‘औरत की देह आपके खेलने की चीज नहीं’ मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने जब शादी के प्रॉमिस और रेप के मामले में यह दलील दी तो तसल्ली हुई. इस केस में लड़के ने लड़की से दोस्ती की, फिर शादी का प्रस्ताव रखा और फिजिकिल रिलेशन भी बनाए. मां-बाप शादी के लिए तैयार नहीं हुए तो लड़का पीछे हट गया. लड़की नाराज हुई, रेप का केस कर दिया. जज ने लड़की के पक्ष में फैसला दिया. साथ ही लड़के को डपटा भी. कहा कि वह अपनी इच्छा पूरी करने के लिए किसी लड़की को मूर्ख नहीं बना सकता. धोखा दिया है तो उसकी सजा भी मिलेगी.
यह फैसला उन तमाम फैसलों से एकदम उलट है जिनमें लड़कियों को ही उलटे दोषी करार दिया गया है. कई मामलों में लिव-इन पार्टनर पर लड़कियों ने रेप का केस किया, क्योंकि उन्होंने शादी करने से मना कर दिया. पुरुष अधिकारों के लिए काम करने वाले लगातार रेप कानून के दुरुपयोग की दुहाई दे रहे हैं. जज भी उनकी तरफ से बोल रहे हैं. 2008 में दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा था कि कानून दोधारी तलवार की तरह हैं. अगर उनसे किसी के अधिकारों की रक्षा होती है तो किसी की आजादी को रौंदने के लिए उनका दुरुपयोग भी किया जाता है. कई बार लड़कियां लवर्स पर दबाव बनाने के लिए भी यह हथकंडा अपनाती हैं. 2012 के एक मामले में दिल्ली हाई कोर्ट के जज ने कहा था कि गुस्से में या बदला लेने की फिराक में, पहले फिजिकल रिलेशन के लिए राजी होती हैं फिर मकसद (शादी का, या पैसे का, या पता नहीं किस-किस का) पूरा न होने पर रेप का केस डाल देती हैं.’’
एनसीआरबी-नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के डेटा कहते हैं कि 2015 में रेप के साढ़े सात हजार से अधिक रिपोर्टेड केसेज़ में लिव-इन पार्टनर या ब्वॉयफ्रेंड आरोपी था. जिसने शादी का वादा करके लड़की को धोखा दिया. ह्यूमन राइट्स वॉच नामक नॉन प्रॉफिट संस्था का कहना है कि कई मामलों में बलात्कार का आरोप तब लगाया गया, जब लड़का-लड़की का रिश्ता बिगड़ गया. कुछ मामलों में लड़का शादी के लिए राजी हो गया, तो लड़की ने केस वापस भी ले लिया. क्या करें? लड़कियां हैं ही ऐसी. उनका क्या है? लड़के की जिंदगी बर्बाद हो जाती है.
हमें कानून की बहुत चिंता है. उसके मिसयूज की भी. इससे पहले सुप्रीम कोर्ट भी सेक्शन 498ए, आईपीसी के मिसयूज के बारे में कह चुका है. यह दहेज प्रताड़ना से जुड़ी धारा है. पति और ससुरालियों की क्रूरता से शादीशुदा औरतों की रक्षा करती है. चूंकि इस धारा के अंतर्गत कनविक्शन रेट कम है और अरेस्ट रेट ज्यादा. इसलिए लगातार अदालतें इसके मिसयूज की बात करती हैं. औरतें आदमियों को परेशान करने के लिए इस धारा का सहारा लेती हैं. लेकिन कनविक्शन रेट कम होने का मतलब यह नहीं कि किसी कानून का मिसयूज होता है. इसका यह मतलब भी हो सकता है कि जांच अच्छी तरह से की ही नहीं जाती.
आरोपी को बेनेफिट ऑफ डाउट मिल जाता है और औरतों के प्रति लोगों का पूर्वाग्रह काम करता है. नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो के अध्ययन खुद कहते हैं कि औरतों के प्रति होने वाले अपराधों को रिपोर्ट ही नहीं किया जाता.
क्या कानून एकतरफा काम करता है? औरतों की तरफ से, आदमियों के खिलाफ. अगर औरत खुद रिश्ते के लिए तैयार होती है, लेकिन बाद में मुकर जाती है तो इसे कैसे साबित किया जा सकता है. दरअसल कानून हमेशा यह मानता है कि आरोपी मासूम है. इसलिए वह विक्टिम पर यह दबाव डालता है कि वह यह साबित करे कि वह रिश्ते के लिए राजी नहीं थी. अगर आरोपी के वकील ने क्रॉस एक्जामिनेशन में विक्टिम के संबंध में कोई शक पैदा कर दिया तो आरोपी के छूटने की उम्मीद बढ़ जाती है. इसीलिए आरोपी की तरफ से केस लड़ने वाले वकील की कोशिश यही रहती है कि शक पैदा हो. विक्टिम के बयान में विरोधाभास हो. अगर विक्टिम लगातार एक ही बात नहीं दोहराती तो कोर्ट उसकी गवाही में यकीन नहीं करेगा.
