भाईसाहब क्या लग रहा है आपको और भाईसाहब क्या चल रहा है? यही दो सवाल हैं जो हम सवाल करने वालों से आजकल लोग पूछते मिलते हैं. अभी कुछ दिनों पहले करेली गया था, एक पुराने दोस्त की दुकान पर बैठे हुये पांच मिनट नहीं हुए कि फिर यही चिर परिचित सवाल घूम फिरकर आ गया. यार क्या होने जा रहा है, क्या लग रहा है, इस बार क्या होगा चुनावों में? अब ऐसे घुमावदार सवालों का जबाव देना कठिन होता है इसलिये सबसे अच्छा है कि आप ही सवाल कर दो आपको क्या लग रहा है?

अब जबाव देने की बारी मेरे मित्र की थी जो आरएसएस की शिक्षा दीक्षा में बड़े हुए हैं. चेहरे पर चिंता का भाव लाकर कहा कि यार हालत तो अच्छी नहीं है, आज के दिन तो बीजेपी की सरकार बनती नहीं दिख रही फिर किसकी बन रही है इस सवाल पर वो फिर गंभीर हुए और कहा कि मामला फिफ्टी फिफ्टी का दिख रहा है. तुमको, मैंने भी वही जुमला दोहरा दिया हां फिफ्टी फिफ्टी, ही दिख रहा है. सरकार दोनों पार्टियों में से कोई भी बना सकता है. दोनों पार्टियां बराबरी के मंच पर खडी हैं. कोई भी यहां से मैच निकाल कर ले जायेगा. भोपाल में कांग्रेस पार्टी की बैठक में आये मेरे एक अन्य मित्र का फोन आया, आपके शहर में आये हैं आओ मिलते हैं और मिलते ही वही सवाल यार बताओ क्या लग रहा है आपको, बीजेपी की सरकार बदलेगी या नहीं. मैंने फिर वही तरकीब अपनायी तुम बताओ क्या लग रहा है?

मेरे खांटी कांग्रेसी मित्र थोड़ी देर तक सोचते रहे फिर बोले यार मामला फिफ्टी फिफ्टी ही लग रहा है. सरकार के खिलाफ माहौल तो है मगर हमारी तैयारी भी कुछ खास नहीं है. थोड़ी ज्यादा मेहनत करनी होगी हमें क्योंकि सामने पंद्रह साल पुरानी बीजेपी की सरकार और तेरह साल का सीएम शिवराज सिंह हैं. और इधर हमारी पार्टी की ओर से अभी तक कोई नेता ही तय नहीं हुआ है किसको आगे कर चुनाव लड़ेंगे? अरे कर दे भाई किसी को भी वक्त निकला जा रहा है. अब तुम बताओ तुमको यहां भोपाल में बैठकर क्या दिख रहा है हमारी सरकार बनेगी या नहीं. फिर मेरा जबाव वहीं था सच कह रहे हो तुम फिफ्टी फिफ्टी से ज्यादा कुछ दिख नहीं रहा. दोनों पार्टियां बराबरी के मंच पर खड़ी हैं. कोई भी यहां से मैच निकाल कर ले जायेगा. भोपाल के सिंधु भवन में दो दिन से आम आदमी पार्टी का सम्मेलन चल रहा है. कार्यकर्ता प्रशिक्षण शिविर के नाम पर बूथ मैनेजमेंट और बीजेपी की सरकार को घेरने के पाठ पढाये जा रहे हैं. यहां मिले कार्यकर्ता मित्र ने मिलते ही पूछ लिया वहीं सवाल, सच बताओ यार क्या लग रहा है एमपी में, क्या होने जा रहा है ये सरकार बदलेगी या नहीं.

पिछले कुछ दिनों से ऐसे सवाल पर मैं राजेश खन्ना और टीना मुनीम की 1981 में आयी फिल्म फिफ्टी फिफ्टी का गाना गा देता था, प्यार का वायदा फिफ्टी फिफ्टी, क्या है इरादा फिफ्टी फिफ्टी. तो यहां भी वहीं तान छेड दी. यार मामला तो फिफ्टी फिफ्टी ही है, सोचा था यहां से भी वही फिफ्टी फिफ्टी की गूंज सुनाई देगी मगर मामला बिगड गया. सामने वाला कार्यकर्ता चढ गया मेरी तरफ मुंह बनाकर बोला तुमको कुछ नहीं मालुम माहौल बुरी तरह बिगड़ा है बीजेपी का. वही तो मैं कह रहा हूं अरे नहीं अभी हमारी पार्टी ने बड़ा अंदरूनी सर्वे कराया है जिससे साफ हुआ है कि बीजेपी को सिर्फ तीस फीसदी लोग वोट देने जा रहे हैं मगर कांग्रेस को दस फीसदी वोट ही मिलेंगे बाकी के साठ फीसदी लोगों ने अब तक मन ही नहीं बनाया. और इनमें से अधिकतर लोग आम आदमी के साथ जाने की तैयारी कर रहे हैं.

बताओ अब बनेगी कि नहीं अपनी सरकार. भाई दिल्ली विधानसभा चुनाव के पहले भी वहां ऐसा ही माहौल था और आम आदमी पार्टी धूमधाम से सबको चौपट करती हुयी आयी. बोलो आयी थी या नहीं. आप के कार्यकर्ता की इस खुशफहमी पर हैरान तो नहीं हुआ क्योंकि राजनीतिक दलों के लोग चुनावों में अपनी पार्टी के प्रदर्शन को लेकर ऐसे ही खुशफहमी के शिकार रहते हैं. सबके अपने अपने दावे होते हैं मगर जो सच है वो इन सब दावों के बीच ही कहीं छिपा है. इसमें दो मत नहीं कि एमपी में बीजेपी की 14 साल पुरानी शिवराज सिंह के कंधे पर सवार सरकार थकी और हांफती दिख रही है. संगठन में चुनाव से पहले का उत्साह सिरे से गायब है. बीजेपी कार्यकर्ता खाये पिये अघाये और अपने नेता और संगठन की शिकायत करते हुए ही मिल रहे हैं इन दिनों. कमोबेश यही हाल कांग्रेस का भी है. लंबे समय से अनिर्णय की शिकार कांग्रेस के नेता और कार्यकर्ता को उम्मीद तो दिख रही है पंद्रह साल बाद सरकार में वापसी का. नये प्रभारी महासचिव बूथ संभालने के पुराने घिेस पिटे पाठ तो पढा रहे हैं मगर जिस चेहरे के फैसले का सबको इंतजार है वो फैसला लिया नहीं जा रहा. संगठन में जान फूंकने के लिये धरने प्रदर्शन की योजनाएं बनती और बिगडती रहती हैं. ऐसे में यदि आम आदमी पार्टी के कार्यकर्ता अपने लिये एमपी की विधानसभा में पहली बार प्रवेश की गुंजाइश देख रहे हैं तो इसमें गलत कुछ नहीं है. मगर अब यदि आप मुझसे पूछेंगे कि क्या लग रहा है तो मैं फिर वही कहूंगा फिफ्टी फिफ्टी.

(नोट- उपरोक्त दिए गए विचार व आंकड़े लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. ये जरूरी नहीं कि एबीपी न्यूज ग्रुप सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है.)