बेंगलुरु के सेसना बिजनेस पार्क में स्मार्टवर्क्स के दफ्तर में आपको मित्री मिलेगी- मुस्कुराती हुई. आप उससे कुछ भी पूछें, आपको पॉजिटिव जवाब मिलेगा. मित्री एक ऐसी रिसेप्शनिस्ट है जो कभी, किसी से नाराज नहीं होती. वह खुश रहना जानती है. चूंकि असल औरत नहीं, रोबोट है. उसे बनाने वाले बालाजी विश्वनाथन जानते हैं कि फीमेल रोबोट्स इसलिए हिट होते हैं, चूंकि टेक वर्ल्ड पुरुष प्रधान क्षेत्र है. साइंस ने कितनी भी तरक्की की हो, एक डिप्रेसिंग प्रवृत्ति कभी नहीं बदलने वाली. रिसेप्शन पर काम करने के लिए आप औरत को ही चुनेंगे- असल न सही, तो रोबोट ही सही. पर होगी वह फीमेल ही. मित्री को बनाने वाली कंपनी मित्र भी बनाती है. उसके बाहरी खोल से आपको पता चल जाएगा कि उसका जेंडर क्या है. बॉडी टाइप मेल है, चौड़ा कंधा और वजनदार आवाज. यह मित्री की तरह साफ-सफाई, हाउसकीपिंग का काम नहीं करता. कारें बेचता है. बेंगलुरु के एक कार डीलर की दुकान में ग्राहकों के सवालों के जवाब देता है. अथॉरिटीटेटिव काम आदमियों के जिम्मे होता है- सो, मित्र यहां तैनात है. हेल्पर के लिए औरत की जरूरत है, सो मित्री मदद के लिए हाजिर है. स्टीरियोटाइप्स हमेशा कायम रहते हैं, यही वजह है कि सारे वर्चुअल एसिस्टेंट्स फीमेल जेंडर को रिफ्लेक्ट करते हैं- सीरी से लेकर अलेक्सा और कोरटाना तक... सभी औरतों जैसा साउंड करते हैं. यहां तक कि गूगल मैप्स के लिए भी फीमेल वॉयस का इस्तेमाल किया गया है. इसमें से सिर्फ सीरी को हम फीमेल वॉयस से मेल वॉयस में तब्दील कर सकते हैं. यानी विज्ञान की दुनिया भी लिंग भेद से अछूती नहीं. होगी भी कैसे... आदमी जहां जहां प्रमुख भूमिकाओं में हैं, औरतों के लिए सिर्फ हाशिया बचता है. उस हाशिए पर खड़े-खड़े मर्दों के बनाए नियमों का पालन करते रहो. मर्द ने नियम बनाया है, जब तुम्हारी मदद की जरूरत हो, आ जाना. मदद के लिए औरतें चल पड़ती हैं. मित्री भी मदद कर रही है. अधिकारपूर्ण कुछ कहने के लिए विज्ञानविदों ने मित्र को तैयार किया है. रोबोट्स जैसे जेंडर न्यूट्रल आविष्कार को खांचों में बांट दिया गया है. नार्व के साइंस और टेक्नोलॉजी यूनिवर्सिटी में इंटरडिस्लिपनरी स्टडीज़ ऑफ कल्चर पढ़ाने वाले प्रोफेसर रॉजर एंद्रे सोरा का एक पेपर है- मकैनिकल जेंडर्स : हाऊ डू ह्यूमन्स जेंडर्ड रोबोट्स. पेपर में रॉजर का कहना है कि रोबोट्स के डिजाइनर्स और यूजर्स तय करते हैं कि उनका जेंडर क्या होगा. ये दोनों ग्रुप्स अपने पूर्वाग्रह के आधार पर काम करते हैं और रिजल्ट सामने आ जाता है. रोबोट्स का जेंडर नहीं होता. धातु, प्लास्टिक या सिलिकॉन के कृत्रिम मानव- शून्य से अटे पड़े. लिंग जीव-विज्ञान का विषय है. उससे कृत्रिम देह का क्या संबंध- जीव विज्ञान की जटिल पहेली तो उसके लिए अबूझ है. पर हमने उसी पहेली को उसके लिए बूझ बनाना शुरू कर दिया है. उसे अपनी सामाजिकता का अंग बना लिया है. माइक्रोसॉफ्ट की चैटबोट रूह को तो लोग शादी का प्रपोजल भी देते रहते हैं. ऐसे में रोबोट बनाने वाले जेंडर