आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस को हम कृत्रिम बुद्धिमत्ता के नाम से जानते हैं. इसके लिए हम एआई का उपयोग करते रहे हैं. आजकल हम अक्सर हर जगह, हर क्षेत्र में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का नाम सुनते रहते हैं. माना जा रहा है कि आने वाले वक्त में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस सब कुछ बदल कर रख देगा. चाहे विकास का मॉडल हो या फिर सोचने-समझने की ताकत.


एआई के बढ़ते इस्तेमाल और मानवीय क्रियाकलापों में इस दखल की वजह से एक नई बहस भी शुरू हो गई है. दरअसल दुनिया के कई जाने माने बिजनेसमैन जिसमें टेक्नोक्रैट भी शामिल हैं, उन लोगों का मानना है कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस  समाज और मानवता के लिए गहरा जोखिम पैदा कर सकता है. एआई समाज के लिए खतरनाक हो सकता है. इन लोगों में ट्विटर के मालिक और उद्योगपति एलन मस्क और प्रौद्योगिकी के मामले में दुनिया के अग्रणी कंपनी एप्पल के को-फाउंडर स्टीव वोजनियाक भी शामिल हैं.


एआई से भविष्य में होने वाले खतरे को लेकर आगाह करने से जुड़े ओपन लेटर पर इन लोगों के अलावा, स्काइप के को-फाउंडर Jaan Tallinn, पिनटेरेस्ट के को-फाउंडर के साथ साथ कई यूनिवर्सिटियों के प्रोफेसरों ने भी दस्तखत किए हैं. इस ओपन लेटर को 'फ्यूचर ऑफ लाइफ इंस्टीट्यूट' की वेबसाइट पर डाला गया है. पिछले हफ्ते पोस्ट किए गए इस लेटर के बाद दुनिया में ये बहस तेज हो गई है कि एआई किस तरह से भविष्य में हमारे लिए फायदेमंद होने के साथ ही घातक भी साबित हो सकता है.


आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस पर हो रहे बड़े-बड़े रिसर्च को रोकने के लिए अपील की जा रही है. कहा जा रहा है कि इसके प्रयोग में उतनी सावधानी नहीं बरती जा रही है, जितनी जरूरत है. ChatGPT के आने के बाद इस बहस में एक बार फिर से तेजी आई है. हाल ही में इसका नया वर्जन GPT-4 लॉन्च हुआ है. दुनिया के जाने माने टेक्नोक्रैट तेजी से विकसित हो रहे इस तरह के मॉड्यूल्स को इंसानी अस्तित्व के लिए अब खतरा मान रहे हैं. इन लोगों ने सभी एआई प्रयोगशालाओं से अपील की है कि GPT-4 से अधिक शक्तिशाली एआई सिस्टम के प्रशिक्षण को कम से कम 6 महीने के लिए तुरंत रोक दी जाए.


ओपन लेटर में यही बात कही गई है कि एआई सिस्टम अब इंसानी बुद्धि जैसा प्रतिस्पर्धी बन गया है. ये एक तरह से धरती पर मानव अस्तित्व के इतिहास में बड़े बदलाव का प्रतिनिधित्व कर रहा है. ऐसे में ये जरूरी है कि इसके प्रयोग के लिए योजना बनाई जानी चाहिए और उचित देखभाल और संसाधनों के साथ मैनेज किया जाना चाहिए. ओपन लेटर में चिंता जाहिर करने वाले लोगों का मानना है कि एआई के इस्तेमाल में इन बातों का ख्याल नहीं रखा जा रहा है और डिजिटल दिमाग के विकास में आउट-ऑफ-कंट्रोल रेस देखने को मिल रहा है. ये इतना खतरनाक साबित हो सकता है कि इस काम में लगे लोगों को भी इसका अंदाजा नहीं है.


जैसा कि नाम से ही पता चलता है कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस एक प्रकार से पैदा की गई बुद्धि है, जिसका प्राकृतिक सोच से कोई मतलब नहीं है. हम सब जानते हैं कि मानव की सबसे बड़ी खासियत उसका चिंतन करने की ताकत है, सोचने की शक्ति है, बुद्धिमता है.


ऐसे में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस को लेकर कुछ सवाल पैदा होंगे ही. सबसे बड़ा सवाल तो यही है कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस को उस हद तक विकसित करना कितना सही है, जो इंसानी बुद्धि को भी पीछे छोड़ दे. दूसरा सवाल ये है कि तकनीक के जरिए मशीनों में उन जानकारी के प्रवाह को होने दें, जो प्रोपेगैंडा और झूठ से भरे हों.  GPT-4 मॉड्यूल से ये सवाल और भी प्रासंगिक हो गया है. आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का जितना इस्तेमाल बढ़ेगा, उससे कई तरह की नौकरियों के ऑटोमेशन पर जाने की संभावना बढ़ते जाएगी.


