में बांधना ठीक नहीं. इसीलिए सामाजिक न्याय का असली मतलब अवसर की असमानता दूर करना है, योग्यता का रास्ता रोकना नहीं.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;उत्तर प्रदेश में सरकारी नियुक्तियों को लेकर एक और भ्रम प्रारंभिक परीक्षा के नतीजों से जुड़ा है. प्रारंभिक परीक्षा चयन की आखिरी मंजिल नहीं होती, उसके आधार पर अंतिम नियुक्ति नहीं होती. उत्तर प्रदेश लोक सेवा अधिनियम, 1994 और संबंधित शासनादेशों के मुताबिक आरक्षण का फायदा अंतिम चयन के स्तर पर ही मिलता है. इसलिए प्रारंभिक परिणाम को ही अंतिम आरक्षण व्यवस्था मान लेना न तो कानूनी प्रक्रिया की सही तस्वीर पेश करता है, न ही अभ्यर्थियों के बीच फैली गलतफहमी दूर करता है. इसी सिलसिले में सितंबर 2025 का न्यायिक घटनाक्रम भी अहम है. उच्च न्यायालय की एकल पीठ के 25 सितंबर 2025 के आदेश की एक ऐसी व्याख्या सामने आई, जिससे लगा कि प्रारंभिक परीक्षा परिणाम में त्रिस्तरीय आरक्षण लागू हो गया है. उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग ने इसके खिलाफ विशेष अपील दाखिल की, और अगले ही दिन, 26 सितंबर 2025 को खंडपीठ ने एकल पीठ के आदेश पर रोक लगा दी. मामला अभी अदालत में लंबित है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;सामाजिक न्याय का तीसरा पहलू प्रतिनिधित्व का है. सरकारी संस्थाओं में समाज के अलग-अलग वर्गों की मौजूदगी लोकतंत्र की साख मजबूत करती है. इसी सिलसिले में योगी सरकार ने नवगठित उत्तर प्रदेश आउटसोर्स सेवा निगम (UPCOS) के तहत आउटसोर्स नौकरियों में आरक्षण नियमों को डिजिटल तरीके से लागू किया है. संविदा नियुक्तियों में अनुसूचित जाति को 21 प्रतिशत, अनुसूचित जनजाति को 2 प्रतिशत और ओबीसी को 27 प्रतिशत आरक्षण देने का प्रावधान है. योगी सरकार ने इसमें 2019 के राष्ट्रीय संवैधानिक संशोधन के तहत 10 प्रतिशत ईडब्ल्यूएस आरक्षण को भी जोड़ा है. यानी नीतियों का प्रभावी क्रियान्वयन बना हुआ है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;प्रतिनिधित्व को सिर्फ आंकड़ों तक सीमित रखना भी सही नहीं. इसका असली मकसद सशक्तीकरण है. ऐसा सशक्तीकरण जहां अगली पीढ़ी को अवसर पाने के लिए किसी व्यवस्था पर निर्भर न रहना पड़े, बल्कि वह खुद प्रतिस्पर्धा में सक्षम हो सके. इसीलिए अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के कोटे में पात्र अभ्यर्थियों की कमी को भी बड़े संदर्भ में देखना चाहिए. इसका हल सिर्फ रिक्तियों की गिनती पर राजनीतिक बहस नहीं हो सकता, बल्कि यह देखना ज़रूरी है कि पात्र अभ्यर्थियों का दायरा कैसे बढ़े&amp;mdash;गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, कौशल, तैयारी और आर्थिक मदद तक पहुंच कैसे आसान हो. यहीं से सामाजिक न्याय की बहस आरक्षण से निकलकर शिक्षा और अवसर की बहस बन जाती है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;उत्तर प्रदेश के इन आंकड़ों को इसलिए भी अहम माना जाना चाहिए, क्योंकि पिछले वर्षों में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने सरकारी नियुक्तियों की पारदर्शिता और निष्पक्षता सुनिश्चित की है. दलित, पिछड़े एवं वंचित तबके के युवाओं को लगातार उच्च शिक्षा, कौशल विकास एवं प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के अवसर उपलब्ध कराए हैं, ताकि सही मायनों में सामाजिक न्याय स्थापित हो सके. सरकार ने स्पष्ट भी किया है कि ऐसा करना शासन का लगातार निभाया जाने वाला दायित्व है. भारत का संविधान समानता की बात करता है, पर समानता का मतलब हमेशा एक जैसा व्यवहार नहीं होता. जिसकी शुरुआत ही असमान हालात से हुई हो, उसे बराबरी का मौका देने के लिए विशेष इंतजाम करना पड़ता है. आरक्षण इसी संवैधानिक सोच से निकला है. उत्तर प्रदेश में सरकारी नियुक्तियों के आंकड़े बताते हैं कि व्यवस्था ने सबके साथ न्याय किया है.&lt;/p&gt;
&lt;ul&gt;
&lt;li style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;हरिशंकर मिश्र, वरिष्ठ पत्रकार&lt;/strong&gt;&lt;/li&gt;
&lt;/ul&gt;]]></description><slash:comments>0</slash:comments><media:thumbnail url="https://feeds.abplive.com/onecms/images/uploaded-images/2026/09/06/75467d34e62831843340722535b1f7bd1788686667981344_original.jpg" width="220"/></item></channel></rss>