<?xml version="1.0" encoding="UTF-8"?><rss version="2.0" xmlns:content="http://purl.org/rss/1.0/modules/content/" xmlns:wfw="http://wellformedweb.org/CommentAPI/" xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/" xmlns:atom="http://www.w3.org/2005/Atom" xmlns:sy="http://purl.org/rss/1.0/modules/syndication/" xmlns:slash="http://purl.org/rss/1.0/modules/slash/" xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/"><channel><title>Opinion: गजब होई गवा! Gen Z ने बदल दी विरोध की भाषा</title><atom:link href="https://www.abplive.com/blog/feed" rel="self" type="application/rss+xml"/><link>https://www.abplive.com/</link><description/><lastBuildDate>Fri, 14 Aug 2026 10:40:40 +0530</lastBuildDate><language>en-US</language><sy:updatePeriod>hourly</sy:updatePeriod><sy:updateFrequency>1</sy:updateFrequency><generator>https://www.abplive.com</generator><item><title><![CDATA[जेवर एयरपोर्ट: यूपी के गौरव का अपमान न करिए अखिलेश]]></title><link>https://www.abplive.com/blog/jewar-airport-akhilesh-yadav-do-not-insult-up-pride-3174833</link><comments>https://www.abplive.com/blog/jewar-airport-akhilesh-yadav-do-not-insult-up-pride-3174833#respond</comments><pubDate>Fri, 14 Aug 2026 09:09:36 +0530 </pubDate><dc:creator><![CDATA[ डॉ. सुनील दत्त त्यागी, पूर्व प्रोफेसर, किसान पीजी कॉलेज, सिंभावली ]]></dc:creator><category><![CDATA[  ]]></category><guid isPermaLink="true">https://www.abplive.com/blog/jewar-airport-akhilesh-yadav-do-not-insult-up-pride-3174833</guid><description><![CDATA[&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;बहुत पहले राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर लिखित एक निबंध पढ़ा था- &amp;lsquo;ईर्ष्या तू न गई मेरे मन से&amp;rsquo; जिसका भावपक्ष यह था कि यदि आपमें ईर्ष्या का भाव है तो आपकी दृष्टि भी नकारात्मक ही रहेगी और आप सकारात्मक पक्षों को देख ही नहीं सकेंगे. वर्तमान में कुछ राजनीतिक दलों में ऐसा ही भाव है और वे प्रमाणित विकास कार्यों को लेकर भी टिप्पणियां करने लगे हैं. ताजा उदाहरण समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव के उस बयान का है जिसमें उन्होंने जेवर एयरपोर्ट की पार्किंग में कुछ देर के लिए पानी भर जाने पर टिप्पणी की है कि क्या अब वहां नावें चलेंगी. इस बयान को सिर्फ एक तंज के रूप में नहीं देखा जा सकता. इसमें उत्तर प्रदेश के उस गौरवबोध की अनदेखी भी छिपी हुई है जो जेवर स्थित नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट जैसी बड़ी उपलब्धि के रूप में राज्य के हर नागरिक को हासिल हुई है. वस्तुतः विकास एक दृष्टि है, एक सोच है, एक ऐसा विजन है जो वर्तमान की सीमाओं से आगे देखकर भविष्य की नींव रखता है. जो लोग खुद कभी इस दृष्टि से परिचित नहीं हुए, जिन्होंने सत्ता में रहते हुए भी प्रदेश के लिए कोई दूरदर्शी परियोजना नहीं गढ़ी, उनके लिए योगी सरकार के ऐतिहासिक कार्यों को देखकर बेचैनी होना स्वाभाविक ही है. यह बेचैनी कभी आलोचना का रूप लेती है, कभी राजनीतिक बयानबाज़ी का, लेकिन इसके मूल में एक ही भाव छिपा होता है- ईर्ष्या.&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&lt;br /&gt;अखिलेश ही नहीं उत्तर प्रदेश के सभी विपक्षी दलों सबसे पहले तो जेवर अंतरराष्ट्रीय परियोजना को समझना चाहिए. यह कोई साधारण निर्माण परियोजना नहीं, बल्कि उत्तर प्रदेश के आर्थिक भविष्य की आधारशिला है. यह हवाई अड्डा आगे चलकर हजारों प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार का स्रोत बनेगा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश को वैश्विक व्यापार मानचित्र पर स्थापित करेगा, और आने वाले दशकों में करोड़ों यात्रियों तथा लाखों टन कार्गो को संभालने की क्षमता रखेगा. यह प्रदेश के उन लाखों युवाओं के लिए अवसर की खिड़की है जो अब तक बड़े महानगरों की ओर पलायन करने को मजबूर थे. यह किसानों, छोटे व्यापारियों, लॉजिस्टिक्स क्षेत्र और पर्यटन उद्योग के लिए नए द्वार खोलने वाला प्रोजेक्ट है. इतने बड़े और दूरगामी लाभ वाली परियोजना का मूल्यांकन उसकी दीर्घकालिक क्षमता से होना चाहिए, न कि किसी एक दिन की प्रकृतिजन्य घटना से. इसीलिए अखिलेश यादव के बयान में उन किसानों का अपमान दिखाई देता है, जिन्होंने इसके लिए जमीन दी. उन अभियंताओं, कर्मचारियों के प्रति अनादर का भाव दिखता है, जिन्होंने रात-दिन एक करके इसे खड़ा किया. उन युवाओं का उपहास दिखाई देता है, जो इसमें अपना भविष्य देखते थे.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;अखिलेश यादव के इस बयान से साफ है कि वो हर अस्थायी असुविधा को राजनीतिक हथियार बनाने की कोशिश करते हैं. कम समय में भारी बारिश के कारण कुछ मिनटों के लिए हुए जल-जमाव को लेकर जिस तरह की राजनीति की गई, वह संकीर्ण सोच का उदाहरण है. यह भूलना नहीं चाहिए कि प्रशासन ने तुरंत सक्रियता दिखाते हुए मात्र 30 मिनट में स्थिति को सामान्य किया, जल निकासी सुनिश्चित की, और सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि एक भी उड़ान इससे प्रभावित नहीं हुई. यात्री सुरक्षित रहे, संचालन सुचारू रहा, और हवाई अड्डे की कार्यक्षमता पर कोई आंच नहीं आई.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;अखिलेश को उन सवालों का जवाब जरूर देना चाहिए जो लाखों मन में कौंधते हैं. उन्होंने स्वयं पांच वर्षों तक प्रदेश की बागडोर संभाली लेकिन विकास के नाम पर क्या दिया? क्या एक भी हवाई अड्डा बना सके? &amp;nbsp;ऐसे में दूसरों की उपलब्धियों पर सवाल उठाने का नैतिक अधिकार भी कमजोर पड़ जाता है. जो सरकार खुद किसी बड़े इन्फ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट को धरातल पर नहीं उतार पाई, वह आज विकास पर सवाल उठाने की स्थिति में कैसे हो सकती है? यह विरोधाभास साफ दिखाई देता है, और जनता भी इसे भली-भांति समझती है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;अखिलेश में सच को स्वीकार करने का नैतिक साहस होना चाहिए. 2017 के पहले जिस प्रदेश में कदम रखने से निवेशक हिचकते थे, आज वहां वैश्विक स्तर की परियोजनाएं आकार ले रही हैं. जेवर एयरपोर्ट इसी बदलाव का सबसे बड़ा उदाहरण है. यह न केवल उत्तर प्रदेश, बल्कि पूरे देश के लिए गर्व का विषय है. यह हवाई अड्डा आने वाले वर्षों में एशिया के सबसे बड़े और महत्वपूर्ण विमानन केंद्रों में गिना जाएगा, और इसका श्रेय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की उस दृढ़ इच्छाशक्ति को जाता है जिन्होंने इसे सपने को हकीकत में बदल कर दिखा दिया.&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&lt;br /&gt;बड़ी परियोजनाओं के निर्माण के दौरान छोटी-मोटी तकनीकी या प्रशासनिक चुनौतियां स्वाभाविक होती हैं. असली परीक्षा इस बात की होती है कि प्रशासन इन चुनौतियों से कितनी तेजी और दक्षता से निपटता है. जेवर एयरपोर्ट के मामले में प्रशासन ने तत्परता दिखाई, समस्या का समाधान किया, और यात्री सेवाओं में किसी भी तरह का व्यवधान नहीं आने दिया. यह प्रशासनिक क्षमता की मिसाल है, न कि आलोचना का विषय. दुर्भाग्य की बात यह है कि जब प्रदेश आगे बढ़ने की दिशा में ठोस कदम उठा रहा है, तब कुछ राजनीतिक आवाज़ें नकारात्मकता फैलाने में जुटी हैं. यह प्रवृत्ति प्रदेश की जनता की भावनाओं पर कुठाराघात है. जनता को रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, बुनियादी ढांचा जैसे असली मुद्दों पर विमर्श चाहिए न कि मौसम की एक सामान्य घटना पर राजनीतिक तमाशा. जब विपक्ष के पास ठोस विकल्प और नीतियां नहीं होतीं, तब वह ऐसा ही करता है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;स्वस्थ लोकतंत्र में जवाबदेही जरूरी है लेकिन आलोचना और ईर्ष्या में फर्क होना चाहिए. रचनात्मक आलोचना प्रदेश को आगे बढ़ाती है, जबकि द्वेषपूर्ण राजनीति गतिरोध पैदा करती है. जेवर एयरपोर्ट जैसी परियोजनाओं को राजनीतिक चश्मे से नहीं, बल्कि राष्ट्रीय गौरव और दीर्घकालिक लाभ की दृष्टि से देखा जाना चाहिए. जो लोग इस बड़ी तस्वीर को नहीं देख पाते, वे केवल अपनी सीमित सोच का परिचय देते हैं. उत्तर प्रदेश का स्वरूप उभर रहा है, निखर रहा है, तो इसे ईमानदारी से स्वीकार करना होगा. विकास कोई एक दिन का चमत्कार नहीं होता, यह निरंतर प्रयास, दूरदर्शिता और दृढ़ इच्छाशक्ति का परिणाम होता है. जेवर एयरपोर्ट इसी यात्रा का एक महत्वपूर्ण पड़ाव है.&lt;/p&gt;]]></description><slash:comments>0</slash:comments><media:thumbnail url="https://feeds.abplive.com/onecms/images/uploaded-images/2026/08/14/9cc4de7f49eb6e82c00e106b002bd2c81786678992662355_original.jpg" width="220"/></item><item><title><![CDATA[मल्लिकार्जुन खरगे की रैली के बाद हवन और गंगाजल, संसद में गूंजा मामला...जानें धर्मग्रंथ क्या कहते हैं]]></title><link>https://www.abplive.com/blog/mallikarjun-kharge-haldwani-rally-shuddhikaran-row-hindu-religious-texts-gita-truth-3174602</link><comments>https://www.abplive.com/blog/mallikarjun-kharge-haldwani-rally-shuddhikaran-row-hindu-religious-texts-gita-truth-3174602#respond</comments><pubDate>Thu, 13 Aug 2026 16:29:14 +0530 </pubDate><dc:creator><![CDATA[ Hirdesh Kumar Singh ]]></dc:creator><category><![CDATA[  ]]></category><guid isPermaLink="true">https://www.abplive.com/blog/mallikarjun-kharge-haldwani-rally-shuddhikaran-row-hindu-religious-texts-gita-truth-3174602</guid><description><![CDATA[&lt;h3 style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;em&gt;मल्लिकार्जुन खरगे की रैली के बाद मंच पर हवन और गंगाजल से &amp;lsquo;शुद्धिकरण&amp;rsquo;. ये मामला अब संसद तक पहुंच चुका है, लेकिन बड़ा सवाल राजनीति से आगे है...क्या किसी इंसान के आने से कोई स्थान अशुद्ध हो सकता है ?&amp;nbsp;&lt;/em&gt;&lt;/h3&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;मल्लिकार्जुन खरगे की हल्द्वानी रैली के बाद रामलीला मैदान में हवन और गंगाजल छिड़ककर कथित 'शुद्धिकरण' किया गया. अब यह मामला संसद तक पहुंच गया है. लेकिन सबसे बड़ा सवाल राजनीति का नहीं, धर्म का है. क्या किसी व्यक्ति के आने से कोई मंच अशुद्ध हो सकता है? वेद, उपनिषद और गीता इस बारे में क्या कहते हैं?&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;हल्द्वानी के रामलीला मैदान में छिड़का गया गंगाजल अब संसद तक पहुंच गया है. कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने राज्यसभा में इस घटना का उल्लेख करते हुए कहा कि उनके भाषण देने के बाद मंच का 'शुद्धिकरण' किया गया. खरगे अनुसूचित जाति समुदाय से आते हैं. इसलिए उन्होंने इस घटना को अपनी सामाजिक पहचान से जोड़ते हुए सवाल किया कि क्या उनके साथ अछूत जैसा व्यवहार किया गया?&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;यह केवल किसी एक पार्टी, नेता या संगठन से जुड़ा विवाद नहीं है. इसका असली सवाल कहीं बड़ा है. क्या सनातन धर्म किसी मनुष्य की मौजूदगी को अपवित्र मानता है? क्या गंगाजल और हवन का उपयोग राजनीतिक विरोध जताने या किसी व्यक्ति के चले जाने के बाद स्थान को 'शुद्ध' करने के लिए किया जाना चाहिए?&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;इसका उत्तर भावनाओं, नारों या राजनीतिक बयानों में नहीं, उन्हीं धर्मग्रंथों में खोजना चाहिए जिनके नाम पर ऐसी गतिविधियों को उचित ठहराने की कोशिश होती है. शास्त्रों को सामने रखकर देखा जाए तो मनुष्य को अशुद्ध बताने वाली यह सोच सनातन के मूल आध्यात्मिक सिद्धांतों के सामने टिकती दिखाई नहीं देती.&lt;/p&gt;
&lt;h3 style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;खरगे ने संसद में कहा- क्या मेरे साथ अछूत जैसा व्यवहार हुआ?&lt;/h3&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;मल्लिकार्जुन खरगे ने 8 अगस्त 2026 को हल्द्वानी के रामलीला मैदान में 'विजय शंखनाद' रैली को संबोधित किया था. इसके बाद श्री राम सेना धर्मार्थ सेवा न्यास के सदस्यों ने मैदान में हवन किया और गंगाजल छिड़का. इस आयोजन को 'शुद्धिकरण' बताया गया.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;13 अगस्त को खरगे ने राज्यसभा में यह मामला उठाया. उन्होंने कहा कि उनके संबोधन के बाद मंच का शुद्धिकरण किया जाना बेहद गंभीर है. उन्होंने इस कृत्य को दलित सम्मान और अस्पृश्यता से जोड़ते हुए कार्रवाई की मांग की.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;जवाब में केंद्रीय मंत्री जेपी नड्डा ने घटना पर दुख जताया. उन्होंने कहा कि भाजपा ऐसी गतिविधियों का समर्थन नहीं करती. नड्डा ने मामले की जांच कराने का आश्वासन भी दिया. वहीं, संबंधित संगठन का कहना है कि उसका विरोध खरगे की जाति से नहीं था. संगठन के अनुसार, कार्यक्रम में कथित आपत्तिजनक नारे लगाए गए थे और धार्मिक-सांस्कृतिक महत्व वाले रामलीला मैदान का इस्तेमाल राजनीतिक आयोजनों के लिए नहीं होना चाहिए.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;संगठन की सफाई अपनी जगह है. लेकिन सवाल फिर भी बचा रहता है. यदि आपत्ति किसी नारे, भाषण या राजनीतिक आयोजन से थी तो उसका लोकतांत्रिक विरोध किया जा सकता था. मंच को 'अशुद्ध' बताकर गंगाजल छिड़कना बिल्कुल अलग और बेहद संवेदनशील संदेश देता है. खासकर तब, जब वहां से संबोधित करने वाला देश का एक बड़ा दलित नेता हो.&lt;/p&gt;