उससे भी बड़ा सवाल है कि एआई के जरिए ऐसा डिजिटल दिमाग विकसित हो रहा है, जिसमें मानवीय दिमाग की तरह बुद्धिमता तो हो सकती है, संवेदना नहीं. एक तरह से ये अमानवीय दिमाग विकसित करने जैसा है.


आप कल्पना कीजिए कि एआई के जरिए भविष्य में मशीनों की एक ऐसी फौज तैयार हो जाए, जिससे इंसानी अस्तित्व पर ही खतरा आ जाए. सबसे बड़ा डर तो यही है कि जो भी इस क्षेत्र में निजी तौर से काम कर रहे हैं, अगर वो अपने आप को इतना मजबूत समझने लगेंगे कि उन्हें न तो सरकार का डर रह जाएगा और न ही कायदे-कानून का क्योंकि उनके पास एआई  से बने मशीनों की फौज होगी. अगर किसी महत्वाकांक्षी आदमी के हाथ इस तरह के मॉड्यूल्स लग जाएं, जो अपनी इच्छाओं को पूरा करने के लिए कुछ भी करने को तैयार हो जाए, तो ये समाज और मानवता के लिए किस हद तक परेशानी का सबब बन सकता है.


ओपन लेटर में जिस तरह की आशंकाएं जाहिर की गई है, उसके हिसाब से एआई को विकसित करने की जिम्मेदारी ऐसे लोगों पर पूरी तरह से नहीं छोड़ा जा सकता है, जो लोकतांत्रिक व्यवस्था में अनिर्वाचित हों, और जिनकी कोई जवाबदेही तय न हो.


समाज की बेहतरी के लिए तकनीक का इस्तेमाल होना चाहिए. लेकिन इस प्रक्रिया में ये कतई नहीं होना चाहिए कि कोई मशीन इंसानी दिमाग से भी ज्यादा तेज़ और दक्ष होकर अनियंत्रित तरीके से इंसानी सोच को ही बरगलाने या गुमराह करने का काम करे. या फिर इंसानी सोच को ही बौना साबित कर दे. IQ या इंटेलिजेंस कोशेंट से ज्यादा ताकतवर अगर आर्टिफिशियल  इंटेलिजेंस हो जाए, तो फिर ये सचमुच समाज और मानवता के लिए खतरनाक बन सकता है.


उदाहरण के तौर पर हम किसी विषय पर कुछ लिखना चाहते हैं. अगर कोई शख्स इसे खुद से लिखेगा, तो उसके बारे में अच्छा या बुरा हर पहलू पर गौर करते हुए अपनी राय जाहिर करेगा. यही काम अगर एआई के जरिए बने किसी सिस्टम जैसे  ChatGPT के माध्यम से किया जाएगा, तो फिर एआई के तहत फीड की गई जानकारी को ही वो शख्स अटल सत्य मान लेगा. इतना ही नहीं इस तरह की जानकारी पलक झपकते ही दुनिया के कोने-कोने में पहुंचाई जा सकती है. इस तरह के सिस्टम में कोई अगर किसी विषय पर झूठे और प्रोपगैंडा भरे तथ्यों को फीड कर देता है, तो फिर ये किसी भी सूरत में इंसानी सोच और समाज के लिए खतरनाक ही होगा.


उसी प्रकार से हम देख रहे हैं कि एआई के प्रयोग से बने कई ऐप और साफ्टवेयर आज के वक्त में किसी भी तस्वीर के साथ कुछ भी बदलाव कर दे रहे हैं. अगर इसका सदुपयोग हो, तो फिर तो कोई समस्या नही है. लेकिन अगर दुरुपयोग हुआ तो वो कई लोगों को नुकसान भी पहुंचा सकता है. बानगी के तौर पर किसी के भी चेहरे को किसी के भी शरीर पर चिपका दिया जा सकता है और एआई इसको इतनी बारीकी से अंजाम दे रहा है कि वो बिल्कुल वास्तविक लगेगा. भविष्य में इसका बड़े पैमाने पर इस्तेमाल अपराध को अंजाम देने और लोगों की छवि को खराब करने में भी हो सकता है.


इस तरह के ही कई मसले हैं, जिनको देखते हुए एआई के विकास और इस्तेमाल पर नज़र रखने के साथ ही सोचने की भी जरूरत है. आज ये दुनिया का हर देश मान रहा है कि भविष्य में दुनिया के सामने सबसे बड़ी चुनौती साइबर सिक्योरिटी को सुनिश्चित करने की है. अगर एआई के विकास और इस्तेमाल पर वक्त रहते तर्कसंगत नियंत्रण नहीं लगाया गया, तो आने वाले वक्त में इंसान का महत्व तो घटेगा ही, ये हमारी सभ्यता और समाज के लिए नुकसानदायक साबित होगा.


[ये आर्टिकल निजी विचारों पर आधारित है.]