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नामी उद्योगपति की मौत का मामला दर्ज़ करने में आखिर क्यों लग गये दो महीने?

क्या आपका वास्ता कभी पुलिस-थाने जाने के झंझटों से पड़ा है? अगर नहीं पड़ा तो शुक्र मनाइए और दुआ कीजिये कि ऐसा कभी हो भी न हो. इस देश में ऐसे बहुत सारे बदनसीब लोग हैं, जिनका बेहद मजबूरी में पुलिस-थाने से पाला पड़ता है, लेकिन उनमें से भी बहुतेरे ऐसे हैं ,जो आज भी इंसाफ की तलाश में दर-दर भटकते रहते हैं. हालांकि महानगरों में मीडिया की ताकत को देखते हुए किसी शिकायत को एफआईआर में दर्ज करने में पुलिस बहुत ज्यादा आनाकानी नहीं करती लेकिन छोटे शहरों और गांवों की हालत देखेंगे, तो आपको इस देश की खाकी वर्दी की जो असली हक़ीक़त देखने को मिलेगी ,तो खुद से ही सवाल करेंगे कि देश में आखिर बदलाव क्या हुआ है?

आपको ये जानकर  हैरानी होगी कि इस देश का एक नामी उद्योगपति सड़क हादसे में मारा जाता है और उसकी मौत के दो महीने बाद इस देश की पुलिस एफआईआर दर्ज करती है. दरअसल, पिछले 75 सालों में पुलिस इतनी बेपरवाह हो चुकी है कि उसके लिए कोई भी मौत किसी अस्पताल के मुर्दाघर में पड़ी एक लाश से ज्यादा कुछ नहीं होती. इतने सालों में देश के पुलिसकर्मियों को ये ट्रेनिंग देने की किसी भी सरकार ने ज़हमत नहीं उठाई कि समाज में उनका ऐसा मानवीय चेहरा सामने आए,ताकि ख़ाकी वर्दी को देखकर लोग खौफ़ न खाएं बल्कि उसे अपना दोस्त समझें. टाटा संस के पूर्व चैयरमैन और नामी उद्योगपति साइरस मिस्त्री के कार-हादसे को शायद आप भूले नहीं होंगे.वो एक ऐसा हादसा था, जिसने देश के उद्योग-जगत समेत कई देशों के कारोबार जगत को हिलाकर रख दिया था. 

4 सितंबर, 2022 को अहमदाबाद से मुंबई लौटते समय महाराष्ट्र के पालघर जिले में कासा नदी के पुल के पास साइरस मिस्त्री की मर्सिडीज बेंज कार दुर्घटनाग्रस्त हो गई थी. हादसे में साइरस मिस्त्री और उनके एक दोस्त जहांगीर पंडोले की मौत हो गई थी. वहीं, डेरियस और अनाहिता पंडोले घायल हो गए थे. कार में चार लोग सवार थे. उनकी डॉक्टर मित्र अनाहिता पंडोले कार चला रही थीं. वो इस हादसे में बाल-बाल बच गईं थीं. लेकिन ये वक़्त सोचने का नहीं बल्कि सरकार के अधीन काम करने वाली जांच एजेंसियों से सवाल पूछने का है, जिसका अधिकार देश के संविधान ने हम सबको दे रखा है. सवाल ये है कि इतने हाई प्रोफाइल हादसे में एफआईआर दर्ज करने में ही अगर पुलिस को दो महीने का वक़्त लग जाता है, तो एक आम-गरीब इंसान का आखिर कौन रखवाला है?

अब आप इसे आज़ादी का अमृत महोत्सव कहें या न्यू इंडिया लेकिन सच ये है कि साइरस मिस्त्री की कार दुर्घटना के ठीक दो महीने बाद पालघर पुलिस ने इस दुर्घटना का मामला दर्ज किया है. इसलिये सवाल उठता है कि आईने की तरह साफ एक सड़क दुर्घटना को लेकर पुलिस को एफआईआर दर्ज करने में दो महीने का वक़्त आखिर क्यों लगा? जरा ये भी सोचिये कि जिस पुलिस को एक एक्सीडेंट की तफ्तीश करने में ही इतना वक़्त लगता है, तो वो हत्या और बलात्कार जैसे संगीन अपराधों की एफआईआर दर्ज करने में कितना समय लेती होगी.

इस मामले में पुलिस ने कार चला रही डॉक्टर अनाहिता पंडोले (Anahita Pandole) को आरोपी बनाया है. उनके खिलाफ लापरवाही से गाड़ी चलाने का मामला दर्ज किया गया है. इस मामले में पालघर कासा पुलिस स्टेशन में धारा-304 ए के तहत केस दर्ज किया गया है ,जिसे गैर इरादतन हत्या का जुर्म माना जाता है. पुलिस के मुताबिक उस वक़्त अनाहिता पंडोले कार चला रही थीं,जो उनकी लापरवाही के चलते अचानक पुल की रेलिंग से टकरा गई. तेज स्पीड में चल रही कार रेलिंग से टकराते ही पलट गई, जिसमें टाटा संस के पूर्व चेयरमैन मिस्त्री और उनके दोस्त जहांगीर पंडोले की मौत हो गई थी.

पुलिस का कहना है कि मामले में डॉक्टर अनाहिता पंडोले के पति का बयान दर्ज कर लिया गया है. उन्होंने बताया है कि अचानक लेन बदलने की वजह से ये हादसा हुआ, जिसमें अनाहिता कार को कंट्रोल नहीं कर पाईं. लेकिन इस दुर्घटना ने उन लोगों को आगाह भी किया है, जो किसी भो लग्जरी कार की पिछली सीट पर बेल्ट पहने बगैर इतने इत्मिनान से बैठते हैं कि कोई एक्सीडेंट होने पर उनका कुछ नहीं बिगड़ने वाला है. इस गलतफहमी को दिमाग से निकालने की जरूरत है. पुलिस जांच में ये सामने आया था कि साइरस मिस्त्री कार की पिछली सीट पर थे और उन्होंने सीट बेल्ट नहीं पहनी हुई थी. ऐसे में ये समझना बेहद जरूरी हो जाता है कि कार की रियर सीट बेल्ट क्यों महत्वपूर्ण है और इससे न पहनने से कितना खतरा हो सकता है.

एक ऑनलाइन प्लेटफॉर्म, लोकल सर्कल्स (Local Circles) के एक सर्वेक्षण में सामने आया है कि कार में पीछे बैठे लगभग 75 प्रतिशत लोग सीट बेल्ट का उपयोग बिल्कुल नहीं करते हैं. उनमें से कुछ यह जानते हुए भी कि रियर बेल्ट मौजूद है और प्रभावी रूप से चोटों के साथ-साथ मृत्यु दर को भी कम कर सकती है, लेकिन फिर भी लोग रियर सीट बेल्ट नहीं पहनते. लिहाज़ा,उस दुखद घटना से सबक लेते हुए सरकार के कानून का इंतजार मत कीजिये और गाड़ी की पिछली सीट पर बैठते हुए सीट बेल्ट लगाने को मजबूरी नहीं, बल्कि आदत बना लीजिये..

(नोट- उपरोक्त दिए गए विचार लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. ये जरूरी नहीं कि एबीपी न्यूज ग्रुप इससे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है.)

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