&lt;h3 style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;धर्मग्रंथों ने भी खोल दी इस पाखंड की पोल&lt;/h3&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;सनातन परंपरा में गंगाजल, हवन और शुद्धि का अत्यंत पवित्र स्थान है. इनका उद्देश्य मन, वातावरण और आचरण में सात्विकता लाना है. लेकिन किसी मनुष्य के जाने के बाद उसके इस्तेमाल किए गए मंच को अशुद्ध घोषित करना धार्मिक शुद्धि नहीं कहा जा सकता.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;गीता, उपनिषद और वैदिक दर्शन का मूल विचार यह है कि प्रत्येक जीव में एक ही परमात्मा का अंश मौजूद है. ऐसे में जन्म, जाति या सामाजिक पहचान के आधार पर किसी व्यक्ति के स्पर्श अथवा मौजूदगी को अपवित्र मानना इसी आध्यात्मिक विचार का विरोध बन जाता है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;धार्मिक प्रतीकों का उपयोग यदि किसी इंसान को नीचा दिखाने के लिए किया जाए तो उससे धर्म की रक्षा नहीं होती. उल्टा धर्म की उदार और समावेशी छवि को नुकसान पहुंचता है.&lt;/p&gt;
&lt;h3 style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;गीता का 'समदर्शन' क्या सिखाता है?&lt;/h3&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;श्रीमद्भगवद्गीता के पांचवें अध्याय के 18वें श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं-&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;em&gt;विद्याविनयसंपन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि।&lt;/em&gt;&lt;br /&gt;&lt;em&gt;शुनि चैव श्वपाके च पण्डिताः समदर्शिनः॥&lt;/em&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;इसका भाव है कि सच्चा ज्ञानी विद्या और विनय से संपन्न ब्राह्मण, गाय, हाथी, कुत्ते और उस समय समाज के सबसे उपेक्षित माने जाने वाले व्यक्ति में भी एक ही आत्मतत्त्व देखता है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;यह श्लोक सामाजिक भूमिकाओं को मिटाने की सीधी राजनीतिक घोषणा नहीं है. लेकिन इसका आध्यात्मिक संदेश बिल्कुल स्पष्ट है. आत्मा के स्तर पर कोई मनुष्य अपवित्र, छोटा या घृणा के योग्य नहीं है. जो व्यक्ति सबमें एक ही परम तत्व देखता है, गीता उसे ज्ञानी बताती है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;गीता के छठे अध्याय में भी योगी की पहचान बताते हुए कहा गया है कि वह सभी प्राणियों में आत्मा और आत्मा में सभी प्राणियों को देखता है. इसलिए किसी व्यक्ति की उपस्थिति को प्रदूषित मानना गीता के 'समदर्शन' से मेल नहीं खाता.&lt;/p&gt;
&lt;h3 style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;'गुण और कर्म' का अर्थ जन्म से श्रेष्ठता नहीं&lt;/h3&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;इस विवाद में गीता के चौथे अध्याय का प्रसिद्ध श्लोक भी महत्वपूर्ण है-&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;em&gt;चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः.&lt;/em&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;यहां भगवान श्रीकृष्ण सामाजिक विभाजन की चर्चा 'गुण' और 'कर्म' के आधार पर करते हैं. इस श्लोक को केवल एक पंक्ति में जन्म आधारित जाति व्यवस्था की संपूर्ण स्वीकृति या अस्वीकृति घोषित करना शास्त्रीय रूप से जल्दबाजी होगी.&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;भगवान श्रीकृष्ण साफ कहते हैं कि समाज का यह वर्गीकरण किसी के जन्म (जाति) के आधार पर नहीं, बल्कि उसके गुण (Attributes,Talent) और कर्म (Action, Profession) के आधार पर है. अलग-अलग आचार्यों ने इसकी अलग व्याख्याएं की हैं.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;इसके बावजूद इतना स्पष्ट है कि इस श्लोक में किसी मनुष्य के स्पर्श से भूमि, मंच या समाज के अशुद्ध हो जाने की बात नहीं कही गई. न ही यह किसी नेता के जाने के बाद हवन कर स्थान को पवित्र करने का आधार देता है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;यदि कोई धार्मिक आचरण व्यक्ति के गुण और कर्म को छोड़कर केवल उसकी सामाजिक पहचान पर निर्णय सुनाता है तो वह गीता के बताए विवेक से दूर जाता है.&lt;/p&gt;
&lt;h3 style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;उपनिषद कहते हैं- सबमें स्वयं को देखने वाला घृणा कैसे करेगा?&lt;/h3&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;ईशावास्य उपनिषद का छठा मंत्र इस विषय को और साफ करता है. इसमें कहा गया है कि जो सभी प्राणियों को अपने भीतर और स्वयं को सभी प्राणियों में देखता है, वह किसी से घृणा नहीं करता.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;यह सनातन दर्शन की सबसे ऊंची शिक्षाओं में से एक है. यहां शुद्धता शरीर, जाति या सामाजिक दर्जे से नहीं, दृष्टि से जुड़ी है. मन में घृणा, अहंकार और भेद हो तो केवल गंगाजल छिड़क देने से चेतना पवित्र नहीं हो जाती.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;यही इस विवाद की सबसे बड़ी विडंबना है. गंगा को भारतीय परंपरा करुणा, मोक्ष और सबके कल्याण का प्रतीक मानती है. उसी गंगाजल को यदि किसी मनुष्य के बाद स्थान साफ करने के प्रतीक के रूप में इस्तेमाल किया जाए तो यह गंगा की समावेशी भावना को ही संकुचित कर देता है.&lt;/p&gt;
&lt;h3 style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;हर शुद्धिकरण छुआछूत नहीं, लेकिन संदर्भ को नजरअंदाज नहीं कर सकते&lt;/h3&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;यह समझना भी जरूरी है कि हिंदू परंपरा में प्रत्येक शुद्धिकरण अनुष्ठान जातिगत भेदभाव नहीं होता. मंदिरों, घरों और धार्मिक स्थलों पर विशेष पूजा, प्राण प्रतिष्ठा, जीर्णोद्धार, मृत्यु-संबंधी संस्कार या किसी निर्धारित धार्मिक नियम के बाद शुद्धि विधियां होती हैं.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;लेकिन हल्द्वानी की घटना का संदर्भ अलग है. यहां एक सार्वजनिक राजनीतिक रैली के तुरंत बाद उसी स्थान पर 'शुद्धिकरण' किया गया. रैली को एक ऐसे नेता ने संबोधित किया जो दलित समुदाय से आता है. इसी कारण इस अनुष्ठान के प्रतीकात्मक अर्थ पर सवाल उठना स्वाभाविक है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;आयोजकों की मंशा की अंतिम पुष्टि जांच के बाद ही हो सकती है. बिना जांच के यह घोषित करना उचित नहीं होगा कि अनुष्ठान केवल खरगे की जाति के कारण हुआ. लेकिन यह कहना भी पर्याप्त नहीं कि यह सामान्य धार्मिक आयोजन था. 'शुद्धिकरण' शब्द का चयन और घटना का समय सामाजिक रूप से गंभीर संदेश देते हैं.&lt;/p&gt;
&lt;h3 style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;संविधान ने अस्पृश्यता को समाप्त किया, कानून ने दंडनीय बनाया&lt;/h3&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;भारतीय संविधान का अनुच्छेद 17 अस्पृश्यता को समाप्त करता है और उसके किसी भी रूप में व्यवहार को प्रतिबंधित करता है. अस्पृश्यता से उत्पन्न निर्योग्यता लागू करना कानून के अनुसार दंडनीय है. हालांकि किसी विशिष्ट घटना में अपराध बनता है या नहीं, इसका फैसला तथ्यों, साक्ष्यों और कानूनी जांच से होगा.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;इसलिए राजनीतिक बयान और कानूनी निष्कर्ष के बीच अंतर रखना आवश्यक है. खरगे ने कार्रवाई की मांग की है. नड्डा ने जांच का आश्वासन दिया है. अब जिम्मेदारी संबंधित प्रशासन और जांच एजेंसियों की है कि वे पता लगाएं कि आयोजन किसने किया, उसका घोषित उद्देश्य क्या था और उसमें शामिल लोगों ने वास्तव में क्या कहा.&lt;/p&gt;
&lt;h3 style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;धर्म की रक्षा गंगाजल से नहीं, सही आचरण से होगी&lt;/h3&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;हल्द्वानी की घटना हमें एक असहज प्रश्न के सामने खड़ा करती है. क्या हम धार्मिक प्रतीकों का उपयोग मनुष्य को जोड़ने के लिए कर रहे हैं या उसे अपमानित करने के लिए?&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;सनातन धर्म की शक्ति उसकी विशालता में है. वह एक ही आत्मा को सभी जीवों में देखने की शिक्षा देता है. वह मन की शुद्धि, अहंकार के त्याग और समदृष्टि की बात करता है. ऐसे धर्म के नाम पर किसी मनुष्य की मौजूदगी को अशुद्ध बताना धर्म की रक्षा नहीं, उसकी मूल भावना को छोटा करना है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;गंगाजल छिड़कने से पहले मन में जमा जातिगत अहंकार, राजनीतिक घृणा और सामाजिक भेदभाव का शुद्धिकरण अधिक जरूरी है. क्योंकि गीता का संदेश साफ है, ज्ञानी वह नहीं जो दूसरों को अशुद्ध घोषित करे, बल्कि वह है जो सबमें उसी एक परमात्मा को देख सके.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;यही सनातन का वास्तविक सत्य है. और इसी सत्य के सामने धर्म के नाम पर किया गया प्रत्येक भेदभाव अंततः पाखंड साबित होता है.&lt;/p&gt;]]></description><slash:comments>0</slash:comments><media:thumbnail url="https://feeds.abplive.com/onecms/images/uploaded-images/2026/08/13/21e3c299b89a397c2396f21e84f611db1786617861831257_original.png" width="220"/></item><item><title><![CDATA[अंगदान की एक पहल दे सकती है कई जिंदगियों में नई उम्मीद]]></title><link>https://www.abplive.com/blog/organ-donation-initiative-can-bring-new-hope-to-many-lives-3174137</link><comments>https://www.abplive.com/blog/organ-donation-initiative-can-bring-new-hope-to-many-lives-3174137#respond</comments><pubDate>Wed, 12 Aug 2026 15:55:44 +0530 </pubDate><dc:creator><![CDATA[ एबीपी लाइव ]]></dc:creator><category><![CDATA[  ]]></category><guid isPermaLink="true">https://www.abplive.com/blog/organ-donation-initiative-can-bring-new-hope-to-many-lives-3174137</guid><description><![CDATA[&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;अंगदान मानवता के सबसे महान और सार्थक कार्यों में से एक है. यह अंतिम चरण की अंग विफलता (एंड-स्टेज ऑर्गन फेल्योर) से जूझ रहे लोगों को आशा प्रदान करता है और उन्हें लंबा, स्वस्थ एवं बेहतर जीवन जीने का अवसर देता है. कई मरीजों के लिए अंग प्रत्यारोपण केवल एक उपचार विकल्प नहीं, बल्कि जीवन बचाने का एकमात्र अवसर होता है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;हालांकि, अंगदान और अंग प्रत्यारोपण की सफलता काफी हद तक संभावित दाताओं की समय पर पहचान, त्वरित चिकित्सा हस्तक्षेप, प्रभावी समन्वय और जन-जागरूकता पर निर्भर करती है. इस बारे मेविस्टर से जानकारी दे रहे हैं इंदौर स्थित कोकिलाबेन धीरूभाई अंबानी अस्पताल के डॉ विकास सिंह, कंसल्टेंट, यूरोलॉजी, &amp;nbsp;जेनिटो यूरो ऑन्कोलॉजी एंड किडनी ट्रांसप्लांट सर्जरी, आईये जानते हैं-&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;समय पर अंगदान क्यों महत्वपूर्ण है?&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;अंगदान की प्रक्रिया में समय की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होती है. किसी मृतक दाता से अंग प्राप्त करने के बाद उसे सीमित समय के भीतर सुरक्षित रखकर प्रत्यारोपित करना आवश्यक होता है. अलग-अलग अंग शरीर के बाहर अलग-अलग समय तक ही सुरक्षित और उपयोग योग्य रह सकते हैं. इसलिए संभावित दाता की पहचान, परिवार की सहमति, अंग प्राप्त करने, सुरक्षित परिवहन और प्रत्यारोपण तक हर चरण का उचित समन्वय और समय पर पूरा होना जरूरी है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;समय पर अंगदान एक सफल प्रत्यारोपण और एक महत्वपूर्ण अंग के उपयोग योग्य न रह पाने के बीच अंतर पैदा कर सकता है. देरी से अंग की गुणवत्ता प्रभावित हो सकती है और प्राप्तकर्ता में सफल परिणाम की संभावना कम हो सकती है. यही कारण है कि अस्पताल, प्रत्यारोपण विशेषज्ञों की टीमें, अंगदान समन्वयक और परिवहन सेवाएं मिलकर काम करती हैं, ताकि अंगों को जल्द से जल्द और सुरक्षित रूप से उपयुक्त मरीजों तक पहुंचाया जा सके.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;संभावित अंगदाताओं की समय पर पहचान&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;संभावित अंगदाताओं की समय पर और सटीक पहचान भी अत्यंत आवश्यक है. मृतक अंगदान के मामलों में, चिकित्सा टीमें ऐसे व्यक्तियों की पहचान कर सकती हैं, जिनके मस्तिष्क की कार्यक्षमता अपरिवर्तनीय रूप से समाप्त हो चुकी हो और जो चिकित्सकीय रूप से अंगदान के लिए उपयुक्त हों.&lt;br /&gt;ऐसे कठिन समय में परिवार के सदस्यों के साथ संवेदनशील और समय पर संवाद करना भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि उन्हें एक महत्वपूर्ण निर्णय लेने के लिए स्पष्ट जानकारी और भावनात्मक सहयोग की आवश्यकता होती है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;अंग प्रत्यारोपण: जीवन को दूसरा अवसर&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;अंग प्रत्यारोपण ने अनगिनत मरीजों के जीवन में सकारात्मक बदलाव लाया है. सफल किडनी प्रत्यारोपण कई मरीजों को लंबे समय तक डायलिसिस पर निर्भर रहने से राहत दिला सकता है और उन्हें अधिक सक्रिय जीवन जीने में मदद कर सकता है. लिवर प्रत्यारोपण गंभीर लिवर रोग से पीड़ित लोगों के लिए जीवन की नई शुरुआत बन सकता है. वहीं, हृदय और फेफड़ों का प्रत्यारोपण उन्नत अंग विफलता से जूझ रहे मरीजों को अपनी शक्ति वापस पाने और रोजमर्रा के कार्य बेहतर ढंग से करने में सहायता कर सकता है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;प्रत्यारोपण के बाद बेहतर जीवन की संभावना&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;अंग प्रत्यारोपण के लाभ केवल शारीरिक स्वास्थ्य तक सीमित नहीं हैं. कई मरीजों में भावनात्मक स्वास्थ्य बेहतर होता है, आत्मनिर्भरता बढ़ती है और वे काम, शिक्षा, पारिवारिक जिम्मेदारियों तथा सामाजिक गतिविधियों में फिर से भाग ले पाते हैं. बच्चों के लिए समय पर किया गया प्रत्यारोपण उन्हें बेहतर विकास, शिक्षा, खेलकूद और स्वस्थ जीवन जीने का अवसर दे सकता है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;हालांकि, प्रत्यारोपण की यात्रा सर्जरी के साथ समाप्त नहीं होती. प्रत्यारोपण के बाद मरीजों को आजीवन चिकित्सकीय निगरानी, नियमित स्वास्थ्य जांच और अंग अस्वीकृति के जोखिम को कम करने के लिए आवश्यक दवाओं की जरूरत होती है. उचित देखभाल और डॉक्टर की सलाह का पालन करने से कई मरीज प्रत्यारोपण के बाद सक्रिय, स्वस्थ और संतोषजनक जीवन जी सकते हैं.