अगले लोकसभा चुनाव से पहले विपक्ष को एकजुट करने के मकसद से दिल्ली में डेरा डाले नीतीश कुमार ने पिछले तीन दिनों में करीब दर्जन भर नेताओं से मुलाकात की है.हालांकि नीतीश का दावा है कि सभी से अच्छा रिस्पांस मिला है लेकिन कांग्रेस के बगैर विपक्षी एकता कोई मायने नहीं रखती है.
विपक्षी खेमे में सबसे मजबूत स्थिति रखने वाली काँग्रेस ने फिलहाल अपने पत्ते नहीं खोले हैं लेकिन दो क्षेत्रीय दल ऐसे हैं, जो कांग्रेस के साथ मंच साझा करने से कतरा रहे हैं क्योंकि उन दोनों ही पार्टियों के प्रमुख पीएम पद का उम्मीदवार बनने की दौड़ में शामिल हैं. लिहाज़ा, फिलहाल ये कहना बेहद मुश्किल है कि नीतीश कुमार अपने मिशन में कामयाब हो ही गये हैं और विपक्षी एकता का सेहरा अपने सिर बांधकर दिल्ली से पटना लौटे हैं.
दरअसल,मौजूदा माहौल में हर विपक्षी दल पीएम मोदी के तो खिलाफ है लेकिन विरोध की ये आवाज एकजुट नहीं है और इसे एक मंच पर लाना भी कोई बच्चों का खेल इसलिये नहीं है कि हर दूसरे नेता की ख्वाहिश पीएम पद का उम्मीदवार बनने की है.यही वह कारण है,जो आखिरी वक्त तक विपक्षी एकता में एक बड़ा रोड़ा बना रहेगा. नीतीश कुमार और शरद पवार जैसे नेता अगर इस रोड़े को हटाने में कामयाब हो गये, तो 2024 के चुनाव में संयुक्त विपक्ष अवश्य ही पीएम मोदी के लिए बड़ी चुनौती बन सकता है.
विश्लेषक मानते हैं कि फिलहाल लोकसभा की 274 सीटें ऐसी हैं,जो गैर बीजेपी शासित राज्यों में है.यानी वहां बीजेपी की मुख्य लड़ाई क्षेत्रीय दलों से ही होती है लेकिन विपक्ष के एकजुट न होने और अलग-अलग चुनाव लड़ने से वोटों का जो बंटवारा हुआ,उसी का भरपूर फायदा बीजेपी को पिछले दोनों लोकसभा चुनाव में मिला.इसलिये अगर विपक्ष अब साथ मिलकर छुनाव लड़ता है,तो यही सीटें उसके लिए गेम चेंजर साबित हो सकती हैं.
लेकिन एक अहम बात ये भी है कि साल 2019 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को 52 सीटों पर जीत मिली थी जबकि 210 सीटों पर वह दूसरे नंबर पर रही थी.यानी कुल 262 सीटें ऐसी हैं, जहां कांग्रेस और बीजेपी में सीधा मुकाबला था.यानी लोकसभा की कुल सीटों में से तकरीबन आधी सीटों पर 2024 में भी दोनों बड़ी पार्टियों में ही सीधा मुक़ाबला होने की तस्वीर बनती दिख रही है.इसलिये कांग्रेस के बगैर विपक्षी एकता की सारी कवायद ही बेकार है.
बुधवार को NCP सुप्रीमो शरद पवार और नीतीश कुमार की मुलाकात में भी दोनों नेताओं ने इस पर माथापच्ची की है कि एक तरफ जहां कांग्रेस को मनाना है,तो वहीं किसी भी छोटे क्षेत्रीय दल की नाराजगी भारी पड़ सकती है. दरअसल, लोकसभा में सबसे अधिक सीटों के कारण पीएम पद के उम्मीदवार पर कांग्रेस अपना दावा करेगी.बेशक नीतीश कुमार ने साफ कर दिया है कि वे पीएम नहीं बनना चाहते और उनका मकसद सबको एकजुट करना ही है.
शरद पवार ने फिलहाल इनकार नहीं किया है लेकिन फिर भी और दो नाम ऐसे हैं,जो उस पद पर अपनी दावेदारी करने से शायद ही पीछे हटें.ममता बनर्जी और अरविंद केजरीवाल के बयानों पर गौर करें ,तो पता चलता है कि वे भी इस दौड़ में शामिल हैं.आम आदमी पार्टी के नेताओं ने तो ऐलानिया तौर पर कहना शुरु कर दिया है कि केजरीवाल ही एकमात्र ऐसे नेता हैं,जो 2024 में बीजेपी को पटखनी दे सकते हैं. इसलिये विपक्षी एकता का पूरा ताना बाना तो फिलहाल उलझा हुआ ही नजर आ रहा है और विपक्ष इसमें जितनी देरी करेगा,उतना ही उसे नुकसान होगा.
हालांकि पवार से हुई मुलाकात के बाद नीतीश कुमार ने कहा कि एक साथ मिलकर चुनाव लड़ेंगे तो देश के विकास के लिए अच्छा रहेगा. हमारा एकजुट होना बहुत जरूरी है. हमारा निजी कुछ नहीं है, हमारा एक ही मकसद है कि सभी एकजुट हो जाएं तो देश के लिए बहुत अच्छा होगा. उन्होंने दावा किया कि सभी पार्टियों के नेताओं से हुई बातचीत में बहुत अच्छा रिस्पॉन्स मिला है.बीजेपी देश को कब्जाने की कोशिश कर रही है,जिसे रोकने के लिए सबका साथ आना जरूरी है. लेकिन सवाल ये है कि जब सबकी मंज़िल ही एक है,तो फ़िर एक ही रास्ते से मिलकर आगे बढ़ने में अहंकार क्यों आड़े आ रहा है?
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