स्टीरियोटाइप्स का फायदा उठाकर मार्केट में अपना प्रोडक्ट क्यों नहीं बनाना चाहेंगे. साइंस ही नहीं, हर क्षेत्र में लिंग भेद होना बहुत स्वाभाविक है. आदमी-औरत जहां होंगे, उनकी सोच उनके हर काम में दिखाई देगी. चार्ल्स डारविन जैसे महान वैज्ञानिक तक अगर शादीशुदा आदमियों को पुअर स्लेव कह गए हैं तो हम सोच सकते हैं कि औरतों को लेकर उनका नजरिया क्या रहा होगा. वैज्ञानिक का पूर्वाग्रह विज्ञान पर हावी क्यों नहीं होगा. यही वजह है कि औरत वैज्ञानिकों को पनपने नहीं दिया जाता. विज्ञान के क्षेत्र में औरतें पहुंच ही नहीं पातीं. याद कीजिए कि पिछले साल अमेजन के ऑनलाइन रिक्रूटमेंट इंजन को सिर्फ इसलिए बंद करना पड़ा था क्योंकि उसमें औरतों के साथ नौकरियों में भेदभाव किया जाता था. दुनिया भर में हाल बुरा है. 2017 में 11 फरवरी को इंटरनेशनल डे ऑफ विमेन एंड गर्ल्स इन साइंस के मौके पर संयुक्त राष्ट्र ने कहा था कि दुनिया के 144 देशों में कंप्यूटिंग, इंजीनियरिंग और फिजिक्स में औरतें 30 प्रतिशत से भी कम हैं. यह नोबल पुरस्कारों से भी सिद्ध होता है. नोबल के पिछले 117 सालों के इतिहास में कमेस्ट्री, फिजिक्स और मेडिसिन के लिए सिर्फ 18 औरतों को नोबल मिला है. जबकि इन विषयों के लिए 518 आदमी सम्मानित किए जा चुके हैं. अपने देश में विज्ञान में हालत और बुरी है. लड़कियां इसे चुनती ही नहीं. देश भर के आईआईटीज़ में लड़कियां सिर्फ 10% हैं. 2020 तक सरकार इस दर को 20% करना चाहती है. भारत में ऑल इंडिया सर्वे ऑफ हायर एजुकेशन (एआईएसएचईस 2015-2016) के डेटा भी बताते हैं कि 41.32% लड़कियां विज्ञान विषय को चुनती तो हैं लेकिन उसमें फैशन टेक्नोलॉजी, फिजियोथेरेपी और नर्सिंग जैसे कोर्सेज पढ़ना पसंद करती हैं. उनके मुकाबले लड़के टेक्नोलॉजी और इंजीनियरिंग की पढ़ाई करते हैं. जाहिर है, ये विषय मैस्कुलिन माने जाते हैं. ये माना जाना ही सबकी जड़ है. हम कुछ भी मान लेते हैं. मान लेते हैं कि औरतें जल्दी घबरा जाती हैं. काम का दबाव नहीं झेल पातीं. उन्हें मशीनें समझ नहीं आतीं. चूंकि विज्ञान और मनोविज्ञान भी यही साबित करता आया है. एक मशहूर क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट हैं साइमन बैरन कोहेन. उनकी एक रिसर्च में कहा गया है कि औरतों की बायलॉजी टेक्नोलॉजी जॉब्स में उन्हें आदमियों से कमतर बनाती हैं. वे लोगों में रुचि लेती हैं, वस्तुओं में नहीं. चूंकि उनके दिमाग की बनावट आदमियों से फर्क होती है जिससे उनमें सीखने की क्षमता कम होती है. चूंकि साइंस और टेक्नोलॉजी में आदमी भरे पड़े हैं, इसीलिए परंपरावादी सोच के साथ काम करते रहते हैं. मित्री को हेल्पर और मित्र को एडमिनिस्ट्रेटर की तरह तैयार करते हैं. रोबोट्स का जेंडर तय किया जाता है और विज्ञान को एकतरफा बना दिया जाता है. (नोट- उपरोक्त दिए गए विचार व आंकड़े लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. ये जरूरी नहीं कि एबीपी न्यूज ग्रुप सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है.)