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;अंगों की मांग और उपलब्धता के बीच की खाई&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;अंग प्रत्यारोपण के क्षेत्र में सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक अंगों की आवश्यकता और उनकी उपलब्धता के बीच का बड़ा अंतर है. कई मरीजों को अंग प्रत्यारोपण की प्रतीक्षा सूची में महीनों या वर्षों तक इंतजार करना पड़ता है. इस दौरान कुछ मरीजों की स्वास्थ्य स्थिति लगातार खराब हो सकती है, जबकि कुछ को समय पर उपयुक्त अंग नहीं मिल पाता.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;अंगदान के प्रति जागरूकता बढ़ाकर इस चुनौती को कम करने में मदद मिल सकती है. लोगों को यह समझना चाहिए कि अंगदान एक स्वैच्छिक और संभावित रूप से जीवन रक्षक निर्णय है. अपने परिवार के सदस्यों के साथ अंगदान की इच्छा पर चर्चा करना विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, क्योंकि जरूरत के समय परिवार की जानकारी और सहमति अंगदान के निर्णय में अहम भूमिका निभा सकती है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;अंगदान से जुड़े मिथकों और भ्रांतियों को दूर करना&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;जन-जागरूकता कार्यक्रमों का उद्देश्य अंगदान से जुड़े मिथकों और गलत धारणाओं को दूर करना भी होना चाहिए. कुछ लोग मानते हैं कि अधिक उम्र अपने आप अंगदान के लिए बाधा बन जाती है, जबकि अंगदान की उपयुक्तता का मूल्यांकन प्रत्येक व्यक्ति की स्वास्थ्य स्थिति के आधार पर किया जाता है. कुछ लोगों को चिकित्सा प्रक्रिया या धार्मिक मान्यताओं से जुड़ी चिंताएं भी हो सकती हैं. सही जानकारी उपलब्ध कराकर और खुले संवाद को प्रोत्साहित करके लोगों को सोच समझकर निर्णय लेने में मदद की जा सकती है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;परिवारों की भूमिका: इच्छा साझा करना है जरूरी&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;अंगदान की प्रक्रिया में परिवारों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होती है. जब लोग अपनी अंगदान संबंधी इच्छा पहले से अपने परिवार के साथ साझा करते हैं, तो परिवार के सदस्य उस निर्णय का सम्मान करने के लिए अधिक तैयार हो सकते हैं. अंगदान के बारे में बातचीत करना कठिन हो सकता है, लेकिन इस विषय पर खुलकर चर्चा करने से अनिश्चितता कम होती है और भावनात्मक रूप से चुनौतीपूर्ण समय में परिवार को सही निर्णय लेने में सहायता मिलती है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;स्वास्थ्य विशेषज्ञों और अंगदान समन्वयकों की जिम्मेदारी&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;स्वास्थ्य विशेषज्ञों की भी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी होती है. वे चिकित्सकीय जानकारी प्रदान करते हैं, दाता की उपयुक्तता का आकलन करते हैं, प्रत्यारोपण से संबंधित अधिकारियों के साथ समन्वय करते हैं, परिवारों को सहयोग देते हैं और यह सुनिश्चित करते हैं कि अंगदान की पूरी प्रक्रिया निर्धारित नैतिक एवं कानूनी मानकों के अनुसार हो. उनकी विशेषज्ञता और संवेदनशील संवाद लोगों में विश्वास बढ़ाने तथा सही निर्णय लेने में सहायता करते हैं.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;अंगदान समन्वयकों की भूमिका भी अत्यंत महत्वपूर्ण होती है. वे अस्पतालों, दाता परिवारों, प्रत्यारोपण टीमों और अंग आवंटन प्रणालियों के बीच समन्वय स्थापित करते हैं. उनके प्रयासों से यह सुनिश्चित करने में मदद मिलती है कि पूरी प्रक्रिया व्यवस्थित, पारदर्शी और समयबद्ध तरीके से पूरी हो.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;अंगदान के प्रति जन-जागरूकता बढ़ाने की आवश्यकता&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;अंगदान दिवस लोगों को अंगदान के बारे में जानने और अपने प्रियजनों के साथ अपनी इच्छा पर चर्चा करने के लिए प्रेरित करने का एक महत्वपूर्ण अवसर है. जागरूकता अभियान, शैक्षणिक कार्यक्रम, सामुदायिक गतिविधियां और मरीजों की प्रेरक कहानियां लोगों को अंग प्रत्यारोपण के जीवन बदलने वाले प्रभाव को समझने में मदद कर सकती हैं.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;अंगदाताओं और अंग प्राप्त करने वाले मरीजों की वास्तविक जीवन की कहानियां विशेष रूप से प्रभावशाली हो सकती हैं. वे यह दर्शाती हैं कि एक व्यक्ति का निर्णय कई परिवारों के जीवन में आशा ला सकता है और मरीजों को जीवन का दूसरा अवसर दे सकता है. ये कहानियां दाता परिवारों की उदारता और संवेदनशीलता को भी उजागर करती हैं, जिनका कठिन समय में लिया गया निर्णय करुणा और मानवता की एक स्थायी मिसाल बन सकता है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;समाज की भागीदारी से बढ़ेगा अंगदान&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;स्कूल, कार्यस्थल, स्वास्थ्य संस्थान और सामाजिक संगठन सही एवं विश्वसनीय जानकारी साझा करके तथा जिम्मेदार संवाद को बढ़ावा देकर महत्वपूर्ण योगदान दे सकते हैं. अधिक जागरूकता से लोगों की झिझक कम हो सकती है, समझ बढ़ सकती है और स्वैच्छिक अंगदान की संस्कृति को प्रोत्साहन मिल सकता है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;आशा और जीवन का उपहार&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;समय पर अंगदान और अंग प्रत्यारोपण एक समन्वित प्रक्रिया है, जिसमें अंगदाता, परिवार, स्वास्थ्य विशेषज्ञ, अस्पताल और प्रत्यारोपण संस्थान मिलकर महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं. इस प्रक्रिया का प्रत्येक चरण आवश्यक है और किसी भी स्तर पर होने वाली देरी जीवन बचाने या किसी मरीज के स्वास्थ्य में सुधार की संभावना को प्रभावित कर सकती है. अंगदाता बनने का निर्णय किसी व्यक्ति के जीवन के बाद भी दूसरों के लिए आशा का कारण बन सकता है. यह मरीजों को अपने परिवार के पास लौटने, अपने लक्ष्यों को पूरा करने और जीवन के उन अनमोल पलों को जीने का अवसर दे सकता है, जिन्हें वे शायद अन्यथा अनुभव नहीं कर पाते.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;अंगदान दिवस के अवसर पर लोगों को अंगदान के बारे में सही जानकारी प्राप्त करने, सोच-समझकर निर्णय लेने और अपनी इच्छा अपने परिवार के साथ साझा करने के लिए प्रेरित किया जाता है. जागरूकता बढ़ाकर और समय पर अंगदान को प्रोत्साहित करके हम अधिक मरीजों को जीवन रक्षक अंग प्रत्यारोपण का अवसर दिलाने में योगदान दे सकते हैं&lt;/p&gt;]]></description><slash:comments>0</slash:comments><media:thumbnail url="https://feeds.abplive.com/onecms/images/uploaded-images/2026/08/12/424ba34fb54a81180ebd31a0bd4d893f1786530208466708_original.jpg" width="220"/></item><item><title><![CDATA[डीजे, रील्स और बदलती कांवड़ यात्रा में आस्था की अनवरत लौ]]></title><link>https://www.abplive.com/blog/kanwar-yatra-2026-djs-reels-meaning-of-faith-lord-shiva-3174132</link><comments>https://www.abplive.com/blog/kanwar-yatra-2026-djs-reels-meaning-of-faith-lord-shiva-3174132#respond</comments><pubDate>Wed, 12 Aug 2026 15:44:21 +0530 </pubDate><dc:creator><![CDATA[ एबीपी लाइव ]]></dc:creator><category><![CDATA[  ]]></category><guid isPermaLink="true">https://www.abplive.com/blog/kanwar-yatra-2026-djs-reels-meaning-of-faith-lord-shiva-3174132</guid><description><![CDATA[&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;कांवड़ यात्रा आज एक नए कलेवर में हमारे सामने है. परंपराएं वही हैं, हरिद्वार, गोमुख और अन्य पवित्र स्थलों से गंगाजल लाकर शिवालयों में अर्पित करना और निभाया भी वही जा रहा है, लेकिन परिदृश्य बदला है. डीजे की धुन पर थिरकते युवा, हाईटेक सजावट से लदी कांवड़ें, बाइकों के काफिले और मोबाइल कैमरों में कैद होते पल प्रति पल. यह नया परिदृश्य है. इसे देखकर कुछ लोग यात्रा के नए स्वरूप पर सवाल उठाते हैं. उन्हें यह ठीक नहीं लगता, लेकिन क्या वाकई उनकी आपत्ति सही है? गहराई से देखें तो यह आस्था की अभिव्यक्ति का ऐसा कायाकल्प है जो वर्तमान पीढ़ी को आस्था से जोड़कर कांवड़ यात्रा की नई तस्वीर हमारे सामने रखता है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;शिव महादेव इसलिए है क्योंकि वे समय के हर रूप को आत्मसात करते हैं. वे आदियोगी भी हैं और नटराज भी. संहारक भी हैं और सृजनकर्ता भी. जिस देवता का स्वभाव ही परिवर्तनशीलता और सर्वव्यापकता है, उसकी भक्ति का स्वरूप भी हर युग में बदलता रहा है. वैदिक काल में रुद्र की उपासना जिस रूप में होती थी, वह भक्ति काल में शिव भजनों और कीर्तनों में बदल गई. आज इक्कीसवीं सदी में जब डिजिटल तकनीक हमारे जीवन के हर कोने में प्रवेश कर चुकी है, तो भक्ति की अभिव्यक्ति भी उसी माध्यम से हो रही है, जो इस पीढ़ी के लिए स्वाभाविक है. डीजे की धुन पर &amp;lsquo;बम भोले&amp;rsquo; के जयकारे लगाना दरअसल उसी उल्लास और समर्पण का विस्तार है, जो पहले ढोल-मंजीरों और लोकगीतों के माध्यम से व्यक्त होता था.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;आस्था और उसकी अभिव्यक्ति दो अलग-अलग चीजें हैं. आस्था अंतर्मन का विषय है जो श्रद्धा, समर्पण और विश्वास की शक्ति से एक भक्त को नंगे पांव सैकड़ों किलोमीटर चलने का साहस देता है. अभिव्यक्ति समय, समाज और तकनीक के साथ बदलती रहती है. आज हम युवाओं को बाइक पर सवार होकर, सिर पर भगवा पगड़ी बांधे, कांधे पर कांवड़ लिए हुए, सोशल मीडिया पर लाइव स्ट्रीमिंग करते हुए देखते हैं. यह आस्था को अपने ढंग से जीने और उसे अपनी पीढ़ी की भाषा में व्यक्त करने का तरीका है. एक युवा जो इंस्टाग्राम रील बनाकर अपनी कांवड़ यात्रा साझा करता है, वह असल में अपने विश्वास को सार्वजनिक रूप से स्वीकार कर रहा है. यह आत्म-प्रदर्शन के साथ ही आत्म-घोषणा भी है कि &amp;lsquo;मैं शिव भक्त हूं और मुझे इस पर गर्व है.&amp;rsquo;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;पिछले कुछ वर्षों में कांवड़ यात्रा में युवाओं की भागीदारी में अभूतपूर्व वृद्धि देखी जा रही है. इसका गंभीर अध्ययन होना चाहिए. कॉलेज के छात्र, आईटी कंपनियों में काम करने वाले युवा पेशेवर, यहां तक कि विदेश में बसे प्रवासी भारतीय भी छुट्टियां लेकर इस यात्रा में शामिल होने आते हैं. यह वह पीढ़ी है जो वैश्वीकरण की उपज है, जिसकी परवरिश स्मार्टफोन और इंटरनेट के बीच हुई है और जो पश्चिमी जीवनशैली के प्रभाव में पली-बढ़ी है. इस पीढ़ी का पारंपरिक धार्मिक अनुष्ठानों की ओर आकर्षित होना यह सिद्ध करता है कि आधुनिकता और आध्यात्मिकता परस्पर विरोधी नहीं, बल्कि सहअस्तित्व में रह सकती हैं. यह पीढ़ी अपनी जड़ों से कटी हुई नहीं है, बल्कि अपने ढंग से उनसे जुड़ने का रास्ता खोज रही है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;डीजे कांवड़ की आलोचना अक्सर अत्यधिक शोर, यातायात में बाधा और कभी-कभी होने वाली अव्यवस्था को लेकर होती है और यह चिंता वाजिब भी है. किसी भी सामूहिक धार्मिक आयोजन में अनुशासन और मर्यादा का पालन आवश्यक है, और प्रशासन और आयोजकों दोनों का यह दायित्व बनता है कि उत्सव का उल्लास किसी के लिए असुविधा का कारण न बने. परंतु इस व्यावहारिक चुनौती को आस्था के मूल स्वरूप में आए बदलाव से जोड़कर देखना उचित नहीं है. हर बड़े धार्मिक आयोजन में प्रबंधन की चुनौतियां रही हैं. कुंभ मेले में चुनौतियां थीं, रथ यात्रा में होती हैं और अब कांवड़ यात्रा में भी हैं. यह वस्तुतः प्रशासनिक दक्षता का प्रश्न है, आस्था की प्रामाणिकता का नहीं. योगी सरकार ने डीजे कांवड़ के लाउडस्पीकरों की आवाज निर्धारित मानक में रखने का स्पष्ट निर्देश भी दिया है.&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;इस पूरे परिदृश्य में उत्तर प्रदेश सरकार की भूमिका उल्लेखनीय है. योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व वाली सरकार ने धार्मिक पर्यटन को राज्य के आर्थिक विकास की एक प्रमुख धुरी के रूप में स्थापित करने का प्रयास किया है. काशी विश्वनाथ धाम का भव्य कॉरिडोर, अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण के बाद वहां का कायाकल्प, और कांवड़ मार्गों पर बेहतर सड़कों, शिविरों, स्वास्थ्य सुविधाओं और सुरक्षा व्यवस्था का विस्तार-यह सब दर्शाता है कि सरकार धार्मिक आस्था को केवल सांस्कृतिक विरासत के रूप में नहीं, बल्कि रोजगार सृजन और स्थानीय अर्थव्यवस्था को गति देने वाले माध्यम के रूप में भी देख रही है. जब सरकारें धार्मिक यात्राओं को सुगम और सुरक्षित बनाती हैं, तो वे परोक्ष रूप से युवाओं की भागीदारी को भी प्रोत्साहित करती हैं, क्योंकि सुविधा और सुरक्षा का भरोसा ही किसी भी बड़े आयोजन में जन-भागीदारी बढ़ाने का आधार होता है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;सोशल मीडिया के इस युग में एक और महत्वपूर्ण परिवर्तन सामूहिकता के नये स्वरूप में देखने को मिला है. पहले कांवड़ यात्रा गांव या मोहल्ले के परिचित समूहों तक सीमित होती थी. आज यह यात्रा डिजिटल माध्यमों से जुड़कर एक विशाल आभासी समुदाय का रूप ले चुकी है, जहां हजारों किलोमीटर दूर बैठा व्यक्ति भी लाइव स्ट्रीम के माध्यम से यात्रा से जुड़ाव महसूस करता है. यह आस्था के वैश्वीकरण का एक उदाहरण है. जो प्रवासी भारतीय अपने देश और अपनी परंपराओं से भौगोलिक रूप से दूर हैं, उनके लिए सोशल मीडिया एक सेतु का काम करता है, जिससे वे अपनी सांस्कृतिक पहचान से जुड़े रह सकते हैं.