पिछले कुछ सालों में शादी के वादे से मुकरने के केस लगातर बढ़े हैं. रेप कानून में 2013 के संशोधन में शादी से मुकरने को क्रिमिनल नहीं माना गया है. ऐसे मामलों में किसी सेक्सुअल एक्ट को रेप नहीं माना जाता. हां, अगर अदालत में यह साबित हो जाता है कि लड़का शादी कभी करना ही नहीं चाहता था, और उसे फिजिकल रिलेशन बनाने के लिए सब्जबाग दिखा रहा था तो स्थिति बदल जाती है. रेप का केस बन जाता है.
2013 के संशोधन में पुलिस के लिए रेप की एफआईआर दर्ज कराने से मना करने या दर्ज न करने को अपराध माना गया. इसी से बहुतों ने कहा कि लड़कियां चालूपंती करते हुए लड़कों को झूठे मामलों में फंसा देती हैं. कानून का मिसयूज करती हैं.
विक्टिम के प्रति सहानुभूति हो न हो, हमें कई बार कलप्रिट के लिए कुछ ज्यादा हमदर्दी हो जाती है. इसका सारा ठीकरा अठारहवीं शताब्दी के ज्यूरी सर विलियम ब्लैकस्टोन के सिर फोड़ा जा सकता है. वह कह गए हैं, ‘दस अपराधी भले ही छूट जाएं, मासूम इनसान को सजा नहीं भुगतनी चाहिए.’ बेशक, झूठे मामले में फंसने का नुकसान बहुत ज्यादा होता है. लेकिन एक मासूम के पक्ष में बोलते-बोलते हम भूल जाते हैं कि दस अपराधी छूटे भी जा रहे हैं. ब्रिटेन के नेशनल सेंटर फॉर बायोटेक्नोलॉजी इन्फॉरमेशन की एक स्टडी में कभी गिरफ्तार न हुए सेक्स ऑफेंडर्स ने कबूला था कि वे औसत 10 हिंसक अपराध कर चुके हैं. तो, ब्लेकस्टोन के बयान के लिहाज से यह निष्कर्ष निकलता है कि भले ही 100 सेक्सुअल असॉल्ट हो जाएं लेकिन एक झूठे केस में किसी को सजा नहीं मिलनी चाहिए. क्या हम इस सामान्य गणित से स्थिति की गंभीरता सोच सकते हैं.
हालत यह है कि लड़कियां मूर्ख बनती रहती हैं. एक दिन चेतती हैं और मामला दर्ज करती हैं तो हम लड़के की सिधाई पर बिसूरना शुरू कर देते हैं. दक्षिण अफ्रीका की यूनिवर्सिटी ऑफ विटवॉटरस्ट्रैंड में एप्लाइड एथिक्स पढ़ाने वाले क्रिस्टोफर वेयरहम ने इस पर एक पेपर लिखा है ‘वाई रेप केसेज शुड नॉट बी सब्जेक्ट टू रिजनेबल डाउट’ . उसमें क्रिस्टोफर लिखते हैं कि सिंपल फिजिकल रिलेशनशिप को कई बार सेक्सुअल असॉल्ट से अलग करके देखना मुश्किल होता है. तब फैसला सिर्फ गवाही पर निर्भर करता है. जब दो लोग अपनी आपबीती सुनाते हैं तो दोनों एक दूसरे पर छींटाकशी करते हैं. तब दोनों पर डाउट किया जा सकता है.
सेक्सुअल हिंसा और सहमति से सेक्स. इन दोनों के बीच अंतर करना मुश्किल भले हो, लड़कियों को किसी भी स्थिति में शिकार नहीं बनाया जाना चाहिए. न ही ‘’दस अपराधी-एक मासूम’ वाली दलील दी जानी चाहिए. अगर अब लड़कियां यौन हिंसा को रिपोर्ट करने की हिम्मत दिखा रही हैं तो यह इस बात का प्रूफ है कि रेप का कानून अच्छी तरह काम कर रहा है.
2012 में दिल्ली रेप केस के बाद बनी जस्टिम वर्मा की कमिटी ने कहा था कि जब हम औरतों की इच्छा का सम्मान करना शुरू करेंगे तभी सेक्सुअल हिंसा कम होगी. लेकिन रास्ता अभी काफी दूर है. पर हमें कदम तो बढ़ाना ही होगा.
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