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;यह भी तथ्य है कि कोई भी सामाजिक परिघटना पूर्णतः निष्कलंक नहीं होती. कई ऐसे मामले भी सामने आए हैं, जिनमें असामाजिक तत्वों ने कांवड़ यात्रा में घुसपैठ कर शोर-शराबा, प्रदर्शनकारी व्यवहार या अनुशासनहीनता की घटनाओं को अंजाम दिया, जिन पर कानून के अनुसार कार्रवाई भी की गई. कुछ आलोचक तर्क देते हैं कि सोशल मीडिया पर दिखावे की प्रवृत्ति कहीं न कहीं आध्यात्मिक अनुभव की गहराई को कमजोर कर रही है. यह चिंता निराधार नहीं है, और इस पर सामाजिक विमर्श होना भी चाहिए. परंतु हर धार्मिक परंपरा में समय के साथ ऐसे विचलन आते रहे हैं, और समाज स्वयं ही धीरे-धीरे संतुलन स्थापित करता है. भक्ति आंदोलन के समय भी कर्मकांडों की अतिशयता पर प्रश्न उठे थे. फिर भी उस आंदोलन ने भारतीय समाज को गहराई से प्रभावित किया और आध्यात्मिकता को जन-जन तक पहुंचाया.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;यह प्रश्न महत्वपूर्ण है कि क्या डीजे, बाइक और रील्स के इस युग में शिव भक्ति की गहराई कम हुई है, या केवल उसका चोला बदला है. मेरा मानना है कि जब एक युवा चालीस डिग्री की गर्मी में, फटे पैरों के साथ, बिना थके सैकड़ों किलोमीटर पैदल चलकर गंगाजल लाता है, तो उसके भीतर की श्रद्धा असंदिग्ध है. सनातन परंपरा में वह लचीलापन है, जो हर पीढ़ी को अपनी भाषा में, अपने ढंग से, शिव से जुड़ने का अवसर देती है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;[नोट- उपरोक्त दिए गए विचार लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. यह ज़रूरी नहीं है कि एबीपी न्यूज़ ग्रुप इससे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही ज़िम्मेदार है.]&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;]]></description><slash:comments>0</slash:comments><media:thumbnail url="https://feeds.abplive.com/onecms/images/uploaded-images/2026/08/12/448e1896f5c207e8bdaf9e65b889d0b61786529211021708_original.jpg" width="220"/></item><item><title><![CDATA[Opinion: कौशल विकास, स्वास्थ्य शिविर और माइक्रोलोन... भारत के दिव्यांग दंपतियों की बदलती ज़िंदगी]]></title><link>https://www.abplive.com/blog/skill-development-health-camps-microloans-are-transforming-disability-couples-in-india-3173806</link><comments>https://www.abplive.com/blog/skill-development-health-camps-microloans-are-transforming-disability-couples-in-india-3173806#respond</comments><pubDate>Tue, 11 Aug 2026 22:35:57 +0530 </pubDate><dc:creator><![CDATA[ प्रशांत अग्रवाल ]]></dc:creator><category><![CDATA[  ]]></category><guid isPermaLink="true">https://www.abplive.com/blog/skill-development-health-camps-microloans-are-transforming-disability-couples-in-india-3173806</guid><description><![CDATA[&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;किसी व्यक्ति की जिंदगी बदलने के लिए हमेशा बड़ी मदद की जरूरत नहीं होती. कई बार सही समय पर मिला इलाज, कोई हुनर सीखने का मौका या छोटा-सा कर्ज भी पूरे परिवार की दिशा बदल सकता है. दिव्यांग दंपतियों के मामले में यह बात और भी महत्वपूर्ण हो जाती है. भारत में ऐसे बहुत से परिवार हैं, जहां पति या पत्नी में से कोई एक, या दोनों दिव्यांग हैं. इनके सामने स्वास्थ्य, रोजगार, कमाई और समाज में सम्मान और बराबरी से जुड़ी कई चुनौतियां होती हैं.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;गांवों में यह मुश्किल और बढ़ जाती है, क्योंकि अस्पताल, प्रशिक्षण केंद्र, रोजगार और बैंकिंग सुविधाएं अक्सर दूर होती हैं. लेकिन दिव्यांगता का मतलब किसी व्यक्ति की क्षमता का खत्म हो जाना नहीं है. जरूरत इस बात की है कि उसे अपनी क्षमता दिखाने का अवसर मिले. स्वास्थ्य सुविधा, कौशल प्रशिक्षण और आसान आर्थिक मदद ऐसे तीन रास्ते हैं, जो दिव्यांग दंपतियों को दूसरों पर निर्भर रहने के बजाय आत्मनिर्भर बनने की दिशा में ले जा सकते हैं.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;स्वास्थ्य सहायता जो आत्मनिर्भरता बढ़ाती है&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;दिव्यांग लोगों के लिए समय पर इलाज और नियमित स्वास्थ्य जांच केवल बीमारी से बचने का जरिया नहीं है. इसका सीधा संबंध उनकी रोजमर्रा की जिंदगी, काम करने की क्षमता और परिवार की आर्थिक स्थिति से भी है. ग्लोबल हेल्थ सिस्टम पर 2026 की मैकिन्से रिपोर्ट इस बात पर जोर देती है कि निवारक और लक्षित हस्तक्षेप, जैसे नियमित स्वास्थ्य शिविर और पुनर्वास सेवाएं, लोगों के जीवन में स्वस्थ वर्ष जोड़ सकते हैं. साथ ही, ये सेवाएं व्यक्तियों को काम करने, सामाजिक रूप से जुड़े रहने और अपने परिवारों को बेहतर ढंग से संभालने में सक्षम बनाकर आर्थिक भागीदारी को भी बढ़ा सकती हैं.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;दिव्यांग दंपतियों के लिए नियमित स्वास्थ्य सहायता गतिशीलता (Mobility) से जुड़ी बाधाओं को कम करती है, निर्भरता घटाती है और आत्मविश्वास बढ़ाती है. ये सभी कारक आय पैदा करने वाली गतिविधियों और सामुदायिक जीवन में उनकी भागीदारी को मजबूत करते हैं. दिव्यांग लोगों को कई बार अकेलेपन, भेदभाव और सामाजिक दबाव का भी सामना करना पड़ता है. इसलिए मानसिक स्वास्थ्य के लिए सलाह, परिवार का सहयोग और समुदाय में जागरूकता भी जरूरी है. एक स्वस्थ और आत्मविश्वासी व्यक्ति अपने परिवार की जिम्मेदारियां बेहतर तरीके से निभा सकता है. इसलिए स्वास्थ्य सुविधा को केवल खर्च के रूप में नहीं, बल्कि व्यक्ति और परिवार को आत्मनिर्भर बनाने वाले निवेश के रूप में देखने की जरूरत है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;कौशल &amp;nbsp;जो आय के मार्ग बनाते है&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;किसी परिवार को लंबे समय तक सहायता देने से ज्यादा जरूरी है कि उसे कमाने का रास्ता दिया जाए. इसके लिए कौशल प्रशिक्षण सबसे बड़ा साधन बन सकता है. दिव्यांग दंपतियों को उनकी क्षमता और स्थानीय जरूरत के हिसाब से सिलाई, कंप्यूटर, मोबाइल से जुड़े काम, हस्तशिल्प, छोटे कारोबार, पैकिंग, खाद्य सामग्री तैयार करने या दूसरे रोजगारों का प्रशिक्षण दिया जा सकता है. खासकर गांवों में प्रशिक्षण ऐसा होना चाहिए जिसे सीखने के बाद व्यक्ति अपने आसपास ही काम शुरू कर सके. हर व्यक्ति को रोजगार के लिए शहर जाने की जरूरत नहीं होनी चाहिए.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;आज तकनीक ने काम के कई नए रास्ते भी खोले हैं. दृष्टिबाधित व्यक्ति स्क्रीन पर लिखी जानकारी सुनकर कंप्यूटर या मोबाइल का इस्तेमाल कर सकते हैं. इसी तरह सुनने में परेशानी वाले लोगों के लिए सांकेतिक भाषा के माध्यम से प्रशिक्षण उपलब्ध कराया जा सकता है. अगर प्रशिक्षण के साथ बाजार से जोड़ने की व्यवस्था भी हो, तो इसका फायदा और बढ़ सकता है. केवल सिलाई सिखाना पर्याप्त नहीं है. यह भी बताना होगा कि कपड़े कहां से खरीदें, ग्राहक कैसे बनाएं और तैयार सामान बाजार तक कैसे पहुंचाएं. यानी कौशल प्रशिक्षण का लक्ष्य सिर्फ प्रमाणपत्र देना नहीं, बल्कि कमाई का रास्ता तैयार करना होना चाहिए.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;माइक्रोलोन से बड़ा बदलाव संभव&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;दिव्यांग दंपतियों के सामने कारोबार शुरू करने के लिए पूंजी जुटाना बड़ी चुनौती होती है. आसान शर्तों पर मिलने वाला छोटा कर्ज (माइक्रोलोन) उन्हें सिलाई, छोटी दुकान, नाश्ते, हस्तशिल्प या मरम्मत जैसे काम शुरू करने में मदद कर सकता है. हालांकि, सिर्फ कर्ज देना पर्याप्त नहीं है. कारोबार चलाने की जानकारी, बाजार से संपर्क और समय-समय पर मार्गदर्शन भी जरूरी है. गांवों में सरकारी योजनाओं, कौशल प्रशिक्षण और आर्थिक सहायता की जानकारी भी हर जरूरतमंद तक नहीं पहुंच पाती. पंचायत स्तर पर इन सुविधाओं की जानकारी और पंजीकरण की व्यवस्था हो, तो दिव्यांग परिवारों के लिए रोजगार और आत्मनिर्भरता का रास्ता आसान हो सकता है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;आय से परे: गरिमा और भागीदारी&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;स्वास्थ्य सेवा, कौशल विकास और समावेशी वित्त तक पहुंच दिव्यांग समुदाय के लिए केवल आर्थिक या भौतिक कल्याण तक सीमित नहीं है, बल्कि यह गरिमा, आत्मविश्वास, आत्मनिर्भरता और सामाजिक भागीदारी को भी मजबूत करती है. सही सहयोग मिलने पर दिव्यांग जोड़े घरेलू निर्णयों में अधिक स्वायत्तता, दैनिक जीवन में स्वतंत्रता और अपने समुदायों में प्रभावी आवाज हासिल कर सकते हैं.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;भारत का दिव्यांग समुदाय अपार अप्रयुक्त मानवीय और आर्थिक क्षमता रखता है. जब नीति, परोपकार और निजी पहल मिलकर सुलभ एवं समावेशी प्रणालियां तैयार करते हैं, तो इसका लाभ केवल व्यक्तियों और परिवारों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि व्यापक सामाजिक और आर्थिक समृद्धि में भी योगदान देता है. देश भर में दिव्यांग जोड़े यह साबित कर रहे हैं कि विकलांगता भाग्य को परिभाषित नहीं करती- अवसर करता है: कमाने, योगदान देने और सम्मान के साथ जीवन जीने का अवसर.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;[नोट- उपरोक्त दिए गए विचार लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. यह ज़रूरी नहीं है कि एबीपी न्यूज़ ग्रुप इससे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही ज़िम्मेदार है.]&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;]]></description><slash:comments>0</slash:comments><media:thumbnail url="https://feeds.abplive.com/onecms/images/uploaded-images/2026/08/11/6fa38b44069f0a394b48d113d110505d1786467876278708_original.jpg" width="220"/></item><item><title><![CDATA[सुरक्षा, सुविधा और समृद्धि: योगी सरकार के माइक्रो-प्लान से कांवड़ यात्रा बनी आर्थिक इंजन]]></title><link>https://www.abplive.com/blog/kanwar-yatra-2026-yogi-adityanath-up-govt-economic-boost-3173288</link><comments>https://www.abplive.com/blog/kanwar-yatra-2026-yogi-adityanath-up-govt-economic-boost-3173288#respond</comments><pubDate>Mon, 10 Aug 2026 23:12:22 +0530 </pubDate><dc:creator><![CDATA[ एबीपी लाइव ]]></dc:creator><category><![CDATA[  ]]></category><guid isPermaLink="true">https://www.abplive.com/blog/kanwar-yatra-2026-yogi-adityanath-up-govt-economic-boost-3173288</guid><description><![CDATA[&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;योगी सरकार के धार्मिक पर्यटन की दृष्टि से देखें तो कांवड़ यात्रा में उत्तर प्रदेश के आर्थिक लक्ष्यों का रोडमैप भी दिखाई देगा. भगवा वस्त्रों में लिपटे लाखों कंधे, कंधों पर सजी बांस की कांवड़ें, &amp;lsquo;बोल बम&amp;rsquo; के जयघोष के बीच आगे बढ़ता जन सैलाब.... यह राज्य की आर्थिक प्रगति के संकेतक हैं. वाराणसी, प्रयागराज, मथुरा और छोटे-छोटे वे धार्मिक स्थल जो आज धार्मिक पर्यटन के जरिये उत्तर प्रदेश की अर्थव्यवस्था को संबल दे रहे हैं, कांवड़ यात्रा उसी की एक कड़ी है. राज्य के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने इस यात्रा को वैश्विक रूप देने के लिए संसाधन उपलब्ध कराए हैं तो इसके पीछे उनकी उत्तर प्रदेश को वन ट्रिलियन डॉलर इकॉनमी के लक्ष्य तक ले जाने की सोच है. कांवड़ यात्रा के सहारे खड़ा किया जा रहा आर्थिक कारोबार भी इसी का एक हिस्सा है.&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&lt;br /&gt;अब बात करते हैं आकंड़ों की जो विशेषज्ञ सामने रखते हैं. लखनऊ के गिरी इंस्टीट्यूट ऑफ डेवलपमेंट स्टडीज की 2024 की एक शोध रिपोर्ट के अनुसार, कांवड़ यात्रा उत्तर प्रदेश में लगभग एक हजार करोड़ रुपये यानी दस अरब से अधिक का कारोबार उत्पन्न करती है. ऐसा पहले नहीं था. 2017 के बाद से राज्य में कांवड़ यात्रियों की संख्या में तेज़ वृद्धि के साथ-साथ होटल, ढाबे, परिवहन, टेंट, पूजा सामग्री और स्थानीय व्यापार का बाजार भी लगातार आगे बढ़ा है. इस साल व्यापारिक हलकों के अनुमान इससे भी आगे जाते हैं. बाज़ार सूत्रों के मुताबिक इस सावन कांवड़ यात्रा से लगभग पंद्रह सौ करोड़ रुपये की आर्थिक गतिविधि को गति मिलने की संभावना है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;यमुनानगर के रेलवे रोड पर दुकान चलाने वाले एक व्यापारी बताते हैं कि लगातार हो रही बारिश के कारण इस मौसम में रेनकोट और चप्पलों की मांग अचानक बढ़ जाती है. साथ ही गर्मी और उमस के चलते बोतलबंद पानी, बर्फ और ग्लूकोज़ की बिक्री भी बढ़ जाती है. ऐसे ही दवा व फल व्यापारियों और छोटी दुकाने चलाने वालों का अनुभव है. आस्था का यह प्रवाह हर वर्ग के व्यापारी गल्ले तक अपनी बूंदें पहुंचा रहा है. कांवड़ यात्रा में पूजा-सामग्री और परिधान बाजारों में भी अलग रौनक है. दुकानदारों के अनुसार महादेव से जुड़े संदेशों वाली भगवा टी-शर्ट, गमछे और वाटरप्रूफ मोबाइल कवर की मांग हर साल की तुलना में इस बार अधिक तेजी से बढ़ी है.&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;अस्सी से पांच सौ रुपये तक की कीमत वाली महादेव के स्लोगन वाली टी-शर्ट्स विशेष रूप से युवा कांवड़ियों में लोकप्रिय है. जलाभिषेक में प्रयुक्त होने वाले सजावटी स्टील कलशों की मांग में भी लगातार बढ़ोतरी देखी जा रही है. ढाबा और खानपान उद्योग को इस यात्रा में सबसे बड़ा लाभ मिल रहा है. सामान्य दिनों में जो श्रमिक छोटी-मोटी दिहाड़ी पर निर्भर रहता है, वहीं कांवड़ यात्रा के दौरान ढाबों पर काम करके छह सौ रुपये तक प्रतिदिन कमा लेता है. साथ ही उसे दो वक्त का भरपेट भोजन भी सहज उपलब्ध हो जाता है. परिवहन क्षेत्र भी इसी अनुपात में सक्रिय होता है. मुजफ्फरनगर डिपो से ही हरिद्वार मार्ग पर साठ रोडवेज बसों का नियमित संचालन होता है और यात्रा के मौसम में इस संख्या को और बढ़ाने की योजना पर काम किया जाता है, ताकि लाखों श्रद्धालुओं को कोई असुविधा न हो. यह पूरा तंत्र दर्शाता है कि एक धार्मिक आयोजन किस तरह परिवहन निगम से लेकर अंतिम पंक्ति के मजदूर तक, हर स्तर पर रोज़गार की एक श्रृंखला खड़ी कर देता है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;श्रद्धालुओं की सुरक्षा और व्यापार की निरंतरता के बीच एक संतुलित व्यवस्था जरूरी है. योगी सरकार का सुनियोजित माइक्रो प्लान इस विशाल अस्थायी अर्थव्यवस्था को दिशा देने का काम करता है. यह एक ऐसा खाका है जो आस्था और आर्थिकी दोनों को साथ लेकर चलता है. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अधिकारियों को कांवड़ मार्गों पर मांस और शराब की दुकानें बंद रखने, खान-पान की दुकानों पर फूड लाइसेंस व रजिस्ट्रेशन सर्टिफिकेट स्पष्ट रूप से प्रदर्शित करने और डीजे की ध्वनि को निर्धारित मानकों में रखने के स्पष्ट निर्देश दिए हैं. यह व्यवस्था को सुचारू रूप देने के लिए है. प्रतिबंध के साथ ही सरकार का सुविधाओं के विस्तार पर भी जोर है.&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;अब कांवड़ यात्रा एक संगठित, सुरक्षित और आर्थिक रूप से उत्पादक आयोजन के रूप में बदला सुनियोजित मॉडल है. यह मॉडल उत्तर प्रदेश सरकार के उस व्यापक धार्मिक पर्यटन दृष्टिकोण का ही एक विस्तार है, जिसके अंतर्गत 'विजिट माय स्टेट' अभियान के तहत सुगम दर्शन योजना जैसी पहल के माध्यम से अयोध्या, नैमिषारण्य, चित्रकूट और विंध्याचल जैसे धार्मिक केंद्रों को नियमित वीकेंड यात्रा पैकेजों से जोड़ा गया है. कांवड़ यात्रा के साथ ही उत्तर प्रदेश उस बड़े लक्ष्य से भी गहराई से जुड़ता है, जिसके तहत राज्य को एक ट्रिलियन डॉलर अर्थव्यवस्था बनाने का संकल्प लिया गया है.&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;कांवड़ यात्रा जैसे आयोजनों से बिना किसी बड़े पूंजीगत निवेश के, केवल जन आस्था और सुव्यवस्थित प्रशासनिक तंत्र के बल पर भी हजारों करोड़ रुपये का आर्थिक चक्र गतिमान किया जा सकता है. छोटे दुकानदार, फुटकर विक्रेता, ढाबा मालिक, परिवहन संचालक और असंगठित क्षेत्र के मजदूर, इन सभी तक यह लाभ पहुंचता है. धार्मिक पर्यटन का यह मॉडल केवल बड़े निवेशकों के लिए नहीं, बल्कि समाज की अंतिम पंक्ति तक समृद्धि पहुंचाने का माध्यम बन सकता है, कांवड़ यात्रा इसका उदाहरण बन चुकी है. जब सरकार का सुव्यवस्थित माइक्रो प्लान आस्था को सुरक्षा और सुविधा का संबल देता है, तो यह प्रवाह और भी शक्तिशाली होकर समाज के हर वर्ग तक पहुंचता है. यही आस्था और अर्थ के इस अनूठे संगम की सबसे बड़ी विशेषता है.&lt;/p&gt;]]></description><slash:comments>0</slash:comments><media:thumbnail url="https://feeds.abplive.com/onecms/images/uploaded-images/2026/08/10/92721d2f4792c9aa3d5cb0ca4adeebc81786383459532708_original.jpg" width="220"/></item><item><title><![CDATA[कांवड़ यात्राः समावेशी हिंदू समाज का नव-जागरण]]></title><link>https://www.abplive.com/blog/kanwar-yatra-2026-lord-shiva-resurgence-of-inclusive-hindu-society-3172050</link><comments>https://www.abplive.com/blog/kanwar-yatra-2026-lord-shiva-resurgence-of-inclusive-hindu-society-3172050#respond</comments><pubDate>Fri, 7 Aug 2026 20:08:12 +0530 </pubDate><dc:creator><![CDATA[ एबीपी लाइव ]]></dc:creator><category><![CDATA[  ]]></category><guid isPermaLink="true">https://www.abplive.com/blog/kanwar-yatra-2026-lord-shiva-resurgence-of-inclusive-hindu-society-3172050</guid><description><![CDATA[&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;भगवान शिव को जलार्पण का अभीष्ट लेकर निकले कांवड़ियों के समूह को आंखें बंद कर आत्मसात कीजिए. श्रद्धा-आस्था की वह धारा दिखेगी जो प्रयागराज के महाकुंभ में दिखाई देती है, अयोध्या में भगवान रामलला के मंदिर परिसर में दिखाई देती है, बांके बिहारी मंदिर प्रांगण में नजर आती है और काशी विश्वनाथ कारिडोर में दिखाई देती है. हिंदू समाज की आंतरिक समरसता, सर्वसमावेशिता और सांस्कृतिक पुनर्जागरण का अद्भुत दृश्य वर्तमान में कांवड़ मार्गों पर सजीव है. सदियों पुरानी सामाजिक सीमाएं और असमानताएं आस्था के पावन जल में विसर्जित हो चुकी हैं. कांवड़ियों की भीड़ में कोई ब्राह्मण है, कोई दलित, कोई ओबीसी तो कोई आदिवासी.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;कंधे पर बंधी कांवड़ किसी की जाति नहीं पूछती. रास्ते के भंडारे किसी की कुल-गोत्र जांच के बाद प्रसाद नहीं बांटते. यह कांवड़ यात्रा के रूप में भारत के सामाजिक अवचेतन का एक जीवंत मानचित्र है और उत्तर प्रदेश इसका प्रतिनिधि राज्य है. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में यह राज्य समावेशी हिंदू समाज के नव-जागरण का प्रतीक हो चला है.&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&lt;br /&gt;हिंदुत्व की सामाजिक-सांस्कृतिक व्याख्या करने वाले विचारक कांवड़ यात्रा को हिंदू समाज की भीतरी समावेशिता के प्रमाण के रूप में देखते हैं और इसका आधार यात्रा में दलितों और पिछड़ों की बढ़ती भागीदारी है. संस्कृतिकरण और सांस्कृतिक वर्चस्व की धारणाओं को यह यात्रा व्यवहार के धरातल पर एक नई व्याख्या प्रदान करती है. यह यात्रा सिद्ध करती है कि सनातन संस्कृति में ईश्वर की भक्ति हर उस आत्मा का सहज अधिकार है जो शिवत्व में विलीन होना चाहती है. शिव तो देव, दानव, मानव, भूत, पिशाच, सबके 'विश्वनाथ' और 'भोलेनाथ' हैं.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;शिव विष को अपने कंठ में धारण कर जगत् की रक्षा करते हैं और औघड़दानी बनकर अपने हर भक्त पर समान रूप से अनुकंपा बरसाते हैं. कांवड़ मार्ग पर चलने वाला हर व्यक्ति 'भोले का भक्त' है. वहां उसकी कोई सामाजिक, आर्थिक या जातीय पहचान नहीं रह जाती. समाज के विभिन्न वर्गों के लोग कंधे से कंधा मिलाकर चलते हैं, तो सामाजिक असमानता की दीवारें अपने आप ढहने लगती हैं.&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&lt;br /&gt;दलित और पिछड़ा वर्ग, जो पूर्व में कई सामाजिक और सांस्कृतिक अवसरों से वंचित रहा, आज इस यात्रा की रीढ़ है तो इसके पीछे एक बड़ा कारण यह है कि योगी सरकार ने उन्हें समावेशी सम्मान का हकदार माना है. सनातन परंपरा के प्रति उनका अटूट विश्वास और अपने सांस्कृतिक अधिकारों पर उनके सहज दावे की स्वीकृति का यह बड़ा धरातल है. यह इस पूर्वाग्रह को खारिज करता है कि भारत में सांस्कृतिक और धार्मिक प्रतीक उच्च जातियों के वर्चस्व को बनाए रखने के साधन रहे हैं.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;जब लाखों की संख्या में वंचित और पिछड़े वर्ग के युवा शिवभक्ति के इस महायज्ञ का मुख्य ध्वजवाहक बनते हैं, तो वे सिद्ध करते हैं कि सनातन धर्म का वास्तविक ढांचा वर्चस्व पर नहीं, बल्कि सहअस्तित्व और भ्रातृत्व पर आधारित है. भक्ति आंदोलन के दौर में संत कबीर, संत रविदास, संत चोखामेला और संत कनकदास ने जिस आध्यात्मिक समता की अलख जगाई थी, वही अलख आज कांवड़ यात्रा के रूप में सड़कों पर साकार होती दिखाई देती है और समाज के अंतिम व्यक्ति के भीतर स्वाभिमान, गौरव और एकता की अनुभूति जाग्रत करती है.&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&lt;br /&gt;हम इसे सनातन समाज के वास्तविक ऐश्वर्य की संज्ञा दे सकते हैं जो प्रशासनिक इच्छाशक्ति, राज्य का संरक्षण और एक अनुकूल वातावरण से संभव होता है. उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व वाली सरकार ने कांवड़ यात्रा को भव्य, सुरक्षित और गौरवमयी 'सांस्कृतिक उत्सव' का रूप दिया है तो यह ऐश्वर्य दिखाई दे रहा है. अब से दस साल पहले की बात करें तो राज्य के स्तर पर कांवड़ यात्रा को उपेक्षा, प्रशासनिक बाधाओं, सुरक्षा के खतरों और संदेह की दृष्टि से देखा जाता था. योगी सरकार ने इस दृष्टिकोण को पूरी तरह से बदला है.&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&lt;br /&gt;सरकार ने यह स्पष्ट संदेश दिया कि आस्था का सम्मान करना और प्रत्येक नागरिक को अपनी धार्मिक परंपराओं को सुरक्षित व सम्मानजनक वातावरण में जीने का अवसर देना सरकार का प्राथमिक दायित्व है. कांवड़ मार्गों पर पुष्पवर्षा का जो दृश्य पिछले कुछ वर्षों में उभरा है, वह राज्य द्वारा अपने नागरिकों की आस्था को दिया गया बड़ा सम्मान है. जब हेलीकॉप्टर से कांवड़ियों पर फूल बरसाए जाते हैं, तो यह दृश्य पूरे समाज के मन में एक नया आत्मविश्वास और गौरव भर देता है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;कांवड़ यात्रा के सुचारु संचालन के लिए की गई व्यापक व्यवस्थाएं, जैसे सुरक्षित और स्वच्छ मार्ग, चिकित्सा शिविर, विश्राम स्थल, प्रकाश व्यवस्था, और कांवड़ियों के भोजन-पानी के लिए उचित प्रबंध यह दर्शाते हैं कि योगी सरकार अध्यात्म को सामाजिक सशक्तीकरण और समरसता का माध्यम मानती है. कांवड़ मार्गों पर लगने वाले सेवा शिविरों में जो सेवा भावना दिखाई देती है, वह समाज के भीतर से छुआछूत, ऊंच-नीच और वैमनस्य के भाव को जड़ से समाप्त कर देती है.&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&lt;br /&gt;सामाजिक असमानता को दूर करने के लिए आर्थिक या राजनीतिक प्रयास तब तक पर्याप्त नहीं होते, &amp;nbsp;जब तक सांस्कृतिक और आध्यात्मिक धरातल पर बराबरी का अहसास न हो. कांवड़ यात्रा इसी आध्यात्मिक समता का व्यावहारिक मंच है. योगी सरकार ने इस मंच को जो भव्यता, सुरक्षा और सम्मान प्रदान किया है, उससे समाज के शोषित और वंचित वर्गों के भीतर सनातन धर्म के प्रति नया स्वाभिमान पैदा हुआ है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;कांवड़ यात्रा का यह विहंगम स्वरूप भारत की उस आंतरिक शक्ति का दर्शन कराता है जो विविधता में एकता और समरसता में ही अपना प्राण देखती है. यह यात्रा उन ताकतों को भी जवाब है जो समाज को जातियों में बांटकर अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकना चाहती हैं. संस्कृतिकरण की यह धारा समस्त हिंदू समाज के एक साथ मिलकर उठ खड़े होने का पर्याय है. यह सनातन समाज को उसकी वास्तविक पहचान 'वसुधैव कुटुंबकम' और 'सर्वे भवंतु सुखिनः' की ओर ले जा रही है.&lt;/p&gt;]]></description><slash:comments>0</slash:comments><media:thumbnail url="https://feeds.abplive.com/onecms/images/uploaded-images/2026/08/07/edc31ee7bd2847e01aa8d801591ee3851786113310864708_original.jpg" width="220"/></item><item><title><![CDATA[Gen-Z के गुस्से से बेचैन क्यों हैं राजनीतिक दल?]]></title><link>https://www.abplive.com/blog/gen-z-youth-movement-jobs-exams-indian-politics-2029-3172038</link><comments>https://www.abplive.com/blog/gen-z-youth-movement-jobs-exams-indian-politics-2029-3172038#respond</comments><pubDate>Fri, 7 Aug 2026 19:36:52 +0530 </pubDate><dc:creator><![CDATA[ Hirdesh Kumar Singh ]]></dc:creator><category><![CDATA[  ]]></category><guid isPermaLink="true">https://www.abplive.com/blog/gen-z-youth-movement-jobs-exams-indian-politics-2029-3172038</guid><description><![CDATA[&lt;h4 style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;em&gt;युवाओं की बेचैनी को केवल सोशल मीडिया अभियान से शांत नहीं किया जा सकता. परीक्षा की विश्वसनीयता, रोजगार की गुणवत्ता और संस्थागत जवाबदेही पर ठोस सुधार नहीं हुए तो इसका असर विद्यार्थियों के भविष्य से लेकर 2029 के चुनावी समीकरण तक दिखाई देगा.&lt;/em&gt;&lt;/h4&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;भारत के कोचिंग सेंटरों, विश्वविद्यालयों और भर्ती केंद्रों में सुलगती बेचैनी को केवल 'पेपर लीक' की तात्कालिक प्रतिक्रिया मानना एक बड़ी भूल होगी. प्रश्नपत्र लीक होने की घटना ने तो महज एक चिंगारी का काम किया है, इसके नीचे बेरोजगारी, शिक्षा के व्यवसायीकरण और टूटते भरोसे का बारूद सालों से जमा हो रहा था.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;यह संकट हर उस परिवार से जुड़ा है, जिसका बच्चा किसी प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी कर रहा है. यह उन अभिभावकों का भी प्रश्न है, जो कॉलेज की फीस पर अपनी बचत खर्च कर रहे हैं. डिग्री के बाद नौकरी खोज रहे युवाओं पर इसका सीधा असर है. बिना सामाजिक सुरक्षा के काम कर रहे गीग वर्कर भी इससे अलग नहीं हैं.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;पेपर लीक के बाद शुरू हुआ विरोध जल्द ही देशव्यापी आंदोलन में बदल गया. छात्र सड़कों पर उतरे. सोशल मीडिया ने अलग-अलग राज्यों के युवाओं को जोड़ा. विपक्ष ने संसद में सरकार को घेरा. आखिरकार केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को इस्तीफा देना पड़ा.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;इसके बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने परीक्षा व्यवस्था में बदलाव के लिए नंदन नीलेकणि के नेतृत्व में टास्क फोर्स बनाने की घोषणा की. सरकार ने नई व्यवस्था को सुरक्षित और पारदर्शी बनाने का भरोसा भी दिया.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;लेकिन मंत्री का इस्तीफा समाधान नहीं है. टास्क फोर्स की घोषणा भी केवल पहला कदम है. असली सवाल यह है कि व्यवस्था कब बदलेगी. जिम्मेदारी किसकी तय होगी. छात्र को हुए नुकसान की भरपाई कौन करेगा.&lt;/p&gt;
&lt;h3 style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;पेपर लीक नहीं, भरोसे का संकट&lt;/h3&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;भारत में प्रतियोगी परीक्षा केवल योग्यता जांचने का माध्यम नहीं है. गरीब और मध्यमवर्गीय परिवारों के लिए यह सामाजिक प्रगति का रास्ता है. परिवार अपनी बचत लगाता है. छात्र कई वर्ष तैयारी करता है. बदले में वह केवल निष्पक्ष अवसर चाहता है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;इसे राज्य और नागरिक के बीच सामाजिक अनुबंध कहा जाता है. इसका अर्थ है कि छात्र नियम माने और व्यवस्था उसकी मेहनत के साथ न्याय करे. पेपर लीक होने पर यही अनुबंध टूटता है. इसीलिए पेपर लीक प्रश्नपत्र से पहले व्यवस्था की विश्वसनीयता लीक करता है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;छात्र दोबारा परीक्षा दे सकता है. बीता हुआ समय वापस नहीं मिलता. परिवार को यात्रा, आवास और कोचिंग पर फिर पैसा खर्च करना पड़ता है. कई अभ्यर्थी आयु सीमा के करीब पहुंच जाते हैं. कुछ पर नौकरी खोजने और घर संभालने का दबाव बढ़ जाता है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;हर स्थगित परीक्षा के साथ किसी युवा का जीवन भी कुछ समय के लिए स्थगित हो जाता है. इसलिए केवल मुफ्त पुनर्परीक्षा पर्याप्त नहीं है. छात्रों को उचित मुआवजा भी मिलना चाहिए. जांच की समयसीमा तय होनी चाहिए. जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका सार्वजनिक की जानी चाहिए.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;कानून अपराधी को दंड दे सकता है. वह अपने आप सुरक्षित परीक्षा नहीं करा सकता. इसके लिए पूरी प्रक्रिया का स्वतंत्र ऑडिट चाहिए. ऑडिट का अर्थ है व्यवस्था की निष्पक्ष और विस्तृत जांच.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;प्रश्नपत्र किसने तैयार किया. डेटा तक किसकी पहुंच थी. सुरक्षा की जांच किसने की. गड़बड़ी की सूचना मिलने के बाद कार्रवाई क्यों नहीं हुई. इन सवालों का जवाब सार्वजनिक होना चाहिए.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;टास्क फोर्स की सफलता बैठकों की संख्या से नहीं मापी जा सकती. उसकी रिपोर्ट सार्वजनिक होनी चाहिए. सिफारिशों पर कार्रवाई की तारीख भी बतानी चाहिए. तकनीक तभी भरोसा बढ़ाएगी, जब उस पर सार्वजनिक निगरानी होगी.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;भर्ती के लिए वार्षिक कैलेंडर भी जरूरी है. इसमें विज्ञापन, परीक्षा, परिणाम और नियुक्ति की संभावित तारीखें हों. तारीख बदलने पर संबंधित विभाग लिखित कारण बताए. इससे अभ्यर्थी अपने करियर की योजना बना सकेगा.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;इस सुधार का लाभ केवल आंदोलन कर रहे छात्रों को नहीं मिलेगा. NEET, SSC, रेलवे, बैंकिंग, UPSC और राज्य भर्ती की तैयारी करने वाला हर अभ्यर्थी इससे प्रभावित होगा.&lt;/p&gt;
&lt;h3 style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;डिग्री बढ़ी, पर सम्मानजनक रोजगार कहां है?&lt;/h3&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;परीक्षा को लेकर पैदा हुआ गुस्सा रोजगार की चिंता से जुड़ा है. छात्र वर्षों तक सरकारी नौकरी की तैयारी इसलिए भी करता है, क्योंकि उसके सामने दूसरे सुरक्षित विकल्प कम हैं. निजी क्षेत्र में कम वेतन और अस्थिरता इस आकर्षण को बढ़ाती है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;भारत की समस्या केवल बेरोजगारी नहीं है. खराब रोजगार भी उतनी ही बड़ी चुनौती है. बहुत से शिक्षित युवा काम कर रहे हैं, लेकिन उनका वेतन योग्यता के अनुसार नहीं है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;इसे अल्प-रोजगार कहा जाता है. इसका अर्थ है कि व्यक्ति के पास काम तो है, लेकिन उसकी क्षमता का पूरा उपयोग नहीं हो रहा. इंजीनियर असंबंधित क्षेत्र में काम कर सकता है. स्नातकोत्तर युवा ऐसा काम कर सकता है, जिसके लिए उसकी डिग्री की जरूरत ही नहीं थी.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;ILO और Institute for Human Development की India Employment Report 2024 के अनुसार 2022 में भारत के कुल बेरोजगारों में युवाओं की हिस्सेदारी लगभग 82.9 प्रतिशत थी. यह युवा बेरोजगारी दर नहीं है. इसका अर्थ है कि देश के सभी बेरोजगारों में युवाओं का हिस्सा बहुत बड़ा था.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;यह अंतर समझना जरूरी है. गलत व्याख्या आंकड़े को सनसनीखेज बनाती है. सही व्याख्या संकट का स्वरूप समझाती है. भारत के रोजगार संकट का सबसे भारी बोझ युवा उठा रहे हैं.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;भारत की बड़ी युवा आबादी को जनसांख्यिकीय लाभांश कहा जाता है. इसका अर्थ है कि काम करने वाली आबादी अधिक हो तो अर्थव्यवस्था तेजी से बढ़ सकती है. लेकिन यह लाभ अपने आप नहीं मिलता. इसके लिए अच्छी शिक्षा, कौशल और पर्याप्त रोजगार चाहिए.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;नौकरी न मिलने पर यही लाभ जनसांख्यिकीय निराशा में बदल सकता है. तब युवा आबादी आर्थिक शक्ति बनने के बजाय सामाजिक असंतोष का स्रोत बन जाती है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;इसलिए सरकारों को केवल नौकरियों की संख्या नहीं बतानी चाहिए. उन्हें क्षेत्र, योग्यता, वेतन और समयसीमा भी बतानी होगी. नौकरी मिलना पर्याप्त नहीं है. उसका सम्मानजनक और सुरक्षित होना भी जरूरी है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;AI और ऑटोमेशन ने इस चिंता को बढ़ाया है. AI हर नौकरी समाप्त नहीं करेगा. वह काम करने का तरीका जरूर बदलेगा. इसे तकनीकी विस्थापन कहते हैं. यानी मशीन पूरे पेशे के बजाय उसके कुछ कार्य अपने हाथ में लेती है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;नई तकनीक कुछ काम कम करेगी. वह नए अवसर भी बनाएगी. इसलिए बड़ा खतरा केवल AI नहीं है. बड़ा खतरा वह कौशल है, जो समय के साथ उपयोगी नहीं रहता.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;कौशल विकास की सफलता प्रशिक्षण पाने वालों की संख्या से नहीं मापी जानी चाहिए. यह देखना चाहिए कि प्रशिक्षण के बाद कितने युवाओं को काम मिला. उनका वेतन कितना बढ़ा. कितने लोग छह महीने बाद भी उसी रोजगार में बने रहे.&lt;/p&gt;
&lt;h3 style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;महंगी शिक्षा, गीग वर्क और मानसिक दबाव&lt;/h3&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;रोजगार संकट का दूसरा सिरा कॉलेजों तक जाता है. उच्च शिक्षा में नामांकन बढ़ना अच्छी बात है. लेकिन कॉलेज में प्रवेश अपने आप अच्छी शिक्षा या नौकरी की गारंटी नहीं देता.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;कई निजी कॉलेज अपने सबसे बड़े प्लेसमेंट पैकेज का प्रचार करते हैं. इससे पूरे बैच की वास्तविक स्थिति सामने नहीं आती. एक छात्र को बड़ा पैकेज मिल सकता है. उसी बैच के अधिकतर छात्र कम वेतन पर या बिना नौकरी के रह सकते हैं.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;हर कॉलेज को सत्यापित रोजगार रिपोर्ट जारी करनी चाहिए. इसमें कुल छात्रों की संख्या हो. वास्तविक प्लेसमेंट प्रतिशत बताया जाए. औसत वेतन और सामान्य वेतन की जानकारी मिले. इससे अभिभावक विज्ञापन के बजाय आंकड़ों के आधार पर कॉलेज चुन सकेंगे.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;शिक्षा का बढ़ता खर्च भी राजनीतिक प्रश्न है. कमजोर सार्वजनिक संस्थान छात्रों को महंगे निजी कॉलेजों की ओर धकेलते हैं. वहां फीस अधिक हो सकती है, लेकिन परिणाम की कोई गारंटी नहीं होती. इससे परिवार पर कर्ज और युवा पर मानसिक दबाव बढ़ता है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;युवा रोजगार का एक बड़ा हिस्सा गीग इकॉनमी में भी है. गीग इकॉनमी का अर्थ है ऐप या छोटे अनुबंध के जरिए किया जाने वाला अस्थायी काम. डिलीवरी पार्टनर, कैब चालक और फ्रीलांसर इसके प्रमुख उदाहरण हैं.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;ये युवा बेरोजगार नहीं हैं. फिर भी उनका भविष्य सुरक्षित नहीं है. बीमार होने पर आमदनी रुक सकती है. दुर्घटना होने पर परिवार संकट में आ सकता है. ऐप से अकाउंट बंद हुआ तो काम तुरंत छिन सकता है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;इन्हें नियमित कर्मचारी जैसी पेंशन, स्वास्थ्य बीमा या भुगतान वाली छुट्टी भी नहीं मिलती. इसलिए गीग वर्कर्स के लिए पोर्टेबल सामाजिक सुरक्षा जरूरी है. इसका अर्थ है कि श्रमिक प्लेटफॉर्म बदले, लेकिन बीमा और पेंशन उसके साथ बने रहें.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;इसका खर्च केवल श्रमिक पर नहीं डाला जा सकता. सरकार, डिजिटल प्लेटफॉर्म और कर्मचारी को मिलकर योगदान देना होगा. ऐसी व्यवस्था करोड़ों युवाओं की आर्थिक सुरक्षा बदल सकती है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;रोजगार और परीक्षा की अनिश्चितता मानसिक स्वास्थ्य को भी प्रभावित करती है. लगातार देरी चिंता बढ़ाती है. बार-बार रद्द भर्ती आत्मविश्वास तोड़ती है. परिवार का कर्ज दबाव को और गंभीर बनाता है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;इसे संस्थागत तनाव कहा जा सकता है. इसका अर्थ है कि व्यक्ति की परेशानी केवल निजी कमजोरी से पैदा नहीं होती. व्यवस्था की अनिश्चितता भी उसका कारण बनती है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;इसलिए काउंसलिंग जरूरी है, लेकिन पर्याप्त नहीं. परीक्षा समय पर कराना भी मानसिक स्वास्थ्य नीति का हिस्सा है. पारदर्शी भर्ती और कम आर्थिक अनिश्चितता कई युवाओं को गहरे तनाव से बचा सकती है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;जलवायु परिवर्तन का सवाल भी जीवन की गुणवत्ता से जुड़ा है. जेन-जी प्रदूषण, भीषण गर्मी और जल संकट को दूर की समस्या नहीं मानती. परीक्षा केंद्रों की खराब व्यवस्था, प्रदूषित शहर और असुरक्षित सार्वजनिक परिवहन उसके रोजमर्रा के अनुभव हैं.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;इसलिए हरित रोजगार, स्वच्छ हवा, पानी और सुरक्षित शहर भी युवा राजनीति का हिस्सा बनेंगे. रोजगार और पर्यावरण को अलग-अलग मुद्दे मानने वाली राजनीति नई पीढ़ी की चिंता पूरी तरह नहीं समझ पाएगी.&lt;/p&gt;
&lt;h3 style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;जेन-जी के पास अपना मीडिया भी है&lt;/h3&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;पिछली पीढ़ियों को अपनी बात बड़े स्तर पर पहुंचाने के लिए अखबार, टीवी चैनल या राजनीतिक संगठन की जरूरत पड़ती थी. जेन-जी की यह निर्भरता काफी कम हो गई है. उसके हाथ का स्मार्टफोन ही कैमरा, स्टूडियो और प्रसारण केंद्र बन चुका है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;इंस्टाग्राम रील, यूट्यूब शॉर्ट्स, पॉडकास्ट और स्वतंत्र डिजिटल चैनल उसके नए मीडिया हैं. व्हाट्सएप, टेलीग्राम और डिस्कॉर्ड उसके संगठन के साधन हैं. एक छात्र परीक्षा केंद्र का वीडियो बनाकर कुछ ही मिनटों में लाखों लोगों तक पहुंचा सकता है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;इसे न्यू मीडिया कहा जाता है. इसका अर्थ है ऐसी डिजिटल व्यवस्था, जिसमें यूजर केवल समाचार देखता नहीं है. वह उसे बनाता, जांचता और आगे भी पहुंचाता है. यहां दर्शक और पत्रकार के बीच की पुरानी सीमा कमजोर हो जाती है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;जेन-जी के पास केवल अपनी आवाज नहीं है. उसके पास अपना कैमरा, अपना मंच और अपनी ऑडियंस भी है. यही कारण है कि उसे अपनी समस्या उठाने के लिए हमेशा किसी बड़े एंकर या राजनीतिक प्रवक्ता की जरूरत नहीं पड़ती.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;वह अपना अनुभव रिकॉर्ड करती है. दस्तावेज दिखाती है. हैशटैग चलाती है. दूसरे छात्रों को जोड़ती है. स्थानीय शिकायत इसी रास्ते से राष्ट्रीय मुद्दा बन सकती है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;जेन-जी के आंदोलन अक्सर किसी एक नेता पर निर्भर नहीं होते. इन्हें नेटवर्क आधारित आंदोलन कहा जाता है. लोग सोशल मीडिया और मैसेजिंग ग्रुप के जरिए जुड़ते हैं.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;हालिया आंदोलन में &amp;lsquo;कॉकरोच जनता पार्टी&amp;rsquo; यानी CJP इसी तरह उभरी. इसके प्रमुख अभिजीत दीपके ने फिलहाल चुनाव लड़ने के बजाय सामाजिक आंदोलन जारी रखने की बात कही.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;यह मॉडल तेजी से लोगों को जोड़ता है. लेकिन इसकी सीमा भी है. सरकार बातचीत किससे करे. समझौता स्वीकार करने का अधिकार किसके पास हो. आंदोलन के बाद संगठन और एजेंडा कैसे बचे. इन सवालों का आसान उत्तर नहीं मिलता.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;किसी एक नेता का न होना आंदोलन की शक्ति है. बाद में वही उसकी कमजोरी बन सकता है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;परंपरागत मीडिया में संपादक तय करता है कि कौन-सी खबर प्रमुख होगी. न्यू मीडिया में यह भूमिका कई बार एल्गोरिदम निभाता है. एल्गोरिदम वह तकनीकी व्यवस्था है, जो यूजर की पसंद के आधार पर सामग्री आगे बढ़ाती है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;इससे छोटी आवाज तेजी से बड़ी हो सकती है. लेकिन सबसे सच्ची बात के बजाय सबसे भावुक वीडियो भी वायरल हो सकता है. वीडियो गड़बड़ी का प्रमाण बन सकता है. वही वीडियो अधूरा काटकर भ्रम भी फैला सकता है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;Reuters Institute की Digital News Report 2026 के भारतीय सर्वे में 58 प्रतिशत उत्तरदाताओं ने ऑनलाइन गलत सूचना पर चिंता जताई. केवल 39 प्रतिशत ने कहा कि वे ज्यादातर समाचारों पर अधिकतर समय भरोसा करते हैं.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;इसलिए डिजिटल पहुंच अपने आप राजनीतिक समझदारी नहीं बनाती. जेन-जी को मीडिया साक्षरता भी चाहिए. इसका अर्थ है किसी सूचना का स्रोत, संदर्भ और प्रमाण जांचने की क्षमता.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;युवाओं के इस मिज़ाज को राजनीतिक दल भी अब गहराई से समझ रहे हैं. हालिया प्रदर्शनों के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा की डिजिटल रणनीति में बड़ा बदलाव दिखा. इंस्टाग्राम जैसे प्लेटफॉर्म्स पर अब ज़्यादा स्वाभाविक और सीधे दिल को छूने वाले वीडियो सामने आ रहे हैं, जहां युवाओं की भाषा, ट्रेंड्स और पॉपुलर कल्चर के ज़रिए उनसे जुड़ने की कोशिश की जा रही है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;लेकिन बेहतर संवाद और बेहतर शासन एक बात नहीं हैं. रील युवाओं तक पहुंच सकती है. वह पेपर लीक नहीं रोक सकती. पुरानी राजनीति मीडिया के जरिए युवाओं से बोलती थी. अब युवा उसी मीडिया से राजनीति को जवाब दे रहा है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;डिजिटल चुनावी प्रचार में पारदर्शिता भी जरूरी है. किस इन्फ्लुएंसर को भुगतान हुआ. कौन-सा वीडियो AI से बनाया गया. किस समूह को कौन-सा विज्ञापन दिखाया गया. मतदाता को इन सवालों का जवाब मिलना चाहिए.&lt;/p&gt;
&lt;h3 style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;पहचान, प्रतिनिधित्व और 2029 की परीक्षा&lt;/h3&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;सोशल मीडिया ने जाति और धर्म की राजनीति समाप्त नहीं की है. कई बार उसने पहचान को और मजबूत किया है. एक जैसी विचारधारा वाली सामग्री बार-बार दिखने पर दूसरी राय के लिए जगह कम हो जाती है. इसे डिजिटल ध्रुवीकरण कहा जाता है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;इसलिए जेन-जी को जाति और धर्म से पूरी तरह मुक्त पीढ़ी मानना गलत होगा. युवा अपनी सामाजिक पहचान भी रखता है. साथ ही रोजगार और सम्मान की मांग भी करता है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;वह अपने समुदाय का प्रतिनिधित्व चाहता है. वह निष्पक्ष परीक्षा भी चाहता है. वह सांस्कृतिक मुद्दे से प्रभावित हो सकता है. फिर भी बेरोजगारी पर सरकार से नाराज रह सकता है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;युवा पहचान नहीं छोड़ रहा. वह पहचान से आगे अपना भविष्य भी देख रहा है. आने वाली राजनीति में अस्मिता और आकांक्षा साथ चलेंगी. सफल दल वही होगा, जो दोनों को परिणाम से जोड़ सकेगा.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;चुनाव आयोग के अनुसार 2024 के लोकसभा चुनाव में 18 से 29 वर्ष के मतदाता कुल मतदाताओं का 22.78 प्रतिशत थे. यह हिस्सा किसी भी बड़े चुनाव पर प्रभाव डाल सकता है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;लेकिन जेन-जी कोई एक जैसा वोट बैंक नहीं है. महानगर का टेक कर्मचारी और बिहार का भर्ती अभ्यर्थी अलग परिस्थितियों में रहते हैं. गांव की युवती और गीग वर्कर की प्राथमिकताएं भी अलग हो सकती हैं.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;भाजपा के पास मजबूत संगठन है. प्रधानमंत्री मोदी की युवाओं में व्यक्तिगत अपील भी रही है. राष्ट्रवाद, कल्याणकारी योजनाएं, स्टार्टअप और डिजिटल इंडिया ने उसकी युवा राजनीति को आकार दिया है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;मौजूदा असंतोष इस मॉडल की परीक्षा ले रहा है. अब आकांक्षा को ठोस परिणाम से जोड़ना होगा. परीक्षा और रोजगार पर भरोसा नहीं लौटा तो संचार की बढ़त कमजोर पड़ सकती है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;कांग्रेस और दूसरे विपक्षी दलों को इससे अवसर मिला है. लेकिन सरकार से नाराज युवा अपने आप विपक्ष के साथ नहीं जाएगा. वह कांग्रेस शासित राज्यों की भर्ती का भी हिसाब मांगेगा.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;समाजवादी पार्टी, राष्ट्रीय जनता दल, तृणमूल कांग्रेस, डीएमके, आम आदमी पार्टी, जन सुराज और दूसरे क्षेत्रीय दलों से भी यही सवाल पूछे जाएंगे. उनके राज्यों में कितने पद खाली हैं. परीक्षाएं समय पर होती हैं या नहीं. कॉलेजों की स्थिति कैसी है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;युवा असंतोष किसी एक दल के खिलाफ स्थायी नहीं रहता. वह सत्ता में बैठे हर दल से जवाब मांगता है. जो दल बेहतर शासन का मॉडल दिखाएगा, वही अधिक विश्वसनीय बनेगा.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;प्रतिनिधित्व पर भी सवाल उठेंगे. दल युवा चेहरे के नाम पर अक्सर राजनीतिक परिवारों के सदस्यों को टिकट देते हैं. केवल कम उम्र का उम्मीदवार युवा प्रतिनिधि नहीं बन जाता.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;वास्तविक प्रतिनिधित्व तब होगा, जब छात्र संगठनों, स्थानीय निकायों और सामान्य परिवारों से आए युवाओं को अवसर मिलेगा. उम्मीदवार चुनने की प्रक्रिया भी पारदर्शी बनानी होगी.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;2029 का लोकसभा चुनाव अभी दूर है. यह कहना जल्दबाजी होगी कि जेन-जी किसी सरकार को बना या गिरा देगी. सोशल मीडिया का समर्थन हमेशा वोट में नहीं बदलता.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;फिर भी हालिया आंदोलन ने एक बदलाव स्पष्ट कर दिया है. युवा अब केवल राजनीतिक संदेश सुनने वाला वर्ग नहीं है. वह अपना नैरेटिव बना सकता है. सरकार पर दबाव डाल सकता है. वह दलों की भाषा और रणनीति भी बदल सकता है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;सरकार को अब ठोस परिणाम देने होंगे. परीक्षा सुरक्षित हो. भर्ती समय पर पूरी हो. गड़बड़ी पर मुआवजा मिले. कॉलेज प्लेसमेंट का सच बताएं. गीग वर्कर्स को सामाजिक सुरक्षा मिले.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;विपक्ष को भी केवल आलोचना से आगे बढ़ना होगा. उसे अपने राज्यों में बेहतर व्यवस्था दिखानी होगी. घोषणापत्र में नौकरी की संख्या के साथ समयसीमा भी देनी होगी.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;यह महज सड़कों पर प्रदर्शन कर रहे कुछ छात्रों की खबर नहीं है, यह हर उस मध्यमवर्गीय परिवार की अंतःकथा है, जो अपने बच्चे की उच्च शिक्षा के लिए अपनी जीवनभर की पूंजी दांव पर लगा देता है. यह पूरी व्यवस्था उस दौर से गुजर रही है जहां एक परीक्षा का नतीजा सीधे रसोई के बजट, फीस, और भविष्य की उम्मीदों को हिला कर रख देता है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;जेन-जी राजनीति को खत्म करने नहीं आई है, वह तो बस दशकों से चले आ रहे खोखले वादों का हिसाब मांगने उतरी है. यदि राजनीतिक दल इसे केवल सोशल मीडिया के 'व्यूज' और 'लाइक' तक सीमित समझते रहे, तो वे युवाओं की भीड़ तो गिन लेंगे, लेकिन उनके भीतर सुलगती बेचैनी को कभी नहीं पढ़ पाएंगे. लोकतंत्र में जब लोगों का यह दर्द लंबे समय तक अनसुना रहता है, तो वह व्यवस्था के भीतर अपना रास्ता खुद तलाश लेता है.&lt;/p&gt;]]></description><slash:comments>0</slash:comments><media:thumbnail url="https://feeds.abplive.com/onecms/images/uploaded-images/2026/08/07/849b47ef4c6b75cd620128ce4016f6a91786110503858257_original.png" width="220"/></item><item><title><![CDATA[Opinion: मिशिगन का चुनावी नतीजा और एपेक की कमजोर होती सियासी पकड़]]></title><link>https://www.abplive.com/blog/israeli-interference-in-american-politics-michigan-us-senate-election-3171425</link><comments>https://www.abplive.com/blog/israeli-interference-in-american-politics-michigan-us-senate-election-3171425#respond</comments><pubDate>Thu, 6 Aug 2026 16:16:37 +0530 </pubDate><dc:creator><![CDATA[ रुमान हाशमी, वरिष्ठ पत्रकार ]]></dc:creator><category><![CDATA[  ]]></category><guid isPermaLink="true">https://www.abplive.com/blog/israeli-interference-in-american-politics-michigan-us-senate-election-3171425</guid><description><![CDATA[&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;अमेरिका की सियासत और एपेक, एक सिक्के के मानों दो पहलु हैं. डेमोक्रेट हो या रिपब्लिक इन पार्टी के नेताओं के राजनितिक चेतना में ये सोंच भीतर तक बैठी हुई थी कि अमेरिकी कांग्रेस में पहुंचने का रास्ता एपेक से होकर गुज़रता है. यानी बिना इजरायली लॉबी के समर्थन के चुनाव नहीं जीता जा सकता, लेकिन मिशिगन के डेमोक्रेटिक सीनेट प्राइमरी ने इस धारणा को जोर का झटका दिया है. प्रोग्रेसिव नेता अब्दुल एल-सैयद ने डेमोक्रेटिक पार्टी के एस्टैब्लिशमेंट की पसंद मानी जा रही हेली स्टीवंस को हरा दिया.&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;यह कोई मामूली चुनाव नहीं था. इस सीट पर अमेरिका के इतिहास के सबसे महंगे प्राइमरी चुनावों में से एक लड़ा गया. AIPAC और उससे जुड़े बाहरी समूहों ने करोड़ों डॉलर के विज्ञापन चलाए, लेकिन नतीजे में उनके हाथ में सिर्फ मायूसी लगी. इस चुनाव ने अमेरिका के राजनेताओं के दिल में ये शक जरूर पैदा कर दिया है कि सिर्फ एपेक के सहारे चुनावी वैतरणी पार करना एक सुरक्षित राजनितिक रणनीति नहीं है. जाहिर है कि ये सिर्फ चुनावी उलटफेर नहीं है, बल्कि अमेरिका की राजनीति में एक बड़े बदलाव की शुरुआत है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;हलांकि यह &amp;nbsp;कहना जल्दबाज़ी होगी कि AIPAC खत्म हो गया या उसका असर समाप्त हो गया, लेकिन इतना तय है कि उसकी राजनीतिक पकड़ अब पहले जैसी निर्विवाद नहीं रह गई है. अब एपेक को भी ये एहसास तो होने ही लगा होगा कि सिर्फ पैसा, टीवी विज्ञापन और लॉबिंग हर चुनाव का नतीजा अब तय नहीं कर रही है. सवाल उठना लाज़िमी है कि इस बदलाव की सबसे वजह क्या है? इस बदलाव की वजह है नई पीढ़ी. पिछले लगभग दो साल से गाजा की तस्वीरें पूरी दुनिया देख रही हैं. हजारों बच्चों और आम नागरिकों की मौत, बर्बाद होते अस्पताल, स्कूल और राहत शिविर, इन सबने अमेरिका के युवाओं के एक बड़े हिस्से की सोच बदल दी है. बहुत से युवा मतदाता अब यह सवाल पूछ रहे हैं कि आखिर अमेरिका बिना शर्त इजरायल का समर्थन क्यों करता है?&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;यही वजह है कि आज डेमोक्रेटिक पार्टी के अंदर एक नया प्रोग्रेसिव धड़ा लगातार मजबूत हो रहा है. डेमोक्रेटिक सेनेटर बर्नी सैंडर्स ने जिस राजनीति की शुरुआत की थी, उसे अब अलेक्जेंड्रिया ओकासियो-कोर्टेज़, अब्दुल एल-सैयद, ज़ोहरान ममदानी और दूसरे युवा नेता आगे बढ़ा रहे हैं. इन नेताओं का फोकस सिर्फ विदेश नीति नहीं है. वे हेल्थकेयर, अमीरों पर टैक्स, मजदूरों के अधिकार, चुनावी फंडिंग में सुधार और कॉरपोरेट लॉबिंग को सीमित करने की भी बात करते हैं, लेकिन गाजा का मुद्दा उनकी पहचान का अहम हिस्सा बन चुका है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;यही बात इस चुनाव को अलग बनाती है. अब्दुल एल-सैयद ने सिर्फ यह नहीं कहा कि वह सीनेटर बनना चाहते हैं. उन्होंने चुनाव के दौरान बार-बार कहा कि &quot;मिशिगन बिकाऊ नहीं है.&quot; उनका सीधा निशाना बाहरी पैसे और चुनावों पर लॉबी के बढ़ते असर पर था. यह संदेश खासकर युवाओं और अरब-अमेरिकी मतदाताओं के बीच काफी लोकप्रिय हुआ. यहां एक और दिलचस्प बात है. कुछ साल पहले तक अमेरिका में कोई नेता अगर इजरायल की खुलकर आलोचना करता था तो उसका राजनीतिक करियर लगभग खत्म माना जाता था, लेकिन आज हालात बदल रहे हैं. अब डेमोक्रेटिक पार्टी के भीतर ऐसे नेताओं की संख्या बढ़ रही है जो खुलकर युद्धविराम, फ़िलिस्तीनियों के अधिकार और अमेरिकी सैन्य सहायता पर सवाल उठा रहे हैं. ये चाहे इजरायल हो या यूक्रेन.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;यानी बहस अब हाशिए पर नहीं रही, मुख्यधारा में पहुंच चुकी है. इसीलिए इंडिपेंडेंट मीडिया, जैसे मेहदी हसन और कई दूसरे विश्लेषक, लंबे समय से यह दलील देते रहे हैं कि गाजा युद्ध ने अमेरिकी राजनीति में एक पीढ़ीगत बदलाव पैदा कर दिया है. सोशल मीडिया पर पली-बढ़ी नई पीढ़ी सिर्फ टीवी विज्ञापन देखकर राय नहीं बनाती. वह अलग-अलग स्रोतों से जानकारी लेती है, वीडियो देखती है, तथ्य जांचती है और फिर फैसला करती है. यही वजह है कि करोड़ों डॉलर के विज्ञापन भी अब वैसा असर नहीं छोड़ पा रहे, जैसा पहले छोड़ते थे, लेकिन तस्वीर का एक दूसरा रूख भी है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;एपेक का असर खत्म हो गया ये मानना जल्दबाज़ी होगी. AIPAC आज भी अमेरिका की सबसे ताकतवर लॉबियों में शामिल है. उसके समर्थित उम्मीदवार कई चुनाव जीतते भी हैं. इसलिए मिशिगन का नतीजा किसी युग के अंत का ऐलान नहीं, बल्कि एक नई राजनीतिक चेतना और बहस और बदलाव की शुरुआत ज़रूर माना जा सकता है. शायद सबसे बड़ा संदेश यही है कि अमेरिकी मतदाता, खासकर युवा, अब पहले से ज्यादा स्वतंत्र होकर वोट दे रहे हैं. वे सिर्फ पार्टी लाइन नहीं देख रहे, बल्कि उम्मीदवार का रूख भी देख रहे हैं.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;विदेश नीति, गाजा, चुनावी फंडिंग और कॉरपोरेट प्रभाव जैसे मुद्दे अब वोटिंग के फैसले को प्रभावित करने लगे हैं. अगर आने वाले महीनों और वर्षों में ऐसे और नतीजे सामने आते हैं, तो यह मानना पड़ेगा कि अमेरिका की राजनीति एक नए दौर में प्रवेश कर चुकी है, जहां चुनाव सिर्फ पैसों से नहीं, बल्कि विचारों से भी जीते जाएंगे. मिशिगन की यह जीत शायद उसी नई कहानी का पहला बड़ा अध्याय है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;[नोट- उपरोक्त दिए गए विचार लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. यह ज़रूरी नहीं है कि एबीपी न्यूज़ ग्रुप इससे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही ज़िम्मेदार है.]&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;]]></description><slash:comments>0</slash:comments><media:thumbnail url="https://feeds.abplive.com/onecms/images/uploaded-images/2026/08/06/7496732e21f40e4da426d8c6207dfb3f1786013109754708_original.jpg" width="220"/></item><item><title><![CDATA[Opinion: गजब होई गवा! Gen Z ने बदल दी विरोध की भाषा]]></title><link>https://www.abplive.com/blog/gen-z-has-changed-protest-language-cjp-delhi-police-jantar-mantar-3169944</link><comments>https://www.abplive.com/blog/gen-z-has-changed-protest-language-cjp-delhi-police-jantar-mantar-3169944#respond</comments><pubDate>Mon, 3 Aug 2026 21:10:45 +0530 </pubDate><dc:creator><![CDATA[ शिवाजी सरकार ]]></dc:creator><category><![CDATA[  ]]></category><guid isPermaLink="true">https://www.abplive.com/blog/gen-z-has-changed-protest-language-cjp-delhi-police-jantar-mantar-3169944</guid><description><![CDATA[&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;गजब होई गवा! इसे अंग्रेजी में कैसे कहेंगे? Amazing? Incredible? Wonderful? शायद इनमें से कोई शब्द इसका असली मजा नहीं पकड़ सकता. भाषा केवल शब्दों का मतलब नहीं होती, उसके पीछे भावना होती है, मिट्टी की खुशबू होती है और बोलने वाले के चेहरे की मुस्कान होती है. जैसे हिंदी की गाली को अंग्रेजी या फ्रेंच में बदल देने से उसका वही असर नहीं रहता, वैसे ही &amp;lsquo;गजब होई गवा&amp;rsquo; का अनुवाद कर दीजिए तो उसकी जान निकल जाती है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;शायद देश की नई पीढ़ी, जिसे हम Gen Z कहते हैं, के इस आंदोलन को समझने के लिए भी यही देसी शब्द सबसे ठीक है-गजब! इस पीढ़ी ने दिखाया है कि आंदोलन का मतलब केवल गुस्सा, पत्थर, हिंसा और गाली नहीं होता. विरोध हंसते हुए भी हो सकता है. सत्ता को सवालों के सामने खड़ा करने के लिए चेहरे पर गुस्सा और हाथ में पत्थर जरूरी नहीं; कभी-कभी एक जोरदार ठहाका भी बहुत कुछ कह देता है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;पुलिस ने आंसू गैस छोड़ी, बच्चों ने पूछा-ये &amp;lsquo;लाफिंग बम&amp;rsquo; है क्या?&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;जंतर-मंतर के आंदोलन की सबसे दिलचस्प तस्वीर शायद यही रही. सामने पुलिस थी, बैरिकेड थे, वाटर कैनन थे, आंसू गैस थी और दूसरी तरफ युवा लड़के-लड़कियां. सामान्य तौर पर ऐसी तस्वीर देखकर मन में डर आता है. लेकिन इस पीढ़ी ने डर की तस्वीर को भी मजाक में बदल दिया. आंसू गैस आई तो मानो सवाल था-ये आंसू गैस है या हमें हंसाने वाला कोई नया बम? पानी की बौछार आई तो युवा ऐसे झूमे जैसे मानसून की पहली बारिश आ गई हो. बैरिकेड हटे तो उन्हें भारी सरकारी लोहे की दीवार समझने के बजाय खिलौने की तरह लिया गया. रस्सियां सामने आईं तो रस्साकशी शुरू हो गई. जिस चीज से डर पैदा होना था, उसी को खेल बना देना शायद इस आंदोलन की सबसे बड़ी ताकत थी. सत्ता के लिए इससे कठिन स्थिति क्या होगी कि वह आपको डराने की कोशिश करे और आप डरने के बजाय मुस्करा दें!&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;&amp;lsquo;हमसे न टकराना, हंसा-हंसाकर सीधा करेंगे&amp;rsquo;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;पटना के एक Gen Z प्रदर्शनकारी की बात इस पूरे आंदोलन का नारा बन सकती है-&amp;ldquo;हमसे न टकराना, हंसा-हंसाकर सीधा करेंगे.&amp;rdquo; सुनने में यह मजाक लगता है, लेकिन इसके भीतर राजनीति का बड़ा संदेश छिपा है. पुरानी राजनीति मानती रही है कि ताकत का जवाब ताकत से दिया जाएगा. लाठी आएगी तो पत्थर आएगा, गुस्सा आएगा तो गाली आएगी. नई पीढ़ी कह रही है-जरूरी नहीं. आप लाठी लेकर आइए, हम हास्य लेकर आएंगे. आप डर पैदा कीजिए, हम उस डर का मजाक बना देंगे. आप हमें गंभीर चेहरों वाली व्यवस्था दिखाइए, हम उसी व्यवस्था के सामने मुस्कराकर पूछेंगे-भाई, इतना गुस्सा क्यों? इस तरह का हास्य केवल मनोरंजन नहीं होता. डर का मजाक बन जाने के बाद डर की ताकत आधी रह जाती है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;&amp;lsquo;चोर-पुलिस&amp;rsquo; का बचपन वाला खेल सड़क पर लौट आया&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;देश के कई शहरों में विरोध की तस्वीरें मानो बचपन के खेलों जैसी दिखाई दीं. कहीं पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच भाग-दौड़, कहीं बैरिकेड के आसपास मजाक, कहीं गीत और कहीं नारे के बीच हंसी. दिल्ली से नागपुर और दूसरे शहरों तक इस आंदोलन का अपना अलग रंग दिखाई दिया, लेकिन यहां एक बात साफ रहनी चाहिए-किसी पुलिसकर्मी को व्यक्तिगत रूप से अपमानित करना इस हास्य का उद्देश्य नहीं होना चाहिए. पुलिस भी इसी समाज का हिस्सा है और कानून-व्यवस्था उसकी जिम्मेदारी है. सवाल उस व्यवस्था और उस बल प्रयोग का है जिसे प्रदर्शनकारी जरूरत से ज्यादा या अनुचित मानते हैं. लोकतंत्र में पुलिस को जनता से लड़ने वाली सेना की तरह नहीं दिखना चाहिए. उसकी जिम्मेदारी व्यवस्था बनाए रखना है और नागरिक की जिम्मेदारी शांतिपूर्ण विरोध करना. जहां दोनों अपनी सीमा समझते हैं, वहीं लोकतंत्र सुंदर लगता है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;राष्ट्रगीत ने जहां लाठी से ज्यादा ताकत दिखाई&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;इस आंदोलन में सबसे असरदार दृश्य वे भी रहे जहां तनाव के बीच युवाओं ने गीत और राष्ट्रीय प्रतीकों का सहारा लिया. कल्पना कीजिए-एक तरफ आगे बढ़ती पुलिस और दूसरी तरफ खड़े युवा अचानक सम्मान के साथ राष्ट्रीय गीत गाने लगें. उस क्षण स्थिति बदल जाती है. जिसे पुलिस &amp;lsquo;भीड़&amp;rsquo; समझ रही थी, वही भीड़ अचानक नागरिकों का समूह दिखाई देने लगती है. यही लोकतंत्र की खूबसूरती है. राष्ट्रीय गीत केवल सरकारी समारोह में बजने वाली धुन नहीं है, वह जनता और राष्ट्र के रिश्ते की याद भी दिलाता है. पुलिस की वर्दी पहनने वाला भी उसी देश का नागरिक है और सामने खड़ा प्रदर्शनकारी भी. ऐसे क्षण दोनों को याद दिलाते हैं कि वे दुश्मन नहीं हैं. एक लोकतंत्र में असहमति युद्ध नहीं होती.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी ने भी एक सीधी बात याद दिलाई&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;27 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी ने आंदोलन और पुलिस कार्रवाई की बहस में एक महत्वपूर्ण बात सामने रखी-केवल आंदोलन हो रहा है, इसलिए लाठीचार्ज नहीं किया जा सकता. यह सुनने में सामान्य बात लगती है, लेकिन लोकतंत्र के लिए इसका अर्थ बहुत बड़ा है. आंदोलन होना अपने आप में अपराध नहीं है. सरकार से सवाल पूछना अपराध नहीं है. सड़क पर उतरना भी कानून के दायरे में नागरिक अधिकार का हिस्सा हो सकता है. हां, हिंसा होगी तो कानून काम करेगा, सार्वजनिक संपत्ति तोड़ी जाएगी तो कार्रवाई होगी. लेकिन शांतिपूर्ण प्रदर्शन को केवल इसलिए बल से खत्म नहीं किया जा सकता कि वह सरकार के लिए असुविधाजनक है. अदालत की यह बात व्यवस्था को याद दिलाती है कि लोकतंत्र में अंतिम मालिक जनता है और सरकार तथा प्रशासन उसी जनता के प्रति जवाबदेह हैं.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;बहुत समय बाद देश के विरोध में हंसी सुनाई दी&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;हमने पिछले कुछ वर्षों में राजनीति को जरूरत से ज्यादा गंभीर, कड़वा और गुस्से से भरा बना दिया है. सोशल मीडिया खोलिए तो कोई किसी को देशद्रोही बता रहा है, कोई भक्त, कोई एजेंट और कोई गद्दार. टीवी बहसों में लोग एक-दूसरे पर चिल्लाते हैं. राजनीति मानो रोज का युद्ध बन गई है. ऐसे माहौल में हंसते हुए प्रदर्शन करते युवा एक अलग तस्वीर पेश करते हैं. शायद देश को इसी हंसी की जरूरत थी. लोकतंत्र केवल गुस्से से नहीं चलता. उसमें गीत भी होना चाहिए, व्यंग्य भी, नाटक भी और हंसी भी. जिस समाज में सत्ता पर हंसा जा सकता है, वहां लोकतंत्र अभी सांस ले रहा होता है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;लड़कियां हंसीं, नाचीं तो उन्हें &amp;lsquo;बेशर्म&amp;rsquo; क्यों कहा जाए?&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;इस आंदोलन में युवा लड़कियों की मौजूदगी और उनका बेफिक्र होकर गीत गाना, नाचना और विरोध करना भी कुछ लोगों को पसंद नहीं आया. उन्हें लेकर अपमानजनक टिप्पणियां की गईं. लेकिन सवाल है-एक लड़की आंदोलन में हंस क्यों नहीं सकती? वह गाना क्यों नहीं गा सकती? क्या विरोध करने के लिए चेहरे पर गुस्सा और आंखों में आंसू जरूरी हैं? भारत की युवा महिलाएं पढ़ रही हैं, नौकरी कर रही हैं, खेल के मैदान में पदक जीत रही हैं, विमान उड़ा रही हैं और राजनीति से सवाल भी पूछ रही हैं. उन्हें यह बताना कि सार्वजनिक स्थान पर उन्हें कैसे हंसना, बोलना या कपड़े पहनना चाहिए, आधुनिक भारत की भाषा नहीं हो सकती. नई पीढ़ी इस पुरानी सोच को स्वीकार करने वाली नहीं है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;गाली से बड़ी कहानी अनुशासन और सवालों की थी&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;आंदोलन के दौरान कुछ युवाओं द्वारा इस्तेमाल की गई आपत्तिजनक भाषा पर काफी चर्चा हुई. गलत भाषा का बचाव करने की जरूरत नहीं है. गाली गलत है तो गलत है, लेकिन पूरे आंदोलन को केवल कुछ गालियों तक सीमित कर देना भी सही तस्वीर नहीं होगी. वहां हजारों युवाओं के सवाल थे, परीक्षा व्यवस्था को लेकर नाराजगी थी, पेपर लीक पर जवाबदेही की मांग थी और पुलिस कार्रवाई को लेकर गुस्सा था. इसके साथ गीत, हंसी और रचनात्मक विरोध भी था. किसी आंदोलन को समझना हो तो उसके सबसे खराब दस सेकंड की वायरल क्लिप नहीं, उसकी पूरी कहानी देखनी चाहिए.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;युवाओं की मुस्कान के पीछे बहुत गंभीर सवाल थे&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;यह आंदोलन केवल मौज-मस्ती नहीं था. हंसी के पीछे गहरी नाराजगी थी. युवा परीक्षा प्रणाली से सवाल पूछ रहे थे. वे जानना चाहते थे कि वर्षों पढ़ाई करने के बाद अगर प्रश्नपत्र लीक हो जाए तो उनकी मेहनत की कीमत कौन लौटाएगा? केंद्रीकृत परीक्षाओं की व्यवस्था में लगातार गड़बड़ियां सामने आएं तो जिम्मेदारी किसकी होगी? कोचिंग, परीक्षा एजेंसियों और पेपर लीक नेटवर्क के बीच युवा आखिर कहां जाए? सरकार ने पेपर लीक रोकने के कानून को और सख्त किया है और फास्ट-ट्रैक अदालतों जैसी व्यवस्था की दिशा में कदम उठाया है. यह स्वागत योग्य है. लेकिन कानून बन जाना कहानी का अंत नहीं है. असली सफलता तब होगी जब पेपर लीक होना बंद होगा और छात्र परीक्षा देने जाते समय व्यवस्था पर भरोसा कर पाएगा.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;मंत्री गया, कानून बदला&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;किसी भी आंदोलन की सफलता केवल इस बात से नहीं मापी जाती कि सड़क पर कितने लोग आए. असली सवाल होता है-क्या व्यवस्था ने उनकी बात सुनी? शिक्षा और परीक्षा व्यवस्था पर उठे सवालों के बाद राजनीतिक और प्रशासनिक स्तर पर बदलाव देखने को मिले. सरकार ने पेपर लीक के खिलाफ कानून को और सख्त किया और तेज सुनवाई की व्यवस्था की दिशा में कदम बढ़ाया. आंदोलनकारी इसे अपने दबाव की सफलता के रूप में देख रहे हैं. सरकार का अपना पक्ष हो सकता है कि फैसले व्यापक नीति प्रक्रिया का हिस्सा थे. लेकिन इतना तो साफ है कि युवाओं के सवाल राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में पहुंच गए. लोकतंत्र का मतलब भी यही है-जनता सवाल उठाए और व्यवस्था को जवाब देना पड़े.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;हंसते-हंसते व्यवस्था को आईना दिखा दिया&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;शायद इस आंदोलन की सबसे बड़ी उपलब्धि कोई एक इस्तीफा, कानून या राजनीतिक बयान नहीं है. इसकी सबसे दिलचस्प उपलब्धि यह है कि इसने विरोध की भाषा बदलने की कोशिश की. &amp;ldquo;हंसते-हंसते सीधा करेंगे&amp;rdquo; केवल मजेदार वाक्य नहीं है. इसका मतलब है कि हम हिंसा नहीं करेंगे, लेकिन चुप भी नहीं रहेंगे. हम डरेंगे नहीं, लेकिन आपको डराएंगे भी नहीं. हम सवाल पूछेंगे और आपके जवाब न देने पर आपकी गंभीरता का मजाक भी बनाएंगे. लोकतंत्र में व्यंग्य की यही ताकत होती है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;यही तो &amp;lsquo;अच्छे दिन&amp;rsquo; होने चाहिए&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&amp;lsquo;अच्छे दिन&amp;rsquo; का मतलब केवल GDP बढ़ना, शेयर बाजार चढ़ना या बड़ी सड़कें बनना नहीं हो सकता. अच्छे दिन वह भी हैं जब नागरिक बिना डर के सरकार से सवाल पूछ सके. छात्र पुलिस को देखकर भागने के बजाय अपने अधिकार याद रख सके. लड़कियां सार्वजनिक स्थान पर हंस सकें, गा सकें और अपनी बात कह सकें. सरकार आलोचना सुन सके और अदालत जरूरत पड़ने पर प्रशासन को उसकी सीमा याद दिला सके. सत्ता का सम्मान होना चाहिए, लेकिन सत्ता का डर लोकतंत्र का आदर्श नहीं हो सकता.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;इसलिए &amp;lsquo;गजब होई गवा&amp;rsquo; को केवल मजाक मत समझिए. इसके पीछे बदलते भारत की एक छोटी-सी कहानी छिपी है. यह पीढ़ी नाराज भी है, लेकिन हंसना नहीं भूली. सवाल भी पूछती है और मीम भी बनाती है. पुलिस की पानी की बौछार को बारिश बना देती है और भारी बैरिकेड को खेल का सामान. इसे डराना आसान नहीं, क्योंकि इसने डर पर हंसना सीख लिया है. और जिस दिन जनता डर पर हंसना सीख जाती है, उस दिन सत्ता को भी जनता की बात सुनना सीखना पड़ता है. शायद यही अच्छे दिनों की असली शुरुआत है-गजब होई गवा!&lt;/p&gt;]]></description><slash:comments>0</slash:comments><media:thumbnail url="https://feeds.abplive.com/onecms/images/uploaded-images/2026/08/03/bbf3bd6f775be6c45627dea4f51e7feb1785769604942708_original.jpg" width="220"/></item></channel></rss>